Jab Ameer Bhai Ne Ghurabat Ka Mazaq Udaya, To Allah Ne Kya Kiya 😢 |

अल्लाह का इंसाफ: भाईचारे की मिसाल”
भूमिका
यह कहानी है दो भाइयों की—फराज और करीम बख्श। एक भाई ने लालच, ताकत और जालिमियत की राह चुनी, तो दूसरा भाई सब्र, ईमान और इंसानियत पर कायम रहा। हालात ने दोनों को अलग-अलग मोड़ों पर ला खड़ा किया, लेकिन आखिरकार अल्लाह ने ऐसा इंसाफ किया कि पूरी दुनिया हैरान रह गई।
अध्याय 1: जुल्म की शुरुआत
गांव के एक छोटे से मिट्टी के घर में करीम बख्श खामोश बैठा था। सुबह की हल्की रोशनी कच्ची दीवारों पर पड़ रही थी, मगर इस उजाले में भी गरीबी की ठंडक साफ महसूस हो रही थी। उसकी बीवी ज़ैनब उसके सामने नाश्ता रखने लगी। नाश्ता क्या था? सिर्फ एक सूखी रोटी। करीम बख्श ने रोटी देखी और दिल बैठ सा गया। उसने ज़ैनब से पूछा, “क्या तुमने कुछ नहीं खाया?” ज़ैनब ने मुस्कुरा कर कहा, “नहीं, मैंने खा लिया है। आप यह खाइए।”
करीम बख्श ने उसकी थकी आंखों, झुके कंधों और चेहरे की उदासी देखी। दिल में चुभन सी उठी। उसने रोटी आधी तोड़ी, आधी खुद खाई और आधी ज़ैनब के लिए छोड़ दी। फिर वह मेहनत मजदूरी की तलाश में घर से बाहर निकल पड़ा।
अध्याय 2: भाई का जुल्म
जैसे ही करीम बख्श बाहर निकला, उसकी नजर फराज के आलीशान घर पर पड़ी। फराज आराम से मेज पर तरह-तरह के खाने खा रहा था। करीम बख्श ने नजरें चुरा लीं और अपने रास्ते चल पड़ा। उसके दिल में बस एक ही दुआ थी—अल्लाह आज दिहाड़ी लगवा दे ताकि घर के लिए थोड़ा राशन ले आ सके।
फराज और करीम बख्श सगे भाई थे। बाप के इंतकाल के बाद फराज ने सारी जमीन अपने नाम करवा ली। करीम बख्श के हिस्से में बस एक कमरे जितनी जमीन आई। उसी पर उसने अपनी छोटी सी झोपड़ी बनाई। घर छोटा था, वसाइल कम थे, मगर दिल मुतमिन था। अल्लाह ने औलाद की नेमत नहीं दी थी, मगर करीम बख्श ने कभी शिकवा नहीं किया। उसका यकीन अल्लाह पर बहुत पुख्ता था।
अध्याय 3: ताने और मजबूरी
एक दिन फराज ने ताना देते हुए कहा, “कब तक यूं मेहनत मजदूरी करते रहोगे? अल्लाह यह कर देगा, वो कर देगा—यह सब पुरानी बातें हैं। मेरी तरह दिमाग इस्तेमाल करो तो मजे करो। देखो मेरी कितनी बड़ी कोठी है।”
करीम बख्श ने दुखी मगर मजबूत लहजे में कहा, “मैंने आज तक क्या तुम्हारे आगे हाथ फैलाया है?” फराज हंस पड़ा, फिर बोला, “अपने घर की यह जमीन मुझे बेच दो। मुझे अपना गोदाम बड़ा करना है। वैसे भी तुम्हारी झोपड़ी बुरी लगती है।” यह अल्फाज करीम बख्श के दिल में जख्म बनकर उतर गए। उसने कहा, “नहीं, यह जमीन मेरे अब्बा की आखिरी निशानी है। मैं इसे कभी नहीं बेचूंगा।”
अध्याय 4: मेहनत और इल्जाम
करीम बख्श दिनभर मजदूरी करता रहा। कभी मजदूरी मिलती, कभी खाली हाथ लौटता। चंद पैसे मिलते तो वह और ज़ैनब दिल से अल्लाह का शुक्र अदा करते। उनके पास दौलत नहीं थी, मगर ईमान था।
एक दिन सेठ ने उसे अकेले ही सारा सीमेंट का काम करने को कहा। “आज तुम्हें डबल दिहाड़ी दूंगा।” करीम बख्श ने सारा दिन जी-जान से मेहनत की। शाम को सेठ से पैसे मांगने गया तो सेठ ने बटुआ मांगा। बटुआ गायब था। सेठ ने करीम बख्श पर चोरी का इल्जाम लगा दिया। “यहां तुम्हारे अलावा कोई नहीं था। चोरी तुमने ही की है।”
करीम बख्श घबरा गया। उसने कहा, “मैं चोर नहीं हूं। अगर मैंने चोरी की होती तो यहां से भाग जाता।” मगर सेठ ने उसकी एक नहीं सुनी। “कल तक मेरे पैसे वापस लाकर दो, वरना मैं तुम्हें छोड़ूंगा नहीं।”
