अरबपति के बेटे ने बेचारे वेटर को अपमानित किया – अप्रत्याशित रूप से, वह लड़का उसका सौतेला भाई है

कहते हैं वक्त को बदलने में वक्त नहीं लगता। लेकिन 20 साल के करण के लिए वक्त जैसे ठहर गया था। वह मुंबई के सबसे महंगे फाइव स्टार होटल पैलेस रॉयल की जगमगाती लॉबी में खड़ा था। उसकी सफेद यूनिफॉर्म कैड डिचक किस्त्री की हुई थी, लेकिन उसके काले जूतों के तले घिस चुके थे। ठीक उसकी उम्मीदों की तरह। वो यहां सिर्फ एक वेटर नहीं था, बल्कि अपनी छोटी बहन प्रिया की सांसे कमाने आया था। प्रिया अस्पताल में थी और उसके दिल के ऑपरेशन के लिए जो रकम चाहिए थी, वो करण के सपनों से भी बढ़ी थी।

होटल के अंदर की दुनिया बाहर की दुनिया से बिल्कुल अलग थी। बाहर सड़कों पर शोर और गरीबी थी और यहां क्रिस्टल के झूमर थे, धीमी पियानों की धुन थी और हवा में महंगी इत्र की खुशबू। करण के लिए यह दृश्य एक सपने जैसा था। उसका काम था सिर झुकाकर “जी सर” कहना और अमीर लोगों की महंगी शराब के गिलासों को भरना। तभी दरवाजा खुला और घमंड ने इंसान का रूप धरकर अंदर कदम रखा। वो रोहन मल्होत्रा था, शहर के सबसे बड़े बिजनेस आइकॉन विक्रम मल्होत्रा का इकलौता बेटा। उसके साथ उसके कुछ दोस्त थे, जो दुनिया का मजाक उड़ाते हुए जोर-जोर से हंस रहे थे।

रोहन ने अपनी उंगलियां चटकाई। “ए वेटर!” करण फौरन भागा। “जी सर,” रोहन ने मेन्यू को देखे बिना कहा, “सबसे महंगी फ्रेंच वाइन और जल्दी!” करण कांपते हाथों से वाइन लेकर आया। जैसे ही उसने कीमती शराब को रोहन के गिलास में डालना शुरू किया, रोहन ने जानबूझकर अपना हाथ आगे कर दिया। करण का हाथ टकराया और महंगी लाल वाइन छलककर रोहन की बर्फ जैसी सफेद शर्ट पर फैल गई।

एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। रोहन अपनी कुर्सी से खड़ा हो गया। उसकी आंखों में नफरत थी। “अंधा है क्या? दिखाई नहीं देता।” “सॉरी सर, सॉरी,” करण की आवाज घिघिघी बन गई। “यह गलती से… गलती…”

रोहन चीखा, “तुम्हारी महीने भर की पगार से महंगी मेरी ये शर्ट है। तुम जैसे शरीर खचाप लोग यहां घुस कैसे जाते हो? तुम्हारी औकात है इस कालीन पर खड़े होने की?” करण की आंखों में आंसू आ गए लेकिन वो उन्हें पी गया। प्रिया का चेहरा याद आते ही उसने हाथ जोड़ दिए। “प्लीज सर, मुझे माफ कर दें। मेरी नौकरी…”

रोहन हंसा। उसने अपना बटुआ निकाला, उसमें से नोटों की एक गड्डी निकाली और उसे मरोड़कर करण के चेहरे पर दे मारा। “यह ले, यह है तेरी औकात। अब दफा हो जा यहां से!” हरे और गुलाबी नोट जमीन पर बिखर गए। मैनेजर दौड़ता हुआ आया और रोहन को खुश करने के लिए फौरन करण को डांटा। “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? तुम्हें नौकरी से निकाला जाता है। गेट आउट!”

