कचरा बिनने वाली लड़की जज से बोली- मुझे इस पुलिस वाले के थप्पड़ मारना है फिर…

“नदी, बाज और न्याय का इंतजार”

भूमिका

यह कहानी एक छोटी बच्ची निधि, उसके मछुआरे दादाजी संतोष और एक न्यायाधीश के परिवार की है। इसमें पहाड़ों की वादियों, एक नदी, एक बाज और दस साल के इंतजार की पीड़ा और आशा समाई है। यह कहानी बताती है कि किस तरह किस्मत, संघर्ष और समाज का न्याय एक अनजानी बच्ची को उसके असली परिवार से मिलाने में मदद करता है।

पहाड़ों की सुबह

पहाड़ों की तलहटी में बसी एक छोटी सी झोपड़ी। सुबह के चार बजे निधि की आंख खुल जाती है। गांव में सब सो रहे हैं, लेकिन निधि अपनी फटी पुरानी साड़ी ठीक करती है और नदी की ओर चल पड़ती है। ठंडी हवा उसके चेहरे को चीरती है, लेकिन उसे परवाह नहीं। उसे अपने बीमार दादाजी के लिए पानी लाना है। नदी झोपड़ी से दूर है, पहाड़ी रास्ता कठिन है। एक घंटा लग जाता है लौटने में, लेकिन निधि कभी शिकायत नहीं करती।

संतोष दादाजी बिस्तर पर लेटे-लेटे उसे देखते हैं। उनकी आंखें नम हो जाती हैं। वे सोचते हैं, “इतनी छोटी बच्ची, इतनी जिम्मेदारी… मैं इसके लिए कुछ नहीं कर पा रहा हूं।” लेकिन निधि मुस्कुराती है, “दादा जी, आप चिंता मत करो। जल्दी ठीक हो जाओगे। अम्मा की दवाई काम कर रही है।”

गांव की बातें

गांव वाले निधि को देखकर हैरान होते हैं। कोई कहता, “इतनी छोटी उम्र में इतनी समझदारी! यह लड़की साधारण नहीं है।” कोई कहता, “इस बच्ची में कुछ खास बात है। देखो कैसे बूढ़े दादाजी की सेवा कर रही है।” कोई पूछता, “इसके असली माता-पिता कौन हैं?” लेकिन किसी को नहीं पता था कि यह फटे पुराने कपड़े पहनने वाली लड़की असल में शहर के सबसे सम्मानित न्यायाधीश जज नरेश मेहता की इकलौती बेटी है, जिसे वे पिछले दस साल से ढूंढ रहे हैं।

दस साल पुरानी कहानी

दस साल पहले जज नरेश मेहता, उनकी पत्नी कीर्ति और दो साल की निधि पहाड़ों पर घूमने गए थे। तीन दिन बाद वे एक ऊंची चट्टान पर गए, घाटी का नजारा देखने। निधि को सुरक्षित जगह पर बैठाया, “बेटा, यहीं बैठो। हम थोड़ा आगे जाकर नजारा देखेंगे, फिर तुम्हारी तस्वीर खींचेंगे।” निधि अपनी गुड़िया से खेलने लगी।

अचानक आसमान से एक विशाल बाज आया। उसकी तेज चोंच, चौड़े पंख। उसने निधि को देखा, झपट्टा मारा, निधि को पंजों में दबोच लिया और उड़ गया। निधि चीख उठी, “पापा! मम्मा!” लेकिन बाज उसे लेकर आसमान में उड़ गया। कीर्ति और नरेश मेहता भागे, लेकिन बाज दूर जा चुका था।

नदी में गिरना

बाज निधि को जंगल के ऊपर ले गया। लेकिन निधि हिल रही थी, चीख रही थी। बाज का संतुलन बिगड़ गया, उसने निधि को छोड़ दिया। निधि नीचे गिर गई, सीधे नदी में जा गिरी। बहाव तेज था, निधि डूबने लगी। वह बेहोश हो गई और पानी में बहती चली गई।

कुछ किलोमीटर दूर मछुआरा संतोष मछली पकड़ रहे थे। उन्होंने नदी में बहती बच्ची को देखा, तुरंत पानी में कूदे, उसे बाहर निकाला। बच्ची बेहोश थी, सांस धीमी थी। संतोष ने उसकी छाती पर दबाव दिया, कुछ देर बाद निधि के मुंह से पानी निकला, सांस चलने लगी। संतोष ने राहत की सांस ली, बच्ची को घर ले आए। उन्होंने निधि को अपनी बेटी की तरह पालना शुरू किया।

निधि की नई जिंदगी

निधि बड़ी होने लगी। संतोष रोज मछली पकड़ते, बाजार में बेचते, उससे घर चलता। निधि उन्हें दादाजी कहने लगी। संतोष को खुशी होती, “कैसी बेटी मिली है मुझे!” एक दिन संतोष बीमार पड़ गए। तेज बुखार, दर्द, सांस लेने में तकलीफ। निधि घबरा गई, पानी पिलाया, पट्टी रखी, लेकिन बुखार नहीं उतरा।

अगले दिन निधि दादाजी को डॉक्टर के पास ले गई। डॉक्टर ने कहा, “इन्हें गंभीर संक्रमण है, इलाज के लिए लाखों चाहिए। अस्पताल में भर्ती करना होगा, टेस्ट, दवाइयां… तुम्हारे पास सिर्फ एक महीने का समय है।” निधि के पास तो ₹2000 भी नहीं थे।

जड़ी-बूटियों की मदद

निधि परेशान थी। पड़ोस की बुजुर्ग अम्मा ने उसे जड़ी-बूटियां दी, “इसे सुबह-शाम पीसकर पानी में संतोष को खिलाना।” निधि ने वैसा ही किया। धीरे-धीरे संतोष की हालत सुधरने लगी। बुखार कम हुआ, सांस सही हुई। निधि खुश थी, “देखो दादा जी, आप ठीक हो रहे हो।” संतोष की आंखों में आंसू आ जाते, “इतनी जिम्मेदार बेटी!”

