उत्तर प्रदेश के एटा में हुआ चौंकाने वाला वाकया | पुलिस ने खोला राज़ | यूपी पुलिस केस की जांच | 2026

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एटा की वह दोपहर: जब खुशियों ने ओढ़ ली खामोशी

उत्तर प्रदेश के एटा ज़िले में 20 जनवरी 2026 की सर्द दोपहर थी। जनवरी की ठंड अपने चरम पर थी, लेकिन सूरज पूरे शबाब पर था। शहर की गलियाँ रोज़ की तरह जीवंत थीं। कहीं सब्ज़ी वाले की आवाज़ गूँज रही थी, तो कहीं बच्चे स्कूल से लौटते हुए हँसी-मज़ाक कर रहे थे। नगला प्रेमी मोहल्ला, जो एटा के कोतवाली नगर क्षेत्र में स्थित था, हमेशा की तरह शांत और सुरक्षित माना जाता था। यहाँ के लोग एक-दूसरे को बरसों से जानते थे, दुख-सुख में साथ खड़े रहते थे।

इसी मोहल्ले में एक दो-मंज़िला मकान था, जो डॉ. गंगा सिंह शाक्य का था। डॉ. गंगा सिंह उम्र में लगभग 75 वर्ष के थे और पूरे इलाके में एक सम्मानित नाम थे। वर्षों तक उन्होंने लोगों का इलाज किया था। उनके व्यवहार में सादगी और आँखों में अपनापन था। उनकी पत्नी श्यामा देवी, लगभग 70 वर्ष की, धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं, जिनका अधिकांश समय पूजा-पाठ और परिवार की देखभाल में बीतता था।

उनके बेटे कमल सिंह शाक्य एक दवा कारोबारी थे। शहर में उनका मेडिकल स्टोर था और लोग उन्हें ईमानदार व्यापारी के रूप में जानते थे। कमल सिंह की पत्नी रत्ना देवी एक सरल, घरेलू और ममतामयी महिला थीं। उनके दो बेटे और एक बेटी थी। बेटी ज्योति इस परिवार की लाडली थी। उसकी शादी तय हो चुकी थी और फरवरी के दूसरे सप्ताह में विदाई होनी थी।

घर में इन दिनों उत्सव जैसा माहौल था। शादी की तैयारियाँ ज़ोरों पर थीं। रिश्तेदारों का आना-जाना लगा रहता था। श्यामा देवी अपनी पोती के लिए नए कपड़े सिलवा रही थीं। रत्ना देवी अपनी बेटी के भविष्य के सपने बुन रही थीं। डॉ. गंगा सिंह हर आने वाले मेहमान से गर्व से कहते, “मेरी पोती की शादी है, ज़रूर आइएगा।”

लेकिन किसे पता था कि यह खुशियाँ कुछ ही दिनों की मेहमान हैं।

वह दिन

19 जनवरी, सोमवार। सुबह हमेशा की तरह हुई। कमल सिंह के दोनों बेटे अपने-अपने स्कूल और कॉलेज के लिए निकल गए। कमल सिंह भी रोज़ की तरह मेडिकल स्टोर चले गए। घर में उस समय चार लोग मौजूद थे — डॉ. गंगा सिंह, श्यामा देवी, रत्ना देवी और ज्योति।

दोपहर करीब एक बजे कमल सिंह घर आए। उन्होंने परिवार के साथ खाना खाया। माहौल बिल्कुल सामान्य था। शादी की बातों पर हँसी-मज़ाक हो रहा था। ज्योति अपनी माँ से कह रही थी कि उसे विदाई के दिन कौन-सी साड़ी पहननी चाहिए। खाना खत्म करके कमल सिंह लगभग 1:30 बजे वापस दुकान के लिए निकल गए।

यही वह समय था, जिसके बाद सब कुछ बदल गया।

एक मासूम की आँखों से देखा गया सच

करीब 2:30 बजे, कमल सिंह का छोटा बेटा, नौ साल का देवांश, स्कूल से घर लौटा। उसके कंधे पर बस्ता था और मन में यह उम्मीद कि घर पहुँचते ही माँ या दादी प्यार से दरवाज़ा खोलेंगी।

लेकिन घर का मुख्य दरवाज़ा अधखुला था।

देवांश को अजीब लगा। उसने दरवाज़ा धक्का दिया और अंदर चला गया। घर के भीतर एक अजीब-सी खामोशी थी। ऐसी खामोशी, जो कानों में चुभती है। ऊपर छत का पंखा पूरी रफ्तार से चल रहा था, जबकि बाहर ठंड थी।

उसने आवाज़ लगाई,
“मम्मी…?”