करण के पास कोई रास्ता नहीं था। अपमान का घूंट पीकर वो जमीन पर झुका और उन नोटों को उठाने लगा। हर नोट उठाते हुए उसकी आत्मा का एक टुकड़ा टूट रहा था। वो चुपचाप होटल से बाहर निकल गया। उसे क्या पता था कि जिस घमंड के महल ने आज उसे बाहर फेंका था, वही महल ठीक 1 घंटे बाद उसे अपना नया वारिस कहने वाला था।

होटल के कांच के दरवाजों से बाहर निकलकर करण मुंबई की उमस भरी रात में आ गया। फर्क सिर्फ इतना था कि होटल के अंदर की ठंडक दिल में चुभ रही थी और बाहर की गर्मी उसकी आंखों से बह रही थी। रोहन के फेंके हुए वो नोट उसकी जेब में एक पत्थर की तरह भारी लग रहे थे। यह पैसे नहीं थे। यह उसकी इज्जत की कीमत थी जो उसने अपनी बहन की जिंदगी के लिए चुकाई थी।

वो बेजान कदमों से बस स्टॉप की तरफ बढ़ने लगा। हर कदम के साथ डॉक्टर के शब्द उसके कानों में गूंज रहे थे। “पैसे कल सुबह तक जमा नहीं हुए तो हम प्रिया को डिस्चार्ज कर देंगे। हमारे पास और भी मरीज हैं।” करण प्रिया को खोने का ख्याल ही उसकी रगों में सिहरन दौड़ा गया। वो अपनी छोटी सी बहन जिसकी हंसी के लिए वह जी रहा था, उसे वह ऐसे कैसे हारने दे सकता था।

वो फुटपाथ पर एक बेंच पर बैठ गया। अपना चेहरा हाथों में छिपा लिया। वो टूटा हुआ महसूस कर रहा था। बेबस तभी उसकी जेब में रखा पुराना फोन वाइब्रेट हुआ। उसने कांपते हाथों से फोन निकाला। अस्पताल का नाम चमक रहा था। उसका दिल डूब गया। “हेलो करण। मैं नर्स रीटा बोल रही हूं।” दूसरी तरफ से एक थकी हुई आवाज आई, “डॉक्टर साहब पूछ रहे थे कल सुबह के डिपॉजिट का कुछ हुआ?”

“जी, मैं कोशिश कर रहा हूं,” करण की आवाज भर आई। “प्लीज, प्लीज कल सुबह तक रुक जाइए। मैं कहीं से भी पैसे ले आऊंगा।”

“देखो बेटा,” नर्स की आवाज में थोड़ी हमदर्दी थी। “हम समझते हैं। पर यह बर्थडे अस्पताल के नियम हैं। कल सुबह 10:00 बजे तक का वक्त है तुम्हारे पास।” फोन कट गया। करण ने फोन को घूरते हुए देखा। 10:00 बजे तक कहां से लाएगा वो इतने पैसे, जिसे उसने अभी-अभी अपनी इज्जत बेचकर कमाया। वो तो डिपॉजिट का 10वां हिस्सा भी नहीं था।

तभी उसके घिसे हुए जूतों के पास आकर एक महंगी काली Mercedes रुकी। गाड़ी इतनी चमकदार थी कि उसमें करण को अपना बिखरा हुआ अक्स दिखाई दे रहा था। करण ने घबरा कर ऊपर देखा। गाड़ी का पिछला शीशा नीचे उतरा। अंदर एक अधिद्धा उम्र का शख्स बैठा था, जिसने महंगा सूट और आंखों पर सोने के फ्रेम वाला चश्मा पहना हुआ था। वो शख्स रोहन का बाप विक्रम मल्होत्रा था।

विक्रम ने आवाज दी। आवाज रौबदार थी लेकिन उसमें चीख नहीं थी। करण सिहर गया। वो फौरन खड़ा हो गया। “जी, सर! वो शर्ट के पैसे मैं चुका दूंगा। मुझे बस थोड़ी…”

वर्मा ने हाथ उठाकर उसे रोका। “मैं उस बारे में बात करने नहीं आया हूं।” उसने दरवाजा खोला। “गाड़ी में बैठो। मिस्टर विक्रम मल्होत्रा तुमसे मिलना चाहते हैं।” करण का खून सूख गया। “रोहन का बाप, अब क्या होगा? क्या वो उसे जेल भिजवा देंगे?”

