Ghareeb Boodhi Aurat Jo Anday Bechti Thi – Dekho Uski Zalim Bahu Ne Kya Kiya

अंडे बेचने वाली शहनाज और बेसहारा अरूज की कहानी

1. शहनाज का जीवन और संघर्ष

शहनाज की उम्र पचपन से साठ के बीच थी, लेकिन उसकी आंखों में अनुभव की गहराई और चेहरे पर थकान की रेखाएं साफ झलकती थीं। उसकी जिंदगी एक आम भारतीय महिला की तरह नहीं थी, जो अपने परिवार के साथ सुकून से रह सके। उसका बेटा और बहू, जिनसे उसने जीवन भर उम्मीदें लगाई थीं, अब उसी के लिए बोझ बन गए थे। बहू तो जैसे उसे घर में देखना भी पसंद नहीं करती थी। बेटा, जो कभी मां की गोद में सिर रखकर सोता था, अब अपनी पत्नी के कहने पर मां से दूर हो गया था।

शहनाज का घर एक पुरानी, टूटी-फूटी सी छत के नीचे था। उसमें न तो कोई आराम की चीज थी, न ही कोई ऐसा कोना जहाँ वह सुकून से बैठ सके। रोज सुबह वह उठती, अपने पुराने कपड़े पहनती, और स्टेशन या बस अड्डे पर उबले अंडे बेचने निकल जाती। सर्दी की ठिठुरन में उसकी चादर उसे गर्मी देने में नाकाम रहती, लेकिन उसके पास और कोई विकल्प नहीं था। उसके पास एक पुरानी टोकरी थी, जिसमें वह अंडे रखती थी। वह हर ट्रेन की खिड़की के पास जाकर मुसाफिरों को अंडे खरीदने के लिए आवाज लगाती।

दिनभर की भागदौड़ के बाद जब वह घर लौटती, तो बहू अपने बच्चों को लेकर कमरे में बंद होती, रजाई में दुबकी रहती। बेटा भी थककर सो चुका होता। शहनाज के पास घर की एक चाबी थी, जिससे वह दरवाजा खोलकर अंदर आती। घर में सन्नाटा पसरा रहता। वह अपनी खाली टोकरी एक तरफ रखती, कच्चे अंडे दूसरी तरफ रखती। रसोई में दोपहर की सूखी रोटी पड़ी होती, सलन नहीं होता। वह अपने पास बचे अंडे, प्याज, हरी मिर्च, टमाटर काटकर थोड़ा सा मसाला बनाती, उबले अंडों के टुकड़े डालकर सालन बनाती और सूखी रोटी से खाना खा लेती।

कमरे में फटी-पुरानी रजाई थी, जिसे देखकर उसे अपने हालात पर तरस आता। वह खुद ही कमरे की सफाई करती, क्योंकि बहू या बेटा उसकी मदद नहीं करते थे। उसकी बूढ़ी हड्डियां दर्द करतीं, लेकिन गंदगी में सोना भी मुमकिन नहीं था। वह खुदा का शुक्र अदा करती कि कम से कम सिर छुपाने को एक छत तो है।

2. स्टेशन पर एक अनजान मुलाकात

एक दिन, जब शहनाज स्टेशन पर अंडे बेच रही थी, उसकी नजर एक लड़की पर पड़ी। लड़की बहुत कमजोर और परेशान थी। उसकी आंखों में गहरे दुख और बेबसी के निशान थे। शहनाज का दिल पसीज गया। वह लड़की के पास गई और प्यार से पूछा, “बेटी, क्या बात है? तुम इतनी मजबूर क्यों लग रही हो?”

