Boorhi Amma Ko Jungle Mein Mila Aik Yateem Bacha 😭 Aakhir Wo Kaun Tha | Moral Story

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बूढ़ी अम्मा को जंगल में मिला एक यतीम बच्चा 😭 आखिर वो कौन था?


प्रस्तावना : जंगल की खामोशी और एक पुकार

दोपहर का समय था।
सूरज आसमान के बीचोंबीच खड़ा था और उसकी किरणें घने जंगल की पत्तियों को चीरकर जमीन पर बिखर रही थीं। हवा में अजीब सी खामोशी थी, जैसे पूरा जंगल किसी राज़ को अपने सीने में छुपाए बैठा हो।

उसी जंगल के एक कोने में बूढ़ी अम्मा हलीमा लकड़ियां काट रही थीं।
उनके हाथ काँपते थे, कमर झुकी हुई थी, मगर चेहरे पर मेहनत की आदत वाली दृढ़ता साफ झलकती थी। गरीबी ने उन्हें कमजोर नहीं किया था, बल्कि मजबूत बना दिया था।

अचानक—

“ए…ए…ए…”

किसी नवजात बच्चे के रोने की आवाज़ जंगल की खामोशी को चीरती हुई उनके कानों तक पहुँची।

अम्मा हलीमा ठिठक गईं।
उनका दिल ज़ोर से धड़कने लगा।

“या अल्लाह… ये किसका बच्चा है?”

उन्होंने चारों ओर देखा—
कोई इंसान नहीं, कोई परछाई नहीं।

आवाज़ फिर आई— इस बार और तेज।

अम्मा हलीमा आवाज़ की दिशा में बढ़ीं और जो उन्होंने देखा, उससे उनकी साँसें थम गईं।

एक पुराने जानवर के घोंसले जैसे सूखे पत्तों के ढेर के बीच
एक नवजात बच्चा गुलाबी कपड़े में लिपटा पड़ा था।


अध्याय 1 : एक अजनबी अमानत

बच्चा बुरी तरह रो रहा था।
उसके चेहरे पर भूख और डर साफ झलक रहा था।

अम्मा हलीमा का दिल पिघल गया।
उन्होंने काँपते हाथों से बच्चे को उठाया और सीने से लगा लिया।

“डर मत बेटा… अब मैं आ गई हूँ।”

उन्होंने लकड़ियों का गट्ठर एक हाथ में संभाला और दूसरे हाथ में बच्चे को लेकर घर की ओर चल पड़ीं।

उन्हें क्या पता था—
कुछ दूरी पर एक औरत खड़ी यह सब देख रही थी।

उसकी आँखों में आँसू थे, होंठ काँप रहे थे।

वो आसमान की ओर देख कर बोली—

“या अल्लाह… तूने मेरी औलाद को महफूज़ हाथों में पहुँचा दिया…”

फिर वो चुपचाप जंगल में गुम हो गई।


अध्याय 2 : गांव वालों की ज़ुबान और अम्मा का फैसला

गांव में जब अम्मा हलीमा बच्चे को लेकर पहुँचीं तो लोग हैरान रह गए।

“अरे अम्मा, ये बच्चा कहां से उठा लाई?”
“किसका पाप है ये?”

किसी ने ताना मारा—
“नाजायज़ औलाद होगी…”

ये शब्द अम्मा हलीमा के दिल में तीर की तरह लगे।

उन्होंने गुस्से में कहा—

“यह बच्चा अब मेरा है।
जिसे तकलीफ़ हो, वो अपने घर जाए।”

उस दिन से बच्चा अम्मा का हो गया।

उन्होंने उसका नाम रखा— फैजान


अध्याय 3 : ममता जो खून से नहीं, दिल से थी

फैजान बड़ा होने लगा।
अम्मा ने उसे दूध पिलाया, झुलाया, सुलाया।

रात को जब वो रोता, अम्मा उसके माथे को चूमकर कहती—

“तू मेरी जिंदगी का नूर है।”

फैजान पाँच साल का हुआ।
फिर दस साल का।

वो स्कूल जाने लगा।
बहुत होशियार था।

एक दिन रोता हुआ घर आया।

“अम्मा… वो लड़के कहते हैं मैं नाजायज़ हूँ… मेरा कोई बाप नहीं…”

अम्मा का दिल टूट गया।

उन्होंने उसे गले लगाकर कहा—

“तू अल्लाह की रहमत है।
और मैं तेरी मां हूँ।”


अध्याय 4 : सच का सामना

एक दिन अचानक वही औरत फिर जंगल में मिली।

उसने कहा—

“मैं अपनी अमानत लेने आई हूँ।”

अम्मा का खून सूख गया।

“कौन अमानत?”

“मेरा बेटा… फैजान…”

औरत ने अपना नाम बताया— मरियम

उसने पूरी कहानी सुनाई—

अमीर घर की बेटी

अहमद नाम के गरीब लड़के से मोहब्बत

घरवालों का विरोध

भागकर निकाह

भाइयों ने पति को मार डाला

जान बचाने के लिए बच्चे को जंगल में छोड़ना पड़ा

मरियम रो रही थी।

“मैं मजबूर थी…”


अध्याय 5 : फैसला दिल का

जब फैजान स्कूल से आया और सच्चाई जानी, तो मरियम ने उसे गले लगाने की कोशिश की।

“बेटा… मैं तेरी असली मां हूँ…”

फैजान पीछे हट गया।

“असली मां वो होती है जो छोड़कर ना जाए।
मेरी मां अम्मा हलीमा हैं।”

ये सुनकर मरियम का दिल टूट गया।

पुलिस आई।
उन्होंने फैजान से पूछा—

“तुम किसके साथ रहना चाहते हो?”

फैजान ने बिना झिझक कहा—

“अम्मा हलीमा।”


अध्याय 6 : एक मां की आखिरी साँस

मरियम चुपचाप गांव से बाहर चली गई।

दरख्त के नीचे बैठकर रोती रही।

दिल का दर्द बढ़ता गया।

सीने में तेज़ दर्द उठा।

और कुछ ही देर में उसकी साँस रुक गई।

उसकी आखिरी फुसफुसाहट थी—

“मेरा बेटा खुश रहे…”


अध्याय 7 : असली रिश्ते कौन से होते हैं?

अम्मा हलीमा ने फैजान को सीने से लगा लिया।

फैजान बोला—

“अम्मा, मैं बड़ा होकर डॉक्टर बनूँगा… आपको आराम दूँगा…”

अम्मा मुस्कुराईं।

“बस तू नेक इंसान बन जा बेटा…”


मोरल (सीख)

खून का रिश्ता ज़रूरी नहीं, मोहब्बत का रिश्ता बड़ा होता है।

मजबूरी में किया गया गुनाह भी ज़िंदगी भर का बोझ बन जाता है।

मां वो नहीं जो जन्म दे…
मां वो है जो पाल दे, संभाल ले और हर हाल में साथ दे।

कुछ रिश्ते कागज़ से नहीं,
दिल से बनते हैं।


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और याद रखिए—

दुनिया में सबसे बड़ी दौलत मोहब्बत है।