कहानी: दो मासूम बहन-भाई और टूटी हुई माँ
एक उदास सुबह
गाँव के एक कच्चे घर में सुबह की हल्की रोशनी फैल रही थी। घर के बाहर आम का पेड़ था, जिसके नीचे दो बच्चे—फारूक और महक—खामोश बैठे थे। उनकी आँखों में नींद थी, लेकिन दिल में बेचैनी। रात को सब कुछ बदल गया था। उनकी माँ, शबाना, अचानक घर छोड़कर चली गई थी। फारूक बार-बार सोचता, “भैया, अम्मी हमें छोड़कर क्यों गई? क्या वो वापस आएंगी?”
महक की आँखें आँसूओं से भरी थीं। वह अपने भाई से पूछती, “भैया, अम्मी कब आएंगी?” फारूक के पास कोई जवाब नहीं था। वह खुद अंदर से टूटा हुआ था, लेकिन महक के सामने मजबूत बनने की कोशिश कर रहा था।
घर की हालत बहुत कमजोर थी। टूटा-फूटा सामान, कम चीज़ें और हर रोज़ पैसों की कमी। शहबाज, उनके पिता, बुरा इंसान नहीं था, लेकिन मेहनत नहीं करता था। ज़्यादातर वक्त घर में पड़ा रहता, ना गुस्सा करता, ना शोर मचाता। बस चुप रहने वाला आदमी था।
शबाना कुछ महीनों से बदली हुई लगती थी। वह मोबाइल ज़्यादा इस्तेमाल करने लगी थी। कभी बाहर जाकर बात करती, कभी कमरे में चुपचाप बैठकर मैसेज करती रहती। घर के कामों में भी पहले जैसी दिलचस्पी नहीं रही थी। जैसे उसका दिल कहीं और लगा हो।
रात का अंधेरा और माँ का फैसला
एक रात सब सोए हुए थे। घर में खामोशी थी। शबाना आहिस्ता से उठी। उसने एक छोटा बैग निकाला, उसमें चंद कपड़े रखे, दो-तीन चीजें डाली और दरवाजा आहिस्ता से खोलकर बाहर निकल गई। वह पीछे वाले दरवाजे से निकली ताकि किसी को आवाज़ ना हो। बाहर आकर उसने मोबाइल निकाला और एक पैगाम भेजा—”मैं बाहर हूँ, जल्दी आओ।”
कुछ ही मिनटों बाद एक सफेद गाड़ी गली में दाखिल हुई। गाड़ी की लाइट्स बंद थीं। गाड़ी आहिस्ता-आहिस्ता आकर उसके पास रुकी। दरवाजा खोला गया। शबाना सीधी गाड़ी में बैठ गई। उसने एक बार भी घर की तरफ वापस नहीं देखा। ना अपने शौहर को, ना अपने बच्चों को। गाड़ी चल पड़ी और रात के अंधेरे में गाँव से बाहर निकल गई।
सुबह की खामोशी
जब सुबह हुई तो घर में अजीब सी खामोशी थी। फारूक सबसे पहले आँख खोलने वाला था। उसने इधर-उधर देखा—किचन खाली, सहन खाली और अम्मी कहीं नज़र नहीं आ रही थी। वह आहिस्ता से उठा, दरवाजे के पास गया, बाहर झाँका फिर वापस आ गया। उसने सोचा शायद अम्मी पानी लेने गई हो, शायद कुछ देर बाद आ जाए।
महक भी जाग गई थी। उठते ही बोली, “भैया, अम्मी कहाँ है?” फारूक ने होंठ काटकर जवाब दिया, “पता नहीं, शायद बाहर गई हो।” दोनों बच्चे भूखे थे। किचन में जाकर खड़े हो गए। बर्तन वैसे ही रखे थे जैसे रात को रखे गए थे। चूल्हा बंद था, खाना कुछ भी नहीं था।