“सर, मेरी गलती नहीं थी।”

“प्लीज, डरो मत,” वर्मा की आवाज इस बार थोड़ी नरम हुई। “यह तुम्हारी बहन प्रिया के बारे में है।” प्रिया का नाम सुनते ही करण जड़ हो गया। इस अमीर आदमी को प्रिया के बारे में कैसे पता? उसके पास अब सोचने का वक्त नहीं था। डर और एक अजीब सी नासमझ उम्मीद के बीच झूलता हुआ वो चुपचाप उस शाही गाड़ी में बैठ गया।

गाड़ी तेज रफ्तार से शहर के सबसे अमीर इलाके मल्होत्रा मैनशन की तरफ बढ़ चली। Mercedes के पहिए जब मल्होत्रा मैनशन के विशाल लोहे के गेटों के अंदर घूमे तो करण को लगा जैसे वो किसी दूसरी दुनिया में आ गया है। यह घर नहीं, एक महल था। सफेद संगमरमर की सीढ़ियां, फव्वारे और इतनी हरियाली कि करण को लगा कि शहर का सारा शोर कहीं पीछे छूट गया है। गाड़ी रुकी। वर्मा ने करण के लिए दरवाजा खोला। “अंदर चलिए।”

करण का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसकी गीली शर्ट जो अपमान और पसीने से चिपचिपी हो रही थी, इस ठंडे शाही माहौल में एक भद्दे मजाक जैसी लग रही थी। जमीन पर बिछी ईरानी कालीन पर पैर रखते हुए भी वो झिझक रहा था। मानो उसके घिसे हुए जूते इस सफेदी को मैला कर देंगे।

वर्मा उसे एक बड़े से स्टडी रूम तक ले गया। कमरे में अंधेरा था। सिर्फ एक डेस्क लैंप जल रहा था। रोशनी एक बड़ी सी ओक की मेज पर और उसके पीछे बैठी एक शख्सियत पर पड़े थी। विक्रम मल्होत्रा, शहर का सबसे ताकतवर आदमी, रोहन का बाप। विक्रम ने अपने चश्मे के ऊपर से करण को देखा। उनकी आंखों में रोहन जैसा घमंड नहीं था, बल्कि एक गहरी पढ़ने में ना आने वाली शांति थी।

“बैठो,” उन्होंने एक भारी आवाज में कहा। करण सहमकर एक महंगी लेदर की कुर्सी के कोने पर बैठ गया। विक्रम ने कुछ पल उसे घूर कर देखा जैसे उसकी आत्मा के आर-पार देख रहे हों। “तुम्हारी बहन प्रिया हार्ट में डिफेक्ट है। कल सुबह ऑपरेशन है।” करण की सांस अटक गई। “जी सर। पर आपको…”

“पैसे जमा नहीं हुए हैं,” विक्रम ने उसकी बात काट दी। “मैंने अस्पताल में बात की है। कल सुबह की सर्जरी के सारे बिल पे कर दिए गए हैं।” एक पल के लिए करण को कुछ सुनाई नहीं दिया। “क्या तुम्हारी बहन का ऑपरेशन कल सुबह होगा?” वो शहर के सबसे अच्छे डॉक्टर की निगरानी में है।

करण की आंखों में आंसू भर आए लेकिन यह खुशी के नहीं, हैरानी के थे। “पर… पर क्यों सर? मैं आपको जानता भी नहीं। आप मेरे लिए, मेरी बहन के लिए ऐसा क्यों करेंगे?”

