DM के office पहुँचा एक भिखारी पति — और डीएम साहिबा ने जो किया, उसे देखकर सबकी आँखें भर आईं।

नंदिनी और राघव: प्रेम, त्याग और पुनर्जन्म की कहानी”
प्रस्तावना
यह कहानी एक जिला अधिकारी, नंदिनी सिंघानिया और उसके खोए हुए पति राघवेंद्र प्रताप सिंह की है। यह सिर्फ एक प्रेम कथा नहीं, बल्कि त्याग, संघर्ष, और समाज की सीमाओं को तोड़ने की गाथा है। आइए, इस मार्मिक यात्रा में डूब जाएँ।
अध्याय 1: सत्ता के गलियारों में एक अनसुनी पुकार
जिले का सबसे व्यस्त इलाका। डीएम ऑफिस के बाहर चिलचिलाती धूप थी, लेकिन भीतर एसी की ठंडक और फाइलों की सरसराहट। नंदिनी सिंघानिया, जिले की डीएम, अपने ऑफिस में बैठी थी। सादी हैंडलूम साड़ी, पतली घड़ी, और चेहरे पर ऐसा तेज कि कोई भी नजरें झुका ले। लेकिन आज वह बेचैन थी। बार-बार खिड़की से बाहर देखती थी, जहाँ पुलिस और भीड़ के बीच हलचल हो रही थी।
पीए मिश्रा जी से पूछती हैं, “बाहर क्या शोर है?”
मिश्रा जी बताते हैं, “कोई पागल भिखारी है, सुबह से गेट पर खड़ा है, अंदर आने की जिद कर रहा है। कहता है, ‘मुझे नंदू से मिलना है।’”
नंदू… यह शब्द सुनते ही नंदिनी के हाथ रुक जाते हैं। वर्षों बाद किसी ने उसे इस नाम से पुकारा था। अचानक बाहर चीख सुनाई देती है, “नंदू, देख तेरा राघव आया है!”
नंदिनी की धड़कनें तेज हो जाती हैं। वह दौड़ती है, गरिमा, प्रोटोकॉल सब भूलकर।
बाहर पुलिस दो फटेहाल भिखारी को घसीट रही थी। “मुझे नंदिनी से मिलना है,” वह चिल्ला रहा था।
नंदिनी सीढ़ियों पर खड़ी होकर चिल्लाती है, “रुको!”
पुलिस वाले रुक जाते हैं। भीड़ सन्न। नंदिनी उस भिखारी को पहचान लेती है – वही नैन नक्श, वही आंखें। “राघव…”
वह उसके पैरों में गिर जाती है, रोती है। “तुम कहाँ थे राघव?”
राघव शर्म से अपने हाथ पीछे छुपा लेता है। “पहचान लिया तूने? लगा था, भूल गई होगी।”
नंदिनी उसका हाथ पकड़कर ऑफिस में ले जाती है। सब हैरान। “यह मेरे पति हैं, राघवेंद्र प्रताप सिंह।”
अध्याय 2: अतीत की गलियों में
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी, दस साल पहले।
नंदिनी गरीब परिवार की होनहार लड़की थी। पिता स्कूल में क्लर्क, माँ सिलाई करती थी। सपना था, आईएएस बनना। लाइब्रेरी ही सहारा थी।
राघव – जमींदार परिवार का इकलौता बेटा, बिंदास, दिल का राजा।
दोनों की मुलाकात एक किताब को लेकर झगड़े में होती है।
“यह किताब मैंने पहले देखी थी,” नंदिनी कहती है।
राघव हंसता है, “देखना और हासिल करना दोनों में फर्क है।”
फिर किताब उसे दे देता है। दोस्ती शुरू होती है।
राघव नंदिनी की मेहनत देखता है। कैसे वह लंच के पैसे बचाकर फोटो कॉपी करवाती है। धीरे-धीरे दोनों करीब आ जाते हैं।
यूपीएससी का फॉर्म भरने का समय आता है। नंदिनी के पिता बीमार पड़ जाते हैं। पैसे नहीं। नंदिनी हार मान लेती है।
राघव अपनी बुलेट, सोने की चैन बेच देता है, पिता की तिजोरी से पैसे चुराता है।
“यह स्कॉलरशिप है, जब अफसर बन जाओगी, लौटा देना।”
नंदिनी दिल्ली चली जाती है। राघव वादा करता है, इंतजार करेगा।
अध्याय 3: टूटन और बिछड़न
दो साल बाद नंदिनी आईएएस बन जाती है।
फोन करती है, नंबर बंद। दोस्तों से पूछती है, “राघव कहाँ है?”
