Police ने रोका Indian Army का Truck 😱 फिर जो हुआ…

वर्दी का असली वजन

प्रस्तावना

जून की तपती दोपहर थी, हवा स्थिर थी। उत्तराखंड के मैदानी इलाकों को सीमांत चौकियों से जोड़ने वाले स्टेट हाईवे 35 पर, देवप्रयाग पुलिस चौकी की अस्थायी नाकाबंदी लगी थी। चौकी के इंचार्ज इंस्पेक्टर विक्रम सिंह थे, जिनका व्यक्तित्व पहाड़ी चट्टान जैसा कठोर था। हाल ही में मिली पोस्टिंग को वे सजा मानते थे, और अपने अहंकार को सख्ती से ढकते थे। उनका मानना था कि यह शांत इलाका उनकी काबिलियत के लायक नहीं है, इसलिए वे अपनी वर्दी और सख्ती से हर किसी में खौफ पैदा करते थे। लेकिन उस दिन, उनके सामने एक ऐसी चुनौती आई जिसने न सिर्फ उनके घमंड को तोड़ा बल्कि वर्दी के असली वजन का एहसास भी करा दिया।

नाकाबंदी और सख्ती

उस दिन नाकाबंदी का कारण गंभीर था। खुफिया जानकारी मिली थी कि वन्य जीवों की खालें और दुर्लभ कीड़ा जड़ी की तस्करी इसी रास्ते से होने वाली है। ऊपर से सख्त आदेश थे – कोई भी गाड़ी बिना चेकिंग के नहीं जाएगी। इंस्पेक्टर विक्रम सिंह अपने मातहत कांस्टेबल पूरण पर दहाड़ते रहे – “बैरिकेड ठीक से लगाओ, एक परिंदा भी पर नहीं मारना चाहिए।”

धूप में कांस्टेबल पूरण पसीना-पसीना था, लेकिन विक्रम सिंह का जवाब ठंडा था – “परेशान वो होते हैं जो कानून तोड़ते हैं। तुम अपनी ड्यूटी करो। वर्दी धूप-छांव देखने के लिए नहीं पहनी जाती।”

चेकिंग शुरू हुई। विक्रम सिंह का तरीका सख्त ही नहीं, अपमानजनक भी था। तभी एक पुराना खटारा पिकअप ट्रक आया, जिसमें सेब की पेटियां लदी थीं। बुजुर्ग किसान चंदन सिंह उसे चला रहे थे। रावत ने ट्रक रुकवाया, दरवाजा खोला, और सारी पेटियां खोलने को कहा। बुजुर्ग किसान ने कांपती आवाज में विनती की – “साहब, रहम करो, सेब खराब हो जाएंगे।” लेकिन रावत ने चालान की धमकी दी – “हेडलाइट टूटी है, 5000 का चालान निकालो।” गरीब किसान ने जैसे-तैसे पैसे दिए और आगे बढ़ा।

भीड़ में खड़े लोग फुसफुसाने लगे – “गरीब को सताने में ही इनकी बहादुरी है।”

सेना के ट्रकों का आगमन

एक घंटे बाद, सड़क पर वाहनों की कतार लंबी हो गई थी। तभी दूर एक मोड़ से दो सेना के विशाल स्टेलियन ट्रक आते दिखे। पहले ट्रक में जवान बैठे थे, दूसरे ट्रक पूरी तरह सील बंद था। इन ट्रकों की अनुशासित गूंज अलग थी। लोगों की आंखों में चमक आ गई, बुजुर्ग किसान बुदबुदाया – “फौज हमारे रक्षक हैं।”

लेकिन इंस्पेक्टर विक्रम सिंह के अहंकार को सेना की मौजूदगी ने और भड़का दिया। आज वह सबको दिखाना चाहता था कि उसकी चौकी के आगे सेना भी नहीं निकल सकती। उसने हाथ उठाया – “रोको!”

