Ye Dulhan Ne Konsa Gunnah kia tha ? Ispar Allah ka Dardnak Azab kyun aaya ?

गुनाह की सजा: एक अपाहिज रूह की दास्तां

अध्याय 1: चिरागपुर की परी और टूटी उम्मीदें

चिरागपुर के छोटे से गांव में रहने वाली समीह की खूबसूरती के चर्चे पूरे इलाके में थे। वह न सिर्फ दिखने में किसी परी जैसी थी, बल्कि उसका दिल भी इबादत और नेकी से भरा हुआ था। लेकिन कहते हैं न कि कभी-कभी इंसान की सबसे बड़ी खूबी ही उसकी परीक्षा बन जाती है। समीह की उम्र 30 साल हो चुकी थी, लेकिन उसकी शादी में बार-बार अड़चनें आ रही थीं। कभी रिश्ता तय होकर टूट जाता, तो कभी लड़के के साथ कोई हादसा हो जाता।

समीह की भाभी रुखसाना, जिसके दिल में हसद (जलन) का जहर भरा था, अक्सर उसे ताने देती थी। “समीह, तेरा हुस्न तो लाजवाब है, लेकिन तेरी किस्मत में शायद काला धागा बंधा है।” इन बातों ने धीरे-धीरे समीह के मन में घर कर लिया। उसे लगने लगा कि वाकई उस पर किसी ने जादू कर दिया है।

अध्याय 2: पीर मूसा शाह और वह गलत मोड़

समीह की सहेली नादिया ने उसे नवाब शाह के एक पीर मूसा शाह के बारे में बताया। उसने कहा कि वे हर तरह की बंदिश और जादू काटने में माहिर हैं। समीह और उसकी मां, जो अपनी बेटी की शादी के लिए परेशान थीं, अल्लाह पर तवक्कुल (भरोसा) छोड़कर उस पीर के पास चली गईं। यहीं से समीह के पतन की शुरुआत हुई।

पीर मूसा शाह ने उसे एक अजीबोगरीब ‘इलाज’ बताया। उसने कहा कि चार कुत्तों को रोटी डालनी है और शर्त यह है कि पीछे मुड़कर नहीं देखना। समीह ने वैसा ही किया, लेकिन जब वह वीराने में रोटी डालकर लौट रही थी, तो उसे अजीब सी आवाजें सुनाई दीं। खौफ ने उसे जकड़ लिया और वह अपनी प्रतिज्ञा भूलकर पीछे मुड़ गई।

उसका पीछे मुड़ना सिर्फ एक हरकत नहीं थी, बल्कि पीर के अनुसार, उसने उन ‘बलाओं’ को अपने भीतर आने का रास्ता दे दिया था। जब वह दोबारा पीर के पास गई, तो उसने डरावनी पेशगोई की: “तूने अल्लाह के बजाय मुझ पर भरोसा किया, यह शिर्क (अल्लाह के साथ किसी को शरीक करना) है। अब तेरी शादी तो होगी, लेकिन तू अपाहिज हो जाएगी और तेरा शौहर ही तेरा दुश्मन बनेगा।”

अध्याय 3: खुशियों का छोटा सा झिलमिलाता सवेरा

पीर की बात सच हुई। कुछ ही दिनों बाद कराची से आरिफ नाम के एक इंजीनियर का रिश्ता आया। शादी धूमधाम से हुई। आरिफ शुरुआती दिनों में बहुत प्यार करने वाला शौहर साबित हुआ। समीह को लगा कि शायद पीर की बातें गलत साबित होंगी। लेकिन तीन महीने गुजरते ही समीह के पैरों में झनझनाहट शुरू हुई।

धीरे-धीरे उसके अंगों ने काम करना बंद कर दिया। डॉक्टरों ने इसे ‘गुलन बैरे सिंड्रोम’ नाम की एक दुर्लभ बीमारी बताया। समीह अब पूरी तरह व्हीलचेयर पर आ गई थी। उसका वह हुस्न, जिस पर उसे नाज था, अब बीमारी की परछाई में छिप गया था।