“वो होटल में जो हुआ उसके लिए…” विक्रम मल्होत्रा अपनी कुर्सी से उठे और खिड़की के पास चले गए। जहां से मुंबई की बत्तियां टिमटिमा रही थीं। “आज जो होटल में हुआ,” विक्रम ने ठंडी आवाज में कहा, “वो मेरे बेटे की बदतमीजी थी। लेकिन मैं यह सब इसी लिए नहीं कर रहा हूं।”

उन्होंने अपनी डेस्क की दराज खोली और उसमें से एक पुरानी मुड़ी हुई तस्वीर निकाली। “इसे देखो।” करण ने कांपते हाथों से तस्वीर थामी। तस्वीर ब्लैक एंड व्हाइट थी और धुंधली हो रही थी। उसमें एक जवान औरत मुस्कुरा रही थी। उसकी मुस्कान बिल्कुल करण की मां की थी। करण का पूरा जिस्म कांप गया। “यह तो मेरी मां है। शारदा! यह आपके पास कहां से आई?”

विक्रम ने अपनी आंखें मोड़ी। जैसे कोई पुराना दर्द याद कर रहा हो। “शारदा,” उन्होंने नाम को ऐसे दोहराया जैसे वह कोई भूली हुई प्रार्थना हो। “वो सिर्फ तुम्हारी मां नहीं थी।”

विक्रम की आंखों में एक अजीब सी नमी थी। “शारदा मेरी पहली पत्नी थी।” कमरे में घड़ी की टिकटिक के सिवा कोई आवाज नहीं थी। करण को लगा जैसे जमीन खिसक गई हो। “पत्नी नहीं! यह मजाक है! मेरी मां!”

“वो तो कहती थी मेरे पिता तुम्हारे पिता नहीं।” विक्रम ने उसे सुधारा। “मेरे बाद उन्होंने किसी और से शादी की। हम बहुत पहले अलग हो गए थे। मुझे लगा था वो इस शहर को छोड़कर चली गई। मैं सालों से उसे ढूंढ रहा था। जब तक मुझे तुम्हारा और प्रिया का पता चला। तब तक बहुत देर हो चुकी थी।”

करण उस तस्वीर को घूरता रहा। उसकी मां इस अमीर आदमी की पत्नी? इसका मतलब? “करण, मैंने तुम्हें दूर से देखा। मैं तुम्हें परखना चाहता था। मैं देखना चाहता था कि शारदा की परवरिश तुम में जिंदा है या नहीं। आज होटल में मैंने जानबूझकर वह सब होने दिया।”

“क्या मैंने रोहन को तुम्हारे टेबल पर भेजा था। मैं देखना चाहता था कि दौलत की क्रूरता के सामने तुम कैसे प्रतिक्रिया करते हो। फवा और तुमने अपनी गरिमा नहीं खोई। करण, तुम शारदा के बेटे हो।”

विक्रम करण के पास आए और उसके कंधे पर हाथ रखा। “मैं बीते हुए 20 साल नहीं लौटा सकता। मैं तुम्हारी मां को वापस नहीं ला सकता। लेकिन मैं तुम्हें वो हक दे सकता हूं जो तुमसे छीना गया था। यह घर, यह जायदाद, इस पर रोहन से ज्यादा तुम्हारा हक है। तुम मेरे बड़े बेटे हो।”

करण अभी कुछ कह पाता। तभी स्टडी का दरवाजा जोर से खुला। “डैड, आप अभी तक जाग रहे हैं।” दरवाजे पर रोहन मल्होत्रा खड़ा था। उसने अभी-अभी पार्टी वाले कपड़े बदले थे और नाइट गाउन पहना था। उसकी नजर कमरे के कोने में बैठे करण पर पड़ी। उसकी आंखें नफरत से सिकुड़ गईं। “ये यहां क्या कर रहा है?”

