मशहूर डॉक्टर बनने के बाद उनकी पूर्व पत्नी बीमार हो गई, तो उन्होंने गांव जाकर उसकी देखभाल की और फिर
दिल्ली स्टेशन की ठंडी सुबह, भीड़-भाड़ से भरा प्लेटफार्म, कहीं चाय की खुशबू, कहीं कुलियों की आवाजें और कहीं सीटी बजाती ट्रेन। इस अफरातफरी में अर्जुन मल्होत्रा अपने एसी कोच की ओर बढ़ रहा था। सफेद शर्ट, काला ब्लेज़र, चमकते जूते और करोड़पति कारोबारी का रुतबा—सब कुछ था उसके पास। पर उसके चेहरे पर एक खालीपन साफ झलक रहा था।
खिड़की के पास बैठते ही उसने अखबार खोला, पर नजरें शब्दों पर टिक न सकीं। ज़िंदगी की चमक-दमक के बीच रिश्तों की वीरानी ने उसे भीतर से तोड़ रखा था। तलाकशुदा पत्नी स्नेहा की याद उसके दिल पर बोझ बनी रहती थी। तभी कानों में एक आवाज गूंजी—“गरमा गरम चने ले लो।”
अर्जुन ने सिर उठाया और स्तब्ध रह गया। हाथ में टोकरी लिए, साधारण से कपड़ों में, थके हुए चेहरे पर दृढ़ता समेटे, वही खड़ी थी—स्नेहा। कभी उसकी पत्नी, उसकी रानी, और आज यात्रियों को चने बेचने वाली।
उसके हाथ से कॉफी का कप छूटकर गिर पड़ा। आसपास बैठे लोग चौंके, पर अर्जुन के लिए दुनिया ठहर गई थी। उसकी आंखें स्नेहा पर जमी थीं। यादों का सैलाब उमड़ पड़ा—कॉलेज की मुलाकात, शादी के सपने, साझा हंसी-खुशी। पर कामयाबी की दौड़ में अर्जुन रिश्तों से दूर होता गया। एक दिन गुस्से में कहे शब्द—“अगर इतना दर्द है तो चली जाओ”—ने सब कुछ खत्म कर दिया।
आज वही स्नेहा उसके सामने थी। आवाज में थकान जरूर थी, पर आत्मसम्मान भी। वह यात्रियों से सहजता से कह रही थी—“भैया, चने लीजिए।” वही शब्द अर्जुन के दिल को चीर गए।
जब उनकी निगाहें मिलीं, तो पल ठहर गया। अर्जुन ने कांपते स्वर में कहा—“स्नेहा… सच में तुम?” स्नेहा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—“हां, मैं ही हूं। लेकिन अब सिर्फ चने बेचने वाली औरत।”
उसकी सच्चाई सुन अर्जुन टूट गया। स्नेहा ने बताया कैसे तलाक के बाद मां-बाप के गुजरने और रिश्तेदारों के मुंह मोड़ लेने से जिंदगी मजबूरी में इस मोड़ पर आ गई। पर उसने हार नहीं मानी। मेहनत से कमाई हुई रोटी ही उसकी इज्जत थी।
अर्जुन की आंखों से आंसू बह निकले। उसने कहा—“नहीं स्नेहा, गलती मेरी थी। मैंने तुम्हें समझा ही नहीं।”

स्नेहा चुप रही, पर उसकी आंखें बोल उठीं। तभी पास बैठे एक बुजुर्ग ने कहा—“बेटा, जिंदगी ट्रेन की तरह है। गलती हर किसी से होती है, पर सुधारना ही असली इंसानियत है।”
उनकी बात ने अर्जुन के दिल में नया संकल्प जगा दिया। उसने कहा—“स्नेहा, अगर मैं कहूं कि फिर से मेरी जिंदगी में लौट आओ, तो क्या तुम आओगी?”
स्नेहा खिड़की से बाहर देखती रही। धूप की किरणें उसके चेहरे पर पड़ रही थीं। आंसुओं के बीच हल्की उम्मीद भी थी। उसने धीमी आवाज में कहा—“लौटना आसान नहीं अर्जुन। भरोसा टूट चुका है।”
अर्जुन ने दृढ़ता से कहा—“भरोसा टूटा है तो उसे जोड़ा भी जा सकता है। अब समझ गया हूं, असली दौलत सिर्फ तुम हो।”
स्नेहा के आंसुओं में वर्षों का दर्द बह रहा था। वह बोली—“अगर सच में चाहते हो तो साबित करना होगा। अब मैं पहले जैसी नासमझ नहीं रही।”
ट्रेन अगले स्टेशन पर रुकी। स्नेहा उठी, बोली—“मुझे दूसरी बोगी में जाना है।” अर्जुन ने दृढ़ स्वर में कहा—“मैं तुम्हारे साथ चलूंगा।”
लोग हैरान थे। करोड़पति कारोबारी गरीब मजदूरों वाले डिब्बे में बैठा था। कोई ताना मार रहा था, कोई फुसफुसा रहा था। पर अर्जुन ने सब अनसुना कर कहा—“जहां अपना हो, वहां सीट मायने नहीं रखती।”
स्नेहा की आंखों में पहली बार विश्वास की चमक उभरी। वर्षों की दूरी, दर्द और मजबूरी के बाद भी उस पल दोनों के बीच उम्मीद की डोर जुड़ती दिखी। ट्रेन पटरी पर दौड़ रही थी, पर अर्जुन और स्नेहा की जिंदगी एक नए मोड़ पर ठहर गई थी।
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