Baap Ne Betiyon Ko Akela Kyun Chhor Diya |

बेटियों का साया और पिता का पछतावा

अध्याय 1: करीम बख्श का त्याग और इमरान की पढ़ाई

यह कहानी शुरू होती है एक छोटे से गाँव के कच्चे मकान से, जहाँ करीम बख्श नाम का एक अत्यंत परिश्रमी और ईमानदार व्यक्ति रहता था। करीम बख्श की पत्नी का देहांत बहुत पहले हो चुका था। उसका पूरा संसार उसका इकलौता बेटा इमरान था। करीम बख्श गाँव में मज़दूरी करता था। कभी वह खेतों में हल चलाता, तो कभी ईंट-भट्ठों पर भारी बोझ उठाता। उसके फटे हुए कपड़े और चेहरे की झुर्रियां उसके संघर्ष की गवाही देती थीं।

करीम बख्श का एक ही सपना था कि उसका बेटा इमरान पढ़-लिखकर एक बड़ा आदमी बने। वह खुद कई बार भूखा सो जाता ताकि इमरान की स्कूल की फीस समय पर भरी जा सके। इमरान जब 15 साल का हुआ, तो करीम बख्श ने उसे शहर के स्कूल में दाखिल कराया। गाँव वाले अक्सर कहते, “करीम, इतनी मेहनत क्यों करते हो? बेटे को काम पर लगाओ, घर में चार पैसे आएँगे।” लेकिन करीम बख्श मुस्कुराकर कहता, “मेरा बेटा मेरी किस्मत बदलेगा।”

अध्याय 2: इमरान का निकाह और फातिमा का आगमन

वक्त अपनी रफ़्तार से गुज़रता गया। इमरान अब जवान हो चुका था। वह दिखने में सुंदर था, लेकिन उसके मन में अपने पिता के संघर्षों के प्रति वह सम्मान नहीं था जिसकी करीम बख्श को उम्मीद थी। एक दिन करीम बख्श ने इमरान से कहा, “बेटा, अब मेरी उम्र हो रही है, मैं चाहता हूँ कि तुम्हारा निकाह हो जाए।”

पड़ोस के घर में फातिमा नाम की एक नेक और सुशील लड़की रहती थी। फातिमा के माता-पिता भी गरीब थे, लेकिन लड़की बहुत ही आज्ञाकारी थी। करीम बख्श ने फातिमा के घर रिश्ता भेजा और जल्द ही दोनों का सादगी से निकाह हो गया। फातिमा ने घर आते ही सारा काम संभाल लिया। वह करीम बख्श की सेवा एक पिता की तरह करती थी।

लेकिन इमरान इस शादी से खुश नहीं था। उसके दिल में शहर की एक आधुनिक लड़की की तस्वीर बसी थी, जिससे वह काम के दौरान मिला था। वह अक्सर फातिमा से कटा-कटा रहता और घर में बहुत कम बात करता था।

अध्याय 3: जुड़वा बेटियों का जन्म और फातिमा की विदाई

शादी के कुछ समय बाद फातिमा गर्भवती हुई। घर में खुशियों की उम्मीद जगी। फातिमा ने मुस्कुराते हुए इमरान से कहा, “मैं माँ बनने वाली हूँ, क्या आप खुश नहीं हैं?” इमरान ने बस बेरुखी से सिर हिला दिया। करीम बख्श ने अल्लाह का शुक्र अदा किया।

अस्पताल में जब फातिमा को भर्ती कराया गया, तो कुछ घंटों बाद डॉक्टर बाहर आई और कहा, “मुबारक हो, आपके घर दो जुड़वा बेटियां आई हैं।” करीम बख्श की आँखों में खुशी के आँसू छलक आए, लेकिन इमरान का चेहरा उतर गया। उसके लिए बेटियां एक बोझ से कम नहीं थीं।