“डैड, आपने इस गटर छाप को घर के अंदर क्यों बुलाया?” “मैंने इसे होटल से…” विक्रम मल्होत्रा की आवाज इस बार गूंज उठी। “जुबान संभाल कर बात करो, ए रोहन।” विक्रम सीधे खड़े हो गए। उनकी आंखों में एक सर्द गुस्सा था।

“डैड!” रोहन चौंक गया। उसके पिता ने आज तक उससे ऊंची आवाज में बात नहीं की थी। “रोहन,” विक्रम ने करण की तरफ इशारा किया। “इनसे मिलो। यह करण है।” विक्रम ने एक पल का विराम लिया और फिर वो बम फोड़ दिया जिसने हवेली की नींव हिला दी। “यह करण, यह मेरा बड़ा बेटा है और तुम्हारा सौतेला भाई।”

एक पल के लिए स्टडी रूम में हवा जम सी गई। रोहन का चेहरा सफेद पड़ गया। वह पहले करण को घूरता, फिर अपने पिता को। फिर वह जोर से हंस पड़ा लेकिन उसकी हंसी में मजाक नहीं, जहर था। “डैड, आप ठीक तो हैं? आपने क्या पी लिया ये? यह… यह…” उसने करण की तरफ नफरत से उंगली उठाई। “यह इस गटर की पैदाइश आपका बेटा है? आप इस वेटर को मेरा भाई कह रहे हैं?”

“बस, विक्रम मल्होत्रा का हाथ उठा।” “खटाक!” एक जोरदार थप्पड़ की गूंज उस आलीशान कमरे में फैल गई। रोहन, जिसे आज तक किसी ने ऊंची आवाज में डांटा नहीं था, अपना गाल पकड़कर रह गया। उसकी आंखों में हैरानी और अपमान का पानी भर आया।

“डैड, आपने मुझ पर हाथ उठाया।” रोहन की आवाज कांप रही थी। “इस भिखारी के लिए…” विक्रम का हाथ अभी भी कांप रहा था। लेकिन उनकी आंखें चट्टान की तरह स्थिर थीं। “मैंने तुम्हें इन्हें इसलिए मारा क्योंकि तुमने उस औरत का अपमान किया है जिसके पैरों की धूल के बराबर भी तुम्हारी हैसियत नहीं है। शारदा मेरी पत्नी थी और यह करण,” विक्रम ने करण के कंधे पर हाथ रखा। “यह मेरा खून है। इस घर का बड़ा वारिस।”

करण चुपचाप यह सब देख रहा था। वो एक तूफान के बीच में फंस गया था। एक घंटे पहले वो अपनी गरीबी पर रो रहा था और अब दो अमीर आदमी, जो बाप बेटे थे, उसके सामने एक दूसरे के खून के प्यासे खड़े थे और वजह वो खुद था। उसे यह सब एक धुंधला सपना लग रहा था।

रोहन ने अपने आंसू पोंछे। उसकी आंखों में अब सिर्फ नफरत थी। उसने करण को ऐसे देखा जैसे कोई शेर अपने शिकार को देख रहा हो। “ठीक है डैड,” रोहन ने ठंडी आवाज में कहा। “अगर यह बड़ा वारिस है तो फिर इस घर में मेरे लिए कोई जगह नहीं है। चुन लीजिए, या तो मैं या यह सड़क छाप!”

रोहन को लगा कि उसके पिता, जिन्होंने हमेशा उसकी हर जिद पूरी की थी, पिघल जाएंगे लेकिन विक्रम टस से मस नहीं हुए। “तुम जाना चाहते हो? जा सकते हो। रोहन, दरवाजा खुला है। लेकिन करण यहीं रहेगा, अपने घर में।” यह रोहन के लिए आखिरी तिनका था। अपमान, हार और जायदाद छीन जाने का डर। वो बिना कुछ कहे गुस्से में पैर पटकता हुआ कमरे से बाहर निकल गया।

कमरे में फिर खामोशी छा गई। विक्रम ने एक थकी हुई सांस ली और करण की तरफ देखा। उनका सख्त चेहरा अब नरम पड़ गया था। “मुझे माफ कर दो बेटा। तुम्हें यह सब देखना पड़ा।” उन्होंने वर्मा को आवाज दी। “वर्मा, करण को घर का सबसे अच्छा कमरा दो। और इनके लिए नए कपड़ों का इंतजाम करो। यह थक गए हैं।”

“जी सर,” वर्मा ने सिर झुकाया। करण, जो अब तक बुत बना बैठा था, आखिरकार खड़ा हुआ। उसकी टांगें अभी भी कांप रही थीं। “नहीं,” उसने धीमी लेकिन मजबूत आवाज में कहा। विक्रम चौंके। “नहीं, क्या मतलब?”

