Buhri Saas Ke Sath Bahu Ny Zulm Ki Inteha Kar Di

सफलता की कीमत और माँ का सम्मान: एक मार्मिक गाथा

रोहित मेहरा आज जिस मुकाम पर खड़ा था, वहां तक पहुंचने का सपना उसने बरसों पहले देखा था। मुंबई के एक पॉश इलाके में स्थित उसका विशाल बंगला, चमकते शीशों, संगमरमर के फर्श और आधुनिक फर्नीचर से सजा हुआ था। गेट के बाहर महंगी गाड़ियां कतार में खड़ी रहतीं और भीतर कदम रखते ही एक ऐसी खामोश शानो-शौकत महसूस होती जो सिर्फ भारी बैंक बैलेंस के दम पर हासिल की जा सकती है।

रोहित मेहरा एक बड़ा बिजनेसमैन था—वह शख्स जिसका नाम बाजार में भरोसे की पहचान माना जाता था। कंपनी के बोर्डरूम्स में उसकी बात आखिरी होती, अखबारों में उसकी कामयाबियों के चर्चे होते और सामाजिक महफिलों में लोग उससे हाथ मिलाने को फक्र समझते। बाहर से देखने पर उसकी जिंदगी मुकम्मल थी। एक शिक्षित, सुंदर पत्नी अनन्या मेहरा, जो उच्च वर्ग से ताल्लुक रखती थी; महंगे परिधान, सलीखेदार बातचीत और सामाजिक शिष्टाचार में वह मशहूर थी। दो नन्हे बच्चे जिन्हें घर की खुशी समझा जाता था। घर में आया, खानसामा, ड्राइवर सब कुछ मौजूद था। हर सुविधा, हर आराम, हर ऐश—मानो नियति ने रोहित पर कोई कमी नहीं छोड़ी थी।

लेकिन इस चमकते दृश्य के पीछे एक ऐसा कोना भी था जिस पर बहुत कम लोगों की नजर पड़ती थी। घर के एक सादे से कमरे में रोहित की मां शारदा देवी रहती थीं। वही शारदा देवी जिन्होंने बरसों पहले एक तंग और अंधेरे किराए के कमरे में रोहित को पाल-पोसकर बड़ा किया था। वह औरत जिनके हाथों की सख्ती और आंखों की थकान उनकी अनगिनत कुर्बानियों की गवाह थी। मगर अब इस विशाल बंगले में वह मां अक्सर पृष्ठभूमि में रहती—खामोश, कम बोलने वाली और खुद को गैर-महत्वपूर्ण रखने वाली।

रोहित रोज सुबह जल्दी निकल जाता। कभी बोर्ड मीटिंग, कभी शहर से बाहर बिजनेस ट्रिप, कभी निवेशकों के साथ लंच। वापसी पर भी उसका ध्यान फोन कॉल्स, ईमेल्स और सौदों में उलझा रहता। मां से बस औपचारिक सा हाल पूछ लेना या कभी-कभार एक औपचारिक मुस्कान—यही उसका रोजमर्रा बन चुका था। वह यह नहीं समझ पाया था कि मां की खामोशी सुकून नहीं बल्कि ‘आदत बन चुकी कुर्बानी’ थी।

अनन्या मेहरा के लिए यह घर एक सिस्टम था। उसकी नजर में शारदा देवी घर की बुजुर्ग जरूर थीं, मगर उसकी सोच वर्गीय मानसिकता से ग्रस्त थी। शारदा देवी कभी शिकायत नहीं करती थीं। उन्हें डर था कि कहीं वे अपने ही बेटे पर बोझ न बन जाएं। यही सोच उन्हें हर दिन और ज्यादा खामोश बनाती चली गई।

वह दृश्य जिसने सब बदल दिया

उस दिन रोहित सामान्य से कहीं पहले घर लौट आया था। एक अहम मीटिंग आखिरी पल में रद्द हो गई थी। गाड़ी गेट के भीतर दाखिल हुई तो हमेशा की तरह सब कुछ शांत था। रोहित ने धीरे से मुख्य दरवाजा खोला ताकि किसी को खबर ना हो। वह सीधे अपने कमरे की ओर बढ़ा, लेकिन बाथरूम के पास से आती सफाई के ब्रश की रगड़ ने उसके कदम रोक दिए।

बाथरूम का दरवाजा आधा खुला हुआ था। रोहित ने अनायास ही अंदर झाँका और जो उसने देखा, उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। उसकी बुजुर्ग माँ, शारदा देवी, फर्श पर झुकी हुई बैठी थीं। उनके हाथों में पीले रबर के दस्ताने थे और वे टॉयलेट साफ कर रही थीं। उनके थके हुए कंधों पर एक बेबी कैरियर बंधा हुआ था, जिसमें रोहित के दोनों नन्हे बच्चे सो रहे थे। बच्चों का बोझ उनकी बूढ़ी पीठ पर था और वे फर्श रगड़ रही थीं।