अध्याय 4: शौहर का बदलता रूप और जुल्म की इंतहा

आरिफ, जो कभी समीह के पैर दबाता था, अब उसके इलाज के खर्च और मां के तानों से तंग आने लगा था। “आरिफ, तूने एक जिंदा लाश से शादी कर ली है, दूसरी शादी कर ले,” उसकी मां हफीजा बेगम रोज आग लगाती थीं। आरिफ का दिल पत्थर होने लगा। वह समीह को अब प्यार की नजर से नहीं, बल्कि एक बोझ की नजर से देखने लगा।

एक रात, जुल्म की इंतहा हो गई। आरिफ ने समीह को धक्के देकर बेड से नीचे गिरा दिया। “तू एक मनहूस औरत है! जब से तू मेरी जिंदगी में आई है, मेरा सुकून छीन गया है।” समीह जमीन पर पड़ी तड़पती रही, लेकिन उसके शरीर में इतनी भी ताकत नहीं थी कि वह खुद उठ सके।

अध्याय 5: वह भयानक रात और चोटी का मंजर

आरिफ ने मन बना लिया था कि वह समीह से पीछा छुड़ा लेगा। उसने उसे ‘ताजी हवा’ खिलाने के बहाने गाड़ी में बिठाया। वह उसे शहर से दूर एक ऊंचे पहाड़ की चोटी पर ले गया। वहां गहरी खाई थी। आरिफ ने उसे व्हीलचेयर समेत खाई के किनारे खड़ा कर दिया।

“मेरे सरताज, मैंने कौन सी गलती की है? तुम मुझे धक्का क्यों दे रहे हो?” समीह की आंखों से आंसू बह रहे थे।

आरिफ ने गरज कर कहा, “तेरी गलती तेरा जिंदा होना है!” उसने व्हीलचेयर को जोर का धक्का दिया। व्हीलचेयर खाई की ओर बढ़ी, लेकिन तभी कुछ ऐसा हुआ जिसकी आरिफ ने कल्पना भी नहीं की थी।

अध्याय 6: मोजिजा और तौबा

जब व्हीलचेयर खाई के एकदम किनारे पहुंची, तो वह अचानक रुक गई, जैसे किसी अदृश्य दीवार ने उसे रोक लिया हो। उसी क्षण आकाश से बिजली कड़की और आरिफ का पैर फिसल गया। वह खुद खाई में गिरने वाला था, लेकिन समीह ने अपनी पूरी ताकत लगाकर, जो उसके शरीर में महीनों से नहीं थी, आरिफ का हाथ पकड़ लिया।

आरिफ को अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ। वह औरत, जिसे वह बोझ समझ रहा था, उसे मौत के मुंह से बचा रही थी। समीह की आंखों में नफरत नहीं, बल्कि खुदा के लिए तौबा और आरिफ के लिए रहम था। आरिफ का दिल पिघल गया। वह फूट-फूट कर रोने लगा। “मुझे माफ कर दे समीह, मैं शैतान के बहकावे में आ गया था।”

अध्याय 7: अंतिम सत्य

समीह ने महसूस किया कि जब तक उसने पीर और जादू-टोने पर भरोसा किया, वह कमजोर रही। लेकिन जैसे ही उसने सच्चे दिल से अल्लाह की पनाह मांगी और अपनी गलती की तौबा की, उसे वह रूहानी ताकत मिली जिसने न सिर्फ उसकी जान बचाई, बल्कि उसके शौहर को भी बदल दिया।

समीह पूरी तरह ठीक तो नहीं हुई, लेकिन आरिफ अब उसकी सेवा को अपनी इबादत समझता है। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि जिंदगी के मुश्किल वक्त में कभी भी शॉर्टकट या गलत रूहानी रास्तों का चुनाव न करें। मदद सिर्फ अल्लाह से मांगे, क्योंकि वही मुश्किल कुशा है।

सन्देश: अल्लाह के सिवा किसी और के दर पर झुकना सबसे बड़ा गुनाह (शिर्क) है। सब्र और तौबा ही हर मुसीबत का आखिरी हल है।