करण ने विक्रम की आंखों में देखा। “मुझे कमरा या कपड़े नहीं चाहिए। मिस्टर मल्होत्रा, आप मेरे पिता हो सकते हैं।” “आप मेरे पिता हैं,” करण ने कहा, “लेकिन मेरी दुनिया अभी भी अस्पताल के उस छोटे से कमरे में है। मेरी बहन वहां अकेली है। आपने उसके ऑपरेशन के पैसे दिए। उसके लिए शुक्रिया। लेकिन मुझे अभी इसी वक्त प्रिया के पास जाना है।”

विक्रम मल्होत्रा एक पल के लिए निहशब्द हो गए। उन्होंने अपने बिजनेस करियर में लाखों करोड़ों के सौदे किए थे। बड़े-बड़े दिग्गजों को अपनी शर्तों पर झुकाया था। लेकिन इस थके हुए गरीब लड़के के एक नहीं ने उन्हें अंदर तक हिला दिया था। रोहन, जिसे उन्होंने दुनिया की हर चीज दी, वह सिर्फ और के लिए चीख रहा था। और करण, जिसे जिंदगी ने सिर्फ दर्द दिया था, वो उनकी सल्तनत को ठुकरा कर वापस उस अस्पताल की टूटी कुर्सी पर जाने को तैयार था, सिर्फ अपनी बहन के लिए।

विक्रम की आंखों में सम्मान की एक नई चमक पैदा हुई। “तुम सही कह रहे हो,” उन्होंने आखिरकार कहा। “तुम्हारी जगह अभी वहीं है। लेकिन तुम अकेले नहीं जाओगे।” उन्होंने अपनी कार की चाबियां उठाई। “मैं तुम्हें खुद ले चलता हूं।”

करण ने कोई बहस नहीं की। वो बस चुपचाप सिर झुकाए उनके पीछे उस महल से बाहर निकल आया, जिसे कुछ ही मिनट पहले उसका घर बताया गया था। वापस उसी Mercedes में, जहां कुछ देर पहले वो एक डरा सहमा नौकरी से निकाला गया वेटर बनकर बैठा था। अब वो मालिक की बगल वाली सीट पर बैठा था। लेकिन फर्क सिर्फ बैठने की जगह का नहीं था। फर्क हवा में तैर रहे तनाव का था।

रास्ता चुपचाप कटा। करण बाहर बत्तियों को देख रहा था, लेकिन उसका दिमाग कहीं और था। वो अपनी मां शारदा के बारे में सोच रहा था। क्या वो खुश थी या उन्होंने पूरी जिंदगी एक अमीर पति को खोने का अफसोस किया, जिसे उनके परिवार ने छीन लिया था? नहीं। करण को अपनी मां की मुस्कान याद आई। वो गरीब थे, लेकिन उनकी मां ने उन्हें कभी प्यार की कमी महसूस नहीं होने दी। उन्होंने करण को ईमानदारी और मेहनत की इज्जत करना सिखाया था।

उसने बगल में बैठे विक्रम मल्होत्रा को देखा। “यह आदमी जिसने अपनी जिंदगी ऐशो आराम में गुजारी थी, क्या वह कभी समझ पाएगा कि जद्दू उर्वषक पर एक-एक कमाना क्या होता है?” गाड़ी अस्पताल के बाहर रुकी। वही अस्पताल, जहां कुछ घंटे पहले गार्ड ने उसे लगभग धक्के मारकर बाहर निकाल दिया था। इस बार Mercedes को देखकर गार्ड ने फौरन सैल्यूट किया। विक्रम और करण तेजी से अंदर गए।