कोई जवाब नहीं।

“अम्मा…?”

फिर भी सन्नाटा।

डरते-डरते वह अपने दादाजी के कमरे की ओर गया। डॉ. गंगा सिंह बिस्तर पर लेटे हुए थे, लेकिन उनकी हालत सामान्य नहीं थी। देवांश के छोटे से दिल में डर समा गया। वह कुछ समझ पाता, इससे पहले ही ऊपर की मंज़िल की ओर दौड़ा।

ऊपर का दृश्य उसकी ज़िंदगी का सबसे डरावना दृश्य था।

कमरे में उसकी माँ रत्ना देवी, दादी श्यामा देवी और बहन ज्योति निश्चल पड़ी थीं। तीनों की आँखें बंद थीं। कमरा अजीब-सी गंध और सन्नाटे से भरा था।

देवांश चीख पड़ा।

रोता हुआ वह बाहर गली में भागा और मदद के लिए चिल्लाने लगा। उसकी आवाज़ सुनकर पड़ोसी बाहर आए। जब उन्होंने घर के भीतर का दृश्य देखा, तो पूरे मोहल्ले में हड़कंप मच गया।

पुलिस की एंट्री

सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँची। वरिष्ठ अधिकारी, फॉरेंसिक टीम और डॉग स्क्वाड को बुलाया गया। जाँच में पता चला कि डॉ. गंगा सिंह की मौके पर ही मौत हो चुकी थी। ऊपर श्यामा देवी की साँसें चल रही थीं, लेकिन अस्पताल पहुँचते ही उन्होंने भी दम तोड़ दिया।

अब यह मामला चार हत्याओं का बन चुका था।

सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि घर में ज़बरदस्ती घुसने के कोई निशान नहीं थे। न कोई ताला टूटा था, न खिड़की। कीमती सामान सुरक्षित था। यह साफ़ था कि मकसद चोरी नहीं था।

शक की सुई

पुलिस ने जब समय का विश्लेषण किया, तो एक बड़ा सवाल सामने आया। 1:30 बजे सब ठीक था और 2:30 बजे सब खत्म। सिर्फ़ एक घंटे का अंतर।

इतने कम समय में कोई बाहरी व्यक्ति आए, चार लोगों को मारे और बिना शोर किए गायब हो जाए — यह बात पुलिस को हज़म नहीं हो रही थी।

शक की सुई घर के बेहद करीबी व्यक्ति की ओर घूमने लगी।

कमल सिंह से पूछताछ हुई। उनके बयान में कुछ असंगतियाँ पाई गईं। फॉरेंसिक रिपोर्ट, कॉल डिटेल्स और अन्य तकनीकी साक्ष्यों की जाँच शुरू हुई।

शहर में चर्चाएँ तेज़ हो गईं।

एक सवाल, जो रह गया

क्या यह संपत्ति का विवाद था?
क्या कोई पारिवारिक तनाव था?
या फिर कोई ऐसा राज़, जो सामने आते ही सब कुछ तबाह कर गया?

देवांश के लिए यह सब किसी डरावने सपने से कम नहीं था। वह बच्चा, जो सुबह स्कूल गया था, शाम तक अनाथ हो चुका था।

अंत नहीं, एक चेतावनी

एटा की यह घटना सिर्फ़ एक अपराध नहीं थी। यह एक चेतावनी थी — कि खतरा हमेशा बाहर से नहीं आता। कभी-कभी वह हमारे सबसे क़रीब होता है।

जिस घर में शहनाइयाँ बजने वाली थीं, वहाँ अब सन्नाटा था।
जिस आँगन में खुशियाँ थीं, वहाँ अब सवाल थे।

सच क्या था — यह पुलिस की जाँच बताएगी।
लेकिन यह कहानी हमें यह ज़रूर सिखा गई कि रिश्तों की दरारें अगर समय पर न भरी जाएँ, तो वे खून से भी गहरी हो सकती हैं।

न्याय होगा — क्योंकि कानून के हाथ लंबे होते हैं।