अध्याय 5: बेबसी और गांव छोड़ना
करीम बख्श टूटे कदमों से घर लौटा। ज़ैनब से सब कुछ बताया। ज़ैनब ने हौसला दिया, “अगर तुम बेगुनाह हो तो अल्लाह तुम्हारी सच्चाई सबके सामने ले आएगा।” तभी दरवाजे पर फराज आया। तंज भरे लहजे में बोला, “अब तो तुम चोरियां करने लगे हो। पूरे गांव में खबर फैल गई है।”
करीम बख्श ने मजबूरी में अपने घर की फाइल फराज को सौंप दी। “भाई, मैं यह घर बेचने के लिए तैयार हूं। मुझे इस वक्त पैसों की सख्त जरूरत है।” फराज ने आधी कीमत दी, मगर करीम बख्श मजबूर था। उसी शाम करीम बख्श और ज़ैनब ने अपना सामान बांधा, मिट्टी के घर को अलविदा कहा और गांव छोड़ दिया।
अध्याय 6: नया सफर और अल्लाह की रहमत
करीम बख्श और ज़ैनब जंगल से गुजरे। जंगली फल खाए, फिर समुंदर किनारे एक छोटे से किराए के घर में रहने लगे। करीम बख्श ने मछलियां पकड़ना शुरू किया। धीरे-धीरे बरकत आने लगी। उनका गुज़र-बसर संभलने लगा।
एक दिन करीम बख्श ने समुंदर में जाल डाला। जाल भारी था। बाहर निकाला तो उसमें एक संदूक था। संदूक सोने, जेवरात और कीमती अशियाओं से भरा था। दोनों रोते हुए सजदे में गिर गए। “ऐ अल्लाह, तूने हमारे सब्र का सिला दिया।”
करीम बख्श ने सोना बेचकर आलीशान घर खरीद लिया। अब उनकी जिंदगी बदल चुकी थी। वे हर लम्हा अल्लाह का शुक्र अदा करते।
अध्याय 7: जुल्म का अंजाम
फराज ने मिट्टी के घर को गिराकर अपनी जमीन में मिला लिया। गोदाम बड़ा हो गया। मगर एक दिन अचानक गोदाम में आग लग गई। पूरा माल जलकर राख हो गया। लाखों के कर्ज फराज के गले में पड़ गए। अब वह भी फाकों की जिंदगी जीने लगा। उसे एहसास हुआ कि वह कितना गलत था।
सेठ का भी कारोबार डूब गया। उसे बार-बार करीम बख्श की रोती आंखें याद आतीं। वह खुद भी शर्मिंदा था।
अध्याय 8: माफी और भाईचारा
करीम बख्श ने अपना आधा माल गरीबों में बांट दिया। एक दिन अल्लाह ने औलाद की नेमत भी दी। करीम बख्श ने ज़ैनब से कहा, “मैं अपने भाई से मिलना चाहता हूं।” गांव पहुंचा तो वहां सिर्फ बंजर जमीन थी। एक आदमी ने बताया, “फराज अब उस कोने में छोटे से घर में रहता है।”
करीम बख्श ने दरवाजे पर दस्तक दी। फराज की आंखों से आंसू फूट पड़े। “मुझे माफ कर दो। मैं तुम्हारा गुनाहगार हूं।” करीम बख्श ने कहा, “मैंने कभी आपको बद्दुआ नहीं दी। यह तो अल्लाह का इंसाफ था। मैं आपको दिल से माफ करता हूं।”
उसने नोटों की गड्डियां फराज को दीं। “मैं हर महीने आपको कुछ रकम भेजता रहूंगा। आप आराम से घर का खर्चा चलाइए। मैं आपका घर दोबारा बनवा दूंगा।” फराज की आंखें शर्मिंदगी से झुक गईं। अब उसके आंसू गम के नहीं, नदामत के थे।
अध्याय 9: असल अमीरी
फराज ने दिल ही दिल में सोचा, “यह वही भाई है जिसका कभी मैं मजाक उड़ाता था। आज वही भाई सब कुछ भुलाकर मुझे सीने से लगाने को तैयार है।” उसे पहली बार एहसास हुआ कि असल अमीरी माल में नहीं, दिल की वसात में होती है।
अंतिम शब्द
करीम बख्श ने हमेशा अल्लाह पर यकीन रखा। तंगदस्ती में भी शिकवा नहीं किया, इल्जाम में सब्र रखा, आजमाइश में भरोसा कायम रखा। उसी यकीन ने उसे सरखरू कर दिया। उसी सब्र ने उसे मालामाल कर दिया। बेशक जो अल्लाह पर सच्चा भरोसा रखते हैं, अल्लाह उन्हें कभी खाली हाथ नहीं लौटाता।
समाप्त
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