शहबाज भी जाग गया था। मगर उसकी हालत पहले जैसी ही थी—खामोश, थका हुआ और जैसे सोचों में गुम। फारूक आहिस्ता से उसके पास आया, “अब्बा, अम्मी नहीं है।” शहबाज ने अदबंद आँखों से दरवाजे की तरफ देखा, मगर कुछ नहीं कहा। उसे भी समझ नहीं आ रहा था कि शबाना कहाँ गई, क्यों गई और कब आएगी।
पूरा दिन गुजर गया। वक्त गुजरता गया, मगर शबाना वापस ना आई। फारूक बार-बार बाहर जाता, गली में देखता, दरवाजे के पास खड़ा रहता। महक कभी घर के अंदर, कभी बाहर जाकर माँ को आवाज़ देती, मगर कोई जवाब नहीं आता। दोपहर तक बच्चे थककर बैठ गए। भूख लगी थी, मगर घर में कुछ नहीं था। शहबाज ने कोशिश की कि कुछ ले आए, मगर उसके पास पैसे नहीं थे।
मजबूरी और हिम्मत
फारूक ने बहन को पानी दिया और बोला, “महक, रो मत। अम्मी आ जाएंगी।” मगर उसकी अपनी आवाज़ भी काँप रही थी। वह मजबूत बनकर दिखा रहा था, लेकिन अंदर से टूट रहा था।
शाम और रात इंतजार ही इंतजार। घर के दरवाजे के पास तीनों बैठे थे। तेज़ हवा चल रही थी, मगर कोई कदमों की आवाज़ नहीं आ रही थी। शबाना ना दिन में आई, ना शाम में। रात होते-होते बच्चों के दिलों में डर बैठ गया। महक फारूक के साथ चिपककर बैठी थी। फारूक ने आसमान की तरफ देखा और आहिस्ता से कहा, “पता नहीं अम्मी क्यों नहीं आई।”
इस रात पहली बार उन्हें लगा कि शायद उनकी माँ वाकई वापस ना आए और यह सोच इन दोनों बहन-भाईयों को अंदर से तोड़ रही थी।
अध्याय 5: भूख, बीमारी और जिम्मेदारी
सुबह का वक्त था। घर में दोबारा वही खामोशी थी जो शबाना के जाने के बाद हर दिन रहने लगी थी। शहबाज अपने कमजोर जिस्म के साथ चारपाई पर बैठा था। उसके चेहरे पर थकन भी थी और बेबसी भी। फारूक और महक दोनों एक दूसरे को देख रहे थे। जैसे उन्हें समझ ही नहीं आ रही थी कि अब आगे क्या करना है।
फारूक आहिस्ता से उठा और पानी का जग लेकर अपने बाप के पास गया। “अब्बा, पानी पी लें।” शहबाज ने जग पकड़ा, मगर हाथ हल्का सा काँप गया। फारूक ने जल्दी से जग थाम लिया, “मैं दे देता हूँ अब्बा, आप रहने दें।”
महक भी करीब ही बैठ गई और बोली, “अब्बा, अम्मी कब आएंगी?” शहबाज ने नजरें नीचे कर ली। “पता नहीं बेटा। शायद आज आए।” लेकिन वह खुद जानता था कि शायद अब वह ना आए।
घर में खाने को कुछ नहीं था। फारूक ने फैसला किया कि आज वह खुद कुछ करेगा। वह 12 साल का बच्चा था, मगर हालात ने उसे वक्त से पहले बड़ा कर दिया था। वह पुराने कपड़े पहनकर बाहर निकला। गाँव की गलियों में हर तरफ खामोशी थी। कुछ लोग उसे देखकर अफसोस से सर हिलाते, मगर कोई पूछने आगे ना बढ़ता।
फारूक ने हौसला जमा किया और पुरानी दुकानों के पास जाकर काम पूछने लगा। “चाचा, मैं काम कर लूं?”