दुख की बात यह रही कि प्रसव के कुछ दिनों बाद ही फातिमा की तबीयत बहुत बिगड़ गई। वह बहुत कमजोर हो चुकी थी। एक शाम, उसने अपनी दोनों नन्ही बच्चियों को करीम बख्श की गोद में दिया, एक आख़िरी बार इमरान की तरफ देखा और हमेशा के लिए अपनी आँखें मूँद लीं। फातिमा के जाने से घर में मातम छा गया।

अध्याय 4: इमरान का पलायन और बेटियों का बचपन

फातिमा के देहांत के कुछ ही हफ्तों बाद, इमरान का व्यवहार और भी अजीब हो गया। वह बच्चियों को उठाना तो दूर, उनकी तरफ देखना भी पसंद नहीं करता था। एक रात, जब पूरा गाँव सो रहा था, इमरान चुपके से घर से निकल गया। वह शहर चला गया और अपनी उसी प्रेमिका के पास पहुँच गया जिसके लिए उसने अपना घर छोड़ दिया था।

करीम बख्श के लिए यह दोहरा झटका था। जवान बहू चली गई और इकलौता बेटा मुँह मोड़कर भाग गया। गाँव वाले कहने लगे, “करीम, इन बच्चियों को किसी अनाथालय में दे दो, तुम बूढ़े आदमी इन्हें कैसे पालोगे?” करीम बख्श ने बच्चियों को सीने से लगाया और कहा, “ये बेटियां मेरी फातिमा की निशानी हैं, अल्लाह इनकी हिफाजत करेगा।”

करीम बख्श ने बेटियों के नाम रखे—इरा और मारिया। वह खुद उन्हें दूध पिलाता, उनके कपड़े धोता और रात भर जागकर उन्हें सुलाता। उसने फिर से मज़दूरी शुरू की ताकि इन दो जानों का पेट पाल सके।

अध्याय 5: संघर्ष, सिलाई और यूट्यूब का सफर

जैसे-जैसे इरा और मारिया बड़ी हुईं, उन्होंने अपने दादा का संघर्ष देखा। वे दोनों समझ गई थीं कि उनका कोई पिता नहीं है, बस यही बूढ़ा दादा ही उनका सब कुछ है। बड़ी बहन इरा ने घर पर ही सिलाई का काम सीखना शुरू किया। गाँव की एक दयालु महिला ने उसे अपनी पुरानी सिलाई मशीन दे दी। इरा दिन-रात कपड़े सिलती और उससे जो पैसे मिलते, वह दादा को दे देती।

दूसरी तरफ, छोटी बहन मारिया को तकनीक में रुचि थी। उसने पड़ोसियों के फोन पर देखा कि लोग कैसे वीडियो बनाते हैं। उसने इरा के सिलाई के हुनर और दादा की कहानियों पर आधारित वीडियो बनाना शुरू किया। धीरे-धीरे मारिया का ‘यूट्यूब’ चैनल गाँव से बाहर तक मशहूर हो गया। घर की आर्थिक स्थिति सुधरने लगी।

अध्याय 6: करीम बख्श का अंत और बेटियों की सफलता

करीम बख्श अब बहुत बूढ़ा और बीमार हो चुका था। एक दिन उसने दोनों पोतियों को पास बुलाया और कहा, “मेरी बेटियों, तुमने मेरा सिर गर्व से ऊँचा कर दिया। कभी हिम्मत मत हारना।” उसी रात करीम बख्श ने अंतिम सांस ली।

इरा और मारिया अब अकेली थीं, लेकिन वे आत्मनिर्भर बन चुकी थीं। अपनी मेहनत और यूट्यूब से हुई कमाई से उन्होंने गाँव में ही एक बहुत बड़ा और सुंदर बंगला बनवाया। वे अब गाँव की सबसे सफल युवतियां मानी जाती थीं। उन्होंने कई गरीब लड़कियों के लिए सिलाई केंद्र भी खोल दिया।

