NEET में फेल हुई गरीब लड़की… छत से कूदने जा रही थी, करोड़पति लड़के ने बचाया, आगे जो हुआ…

सपनों की ढलान: कोटा की छत और एक नया जीवन

कोटा की वह दोपहर बहुत तपिश भरी थी। शहर की गलियों में एक अजीब सी हलचल थी, लेकिन यह हलचल उत्साह की नहीं, बल्कि बेचैनी की थी। ‘रिजल्ट बोर्ड’ के सामने सैकड़ों चेहरों की भीड़ उमड़ पड़ी थी। हर कोई अपनी धड़कनों को थामे उस सफेद शीट पर लिखे काले अक्षरों में अपना भविष्य तलाश रहा था।

उम्मीदों का गिरवी होना

भीड़ के बीच खड़ी आस्था को ऐसा लग रहा था जैसे पूरी दुनिया अचानक बहुत तेज चलने लगी है और वह अकेली कहीं पीछे छूट गई है। वह बार-बार सूची को ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर देख रही थी। उसे लग रहा था कि शायद उसकी नजर चूक रही है, शायद अगले कॉलम में उसका रोल नंबर चमक उठेगा। लेकिन हर बार उसकी आँखों के सामने वही नाम आ रहे थे जो उसके नहीं थे।

आस्था के कान सुन्न पड़ चुके थे। उसके आसपास कोई खुशी से चिल्ला रहा था, कोई फोन पर अपने घर खुशखबरी सुना रहा था, लेकिन आस्था के भीतर एक गहरा सन्नाटा उतरता जा रहा था। उसे उस वक्त केवल एक परीक्षा में असफलता नहीं दिख रही थी, उसे अपने घर की वह टूटी हुई छत और पिता के कांपते हाथ याद आ रहे थे।

उसके फोन की स्क्रीन पर एक मैसेज चमका—पापा का था। “बेटी, रिजल्ट आते ही बताना, हम सब भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं।” यह पढ़ते ही आस्था का दिल जैसे किसी ने मुट्ठी में भींच लिया। उसे याद आया कि कैसे उसके पिता ने गांव की वह जमीन गिरवी रख दी थी जिस पर पूरे परिवार की रोटी टिकी थी। कैसे उसकी माँ ने अपने आखिरी गहने बेच दिए थे ताकि बेटी डॉक्टर बन सके। पूरे गांव में चर्चा थी कि “शर्मा जी की बेटी कोटा गई है, डॉक्टर बनकर ही लौटेगी।” आज वही बेटी भीड़ में खड़ी अपनी हार देख रही थी।

छत का वह किनारा

भीड़ धीरे-धीरे कम होने लगी, लेकिन आस्था वहीं खड़ी रही। जब वह आखिरकार वहां से हटी, तो उसके कदम इतने भारी थे जैसे वह अपने कंधों पर पूरे परिवार की उम्मीदों का बोझ घसीट रही हो। हॉस्टल की सीढ़ियां चढ़ते हुए उसे लग रहा था कि हर कदम उसे अपनी हार के करीब ले जा रहा है।

वह कमरे में जाने के बजाय सीधे हॉस्टल की छत पर चली गई। छत पर हवा तेज थी। नीचे शहर का शोर था, वही शहर जो कभी उसके सपनों का प्रतीक था, अब उसे अपनी असफलता का गवाह लग रहा था। उसने छत के किनारे खड़े होकर नीचे झांका। उसके मन में बस एक ही सवाल गूंज रहा था—”अब किस मुँह से घर जाऊंगी?”

जैसे ही उसने अपनी आँखें बंद कीं और अपनी सुध-बुध खोने लगी, पीछे से एक आवाज आई—”आस्था!”

आवाज में कोई शोर नहीं था, लेकिन एक ऐसी दृढ़ता थी जिसने आस्था को चौंका दिया। वह मुड़ी, सामने राहुल खड़ा था।

एक अजनबी का हाथ

राहुल भी उसी संस्थान का छात्र था। उसका चयन हो चुका था, लेकिन उसकी नजर पिछले कई महीनों से आस्था पर थी। उसने उसे हमेशा पहली बेंच पर बैठकर मेहनत करते देखा था। राहुल एक अमीर परिवार से था, लेकिन वह जानता था कि संघर्ष का कोई रंग नहीं होता।

आस्था ने थकी हुई आवाज में कहा, “मुझे अकेला छोड़ दो राहुल। तुम जीत चुके हो, मेरी हार का तमाशा मत बनाओ।”

राहुल ने शांत स्वर में कहा, “हार तब तक हार नहीं होती जब तक आप मैदान न छोड़ दें। अगर तुम आज इस एक रिजल्ट के लिए हार मान लोगी, तो तुम सिर्फ खुद को नहीं, अपने पिता के उस भरोसे को भी खत्म कर दोगी जिसने तुम्हें यहाँ तक भेजा।”

आस्था फूट-फूटकर रो पड़ी। उसने राहुल को बताया कि अब उसके पास कोई दूसरा मौका नहीं है। पैसे खत्म हो चुके हैं, जमीन गिरवी है और पिता के पास अब बेचने के लिए कुछ नहीं बचा। उसने कहा, “अगले साल की फीस कहाँ से आएगी? क्या मैं अपने पिता को और झुकने के लिए कहूँ?”

