Sara Din Chhaliya Bech Kar Kitna Kama Lete Ho Ek Bari Gari wali Begam Sahiba

एक छल्ली वाले की तक़दीर – रिहान, शाहिना और अनिका की कहानी
अध्याय 1: पहाड़ों से शहर तक का सफर
रिहान का जन्म उन पहाड़ों में हुआ था, जहां ना सड़कें थीं, ना रोशनी। वहां रात का अंधेरा दिल तक उतर जाता था। गरीबी इतनी गहरी थी कि बच्चे बचपन में ही बूढ़े हो जाते। रिहान के मां-बाप ने कभी कोई ख्वाब नहीं देखा, क्योंकि उनके लिए ख्वाब रोटी से बड़े नहीं थे। उनके लिए ख्वाब वही थे, जो भूख की नींद में दिखते थे। रिहान के बहन-भाई भी उसी अभाव में बड़े हो रहे थे, जैसे किसी जंगल में बारिश के सहारे कोई जंगली पौधा।
रिहान ने बचपन में ही ठान लिया था कि वह कुछ करेगा, जिससे मां-बाप का चेहरा रोशन हो जाए, बहनों की शादी हो जाए, भाइयों को इज्जत मिले। यही सोचकर उसने पहाड़ों को छोड़कर कराची का रुख किया। उसके पास कोई डिग्री नहीं थी, ना कोई सहारा। बस उम्मीद थी कि शहर में कुछ कमा लेगा।
अध्याय 2: छल्ली वाला बनना
शहर आकर रिहान को सबसे पहला काम छल्ली बेचने का मिला। शुरुआत में दिल नहीं मान रहा था, लेकिन मां का चेहरा, उनकी झुर्रियां, बाप की खामोश नजरें, बहनों के पुराने कपड़े और भाइयों के नंगे पांव याद आते ही उसने ठान लिया – अब पीछे नहीं हटना। उसने एक छोटा सा ठेला खरीदा, ईंधन और छल्ली ली, और कराची के एक मशहूर चौराहे पर जा बैठा।
लोग उसे हैरानी से देखते, कोई कहता, “तुम तो छल्ली बेचने वाले नहीं लगते, पढ़े-लिखे इंसान लगते हो।” रिहान मुस्कुरा कर कहता, “मजबूरी इंसान से सब कुछ करवा देती है।” हर ठेले के पीछे एक कहानी होती है, और उसकी भी थी।
दिन भर धूप में खड़े रहना, चूल्हे की गर्मी से चेहरा झुलसना, पसीने से भीग जाना – यह रोज की कहानी थी। लेकिन हर शाम जब वह ठेला समेटता, बची हुई छल्ली खुद नहीं खाता, बल्कि किसी ऐसे बच्चे को दे देता जो सड़क के किनारे खड़ा हो या कूड़े के ढेर में कुछ ढूंढ रहा हो। क्योंकि रिहान को बच्चों से बेइंतेहा मोहब्बत थी। उसके अपने भाई-बहन छोटे थे, वह हर बच्चे में उन्हें देखता था।
अध्याय 3: शहर की सख्त दुनिया और उम्मीद
शहर का अपना एक सख्त निजाम था। हर चीज का किराया देना पड़ता था, ईंधन के पैसे अलग, छल्ली खरीदने के अलग। कभी नुकसान हो जाता, फिर भी रिहान हर महीने मां को कुछ पैसे भेजता। खुद कभी खैराती होटल से खाना खा लेता, कभी फुटपाथ पर भूखा ही सो जाता। लेकिन शिकायत नहीं करता, क्योंकि अंदर उम्मीद अभी भी जिंदा थी।
रिहान सोचता, एक दिन सब बदल जाएगा। उसका भी घर होगा, उसकी भी इज्जत होगी, वह अपनी मां को अस्पताल ले जाएगा, बहनों के लिए नए कपड़े होंगे, भाइयों के हाथ में स्कूल के बैग होंगे। लेकिन हकीकत यह थी कि इन ख्वाबों को सच करने के लिए उसके पास बस एक छोटा सा ठेला था।
अध्याय 4: रहस्यमयी गाड़ी और एक बच्ची