नर्स रीटा, जो काउंटर पर ऊंघ रही थी, शहर के सबसे बड़े टाइकून को अपने सामने देखकर हड़बड़ाकर खड़ी हो गई। “मिस्टर मल्होत्रा, सर, आप यहां? सब ठीक है? प्रिया कैसी है?” विक्रम ने सीधे पूछा।

“जी, वो सो रही है। सुबह की सर्जरी के लिए तैयार है। आप उनसे मिल सकते हैं।” पर विक्रम ने करण की तरफ देखा। “जाओ बेटा।”

करण लगभग दौड़ता हुआ प्रिया के कमरे में गया। वो छोटी सी बच्ची तारों और ट्यूबों के बीच लिपटी हुई शांति से सो रही थी। करण ने उसकी नन्ही सी उंगली को छुआ। वो गर्म थी। वो जिंदा थी। करण वहीं उसके बिस्तर के पास घुटनों के बल बैठ गया और अपने आंसू नहीं रोक पाया।

यह आंसू अपमान या गुस्से के नहीं थे। यह उस बेबसी के थे जो अब खत्म हो गई थी। विक्रम मल्होत्रा दरवाजे पर खड़े सब देख रहे थे। उन्होंने अपनी आलीशान हवेली देखी, अपना अरबों का बिजनेस देखा और फिर इस छोटे से अस्पताल के कमरे को देखा। उन्हें आज पहली बार एहसास हुआ कि असली दौलत क्या होती है। यह वो थी जो उनके सामने घुटनों पर बैठा उनका बेटा अपनी बहन पर लुटा रहा था।

विक्रम को अपनी गलती का, अपने परिवार के गुनाह का और उन खोए हुए 20 सालों का वजन पहली बार महसूस हुआ। अगली सुबह ऑपरेशन थिएटर की लाल बत्ती के नीचे वक्त मानो थम गया था। करण दालान में एक कुर्सी पर बैठा था। उसकी आंखें लाल थीं। हाथ आपस में जुड़े हुए प्रार्थना कर रहे थे। वह रात भर प्रिया के पास से नहीं हिला था। विक्रम मल्होत्रा, जो शायद बरसों से किसी अस्पताल की बेंच पर नहीं बैठे थे, चुपचाप उसके पास बैठे थे।

उनके बीच कोई बात नहीं हो रही थी। लेकिन इस खामोशी में एक अजीब सा अपनापन था, जो उन्होंने अपने दूसरे बेटे रोहन के साथ कभी महसूस नहीं किया था। तीन घंटे, तीन सदियों जैसे बीते। तभी बत्ती बुझी और डॉक्टर बाहर निकले। करण झटके से खड़ा हो गया। “डॉक्टर, प्रिया…”

डॉक्टर ने अपना मास्क उतारा और मुस्कुराए। “ऑपरेशन सफल रहा। वो खतरे से बाहर है। उसमें जीने की जबरदस्त इच्छाशक्ति है।” करण वहीं जमीन पर बैठ गया। उसके शरीर की सारी ताकत जैसे चली गई हो और उसकी जगह सिर्फ राहत ने ले ली हो।

विक्रम ने आगे बढ़कर उसे उठाया और पहली बार अपने बेटे को गले से लगा लिया। “सब ठीक है बेटा। सब ठीक है।” उसी वक्त शहर के दूसरी तरफ मल्होत्रा मैनशन में रोहन की नींद खुली। उसका सिर अपमान और हैंगओवर से फट रहा था। उसे याद आया कि कैसे उसके पिता ने उसे एक भिखारी के लिए थप्पड़ दे मारा।

गुस्से से भरकर उसने फैसला किया कि वह आज अपने पिता को सबक सिखाएगा। वो सीधे कंपनी के ऑफिस पहुंचा और अकाउंट्स डिपार्टमेंट को फोन किया। “मैं रोहन मल्होत्रा बोल रहा हूं। मेरे पर्सनल अकाउंट में तुरंत 50 लाख ट्रांसफर करो।”

“माफ कीजिएगा सर,” अकाउंटेंट की घबराई हुई आवाज आई। “लेकिन विक्रम सर का सख्त आदेश है। आपके सारे कंपनी कार्ड और अकाउंट्स फ्रीज कर दिए गए हैं।”

“क्या?” रोहन चीखा। “मेरे पिता…” तभी उसके फोन पर विक्रम की कॉल आई। “डैड, यह सब क्या बकवास है?”