राहुल ने कुछ देर सोचा और फिर एक ऐसा फैसला लिया जिसने आस्था के जीवन की दिशा बदल दी। उसने कहा, “आस्था, मैं तुम्हारी मदद करना चाहता हूँ। लेकिन यह दया नहीं है। यह एक निवेश है। मैंने तुम्हें पढ़ते देखा है, मुझे तुम्हारी मेहनत पर यकीन है।”

दया नहीं, सम्मान

आस्था का स्वाभिमान उसे यह स्वीकार करने से रोक रहा था। उसने पूछा, “तुम मुझ पर तरस क्यों खा रहे हो?”

राहुल ने उसकी आँखों में देखकर कहा, “यह तरस नहीं है। मैं चाहता हूँ कि तुम अपनी फीस ‘स्कॉलरशिप’ के रूप में लो। मेरे पिता का एक ट्रस्ट है, जो काबिल बच्चों की मदद करता है। तुम्हें कभी यह नहीं लगेगा कि तुम मुझ पर निर्भर हो।”

राहुल ने कोचिंग प्रशासन से बात की और अपने पिता को मनाया। उसके पिता ने भी एक शर्त रखी कि यह मदद तभी जारी रहेगी जब आस्था अपनी मेहनत को साबित करेगी। आस्था के पास अब हार मानने की कोई वजह नहीं बची थी। उसने उस छत से नीचे उतरने का फैसला किया। उसने अपने पिता को फोन किया और कहा, “पापा, इस बार नहीं हुआ, लेकिन मैं वापस नहीं आ रही। मैं फिर से कोशिश करूंगी और अपनी फीस का इंतजाम मैंने कर लिया है।”

दूसरा जन्म और संघर्ष

अगला साल आस्था के लिए किसी तपस्या से कम नहीं था। वह सुबह सबसे पहले उठती और रात को सबसे बाद में सोती। उसे पता था कि यह उसका आखिरी मौका है। राहुल हमेशा उसके साथ एक दोस्त की तरह खड़ा रहा, कभी उसे नीचा नहीं दिखाया और न ही अपने अहसान का अहसास कराया।

जब दोबारा परीक्षा हुई, तो कोटा की वही सड़कें थीं, वही भीड़ थी। लेकिन इस बार आस्था के कदमों में संकोच नहीं, संकल्प था। जब रिजल्ट बोर्ड पर सूची लगी, तो इस बार आस्था का रोल नंबर सबसे ऊपर की श्रेणियों में चमक रहा था।

सफलता और साझी जीत

आस्था ने मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया और अपनी पढ़ाई के दौरान गोल्ड मेडल जीता। दीक्षांत समारोह के दिन, जब वह सफेद कोट पहनकर मंच पर खड़ी थी, उसने भीड़ में राहुल को देखा। राहुल आज भी वहीं पीछे खड़ा था, मुस्कुराता हुआ। वह जानता था कि उसने सिर्फ एक लड़की की जान नहीं बचाई थी, उसने एक भविष्य और एक परिवार की उम्मीद को बचाया था।

आस्था और राहुल का रिश्ता अब केवल मदद का नहीं रहा था। यह एक ऐसी साझेदारी बन चुका था जो सम्मान और समानता पर टिकी थी। दोनों ने बाद में शादी की और मिलकर एक ऐसा अस्पताल खोला जहाँ किसी भी गरीब छात्र या मरीज को इसलिए वापस नहीं भेजा जाता कि उसके पास पैसे नहीं हैं।

लेखक के विचार

यह कहानी हमें सिखाती है कि असफलता जीवन का अंत नहीं है। कभी-कभी हमें बस एक ऐसे हाथ की जरूरत होती है जो हमें गिरते समय थाम सके, और कभी-कभी हमें वह हाथ बनना पड़ता है जो किसी को गिरने से बचाए। कोटा की वह छत आज भी वहीं है, लेकिन वह अब एक अंत की नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत की गवाह है।

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जय हिंद!