“बेटा, काम तो है नहीं अभी।”
“चाचा, मैं कुछ भी कर लूंगा। बस घर में राशन नहीं है।”
एक दुकान वाले ने तरस खाकर उसे ठहरने को कहा। “चलो यह बैग उठा दो, ग्राहक तक पहुंचा दो।” वो बैग फारूक के लिए बहुत भारी था, मगर उसने बिना कुछ कहे उसे उठाया और दौड़ता हुआ ग्राहक के घर तक पहुंचा दिया। वापसी पर उसे कुछ रुपए मिले। वह रुपए उसके लिए दुनिया के सबसे कीमती थे।
जब वह घर पहुंचा तो महक दरवाजे पर खड़ी थी। “भैया, आप इतनी देर कहाँ रह गए थे?” फारूक ने मुस्कुरा कर उसे दिखाया, “देख बहन, आज मैंने कुछ पैसे कमाए हैं। आज हम खाना बनाएंगे।” महक की आँखों में खुशी की हल्की सी झलक आई। शहबाज भी उन्हें देख रहा था। “फारूक बेटा, तुम्हें यह सब करने की जरूरत नहीं। मैं ठीक हो जाऊंगा, फिर काम पर जाऊंगा।” फारूक ने अपने बाप का हाथ थामा, “अब्बा, आप आराम करें। मैं हूँ ना।”
पहली रात की हिम्मत
उसी रात महक ने दो पुराने बर्तन साफ किए। फारूक ने चूल्हा जलाया और तीनों ने मिलकर वो सादा सा खाना खाया। मगर वो खाना पैसों से ज्यादा हौसले से बना था। खाने के बाद महक आहिस्ता से बोली, “भैया, अम्मी वापस आएंगी?” फारूक ने चाहकर भी झूठ ना बोला, “पता नहीं महक, लेकिन हम दोनों साथ हैं ना, बस डरना नहीं।” महक ने उसका हाथ पकड़ लिया, “मैं डर नहीं रही, बस आपके साथ हूँ।”
रात को शहबाज चारपाई पर लेटा हुआ छत को देख रहा था। “मैंने जिंदगी में कुछ नहीं किया। ना बीवी को रोक सका, ना बच्चों के लिए कुछ कर सका।” दूसरी तरफ फारूक और महक एक ही चारपाई पर साथ लेटे हुए थे। फारूक छत को देखकर सोच रहा था कि अब उसे अपने लिए नहीं, बल्कि अपनी बहन और बीमार बाप के लिए जीना है। उसने दिल में अहद किया, “कल से मैं और मेहनत करूंगा। महक को कभी मुश्किल नहीं आने दूंगा।”
घर में गरीबी जरूर थी, लेकिन फारूक की हिम्मत पहली बार जग चुकी थी। यह वह रात थी जिसने इन बहन-भाईयों की पूरी जिंदगी बदलनी थी।
बीमारी, संघर्ष और टूटता परिवार
घर के हालात पहले ही खराब थे। अब महक की तबीयत ने सबको और भी परेशान कर दिया। वह कई दिनों से कमजोर थी। कभी चक्कर आते, कभी खाँसी और चेहरा जर्द होता जा रहा था। फारूक उसे संभालता रहता, मगर वह खुद भी डरा हुआ था।
एक शाम महक ने धीरे से कहा, “भैया, मेरी सांस रुक-रुक के चल रही है।” फारूक के दिल पर जैसे चोट पड़ी, वह फौरन उसके पास बैठ गया, “मैं हूँ ना, डर मत।” लेकिन उसकी अपनी आवाज भी काँप रही थी। कमरे के दूसरे कोने में बैठा शहबाज दोनों बच्चों को देख रहा था। वह कुछ नहीं कह पा रहा था, मगर उसकी आँखों में डर साफ नजर आ रहा था।
रात को महक की हालत और बिगड़ गई। बुखार था, जिस्म जल रहा था और वह हल्की सी आवाज में पानी मांगती थी। घर में दवाई तक नहीं थी। फारूक ने बाप की तरफ देखा, “अब्बा, कुछ ले आई, महक ठीक नहीं है।” शहबाज ने आहिस्ता से सर हिलाया, “बेटा, मैं अभी जाता हूँ, कोशिश करता हूँ।”