“यह बकवास नहीं है रोहन,” विक्रम की आवाज अस्पताल से आ रही थी लेकिन उसमें बिजनेस वाली सख्ती थी। “तुम्हारी पॉकेट मनी बंद हो गई है। तुम्हारी गाड़ियां आम ले ली गई हैं। अगर तुम्हें इस घर में रहना है तो कल से तुम हमारी फैक्ट्री के वेयर हाउस में एक ट्रेनी की तरह काम शुरू करोगे। वही तनख्वाह मिलेगी जो बाकियों को मिलती है। तुम्हें जमीन से सीखना होगा कि मेहनत और इज्जत क्या होती है।”

“आप मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकते।”

“मैं कर सकता हूं रोहन, और मैंने कर दिया है। और हां, तुम्हें करण से माफी मांगनी होगी। वो तुम्हारा बड़ा भाई है।” विक्रम ने फोन काट दिया।

एक महीने बाद, प्रिया अब घर आ चुकी थी। लेकिन उसका घर अब वो तंग सीलन भरी खोली नहीं थी। विक्रम ने उसे मल्होत्रा मैनशन के सबसे खूबसूरत कमरे में शिफ्ट कर दिया था। करण अपना ज्यादातर वक्त प्रिया के साथ बिताता। लेकिन अब वो शाम को विक्रम के साथ ऑफिस जाने लगा था। उसने बिजनेस सीखना शुरू कर दिया था। विक्रम ने देखा कि करण के पास सिर्फ ईमानदारी ही नहीं बल्कि एक तेज दिमाग भी था।

वो सिर्फ प्रॉफिट नहीं बल्कि लोगों की भलाई के बारे में सोचता था। विक्रम ने अपनी कंपनी के नाम पर एक चैरिटेबल ट्रस्ट शुरू किया, जिसका पूरा जिम्मा उन्होंने करण को सौंप दिया। “शारदा फाउंडेशन,” जो गरीब बच्चों के इलाज का खर्चा उठाती थी।

रोहन को अपनी गलती का एहसास हो गया था। जिंदगी की ठोकर ने उसे घमंड के आसमान से जमीन पर पटक दिया था। उसने वेयर हाउस में काम करना शुरू कर दिया था। शायद वो एक दिन बदल जाएगा। लेकिन अब सल्तनत को उसका असली वारिस मिल चुका था।

एक शाम करण, प्रिया और विक्रम तीनों शारदा की तस्वीर के सामने खड़े थे। विक्रम ने तस्वीर पर ताजे फूल चढ़ाए। “मुझे माफ कर देना शारदा। मैंने तुम्हें ढूंढने में बहुत देर कर दी।”

करण ने अपना हाथ विक्रम के हाथ पर रखा। “मां, आपको देख रही है पापा,” उसने पहली बार उन्हें पापा कहा। “उन्होंने आपको माफ कर दिया होगा।”

विक्रम की आंखों में आंसू थे। उन्होंने अपने दोनों बच्चों को गले लगा लिया। करण ने बाहर डूबते सूरज को देखा। उसे आज समझ आया था। वक्त ने उससे उसकी मां छीनी, उसका बचपन छीना। लेकिन उसकी अच्छाई और इंसानियत नहीं छीन सका। और उसी अच्छाई ने आज उसे वह सब कुछ लौटा दिया था जो कभी उसका था ही नहीं।

एक परिवार, एक इज्जत और एक मुकसद। जिस वेटर को घमंड ने ठुकराया था, उसी की इंसानियत ने आज पूरी सल्तनत को जीत लिया।

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