वही हाथ, जिन्होंने रोहित का भविष्य सिलने के लिए रातों को सिलाई मशीन चलाई थी, आज बुढ़ापे में टॉयलेट साफ कर रहे थे। रोहित का सीने में जैसे कुछ टूट सा गया। तभी उसकी नजर अनन्या पर पड़ी, जो पास ही खड़ी बेरुखी से यह सब देख रही थी।

“माँ!” रोहित के मुँह से बस इतना ही निकला।

शारदा देवी चौंक कर ऊपर देखने लगीं। उनकी आंखों में कोई शिकायत नहीं थी, बस वही पुरानी ममतामयी मुस्कान थी। “अरे बेटा, तुम इतनी जल्दी आ गए? मैं बस थोड़ी सफाई कर रही थी, बच्चे सो गए थे तो सोचा उतारूंगी तो जाग जाएंगे।”

आत्म-ग्लानि और संघर्ष

रोहित को अपनी सफलता खोखली लगने लगी। उसे वह समय याद आया जब माँ भूखी सोकर उसे खिलाती थी। उसे अपनी बेखबरी पर तीव्र गुस्सा आया। उसने अनन्या से बात करने का फैसला किया। स्टडी रूम में जब उसने अनन्या से पूछा कि यह सब कब से चल रहा है, तो अनन्या का जवाब और भी चुभने वाला था।

“जब से माँ हमारे साथ रहने आई हैं… रोहित, वे खुद काम करना चाहती हैं। उन्हें व्यस्त रहना अच्छा लगता है,” अनन्या ने सफाई दी।

रोहित ने मेज पर हाथ पटकते हुए कहा, “व्यस्त रहना और मजबूर होना दो अलग बातें हैं अनन्या। मेरी माँ ने जवानी मेरी परवरिश में गुजार दी और आज हमने उन्हें बिना तनख्वाह की नौकरानी बना दिया है? यह मेरा घर है और इस घर में मेरी माँ कोई किरदार निभाने वाली नौकरानी नहीं, बल्कि इस घर की नींव हैं।”

रोहित ने उस दिन तय कर लिया कि अब चीजें पहले जैसी नहीं रहेंगी।

नया सवेरा और पुनरुद्धार

अगले ही दिन से रोहित ने घर के नियम बदल दिए। बच्चों के लिए अलग स्टाफ और सफाई के लिए अतिरिक्त कर्मचारी रखे गए। उसने माँ को डॉक्टर के पास ले जाकर उनके घुटनों का इलाज शुरू करवाया। लेकिन सबसे बड़ा बदलाव रोहित के व्यवहार में आया। अब वह दफ्तर जाने से पहले माँ के साथ बैठकर चाय पीता, उनकी यादें सुनता।

एक दिन रोहित ने माँ से उनके पुराने शौक के बारे में पूछा। माँ ने सकुचाते हुए बताया कि उन्हें कभी पेंटिंग का शौक था। रोहित ने बिना बताए माँ के कमरे में एक छोटा सा आर्ट स्टूडियो तैयार करवा दिया—रंग, कैनवस और ब्रश।

शारदा देवी के हाथों में जब बरसों बाद ब्रश आया, तो उनके चेहरे की झुर्रियां मुस्कान में बदल गईं। वे कैनवस पर अपनी जिंदगी के रंग उकेरने लगीं। धीरे-धीरे अनन्या का दिल भी पिघलने लगा। एक दिन अनन्या ने खुद जाकर माँ से पेंटिंग सीखने की इच्छा जताई। दो अलग दुनिया की औरतें एक ही कैनवस के सामने बराबरी से खड़ी थीं।

निष्कर्ष: असली कामयाबी

वक्त बीतने के साथ, वह बंगला अब सिर्फ ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि ‘घर’ बन गया था। अब वहां आदेशों का शोर नहीं, बल्कि रिश्तों की खुशबू थी। शारदा देवी अब फर्श पर नहीं, बल्कि बाग में आरामकुर्सी पर बैठकर अपनी कला को जीती थीं।

कहानी का अंत रोहित के इस अहसास के साथ होता है कि इंसान की असली इज्जत उसके बैंक बैलेंस या ओहदे से नहीं, बल्कि उस व्यवहार से आंकी जाती है जो वह उन लोगों के साथ रखता है जिन्होंने उसे तब सब कुछ दिया जब उसके पास देने को कुछ भी नहीं था। रोहित मेहरा आज सच में कामयाब था, क्योंकि उसकी माँ की आँखों में अब ‘थकान’ नहीं, ‘सम्मान’ की चमक थी।

“असली कामयाबी वह नहीं जिसे दुनिया देखे, बल्कि वह है जिसे माँ महसूस करे।”