अध्याय 7: इमरान का बुरा वक्त और एक्सीडेंट

उधर शहर में इमरान की जिंदगी ने करवट ली। जिस औरत के लिए उसने अपना परिवार छोड़ा था, वह उसकी सारी कमाई उड़ाती रही। एक दिन सड़क पार करते समय इमरान का एक भयानक एक्सीडेंट हो गया। डॉक्टर ने बताया कि उसके दोनों पैर अब कभी काम नहीं करेंगे।

व्हीलचेयर पर आए इमरान को उसकी पत्नी ने बोझ समझकर घर से निकाल दिया। इमरान के पास अब न पैसे थे, न सेहत, और न ही कोई सहारा। वह शहर की सड़कों पर भीख मांगने को मजबूर हो गया। हर रात उसे अपने पिता और उन दो मासूम बच्चियों का चेहरा याद आता जिन्हें वह छोड़ आया था।

अध्याय 8: गाँव वापसी और पश्चाताप

पछतावे की आग में जलते हुए, एक दिन इमरान ने हिम्मत जुटाई और व्हीलचेयर के सहारे अपने गाँव की ओर निकल पड़ा। जब वह गाँव की सीमा पर पहुँचा, तो उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ। जहाँ उसका कच्चा मकान था, वहाँ अब एक आलीशान बंगला खड़ा था।

गाँव वालों ने उसे पहचान लिया। “देखो, इमरान वापस आ गया!” सब लोग उसे नफरत की नज़र से देख रहे थे। इमरान रोते हुए बंगले के गेट पर पहुँचा। गेट खुला और सामने दो सुंदर, शालीन और सफल युवतियां खड़ी थीं। वे इरा और मारिया थीं।

इमरान फूट-फूट कर रोने लगा। उसने कांपते हुए कहा, “बेटियों, मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ। मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हें बोझ समझा था, लेकिन आज मैं खुद दुनिया पर बोझ बन गया हूँ।”

अध्याय 9: बेटियों की ममता और माफी

इरा और मारिया के मन में अपने पिता के प्रति गुस्सा तो था, लेकिन वे करीम बख्श के संस्कारों में पली-बढ़ी थीं। मारिया ने आसमान की तरफ देखा और फिर अपनी बहन का हाथ थामा। दोनों ने आगे बढ़कर अपने पिता की व्हीलचेयर पकड़ी और उन्हें घर के अंदर ले आईं।

इरा ने धीमे स्वर में कहा, “अल्लाह के लिए हमने आपको माफ किया। आप हमारे पिता हैं, भले ही आपने हमें छोड़ दिया था, लेकिन हम आपको इस हाल में नहीं छोड़ सकतीं।” इमरान की आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उसे अहसास हुआ कि जिसे उसने ‘पत्थर’ समझकर फेंका था, वही आज उसके लिए ‘हीरा’ बनकर चमकी हैं।

अध्याय 10: एक नया जीवन और संदेश

इमरान अब अपनी बेटियों के साथ रहने लगा। इरा और मारिया ने उसका सबसे अच्छे अस्पताल में इलाज कराया। इमरान ने बाकी की जिंदगी अल्लाह की इबादत और अपनी बेटियों की सेवा में बिताने का फैसला किया। वह अक्सर गाँव के लोगों को बताता, “बेटियां खुदा की रहमत होती हैं। इन्हें कभी बोझ मत समझना, क्योंकि जब दुनिया साथ छोड़ देती है, तब यही बेटियां सहारा बनती हैं।”

गाँव का वह बंगला आज भी ‘करीम बख्श पैलेस’ के नाम से जाना जाता है, जो मेहनत, सब्र और बेटियों के प्यार का प्रतीक है।

कहानी का सार

यह कहानी हमें सिखाती है कि इंसान का अहंकार और स्वार्थ उसे अपनों से दूर कर सकता है, लेकिन निस्वार्थ प्रेम और मेहनत कभी बेकार नहीं जाती। बेटियां परिवार की वह जड़ें होती हैं जो आँधी में भी घर को गिरने नहीं देतीं।

समाप्त