लड़की की आंखों में आंसू आ गए। उसने कांपती आवाज में कहा, “अम्मा जी, मैं बेसहारा हूं। मेरे मां-बाप अब इस दुनिया में नहीं हैं। कोई मुझे सहारा देने वाला नहीं है। मैं कई दिनों से भूखी हूं, कहीं पनाह नहीं मिल रही।”

शहनाज को लड़की पर बहुत तरस आया। उसे लगा, जैसे उसकी अपनी तकलीफें इस लड़की की तकलीफों से जुड़ी हुई हैं। उसने लड़की को गले लगा लिया और कहा, “बेटी, तुम मेरी बेटी बन जाओ। मैं तुम्हारा सहारा बनूंगी, और तुम मेरा। इस दुनिया में कोई किसी का नहीं है, लेकिन हम एक-दूसरे का सहारा बन सकते हैं।”

लड़की ने उसका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। शहनाज ने अपने बाकी अंडे स्टेशन पर बेचे और लड़की को लेकर घर आ गई।

3. घर में तूफान और बहू की बेरुखी

घर पहुंचकर शहनाज ने लड़की को अपने कमरे में बैठाया। बहू ने जब लड़की को देखा, तो आग बबूला हो गई। उसने ताना मारा, “पहले तुम्हारा बोझ कम था जो इस गंध की गठरी को भी ले आई?”

शहनाज ने जवाब दिया, “तुम लोग कौन सा मुझे कमा कर खिला रहे हो? बकवास बंद करो।”

बहू ने गुस्से में डंडा उठाकर शहनाज के सिर पर दे मारा। शहनाज बेहोश हो गई। बहू ने लड़की को चारपाई से बांध दिया और जब शहनाज का बेटा घर आया, तो बहू ने झूठ बोल दिया कि लड़की ने उसकी मां को मारा है।

बेटा मां की हालत देखकर परेशान हो गया, लेकिन बहू की झूठी कहानी पर यकीन कर लिया। उसने लड़की की रस्सियां खोल दीं, लेकिन शहनाज को डांटने लगा कि वह अंडे बेचना छोड़ दे और इज्जत से घर बैठे। शहनाज ने बेटे की बातों को नजरअंदाज कर दिया, क्योंकि उसे अब अरूज (लड़की) की फिक्र थी।

4. अरूज की सच्चाई और उसका दर्द

अरूज ने शहनाज का हाथ पकड़ा और उसे घर से बाहर ले गई। सड़क पर पहुंचकर अरूज ने एक राहगीर से मोबाइल लेकर एक नंबर मिलाया। थोड़ी देर बाद एक बड़ी गाड़ी आई और दोनों उसमें बैठ गए। शहनाज हैरान थी कि अरूज, जो खुद को बेसहारा बता रही थी, अचानक गाड़ी में बैठकर एक बड़े बंगले में पहुंच गई।

बंगले में अरूज ने सबको बताया कि शहनाज उसकी नानी हैं और अब वे इसी घर में रहेंगी। रिश्तेदारों ने घर खाली कर दिया। शहनाज को समझ नहीं आ रहा था कि यह सब कैसे हुआ। अरूज ने शहनाज को अपनी कहानी सुनाई—उसके मां-बाप की मौत के बाद सारे रिश्तेदार उनकी दौलत के लालच में घर आ गए थे। अरूज ने घर छोड़ दिया था, ताकि देख सके कि कौन उसे सच में खोजता है। किसी ने नहीं खोजा, लेकिन शहनाज ने उसे अपनाया। इसलिए अरूज ने फैसला किया कि शहनाज ही उसकी असली मां है।

5. नई जिंदगी की शुरुआत

अब शहनाज और अरूज एक साथ बंगले में रहने लगे। अरूज ने शहनाज का पूरा ख्याल रखा। शहनाज ने पहली बार जिंदगी में आराम और प्यार महसूस किया। उसे अच्छा खाना, अच्छे कपड़े, और सबसे बढ़कर—इज्जत मिली। अरूज को मां मिल गई थी, और शहनाज को बेटी। दोनों एक-दूसरे के साथ खुश रहने लगीं।

