5 साल बाद अनाथ आश्रम में पत्नी को देख पति रो पड़ा! 😭
दोस्तों, ज़रा सोचिए, 5 साल की तड़प और इंतज़ार के बाद, जब कोई खोया हुआ अपना अचानक आपके सामने आ जाए, मगर वह आपको पहचानने से ही इंकार कर दे—तो दिल पर क्या गुज़रती होगी? यही दर्द, यही रहस्य और यही सच्चाई अर्जुन की कहानी है।
अर्जुन एक सीधा-सादा इंसान था, छोटे कस्बे में सरकारी नौकरी करता था। उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी खुशी थी उसकी पत्नी सुहानी। उनकी शादी को मुश्किल से दो साल हुए थे, और दोनों अपने छोटे-से किराए के घर में प्रेम और सुकून से रहते थे। मगर फिर आई वह काली रात—जिसने अर्जुन की पूरी दुनिया उजाड़ दी।
सुहानी अचानक गायब हो गई। अर्जुन ने हर जगह तलाश की—पड़ोस, रिश्तेदार, पुलिस थाने तक। गुमशुदगी की रिपोर्ट भी लिखवाई, मगर नतीजा सिफर। कुछ लोग ताने कसते, कहते औरतें भाग जाती हैं, मगर अर्जुन का दिल जानता था—सुहानी कभी उसे छोड़कर नहीं जा सकती।
5 सालों तक अर्जुन ने उम्मीद नहीं छोड़ी। उसका चेहरा झुर्रियों से भर गया, आंखों के नीचे काले घेरे गहरे हो गए, मगर दिल में बस एक ही चाहत थी—सुहानी को ढूंढ निकालना।
फिर एक दिन, अर्जुन ने समाज सेवा का मन बनाया और पास के एक अनाथ आश्रम चला गया। वहां बच्चों की खिलखिलाहट के बीच उसकी नजर अचानक एक औरत पर जा ठहरी। हल्की साड़ी में थकी हुई, मगर आंखों में गहरी उदासी। वही चेहरा—सुहानी का चेहरा।
अर्जुन की सांसें थम गईं। वह कांपते कदमों से आगे बढ़ा और बोला, “सुहानी, यह मैं हूं… तुम्हारा अर्जुन।”
लेकिन उस औरत ने हल्की मुस्कान दी और बोली—“आप शायद गलतफहमी में हैं। मेरा नाम राधा है।”
अर्जुन का दिल चीर गया। उसकी आंखों में सवालों का सैलाब था—
अगर यह सुहानी है, तो उसने अपना नाम क्यों बदला?
वह पिछले 5 साल कहां थी?
और सबसे बड़ा सवाल—उसने अर्जुन को क्यों नहीं पहचाना?

अर्जुन ने हार नहीं मानी। उसने बार-बार आश्रम जाना शुरू किया। कभी बच्चों को मिठाई देने, कभी दान के बहाने। और हर बार उसने देखा—राधा बच्चों को मां की तरह प्यार करती, मगर जब अकेली होती तो चुपचाप रोती और आंचल में छुपी एक तस्वीर देखती।
फिर एक दिन अर्जुन ने आश्रम के रजिस्टर में झांका। लिखा था—राधा शर्मा, कार्यकाल 4 साल 7 महीने। प्रवेश की तारीख—5 साल पहले।
यानी ठीक वही वक्त जब सुहानी गायब हुई थी।
अब अर्जुन का यकीन और गहरा हो गया। और फिर एक बच्ची ने सच उगल दिया—“अंकल, दीदी रात में अक्सर किसी अर्जुन का नाम लेकर रोती है।”
अर्जुन का दिल दहल उठा। तो वह सचमुच उसकी सुहानी थी। मगर उसने अपना सच क्यों दबा रखा था?
आखिरकार, एक रात मंदिर में, सुहानी ने राज खोला। उसने कांपते लफ्जों में कहा—
“अर्जुन, उस रात मैंने एक हत्या होते देखी थी। हत्यारे बहुत ताकतवर लोग थे। उन्होंने मुझे देख लिया और अगवा कर लिया। कई दिन तक बंधक बनाए रखा, मेरे शरीर पर चोटों के निशान उन्हीं दिनों के हैं। किसी तरह मैं बचकर निकली, मगर पुलिस भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती थी। मुझे लगा अगर मैंने सच बोला तो तुम्हारी और मेरी जान चली जाएगी। इसलिए मैंने सब छोड़ दिया, अपना नाम मिटा दिया और इस आश्रम में बच्चों के बीच रहने लगी।”
यह सुनकर अर्जुन की आंखों से आंसू बह निकले। उसने सुहानी का हाथ पकड़ते हुए कहा—“तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं कि तुम्हारे बिना मैंने क्या सहा है। अब चाहे जो हो, मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

मगर उनकी बातें अधूरी ही रह गईं। उसी वक्त, मंदिर के बाहर वही काली कार और गुंडे आ पहुंचे। उनकी नजरें गुस्से से भरी थीं।
सुहानी चिल्लाई—“भागो अर्जुन! ये वही लोग हैं!”
अर्जुन ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया और दोनों अंधेरी गलियों में दौड़ पड़े। पीछे से कदमों की आवाज गूंज रही थी, धमकी देती हुई—
“भागो मत, वरना अंजाम बुरा होगा…”
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