कुछ दिनों से एक अजीब बात होने लगी थी। जहां रिहान रोज ठेला लगाता, वहीं सामने वाली सड़क पर रोज एक बड़ी काली शीशों वाली गाड़ी आकर खड़ी हो जाती। अंदर कुछ दिखाई नहीं देता था, लेकिन रिहान को लगता जैसे कोई उसे लगातार देख रहा है। यह रोज का सिलसिला बन गया था।
एक सुबह, जब सूरज की रोशनी भी नहीं फैली थी, पार्क के बाहर रिहान के ठेले के पास बच्चों की हंसी आ रही थी। उसकी नजर एक छोटी सी बच्ची पर पड़ी – गुलाबी फ्रॉक, नीली रिबन। वह बार-बार सड़क के किनारे पत्थरों से खेल रही थी। रिहान छल्ली भूनने में मशगूल था, लेकिन नजर बार-बार उसी तरफ जाती।
अचानक, एक गाड़ी बहुत तेज रफ्तार में उस तरफ आ रही थी, और वह बच्ची सड़क पर झुकी हुई कुछ उठाने में लगी थी। रिहान सब छोड़कर दौड़ा, बच्ची को बाहों में भरकर सड़क से दूर खींच लिया। अगर एक लम्हा भी देर हो जाती, तो कुछ भी हो सकता था।
गाड़ी वाला गुस्से से चिल्लाया, “देखकर नहीं चल सकते हो?” रिहान ने जवाब दिया, “गलती तुम्हारी है, बच्चों का पार्क है।” बात बढ़ गई, लेकिन रिहान ने अपने हाथ दिखाकर कहा, “यह हाथ छल्ली भूनते हैं, अगर मुंह पर पड़ गए तो तारे दिख जाएंगे।” गाड़ी वाला डर गया, लेकिन जाते-जाते कह गया, “अपनी औलाद को संभाल कर रखना।” रिहान ने बच्ची को समझाया, “सड़क पर मत खेलो, पार्क के अंदर जाओ।” बच्ची पार्क की तरफ भाग गई।
अध्याय 5: किस्मत का दरवाजा
रिहान फिर अपने काम में लग गया। लेकिन उस बच्ची की मासूमियत और उस हादसे ने उसके दिल में हलचल पैदा कर दी। उसी दिन शाम को वही काली गाड़ी उसके ठेले के पास आकर रुकी। पहली बार उसके शीशे नीचे हुए। अंदर एक औरत बैठी थी, उम्र करीब 40 साल, चेहरा गहरे मेकअप में, लेकिन झुर्रियों में भी एक अजीब रब और नजाकत थी।
उसने आठ छल्ली पैक करने को कहा। रिहान ने काम किया, लेकिन जब पैसे लेने गया तो उसने नोटों की मोटी गड्डी उसकी तरफ फेंक दी। रिहान हैरान था। आठ छल्ली के बदले इतनी रकम? औरत बोली, “यह छल्ली के पैसे नहीं हैं, मैं तुम्हें एक ऑफर देना चाहती हूं। अगर मेरी बात मान ली तो दिन-रात नोटों में खेलोगे। बस ठेला छोड़ना होगा और मेरे साथ चलना होगा।”
रिहान ने पूछा, “क्या काम करना होगा?” औरत बोली, “काम बाद में बताऊंगी। मौके बार-बार नहीं मिलते।” रिहान सोच में पड़ गया – यह कमाई तो वह आधी जिंदगी में भी नहीं कमा सकता था। शायद यही वह मौका था जिसका इंतजार वह बरसों से कर रहा था। उसने हां कर दी।
अध्याय 6: नए घर में नई जिंदगी
गाड़ी कराची के एक पॉश इलाके में एक बड़े बंगले के सामने रुकी। नौकर दौड़ पड़े, दरवाजा खोला। रिहान अंदर गया – संगमरमर का फर्श, लंबी राहदारी, हर तरफ चमक-दमक। थोड़ी देर बाद एक छोटी सी बच्ची अंदर से दौड़ती हुई आई, रिहान के गले लग गई। वही बच्ची, जिसे उसने सड़क पर बचाया था।
वह बच्ची, अनिका, जोर से कहने लगी, “मेरे हीरो पापा आ गए।” रिहान साकित रह गया। वह ना उसका बाप था, ना उस औरत को जानता था। लेकिन उसने बच्ची को खुद से अलग नहीं किया। अनिका के हाथ में कैनुला लगा था, कलाई पर सफेद पट्टी, वह किसी बीमारी से निढाल लग रही थी।