शहनाज कभी-कभी अपने बेटे के बारे में सोचती थी, लेकिन अब उसे एहसास हो गया था कि असली रिश्ते खून से नहीं, बल्कि दिल से बनते हैं। उसने अपने बेटे और बहू की बेरुखी को भुला दिया। अरूज ने उसे सिखाया कि जिंदगी में आगे बढ़ना ही सही है।

6. बेटे से आखिरी मुलाकात

एक दिन शहनाज शॉपिंग करके लौट रही थी, तभी उसका बेटा सामने आ गया। बेटे ने मां को अच्छी हालत में देखकर हाथ जोड़ लिए और रोने लगा। उसने बताया कि उसकी बीवी ने सच्चाई बता दी है, और उनका बेटा मर गया है। बेटे ने मां से माफी मांगी और उसे अपने साथ चलने को कहा। शहनाज ने इंकार कर दिया। उसने अरूज का पता बेटे को दिया और कहा, “जब मेरी याद आए तो मिलने आ जाना। मुझे दौलत और पैसों की जरूरत नहीं थी; बस चाहती थी कि मेरा बेटा मेरा ख्याल रखे और बहू मुझसे प्यार करे।”

शहनाज ने बेटे को माफ कर दिया और कहा, “अल्लाह ने तुम जैसा नाफरमान बेटा दिया तो अरूज जैसी बेटी भी मेरी जिंदगी में भेज दी है। अब मैं अपनी बेटी के साथ बहुत खुश हूं।”

7. भावनाओं का विस्तार और संवाद

शहनाज और अरूज की बातचीत

एक शाम, जब शहनाज बंगले के बगीचे में बैठी थी, अरूज उसके पास आई।
अरूज: “अम्मा, क्या आपको अपने पुराने घर की याद आती है?”
शहनाज: “बेटी, घर की याद तो आती है, लेकिन वहां जो दर्द मिला, वह अब याद नहीं करना चाहती। यहां मुझे सुकून मिला है, तुम्हारा प्यार मिला है।”
अरूज: “मैंने भी मां-बाप का प्यार खोया है, लेकिन आपके साथ सब कुछ फिर से पा लिया।”

बहू और बेटे की आपसी बातचीत

बहू: “देखो, तुम्हारी मां ने तो हमें छोड़ दिया। अब क्या फर्क पड़ता है?”
बेटा: “फर्क पड़ता है, क्योंकि मां का दिल तोड़ने की सजा हमें मिल गई। हमारा बेटा चला गया। अब समझ में आया कि मां की दुआओं में कितनी ताकत होती है।”

शहनाज की आत्मचिंतन

रात को शहनाज अपने कमरे में बैठी थी।
शहनाज (सोचती है): “जिंदगी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है। कभी अपनों से धोखा मिला, कभी गैरों से सहारा। लेकिन खुदा ने आखिरकार मुझे अरूज जैसी बेटी दी, जो मेरी हर जरूरत का ख्याल रखती है।”

8. अरूज का बड़ा फैसला

अरूज ने शहनाज के लिए एक बड़ा फैसला लिया। उसने बंगले में एक कमरा खास तौर पर शहनाज के लिए सजाया। वहां उसकी पसंद की चीजें रखीं—पुरानी किताबें, गर्म रजाई, सुंदर पर्दे। शहनाज को अब हर सुबह अरूज चाय और नाश्ता देती, उसके साथ बैठकर बातें करती। शहनाज को अब अहसास हुआ कि असली सुख परिवार के प्यार में है, न कि दौलत में।

एक दिन अरूज ने शहनाज से कहा, “अम्मा, मैं चाहती हूं कि आप अपनी जिंदगी की सारी तकलीफें भूल जाएं। अब हम मिलकर नई शुरुआत करेंगे।”
शहनाज मुस्कराई और बोली, “बेटी, जब तक तू मेरे साथ है, मुझे किसी चीज की कमी नहीं है।”

