माँ का कर्ज अरबपति बेटा और भिखारिन माँ जिसके आगे अरबों भी कम पड़ गए”
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माँ का कर्ज: अरबपति बेटा और भिखारिन माँ जिसके आगे अरबों भी कम पड़ गए
प्रस्तावना
यह कहानी एक ऐसे बेटे की है, जिसने अपने जीवन में माँ के कर्ज को चुकाने का संकल्प लिया। यह कहानी मुंबई की है, जहाँ एक अरबपति बेटा विक्रम सिंह राठौर और उसकी माँ सावित्री की अनकही दास्तान है। यह कहानी उस रिश्ते की है, जो धन और शक्ति से परे, एक माँ और बेटे के अटूट बंधन को दर्शाती है। जब विक्रम अपनी माँ को खोने के बाद अरबों की दौलत के बीच अकेला महसूस करता है, तब उसे समझ में आता है कि असली संपत्ति क्या होती है।
भाग 1: द ग्रैंड इंपीरियल का जश्न
शाम का समय था, और जूहू बीच के पास स्थित एशिया के सबसे महंगे होटलों में से एक, द ग्रैंड इंपीरियल, दुल्हन की तरह सजा हुआ था। होटल की सात मंजिला इमारत पर लगी सुनहरी लाइटें समुद्र की लहरों पर जादुई प्रतिबिंब बना रही थीं। आज की रात भारत की सबसे बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी, रुद्राक्ष ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज, अपनी 25वीं वर्षगांठ मना रही थी। इस साम्राज्य के मालिक विक्रम सिंह राठौर, 32 वर्ष के एक सफल उद्योगपति, ने अपनी ताकत और बुद्धि से सबकुछ हासिल किया था।
विक्रम ने इटली से मंगवाया हुआ नेवी ब्लू रंग का अरमानी सूट पहन रखा था, और उसकी कलाई पर बंधी 50 लाख की पाटेक फिलिप घड़ी चमक रही थी। लेकिन उसकी आँखों में एक गहरा सन्नाटा था, जो किसी को दिखाई नहीं देता था। वह भावनाओं से नहीं, बल्कि मुनाफे से चलता था।
होटल के अंदर देश के सबसे अमीर उद्योगपति, फिल्म सितारे और राजनेता शैंपेन के गिलास हाथ में लिए बातें कर रहे थे। सबकी जुबान पर बस एक ही सवाल था, “विक्रम सर कब आएंगे?”

भाग 2: सावित्री की कहानी
वहीं, होटल के बाहर, एक बूढ़ी औरत, सावित्री, सड़क के किनारे बैठी थी। उसके कपड़े मैले और फटे हुए थे, और उसके नंगे पैरों में छाले थे। वह कांप रही थी, लेकिन ठंड से नहीं, भूख और कमजोरी से। उसकी धुंधली आँखें होटल की जगमगाती इमारत पर टिकी थीं। वह बस यही कह रही थी, “मेरा विजू, मेरा विजू।”
सावित्री ने 15 साल तक अपने बेटे विक्रम को खोजने के लिए हर मंदिर, हर दरगाह पर भटकने का साहस दिखाया। उसे विश्वास था कि उसका बेटा, जो अब एक बड़ा आदमी बन चुका है, उसे एक दिन जरूर मिलेगा।
जब होटल के बाहर सुरक्षा गार्ड्स ने उसे हटाने की कोशिश की, तो उसने कहा, “मुझे विजू से मिलना है। वो अंदर है।” लेकिन गार्ड्स ने उसका मजाक उड़ाया और उसे धक्का देकर बाहर निकाल दिया।
भाग 3: विक्रम का अतीत
विक्रम अपनी माँ के बारे में सोचते हुए होटल के अंदर गया। 15 साल पहले, जब वह शहर में पढ़ाई कर रहा था, उसके गाँव में दंगे हुए थे। उसकी माँ सावित्री उस आग में फंस गई थीं। विक्रम ने सोचा था कि उसकी माँ मर चुकी है, लेकिन आज उसे एक आवाज सुनाई दी, “विजू बाबू।” यह आवाज उसके दिल में एक अनजान डर पैदा कर गई।
जब विक्रम ने गाड़ी रुकवाने का आदेश दिया, तो उसने देखा कि उसके सामने एक भिखारिन बैठी थी। उसके दिल की धड़कन तेज हो गई। क्या यह उसकी माँ है? उसने गाड़ी से बाहर निकलकर सावित्री की ओर बढ़ा।
भाग 4: मिलन का पल
विक्रम सावित्री के पास गया और उसके चेहरे से उलझे हुए बालों को हटाया। उसकी आँखों में पहचान की चमक आई। सावित्री ने कांपते हुए कहा, “विजू, तू आ गया मेरा लाल।” यह सुनकर विक्रम की आँखों में आँसू आ गए। उसने अपनी माँ को गले लगा लिया और कहा, “माँ, तुम जिंदा हो। तुम यहाँ कैसे?”