वह रात के वक्त गाँव की तंग गलियों में निकल गया। हर दरवाजे पर जाकर दस्तक दी। किसी से दवाई मांगी, किसी से पैसे। मगर सब ने कहा, “भाई, कल आना, अभी नहीं दे सकते।” दुनिया की यह सख्ती उस रात शहबाज को खूब महसूस हुई। उसके पास देने के लिए कोई चीज नहीं थी। लेने के लिए किसी का दिल नहीं था। आखिर वह थककर घर की तरफ वापस चल पड़ा। उसके हाथ खाली थे, मगर दिल अंदर से टूट चुका था।
घर पहुंचकर उसने आहिस्ता दरवाजा खोला। फारूक और महक जाग रहे थे। फारूक ने जैसे ही बाप को देखा, फौरन पूछा, “अब्बा, क्या लाए?” शहबाज कुछ लम्हे खामोश रहा, फिर धीरे से बोला, “बेटा, किसी ने नहीं दिया। सुबह फिर कोशिश करूंगा।” फारूक की आँखों में मायूसी झलक आई। महक ने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया ताकि बाप उसे रोता ना देख ले।
शहबाज बच्चों के सामने मजबूत बनने की कोशिश कर रहा था, मगर उसकी आँखें अंदर की शिकस्त दिखा रही थी।
अंतिम विदाई
रात भर महक की हालत खराब रही। फारूक उसके सर पर पानी की ठंडी पट्टियां रखता रहा। शहबाज कोने में बैठा बेसहारा नजरों से अपनी बेटी को देखता रहा। जब सुबह हुई, महक और भी कमजोर हो चुकी थी। वह चल भी नहीं पा रही थी। फारूक ने उसे सहारा दिया और बाहर चबूतरे पर ले आया।
वह दोनों बैठे ही थे कि महक ने आहिस्ता सा पूछा, “भैया, अम्मी हमें छोड़कर क्यों चली गई?” फारूक के पास कोई जवाब नहीं था। उसकी आवाज रुक गई। वह बस इतना कह सका, “महक, मैं हूँ ना, मैं सब संभाल लूंगा।” महक ने उसकी तरफ देखा, मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन आँखों में आँसू भर आए।
और वह दिन, वह रात इन सबके लिए बहुत भारी गुजर गई। महक अब काफी बेहतर हो चुकी थी। उसके चेहरे की जड़ती कम हो गई थी। वह आहिस्ता-आहिस्ता चलने लगी थी और पहली बार फारूक के दिल से एक बड़ा बोझ हटा था। वह अपनी बहन को देखकर हर लम्हा शुक्र अदा करता था।
लेकिन जिस दिन महक ठीक हुई, उसी दिन एक और खामोश परेशानी शुरू हो गई और वह थी शहबाज की हालत। पिछले कई दिनों से वह बहुत कमजोर होता जा रहा था। वह बच्चों के सामने मजबूत रहने की कोशिश करता, मगर उसके हाथ काँपते, सांस फूलती और चेहरा अंदर धंस गया था।
एक दिन महक ने पूछा, “अब्बा, आप ठीक हैं?” शहबाज ने मुस्कुरा कर कहा, “हाँ बेटा, मैं ठीक हूँ।” लेकिन वह ठीक नहीं था, बिल्कुल भी नहीं। रात को खाने में वह मुश्किल से दो निवाले खा सका। फारूक ने गौर से देखा और उसके दिल में पहली बार खौफ बैठ गया।
रात गए शहबाज ने आहिस्ता से पुकारा, “फारूक बेटा।” फारूक फौरन उठ बैठा, “जी अब्बा?”
