IPS OFFICER की गाड़ी के सामने एक बूढ़ी भिखारिन खाना मांगने लगी, भिखारिन निकली उनकी ही सगी माँ और फिर

“IPS अमित शर्मा: माँ के आँचल की तलाश”
भूमिका
कहते हैं, किस्मत का खेल सबसे बड़ा होता है। कभी वह इंसान को आसमान की ऊँचाइयों पर पहुँचा देती है, तो कभी उसे ज़मीन पर पटक देती है। लेकिन जो लोग हालातों से हार नहीं मानते, वही सच में मिसाल बन जाते हैं। यह कहानी भी ऐसे ही एक बेटे की है—अमित शर्मा—जिसने अनाथ आश्रम से लेकर IPS बनने तक का सफर तय किया, और अंत में अपनी बिछड़ी माँ को फिर से पाया।
1. एक खुशहाल परिवार की शुरुआत
लखनऊ के एक छोटे से मोहल्ले में रमेश शर्मा का परिवार रहता था। रमेश रोज सुबह मेहनत-मजदूरी के लिए निकल जाता, और उसकी पत्नी सविता देवी घर पर रहकर अपने चारों बच्चों—अमित, पूजा, मनोज और सबसे छोटे गुड्डू—की देखभाल करती थी। अमित सबसे बड़ा था, महज 7 साल का, लेकिन उसमें जिम्मेदारी का एहसास बचपन से ही था।
रमेश की कमाई ज्यादा नहीं थी, लेकिन परिवार में प्यार और अपनापन भरपूर था। सविता देवी घर को ममता से संवारती थी, बच्चों को लोरी सुनाती, और उनके लिए सपने बुनती थी। मोहल्ले के लोग भी इस परिवार की मिसाल देते थे कि कम साधनों में भी खुश कैसे रहा जा सकता है।
2. अचानक टूटा खुशियों का संसार
पर कहते हैं, खुशियों की उम्र बहुत छोटी होती है। एक दिन रमेश रोज की तरह काम पर गया, लेकिन शाम को घर नहीं लौटा। मोहल्ले में खबर आई कि रमेश का सड़क हादसे में निधन हो गया। तेज रफ्तार ट्रक ने उसे कुचल दिया था।
सविता देवी की दुनिया उजड़ गई। चार बच्चों की जिम्मेदारी, घर चलाने की चिंता, और दिल में रमेश के जाने का दर्द—सब एक साथ टूट पड़ा। मोहल्ले वालों ने कुछ दिन तक सहारा दिया, लेकिन वक्त के साथ सब अपने-अपने जीवन में व्यस्त हो गए। सविता के लिए हर दिन एक नई परीक्षा थी।
3. संघर्ष की शुरुआत
सविता ने हार नहीं मानी। उसने दूसरों के घरों में झाड़ू-पोछा, बर्तन धोने का काम शुरू किया। लेकिन छोटे बच्चों को अकेला छोड़ना भी मुश्किल था। कभी-कभी गुड्डू को साथ ले जाती, बाकी बच्चों को घर में बंद करके छोड़ देती। बच्चों की चिंता में वह काम पर भी ठीक से ध्यान नहीं दे पाती। धीरे-धीरे लोगों ने उसे काम से निकालना शुरू कर दिया। अब घर में खाने को भी दाना नहीं था।
बच्चे भूख से बिलखते, सविता की आंखों से आंसू बहते। वह खुद से सवाल करती—क्या मैं एक अच्छी माँ हूँ? क्या मेरे बच्चे भूख से मर जाएंगे?