शाहीना बीवी ने रिहान को खाने का आग्रह किया। रिहान ने मना किया, लेकिन शाहीना मुस्कुराकर बोली, “अब तुम्हें यहीं रहना है।” खाने का वक्त आया – तरह-तरह के खाने, खुशबू का तूफान, बच्चों के लिए खास प्याले। अनिका रिहान की गोद में सिर रखकर लेट गई, जैसे बरसों से उसका इंतजार कर रही हो।
अध्याय 7: असलियत का खुलासा
शाहीना बीवी ने कहा, “अब मैं तुम्हें असल बात बताने जा रही हूं।” उनका लहजा टूटा हुआ था। उन्होंने बताया, उनके शौहर बहुत अच्छे इंसान थे, अपनी बेटी अनिका से बेहद मोहब्बत करते थे। एक हादसे में वह हमेशा के लिए दूर हो गए। अनिका आज तक उस सदमे से बाहर नहीं आ सकी। उसकी हालत इतनी खराब है कि डॉक्टर कहते हैं, उसके जिस्म में खून ही नहीं बन रहा।
रिश्तेदारों ने सलाह दी थी कि शाहीना दूसरी शादी कर ले, ताकि अनिका को फिर से बाप का साया मिल सके। लेकिन जिस आदमी से रिश्ता तय हुआ, उसे अनिका से कोई लगाव नहीं था। उसके लिए सिर्फ दौलत मायने रखती थी। उसने तो कहा, “बच्ची को कहीं और रखना पड़ेगा।” शाहीना ने रिश्ता ठुकरा दिया।
उसके बाद हर शाम जब अनिका पार्क में खेलती थी, शाहीना गाड़ी में बैठकर उसे देखती रहती थी। उन्हीं दिनों में उसने रिहान को देखा – बच्चों से प्यार करता, बिना पैसे देखे छल्ली देता, और जिस दिन उसने अनिका को बचाया, उसी दिन शाहीना ने फैसला कर लिया कि रिहान एक अच्छा इंसान है।
अनिका बार-बार मामा से कहने लगी, “हीरो अंकल को मेरा बाबा बना दो।” शाहीना मजबूर हो गई कि रिहान से बात करे।
अध्याय 8: एक नया रिश्ता
शाहीना बोली, “मैं तुमसे यह नहीं कहती कि शादी कर लो, लेकिन अगर तुम इस घर में आकर अनिका के लिए उसके बाप की कमी पूरी कर सको, तो बदले में जो चाहोगे, दूंगी।” फिर बोली, “हम दोनों की उम्र में 15 साल का फर्क है। मैं तुम्हारी जिंदगी बर्बाद नहीं करना चाहती। लेकिन मेरी बेटी ने तुम्हें चुन लिया है।”
रिहान ने गहरी सांस ली, “अगर उसकी खुशी का सवाल है, उसकी सेहत का सवाल है और वह मुझे अपना बाप मान चुकी है, तो मुझे कोई ऐतराज नहीं। लेकिन मैं बिना किसी रिश्ते के इस घर में नहीं रह सकता। अगर मैं यहां रहूं तो आप मेरी बीवी बनेंगी और मैं बाकायदा निकाह करूंगा। रिश्ता सिर्फ नाम का नहीं, इज्जत का होना चाहिए।”
शाहीना की आंखों में रोशनी आ गई। “अगर यही शर्त है तो इसी हफ्ते हमारा निकाह होगा।”
अध्याय 9: हीरो पापा और एक मुकम्मल परिवार
निकाह के बाद रिहान ने कभी शाहिना के कारोबारी मामले में दखल नहीं दी। बस अपने वादे पर कायम रहा – अनिका को अपना समझा, उसकी हर जरूरत में साथ रहा। वह बच्ची मुझसे इतनी मानूस हो गई कि अब अपने स्कूल का काम भी मेरे साथ करती। पार्क में अपने दोस्तों से मिलवाती – “यह मेरे हीरो पापा हैं।”
अनिका अब दवाई भी रिहान के हाथ से पीने लगी थी। खाने के वक्त उसके पास बैठती। शाहिना बीवी भी अब बहुत खुश रहने लगी थी। वह कहती, “शायद अल्लाह ने तुम्हें अनिका के लिए ही भेजा है।”