सावित्री ने कहा, “मैंने तुझे बहुत ढूंढा। लोग कहते थे तू मर गया। लेकिन मेरा दिल कहता था मेरा विजू राजा बनेगा।” यह मिलन इतना पवित्र था कि वहाँ मौजूद हर व्यक्ति की आँखों में आँसू थे।
भाग 5: सावित्री का कर्ज
लेकिन सावित्री की खुशी जल्दी ही गहरी चिंता में बदल गई। उसने विक्रम से एक पुराना सिक्का निकाला और कहा, “यह तेरा लकी सिक्का है। मैंने इसे 15 साल तक भूखे रहकर संभाला है।” विक्रम ने यह सुनकर अपने आपको बुरा महसूस किया। उसने कहा, “माँ, मुझे माफ कर दो। मैं एसी कमरों में सोता रहा और तुम सड़कों पर।”
विक्रम ने अपनी माँ को गोद में उठाया और कहा, “मैं तुम्हें अपने असली घर ले जा रहा हूँ।” वह अपनी Rolls Royce में बैठकर अपने महल, जन्नत, की ओर बढ़ा।
भाग 6: जन्नत का सफर
जब विक्रम ने सावित्री को अपने महल में लाया, तो उसने कहा, “यह तेरा घर है। तू यहाँ राजमाता है।” लेकिन सावित्री ने कहा, “नहीं बेटा, मेरे पैर गंदे हैं। मैं अंदर नहीं जाऊंगी।” विक्रम ने कहा, “माँ, यह तेरा घर है। कोई तुझे हाथ नहीं लगाएगा।”
जब सावित्री को साफ किया गया, तो विक्रम ने देखा कि उसकी माँ के शरीर पर बहुत से घाव थे। डॉक्टर ने कहा, “उनकी हालत बहुत गंभीर है। कुपोषण और मानसिक आघात ने उन्हें कमजोर कर दिया है।”
भाग 7: सच्चाई का खुलासा
डॉक्टर ने विक्रम को बताया कि सावित्री को कई सालों तक ड्रग्स दिए गए थे, जिससे वह पागल हो गई थी। यह सुनकर विक्रम का खून खौल गया। उसने तय किया कि वह अपने माँ के गुनहगार का सामना करेगा।
विक्रम ने अपनी माँ के लिए प्रतिशोध की आग में जलते हुए दीनाना मल्होत्रा का पता लगाया, जिसने उसकी माँ को कैद किया था। विक्रम ने दीनाना को ढूंढ निकाला और उससे बदला लेने का फैसला किया।
भाग 8: प्रतिशोध का समय
विक्रम ने दीनाना के फार्महाउस में घुसकर उसे ढूंढा। जब उसने दीनाना का सामना किया, तो दीनाना ने कहा, “मैंने उसे पागल बना दिया।” विक्रम ने अपनी पिस्तल तान दी और कहा, “मेरी माँ की एक रात की नींद की कीमत तेरी पूरी सल्तनत से ज्यादा है।”
विक्रम ने दीनाना को गोली मार दी और अपनी माँ के लिए न्याय प्राप्त किया। उसने अपनी माँ के लिए लड़ाई लड़ी और उसे अपने गुनहगार से मुक्ति दिलाई।
भाग 9: नए जीवन की शुरुआत
विक्रम ने जेल में बिताए समय के बाद, जब वह बाहर आया, तो उसकी माँ सावित्री वहाँ खड़ी थी। उसने कहा, “कर्ज अभी पूरा नहीं हुआ बेटा। तुझे अभी बहुत जीना है उन हजारों माताओं के लिए जो सड़कों पर बेसहारा हैं।”
विक्रम ने अपनी माँ का हाथ थाम लिया और सावित्री निकेतन, बेसहारा माताओं के घर की ओर कदम बढ़ाया। उसने एक जान ली थी, लेकिन अब वह हजारों जानें बचाने वाला था।
निष्कर्ष
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि माँ का कर्ज कभी नहीं चुकता। माँ का प्यार और बलिदान अनमोल होता है। विक्रम ने अपनी माँ के लिए जो किया, वह केवल एक बेटे का कर्तव्य नहीं, बल्कि सभी बेटों के लिए एक प्रेरणा है। हमें अपने माता-पिता का सम्मान करना चाहिए और उनके बलिदानों को कभी नहीं भूलना चाहिए।
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