4. सबसे बड़ा बलिदान
आखिरकार, जब बच्चों ने दो दिन से कुछ नहीं खाया, सविता ने दिल पर पत्थर रखकर फैसला लिया—अपने बच्चों को अनाथ आश्रम में छोड़ देगी, ताकि वे भूख से ना मरें। वह उन्हें लेकर “स्नेह बाल आश्रय गृह” पहुंची। दरवाजे पर खड़ी होकर कांपते हाथों से बच्चों को गले लगाया, माथा चूमा, और फूट-फूट कर रो पड़ी।
अमित, जो अब थोड़ा बड़ा हो चुका था, माँ का आँचल पकड़कर बोला, “माँ, मुझे मत छोड़ो। मैं भूखा रह लूंगा, पर आपके बिना नहीं।”
लेकिन मजबूरी के आगे माँ हार गई। वह बच्चों को छोड़कर लौट गई, पर हर कदम के साथ उसका दिल टुकड़ों में टूटता रहा।
5. बिछड़न और संघर्ष
अनाथ आश्रम में बच्चों को खाना तो मिलता, लेकिन माँ की ममता की जगह कोई नहीं ले सकता था। कुछ समय बाद अमित के छोटे भाई-बहनों को गोद लेने के लिए लोग आए, लेकिन अमित को कोई नहीं अपनाना चाहता था क्योंकि वह अब बड़ा हो गया था।
अमित ने ठान लिया—एक दिन वह अपनी माँ को ढूंढ निकालेगा और इतना बड़ा बनेगा कि किसी को यह न लगे कि वह अनाथ है। उधर, सविता देवी भी पूरी तरह टूट चुकी थी। काम की तलाश में भटकती रही, फिर एक दिन सड़क हादसे में घायल हो गई। जब होश आया, तो याददाश्त चली गई थी। उसे अपने बच्चों का नाम याद था, पर कहाँ छोड़ा, यह सब भूल चुकी थी।
6. अमित का संघर्ष
अनाथ आश्रम में अमित ने पढ़ाई जारी रखी। वह होशियार था, मेहनती था, लेकिन दिल में हमेशा खालीपन था। 18 साल की उम्र में उसे आश्रम छोड़ना पड़ा। उसके पास कोई सहारा नहीं था, लेकिन हौसला था।
अमित ने अखबार बेचना, जूते पॉलिश करना, गाड़ियां साफ करना, बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना—हर छोटा-बड़ा काम किया। पढ़ाई के लिए पैसे बचाता, दिन में काम करता, रात को फुटपाथ पर सो जाता। कॉलेज में दाखिला लिया, ग्रेजुएशन पूरी की। एक दिन अखबार में खबर पढ़ी—”किसान का बेटा बना IPS”—और उसी पल ठान लिया कि अब उसका सपना IPS बनना है।
कोचिंग, गाइडेंस, अच्छे कपड़े—कुछ नहीं था। लेकिन हौसला था। लाइब्रेरी में घंटों पढ़ता, बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर पैसे कमाता। कई सालों की मेहनत के बाद UPSC का फॉर्म भरा, और पहले ही प्रयास में चयनित हो गया।
7. IPS बनने का सफर
जब रिजल्ट आया, अमित फूट-फूट कर रो पड़ा। उसका सपना सच हो गया था। मोहल्ले में उसकी कहानी फैल गई—”देखो, कैसे अनाथ बच्चा IPS बन गया।” ट्रेनिंग के बाद उसकी पहली पोस्टिंग शिवगंज जिले में हुई। अब वही अमित, जो कभी अखबार बेचता था, सरकारी गाड़ी में बैठता था, और लोग उसे सम्मान से सलाम करते थे।
8. किस्मत का खेल—माँ से मुलाकात
एक दिन, जिले में एक बड़े अपराध की खबर आई। अमित मीटिंग लेकर लौट रहा था। रास्ते में अचानक एक बुजुर्ग महिला उसकी गाड़ी के सामने आ गई। ड्राइवर ने ब्रेक लगाए, गार्ड महिला को हटाने लगा, लेकिन अमित ने खुद जाकर महिला से बात की।
महिला बेहद कमजोर थी, फटे पुराने कपड़े, चेहरे पर धूल, थकान की लकीरें। जैसे ही अमित उसके पास गया, वह कांपती आवाज में बोली, “बेटा, तू आ गया। मेरे लिए खाना नहीं लाया?”