अध्याय 10: गांव की वापसी और मोहब्बत की शुरुआत
एक दिन रिहान ने कहा, “मुझे कुछ दिन के लिए गांव जाना है।” अनिका ने शोर मचा दिया, “नहीं, आप मुझे छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे।” डॉक्टर ने कहा, अब वह बेहतर है, सफर कर सकती है। तीनों गांव गए। सबको रिहान की हालत बदली-बदली लगी – कपड़े साफ, चेहरे पर सुकून, जेब में पैसे। सब पूछने लगे, “यह औरत कौन है?” रिहान ने कहा, “यह मेरी बीवी है और यह मेरी बेटी।”
मां ने सवाल किया, “यह सब कैसे हो गया?” रिहान ने हंसते हुए कहा, “अम्मा, मैंने तो 7-8 साल पहले ही शादी कर ली थी और यह मेरी ही बेटी है।” मां खुश हो गई, शाहिना और अनिका को गले लगा लिया।
शाहिना ने पूछा, “तुमने झूठ क्यों बोला?” रिहान ने कहा, “ताकि तुम्हारे और मेरे खानदान में इज्जत बनी रहे।” शाहिना ने कोई शिकायत नहीं की, बल्कि खुश हुई। अब वह रिहान की आदतों को पसंद करने लगी थी – उसकी सादगी, खामोशी और अनिका से उसकी मोहब्बत।
जो रिश्ता एक मुआदे पर खड़ा था, वह धीरे-धीरे मोहब्बत में बदलने लगा। अब दोनों एक दूसरे से हर बात करते, हंसी में शरीक होते। एक दिन वह खामोशी टूट गई और दोनों ने शादीशुदा जिंदगी का बाकायदा आगाज कर लिया। अब दोनों एक साथ हैं और खुश हैं।
अध्याय 11: मुकम्मल परिवार और अनिका की सेहत
अनिका पहले से कहीं ज्यादा मुस्कुराती है। वह बार-बार कहती, “मुझे एक छोटा सा भाई चाहिए।” डॉक्टर भी कहते, अगर अनिका को एक छोटा भाई मिल जाए तो उसकी बीमारी और बेहतर हो जाएगी, शायद पूरी तरह ठीक हो जाए। उसका सबसे बड़ा मसला यही था कि उसके जिस्म में खून नहीं बनता था, हर दो हफ्ते बाद मसनुई खून चढ़वाना पड़ता था। लेकिन अब उसकी हालत दिन-ब-दिन सुधर रही है।
अगर अल्लाह ने चाहा तो अनिका ना सिर्फ सेहतमंद हो जाएगी, बल्कि उसका बचपन वापस लौट आएगा और हमारा घर भी मुकम्मल खानदान बन जाएगा।
अध्याय 12: रिहान की नई जिंदगी
यही थी रिहान की कहानी। एक मुखलिस औरत और प्यारी सी बच्ची ने उसकी जिंदगी बदल दी। उसकी जिंदगी जो कभी एक छोटे से ठेले तक सीमित थी, आज एक मुकम्मल और भरपूर जिंदगी बन चुकी है।
रिहान ने अपने मां-बाप को शहर लाने की जिद नहीं की, क्योंकि वे गांव की मिट्टी में रच-बस गए हैं, वहीं खुश हैं। लेकिन उनकी जिंदगी बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बहन-भाइयों को अच्छे स्कूल में दाखिल करवाया, हर महीने अच्छी रकम भेजता है। मां-बाप अब दूसरों के घरों में काम नहीं करते, अब सिर्फ आराम करते हैं। गांव में अब उसके वालिद सबकी नजरों में इज्जत का निशान हैं, क्योंकि उनका बेटा शहर में कामयाब है, बड़े घर का दामाद है।
अंतिम संदेश
यह कहानी बताती है कि इंसान की तकदीर कभी भी बदल सकती है, बस उसे मेहनत, सच्चाई और इंसानियत का दामन थामे रहना चाहिए। रिहान की जिंदगी एक मिसाल है – छल्ली वाला, जिसकी किस्मत ने उसे एक मुकम्मल परिवार, इज्जत और खुशियों से नवाजा।
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