नई मुसीबत

जिंदगी थोड़ी सामान्य हुई तो एक दिन दोपहर में सरकारी अधिकारी और पांच पुलिस वाले झोपड़ी के पास आए। “यह सरकारी जमीन है, झोपड़ी हटाओ!” संतोष व्हीलचेयर पर थे, बोले, “मैं 20 साल से यहां रह रहा हूं, कभी किसी ने कुछ नहीं कहा।” पुलिस ने कहा, “अब यह जमीन सरकार को चाहिए। पांच दिन में निकलो!”

निधि रोती हुई पुलिस वालों के पैरों में गिरी, “मेरे दादाजी बहुत बीमार हैं, कहीं नहीं जा सकते, थोड़ा समय दे दीजिए।” पुलिस ने उसे धक्का दिया, संतोष की व्हीलचेयर को लात मारी, वह गिर गए। भीड़ इकट्ठा हो गई, लेकिन पुलिस वालों ने किसी की नहीं सुनी।

पत्रकार की एंट्री

पत्रकार प्रकाश शर्मा वहां मौजूद थे। उन्होंने पूरी घटना रिकॉर्ड की। निधि की गुहार, पुलिस का बर्बर व्यवहार, संतोष की बेबसी… सब कैमरे में कैद हो गया। पत्रकार ने वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया।

रात के 8 बजे वीडियो अपलोड हुआ। धीरे-धीरे वायरल होने लगा। 10 बजे तक लाखों लोग देख चुके थे। सबने लिखा, “यह गलत है! बच्ची को न्याय मिलना चाहिए!” टीवी चैनलों ने भी वीडियो दिखाया। देशभर में मामला गरमा गया।

अदालत में सुनवाई

अगले दिन अदालत में हंगामा था। जज नरेश मेहता केस सुनने बैठे। वकील ने वीडियो दिखाया, पूरी अदालत ने देखा। जज साहब की आंखों में आंसू आ गए। उन्हें दस साल पहले की घटना याद आ गई। उन्होंने निधि को ध्यान से देखा, “क्या यह मेरी बेटी है?”

जज ने आदेश दिया, “पुलिस वालों को कोर्ट में बुलाओ, लड़की और बुजुर्ग को भी लाओ।” अदालत में भारी भीड़ थी। निधि और संतोष आए, पुलिस वाले भी। जज ने सख्ती से पूछा, “क्या आपने नोटिस दिया था?” पुलिस वाले हकलाए, “नहीं, आदेश था।” जज बोले, “कानून से ऊपर कोई आदेश नहीं।”

मछुआरा संतोष से पूछा, “यह लड़की आपकी बेटी है?” संतोष बोले, “नहीं, लेकिन बेटी से बढ़कर है। नदी में मिली थी।” जज ने पूछा, “कब?” संतोष बोले, “दस साल पहले, गर्मियों में।” जज को यकीन हो गया, “यह मेरी बेटी है।”

सच का खुलासा

जज ने निधि से पूछा, “तुम्हें अपने मां-बाप याद हैं?” निधि बोली, “नहीं, बस इतना पता है कि दादाजी ने मुझे बचाया और पाला।” जज ने डीएनए टेस्ट करवाने का आदेश दिया। तीन घंटे बाद रिपोर्ट आई, “99.9% मैच है। यह आपकी बेटी है।”

पूरी अदालत तालियों से गूंज उठी। जज ने निधि को गले लगाया, “बेटा, मैं 10 साल से तुम्हें तलाश रहा था।” निधि की आंखों में आंसू थे, “क्या सच में मेरे मां-बाप मिल गए?”

न्याय का फैसला

जज ने फैसला सुनाया, “पुलिस वालों ने बिना नोटिस के मछुआरा संतोष और निधि को परेशान किया। उन पर हाथ उठाया। यह गैरकानूनी है। पुलिस के पांचों अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड किया जाता है। उन पर एक-एक लाख का जुर्माना लगाया जाता है।”

साथ ही जज ने आदेश दिया, “मछुआरा संतोष को सरकारी घर दिया जाए, निधि को शिक्षा और देखभाल मिलेगी। निधि अब अपने असली परिवार में रहेगी, लेकिन संतोष दादाजी उसके जीवन का हिस्सा रहेंगे।”

समाप्ति

निधि को उसका असली परिवार मिल गया। जज नरेश मेहता और कीर्ति मेहता ने निधि को गले लगाया, “हमारा परिवार फिर से पूरा हो गया।” संतोष दादाजी निधि के साथ नए घर में रहने लगे। गांव वालों ने खुशी मनाई। पत्रकार प्रकाश शर्मा को समाज ने सम्मानित किया।

निधि ने सीखा, “संघर्ष, उम्मीद और न्याय कभी खत्म नहीं होते। अगर दिल में विश्वास हो तो किस्मत भी बदल जाती है।”

कहानी का सार

यह कहानी बताती है कि एक बच्ची का संघर्ष, एक दादाजी का प्यार, और समाज की ताकत मिलकर न्याय दिला सकती है। नदी की लहरों, बाज की उड़ान और दस साल के इंतजार के बाद निधि को उसका परिवार, उसका हक और उसका प्यार मिल गया।