9. समाज की नजरें और बदलाव

शहनाज की कहानी धीरे-धीरे आसपास के लोगों तक पहुंचने लगी। पड़ोसी, रिश्तेदार और पुराने जान-पहचान वाले हैरान थे कि शहनाज, जो कभी फटे कपड़ों में अंडे बेचती थी, अब बंगले में राज करती है। कुछ लोग ताने मारते, तो कुछ उसकी किस्मत की तारीफ करते। लेकिन शहनाज को अब इन बातों से फर्क नहीं पड़ता था।

एक दिन, पुराने पड़ोसी मिलने आए। उन्होंने शहनाज से पूछा, “बहन, तुम्हारी किस्मत कैसे बदल गई?”
शहनाज ने मुस्कराकर जवाब दिया, “किस्मत बदलती नहीं, खुदा जब चाहता है तो इंसान को उसकी मेहनत का फल देता है। और सबसे बड़ी दौलत प्यार है, जो मुझे अरूज से मिला।”

10. अंत की ओर—सच्चे रिश्ते और जिंदगी का संदेश

समय बीतता गया। शहनाज और अरूज की जिंदगी में खुशियां लौट आईं। शहनाज ने अरूज को हर त्योहार, हर खुशी में मां की तरह गले लगाया। अरूज ने शहनाज को अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा सहारा माना। दोनों ने मिलकर कई जरूरतमंदों की मदद भी शुरू की। शहनाज ने अपने पुराने अनुभवों से सीखा कि दुख बांटने से कम होता है, और प्यार देने से बढ़ता है।

एक दिन, शहनाज ने अरूज से कहा, “बेटी, तूने मुझे न सिर्फ सहारा दिया, बल्कि मेरा वजूद भी लौटा दिया। अब मैं चाहती हूं कि हम मिलकर और भी बेसहारा लोगों की मदद करें।”
अरूज ने खुशी-खुशी हामी भर दी।

11. बेटे की वापसी और माफ़ी

कुछ महीनों बाद, शहनाज का बेटा फिर मिलने आया। उसने अपनी मां के सामने सिर झुका दिया और कहा, “मां, मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हारे साथ बहुत बुरा किया। अब मैं समझ गया हूं कि मां की दुआओं के बिना जिंदगी अधूरी है।”

शहनाज ने बेटे को गले से लगा लिया और कहा, “बेटा, मैंने तुझे माफ कर दिया। लेकिन अब मेरी जिंदगी अरूज के साथ है। जब भी याद आए, मिल लिया कर।”

12. उपसंहार—जिंदगी का असली अर्थ

शहनाज की कहानी हमें यह सिखाती है कि जिंदगी में मुश्किलें चाहे जितनी भी हों, अगर इंसान का दिल साफ हो और वह किसी का सहारा बन सके, तो खुदा भी उसे सहारा देता है। असली रिश्ते खून से नहीं, बल्कि दिल से बनते हैं। शहनाज को अपने बेटे से प्यार था, लेकिन उसे बेटी अरूज में सच्चा प्यार और इज्जत मिली। दोनों ने एक-दूसरे का सहारा बनकर अपनी जिंदगी को खुशहाल बना लिया।

शहनाज ने अपने जीवन के आखिरी वर्षों को अरूज के साथ बिताया, और दोनों ने मिलकर कई बेसहारा लोगों की मदद की। शहनाज ने सीखा कि इंसान की असली पहचान उसके कर्मों में है, न कि उसके रिश्तों में। वह अब हर दिन खुदा का शुक्र अदा करती थी।

अंतिम संदेश

शहनाज और अरूज की कहानी एक मिसाल है उन सभी लोगों के लिए, जो जिंदगी की कठिनाइयों से हार मान लेते हैं। यह कहानी बताती है कि सच्चा प्यार और सहारा कहीं भी मिल सकता है—जरूरी नहीं कि वह खून के रिश्तों में ही हो। अगर दिल में इंसानियत और दया हो, तो खुदा भी रास्ता बना देता है।