Meerut: माँ को फरसी से काटा, दलित बेटी को उठाया फिर रेप? UP में पुलिस ने भी नहीं की मदद | JAWAB DO

मेरठ कपसाड़ कांड: दलित बेटी के अपहरण और मां की हत्या पर उठे कानून-व्यवस्था और सामाजिक न्याय के सवाल

उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के सरधना क्षेत्र के गांव कपसाड़ में दलित परिवार पर हुए भीषण हमले ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया है। एक तरफ मां की हत्या, दूसरी तरफ बेटी का अपहरण—और इसके बाद पुलिस-प्रशासन की संवेदनहीनता ने लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंचा दिया।

क्या है मामला?

सुबह 8 बजे: सुनीता अपनी बेटी रूबी के साथ खेत जा रही थीं।
आरोपी कंडक्टर पारस राजपूत ने रास्ते में रोककर गाली-गलौज की।
विरोध करने पर सुनीता के सिर पर फरसे से हमला, मौके पर गिर गईं।
आरोपी दलित बेटी रूबी को जबरन बाइक पर बिठाकर ले गया।
गंभीर रूप से घायल सुनीता को अस्पताल ले जाया गया, इलाज के दौरान मौत।
मौत से पहले सुनीता ने बयान दिया—”आरोपी ने मेरी बेटी को जबरन उठा लिया।”

पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर सवाल

शव को चोरी-छुपे पोस्टमार्टम के लिए ले जाने का आरोप, परिवार और ग्रामीणों ने एंबुलेंस रोककर हंगामा किया।
घंटों तक अस्पताल में हंगामा, भीड़ का आक्रोश।
पुलिस पर लापरवाही और संवेदनहीनता के आरोप—परिवार को सूचना तक नहीं दी गई।
अब तक आरोपी फरार, लड़की लापता।

सियासी हलचल और समर्थन

सपा विधायकभीम आर्मी और कांग्रेस नेताओं का पीड़ित परिवार के पास पहुंचना।
सांसद चंद्रशेखर का न्याय की मांग और आर्थिक मदद का ऐलान।
सभी दलित परिवार के साथ खड़े, आर्थिक सहायता और सरकारी नौकरी की मांग।

बड़े सवाल

क्या दलित होना इस परिवार की गलती थी?
क्या ऊंची जाति का आरोपी कानून से ऊपर है?
क्या यूपी में अपराधियों को पुलिस का डर नहीं?
क्या पुलिस वाकई इंसानियत और ईमानदारी निभा रही है?
कब मिलेगा पीड़ित परिवार को न्याय? कब आरोपी सलाखों के पीछे होगा?

समाज की एकजुटता

हर जाति-वर्ग के लोग परिवार के समर्थन में खड़े।
सभी जनप्रतिनिधियों और समाजसेवियों से आर्थिक, सामाजिक और कानूनी मदद की अपील।

निष्कर्ष

यह घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, पूरे सिस्टम और समाज के लिए आईना है।
कानून-व्यवस्था, सामाजिक न्याय और प्रशासनिक जवाबदेही—तीनों पर गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं।

अब वक्त है कि सरकार और पुलिस ईमानदारी से जवाब दें—
कब मिलेगा इस दलित परिवार को न्याय?
कब रुकेगी ऐसी घटनाएं?

अगर आप भी इस घटना से आहत हैं, तो आवाज उठाएं,
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