अमित के कदम रुक गए। “बेटा” शब्द सुनकर उसके दिल में एक अजीब सा एहसास हुआ। पहली बार किसी ने उसे इस तरह पुकारा था। उसने महिला को गाड़ी में बिठाया, होटल ले जाकर खाना खिलाया। महिला की हालत देखकर उसे अस्पताल में भर्ती कराया।
9. माँ की पहचान
छह महीने इलाज के बाद महिला की हालत सुधरी। अमित ने उसे अपने घर लाकर रखा। एक दिन महिला ने पूछा, “बेटा, तू कौन है? क्यों मुझे अपने साथ रख रहा है?” अमित ने बताया कि वह अनाथ है, माँ का प्यार कभी नहीं मिला।
महिला फूट-फूट कर रोने लगी। उसने अपना नाम बताया—सविता देवी। अपने पति रमेश, लखनऊ, और चार बच्चों की कहानी सुनाई। अमित के दिल में हलचल मच गई। उसने धीरे से पूछा, “माँ, आपके बड़े बेटे का नाम क्या था?”
“अमित… अमित शर्मा।”
अमित के हाथ से पानी का गिलास गिर पड़ा। वह माँ के गले लगकर फूट-फूटकर रो पड़ा—”माँ, मैं ही हूँ तुम्हारा अमित!”
सविता देवी अवाक् रह गई। फिर उसने बेटे को गले से लगा लिया, आँसुओं से भीगते हुए बोली, “मेरे बेटे, मैंने तुझे मजबूरी में छोड़ा था। माफ कर दे।”
10. बिछड़े भाई-बहनों की तलाश
कुछ दिन बाद सविता ने पूछा, “बेटा, क्या तू अपने भाई-बहनों को ढूंढ सकेगा?” अमित ने अपने अधिकार का इस्तेमाल कर अनाथ आश्रम के रिकॉर्ड खंगाले। आखिरकार उसे उन परिवारों के पते मिल गए, जिन्होंने उसके भाई-बहनों को गोद लिया था।
अमित ने देखा—पूजा अच्छे स्कूल में पढ़ रही थी, मनोज इंजीनियर बन चुका था, गुड्डू कॉलेज का होशियार छात्र था। सब खुश थे, अपने-अपने नए परिवारों में। अमित ने माँ से कहा, “माँ, वे सब खुश हैं। हमें उनकी जिंदगी में दखल नहीं देना चाहिए।”
सविता ने भारी दिल से हामी भर दी।
11. नई शुरुआत—परिवार की खुशियाँ
समय बीतता गया। अमित और सविता अब एक-दूसरे के साथ सुकून भरा जीवन बिता रहे थे। एक दिन सविता ने कहा, “बेटा, अब तुझे शादी कर लेनी चाहिए।” अमित ने माँ की इच्छा का सम्मान किया और नेहा नाम की एक संस्कारी लड़की से शादी कर ली।
शादी के बाद नेहा और सविता के बीच माँ-बेटी जैसा रिश्ता बन गया। अमित जब ड्यूटी पर होता, तो नेहा और सविता एक-दूसरे का साथ निभातीं। उनका छोटा सा परिवार अब खुशियों से भर गया था।
12. संघर्ष से सफलता तक
अमित की कहानी सिर्फ एक इंसान की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि यह संघर्ष, मेहनत और दृढ़ निश्चय की मिसाल है। उसने कभी हार नहीं मानी। अनाथ आश्रम में पला-बढ़ा, जूते पॉलिश किए, गाड़ियां साफ की, ट्यूशन पढ़ाया—लेकिन सपनों को टूटने नहीं दिया।
सबसे बड़ी बात—उसने हमेशा इंसानियत के लिए दिल में जगह बनाए रखी। अपनी माँ को फिर से पाया, और उसकी सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ी।
13. समाज के लिए संदेश
अमित की कहानी हमें सिखाती है—जिंदगी में चाहे कितनी भी मुश्किलें आएं, अगर हौसला मजबूत हो तो हर मंजिल पाई जा सकती है। साधन नहीं है, मौका नहीं है, हालात खिलाफ हैं—ये सब बहाने हैं। असली सफलता आपके अंदर के हौसले और मेहनत से मिलती है।
समापन
IPS अमित शर्मा की कहानी उन लाखों बच्चों के लिए प्रेरणा है, जिन्हें लगता है कि उनकी किस्मत खराब है, या वे अकेले हैं। यह कहानी बताती है—माँ का आँचल, परिवार की ममता, और इंसानियत की ताकत, किसी भी हालात को बदल सकती है।
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