“उसके बाप ने घर से निकाल दिया।”
राघव ने चोरी की थी, लेकिन नंदिनी का नाम नहीं लिया।
नंदिनी इलाहाबाद लौटती है, राघव को ढूंढती है। कोई कहता है, मर गया।
वह टूट जाती है, लेकिन शादी नहीं करती।
सात साल बाद, वही राघव आज डीएम ऑफिस के बाहर भिखारी बनकर खड़ा था।
अध्याय 4: घावों की कहानी
नंदिनी राघव को घर ले आती है।
बाथरूम में ले जाती है।
राघव अपना चेहरा आईने में देखकर डर जाता है।
शर्ट उतारता है, नंदिनी चीख पड़ती है।
सिगरेट से जलाए निशान, बेल्ट के घाव, टूटा पैर।
“यह सब कैसे हुआ?”
राघव बताता है, “सड़क पर रहने का किराया है। मजदूरी की, गटर साफ किया।
एक रात नशेड़ियों ने पीटा, पैर टूट गया।
तीन दिन नाली के किनारे पड़ा रहा।
फिर एक बूढ़े भिखारी ने बचाया।
तेरी तस्वीर देखी अखबार में, तू आईएएस बन गई थी।
मैंने अपनी मौत का फैसला कर लिया।
मैं तुझे शर्मिंदा नहीं करना चाहता था।”
नंदिनी रोती है, “अगर तुम नाली में भी पड़े होते, मैं तुम्हारे साथ रहती।”
सिंदूर की डिब्बी निकालती है, राघव के पैरों पर सिर रख देती है।
अध्याय 5: समाज की जंग
मीडिया में वीडियो वायरल।
“क्या डीएम मानसिक रूप से अस्वस्थ है?”
नंदिनी प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाती है।
“आप जिसे भिखारी कह रहे हैं, वही मेरे पति हैं।
अगर इनसे दिक्कत है, तो मैं इस्तीफा देने को तैयार हूं।”
भीड़ में राघव के पिता आते हैं।
“मुझे माफ कर दे बेटे।”
राघव पिता के सीने से लग जाता है।
प्रशासन जांच बिठाता है, लेकिन समाज बदल चुका था।
राघव का इलाज शुरू होता है।
नंदिनी मां की तरह सेवा करती है।
धीरे-धीरे राघव सामान्य जीवन में लौटता है।
अध्याय 6: पुनर्जन्म
दो साल बाद, टाउन हॉल में आश्रय गृह का उद्घाटन।
नंदिनी मंच पर, “इस प्रोजेक्ट की फंडिंग मेरे पति राघव ने दी है।”
राघव मंच पर आता है।
“मैं जानता हूं, सड़क पर भूख क्या होती है।
प्यार में ताजमहल नहीं, इंसान बनाना असली प्यार है।
अब कोई राघव भूख से नहीं मरेगा।”
राघव फाउंडेशन बनता है।
गरीबों के लिए दान करता है।
नंदिनी गर्व से कहती है, “तुमने मुझे बनाया, मैंने तुम्हें बचाया। हिसाब बराबर।”
राघव हंसता है, “प्यार में हिसाब नहीं होता। बस बेहिसाब होता है।”
उपसंहार
सूरज ढल रहा था, लेकिन उनकी जिंदगी में अब अंधेरा नहीं था।
यह कहानी सिर्फ नंदिनी और राघव की नहीं, हर उस इंसान की है, जिसने प्रेम और त्याग को समझा है।
समाज ने राघव को भिखारी कहा, लेकिन नंदिनी ने उसके त्याग को पहचाना।
सच्चा प्रेम वही है, जो टूटे हुए को समेट ले।
पद, प्रतिष्ठा, पैसा – सब प्रेम और मान्यता के आगे छोटे हैं।
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