सेना को रोकना – टकराव की शुरुआत

सेना के ट्रक रुके, वरिष्ठ अधिकारी सूबेदार ध्यान सिंह उतरे। उम्र पचास पार, चेहरा शांत, आंखें अनुभवी। “जय हिंद इंस्पेक्टर साहब, क्या बात है?”
“चेकिंग चल रही है सूबेदार साहब, सब गाड़ियों की तलाशी होगी। इस ट्रक की भी और पीछे वाले की भी।”

सूबेदार ध्यान सिंह ने मूवमेंट ऑर्डर दिखाए – “हम ऑपरेशनल ड्यूटी पर हैं, सीमा की अति संवेदनशील पोस्ट पर जा रहे हैं। देर नहीं होनी चाहिए।”
रावत ने फाइल को देखे बिना किनारे कर दिया – “ऑर्डर-वॉर्डर सब समझता हूं, पर कानून यहां मैं हूं। तलाशी तो होगी। जवानों को नीचे उतरो और ट्रक खोलो।”

भीड़ में सन्नाटा छा गया। सेना को इस तरह रोकना अपमानजनक था। जवानों के चेहरे अनुशासित थे, लेकिन जबड़ों की नसें तन गई थीं। सूबेदार ध्यान सिंह ने ठंडी आवाज में कहा – “आप अपनी वर्दी का अपमान कर रहे हैं और हमारी वर्दी का भी। हम तस्कर नहीं सैनिक हैं। आप यह तलाशी नहीं ले सकते।”

रावत लाल हो गया – “मैं तुम्हें सरकारी काम में बाधा डालने के जुर्म में अरेस्ट कर सकता हूं।”

जैसे ही रावत ने ट्रक की सील पकड़ने को हाथ बढ़ाया, सूबेदार ध्यान सिंह ने फोन निकाला, कमांडिंग ऑफिसर को कॉल किया – “सर, स्थिति तनावपूर्ण है। बल प्रयोग की कोशिश हो रही है।”
“अब मेरे कमांडिंग ऑफिसर खुद आ रहे हैं। आपको जो बात करनी है, उनसे कीजिएगा।”

तनाव और सेना का अनुशासन

अगले 20 मिनट हाईवे पर तनाव चरम पर था। सेना के जवान ट्रक से उतर कर अनुशासित घेरा बना कर खड़े हो गए। पुलिस वाले लाठियां लिए खड़े थे, लेकिन उनके चेहरों पर अब घबराहट थी। विक्रम सिंह भी समझ गया था कि मामला हाथ से निकल गया है।

भीड़ में लोग अपने फोन निकालकर वीडियो बनाने लगे। हवा में अजीब सी खामोशी थी। तभी तेज रफ्तार से एक आर्मी जिप्सी आई, जिसमें से मेजर अविनाश कोठियाल उतरे – उम्र कम, लेकिन चाल और आंखों की तेजी में अधिकार था।

मेजर कोठियाल का सामना

मेजर कोठियाल ने स्थिति का जायजा लिया, सूबेदार ध्यान सिंह से संक्षिप्त रिपोर्ट ली। इंस्पेक्टर विक्रम सिंह के सामने आकर बोले – “रूटीन चेकिंग? क्या आपने मूवमेंट ऑर्डर देखे? इन पर प्रायोरिटी रेड की मोहर लगी है। इसका मतलब है कि इस कॉनवाय को परमाणु हमले की स्थिति में भी नहीं रोका जा सकता।”

“आपको अंदाजा है कि वह दूसरा ट्रक क्या ले जा रहा है? वह सिर्फ सामान नहीं है, इंस्पेक्टर। वह उन जवानों के लिए जिंदा रहने का जरिया है जो 18,000 फुट पर बैठे हैं। जहां आप शायद 5 मिनट भी सांस ना ले पाएं।”

रावत ने आखिरी दलील दी – “सर, मुझे तस्करी की खबर थी, मुझे आदेश थे।”

मेजर कोठियाल गुस्से में बोले – “क्या आपके आदेश आपको सेना के ट्रकों पर शक करने को कहते हैं? क्या आपको लगता है कि भारतीय सेना तस्करी करती है?”
“यह खाकी वर्दी आपको जनता की सेवा और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए मिली है, देश के रक्षकों का रास्ता रोकने के लिए नहीं।”

“45 मिनट तक आपने एक ऑपरेशनल कॉनवाय को रोका है। आप पर ऑब्स्ट्रक्टिंग अ मिलिट्री कॉनवाय इन एन एक्टिव बॉर्डर जोन का चार्ज लग सकता है। क्या आप ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के उल्लंघन का मतलब समझते हैं? आपकी यह हरकत न सिर्फ आपकी नौकरी ले सकती है बल्कि आपको कोर्ट मार्शल तक घसीट सकती है।”

अहंकार का पतन

भीड़ में सन्नाटा था, फिर तालियों की गड़गड़ाहट शुरू हो गई – “इंडियन आर्मी जिंदाबाद! सही कहा मेजर साहब, इस पुलिस वाले का घमंड तोड़ो!”

विक्रम सिंह का चेहरा सफेद पड़ गया। कोर्ट मार्शल और ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के शब्द उसके कानों में पिघले शीशे की तरह उतर रहे थे। उसे एहसास हो गया कि उसका अहंकार उसे किस गहरे गड्ढे में ले आया है। भीड़ उसकी इज्जत उछाल रही थी। जवान उसे घृणा से देख रहे थे और एक आर्मी मेजर उसके करियर को खत्म करने की ताकत रखता था।

अचानक वह सारी अकड़, सारा घमंड पहाड़ी बर्फ की तरह पिघल गया। विक्रम सिंह ने हाथ जोड़ दिए – “सर, मेजर साहब, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैं बहक गया था। मुझे माफ कर दीजिए सर। मैं अपनी गलती मानता हूं। प्लीज कोई फॉर्मल एक्शन मत लीजिए। मेरा परिवार है सर, मेरा करियर सब तबाह हो जाएगा।”

सबक और सम्मान

मेजर कोठियाल ने कुछ पल विक्रम सिंह को देखा, फिर भीड़ की ओर नजर घुमाई। “इंस्पेक्टर रावत, माफी गलती का एहसास है, सजा का विकल्प नहीं। लेकिन मैं अभी मामला बढ़ा नहीं रहा हूं, सिर्फ इसलिए क्योंकि आपकी वर्दी मेरी वर्दी की तरह ही देश की सेवा के लिए है। पर आज आपने जो किया है, वह सिर्फ एक गलती नहीं, एक सबक है।”

उन्होंने रावत के कंधे पर हाथ रखा – “इस वर्दी का वजन बहुत है, इंस्पेक्टर। इसे अपने अहंकार के नीचे दबने मत देना। असली ताकत अकड़ में नहीं, अनुशासन और सम्मान में होती है। हम सीमा पर गोली इसलिए नहीं खाते कि आप यहां हमारे ही जवानों को बेइज्जत करें। याद रखिएगा, हम दोनों एक-दूसरे के लिए काम करते हैं। एक-दूसरे का सम्मान करना सीखिए।”

मेजर कोठियाल मुड़े – “सूबेदार साहब, कॉनवाय आगे बढ़ाओ।”
जवानों ने भीड़ का अभिवादन स्वीकार किया, ट्रकों पर सवार हो गए। जैसे ही हरे रंग के ट्रकों ने आगे बढ़ना शुरू किया, पूरी सड़क “भारत माता की जय” और “इंडियन आर्मी जिंदाबाद” के नारों से गूंज उठी।

अंत – वर्दी का असली वजन

भीड़ छंटने लगी। इंस्पेक्टर विक्रम सिंह सड़क के किनारे खड़ा रहा, सिर झुका हुआ। उसकी स्टार्च लगी वर्दी अब पसीने और धूल से मैली हो गई थी, पर उससे ज्यादा मैला उसका घमंड हुआ था। कांस्टेबल पूरण झिझकते हुए पास आया – “साहब, पानी…”
रावत ने बिना सिर उठाए हाथ से मना कर दिया।

तभी वही बुजुर्ग किसान चंदन सिंह अपना ट्रक स्टार्ट करके पास से गुजरा। उसने रावत के पास आकर गाड़ी धीमी की – “साहब, पहाड़ कितना भी ऊंचा हो जाए, नदी को रास्ता दे ही देता है क्योंकि नदी पहाड़ से भी ऊंचे मकसद यानी समंदर तक जाने के लिए बहती है। फौज भी वही नदी है साहब, उसका रास्ता…”

रावत ने कुछ नहीं बोला। वह बस दूर जाते उस धूल के गुबार को देखता रहा, जहां आज उसे वर्दी का असली वजन समझ आया।