शहबाज ने उसका हाथ पकड़ा, “बेटा, तुम बहुत अच्छे हो। अपनी बहन का ख्याल रखना। वह डर जाती है, उसे कभी अकेला मत छोड़ना।”
फारूक की आँखें भर आईं, “अब्बा, आपको कुछ नहीं होगा।”
लेकिन शहबाज की सांसें और कमजोर हो रही थीं। उसने महक के सर पर हाथ रखा जो सोई हुई थी, “मेरी बच्ची, हमेशा हिम्मत रखना।” फिर उसने आखिरी बार फारूक की तरफ देखा, “बेटा, अल्लाह तुम दोनों का हामी हो।” यह उसकी आखिरी बात थी। कुछ लम्हों बाद उसके हाथ ने हरकत छोड़ दी। उसकी सांस रुक गई और वह अपने बच्चों को हमेशा के लिए छोड़ गया।
फारूक चीख पड़ा, “अब्बा, उठे ना, प्लीज उठे।” महक भी रो पड़ी, बाप के हाथ को पकड़ कर बोलती रही, “अब्बा, हमें छोड़कर मत जाए।” लेकिन शहबाज अब वापस नहीं आ सकता था। यह रात बच्चों पर दूसरी कयामत थी। पहले माँ गई थी, अब बाप भी चला गया। घर में सिर्फ रोने की आवाजें थीं। दो छोटे बच्चे और एक खामोश लाश।
गाँव की तन्हाई और यतीमी
अगली सुबह सूबे भर में खबर फैल गई कि शहबाज नहीं रहा। गाँव के लोग इस घर की हालत जानते थे। वह गरीब थे, तन्हा थे और बच्चों का कोई सहारा नहीं था। इसलिए गाँव वालों ने तरस खाकर खुद ही शहबाज की तदफीन करवाई। किसी ने कफन दिया, किसी ने कब्र खोदी, किसी ने नमाज जनाजा पढ़वाई।
फारूक और महक एक कोने में खड़े सब देखते रहे। खामोश, टूटे हुए, अकेले। उस दिन के बाद यह दोनों बच्चे वाकई यतीम हो गए थे। उनका दुनिया में अब कोई नहीं बचा था, सिवाय एक दूसरे के।
माँ की नई जिंदगी—बर्बादी का सफर
शबाना जब उस रात गाड़ी में बैठकर गई थी, उसे लगा था कि अब उसकी जिंदगी बदल जाएगी। उसे लगा था कि वह अब सुकून पाएगी, खुश रहेगी, आजाद हो गई। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। जिस शख्स के साथ वह गई थी, उसका नाम कामरान था। उसने शबाना को शादी का लालच दिया था, खूबसूरत जिंदगी का वादा किया था और कहा था, “बस एक बार चलो, मैं सब ठीक कर दूंगा।”
शबाना उसकी बातों में आ गई। वह उसे शहर के एक पुराने से मकान में ले गया। घर छोटा था, अंधेरा था और दरवाजे पर भारी सा ताला लगा हुआ था। पहली ही रात जब शबाना ने पूछा, “कामरान, शादी कब करोगे? मैं अपने बच्चों को कब बुलाऊँ?” तो वह हंसकर बोला, “पहले तुम्हें यह समझ आ जाए कि यहाँ रहना कैसे है। बाद में सब होगा।”
धीरे-धीरे शबाना को समझ आने लगा कि यहाँ शादी जैसी कोई बात थी ही नहीं। कामरान का असली मकसद कुछ और था। वह उसे कमरे के अंदर कैद रखता था। जब खुद बाहर जाता तो दरवाजे पर ताला लगाकर जाता। शबाना घंटों खिड़की से बाहर देखती रहती। कभी सड़क पर चलती औरतों को, कभी राहगीरों को, कभी बच्चों को देखकर उसके आँसू बहने लगते।
एक दिन उसने भागने की कोशिश की। कामरान ने उसे रोक कर कहा, “याद रखो, अब तुम वो शबाना नहीं रही जो गाँव में थी। यहाँ तुम वही करोगी जिससे मुझे पैसे मिलेंगे।” यह सुनकर शबाना के पैरों तले जमीन निकल गई। अब कामरान उसके पास अजनबी मर्द लाने लगा और उसकी मजबूरी को पैसों में बदलने लगा।
शबाना चीखती, रोती, मिन्नतें करती। मगर कामरान पर कोई असर नहीं होता। वह कहता, “दरवाजा बंद है। जाओगी कहाँ? अब तुम मेरे लिए कमाई हो।” हर रात शबाना अपने बच्चों को याद करके टूट जाती। वह चाहती थी कि एक बार, सिर्फ एक बार फारूक और महक को देख ले। मगर वह कमरे से निकल ही नहीं सकती थी। उसकी पूरी दुनिया बस एक छोटा सा कमरा था, जिसके बाहर कामरान का ताला लगा होता और अंदर सिर्फ डर, पछतावा और वो गलत फैसले, जिन्होंने उसकी पूरी जिंदगी बर्बाद कर दी।
अध्याय 11: गाँव में संघर्ष, शहर में पछतावा
दूसरी तरफ फारूक और महक की असली जिंदगी। अब घर में सिर्फ दो बच्चे रह गए थे। ना माँ, ना बाप, बस फारूक और उसकी छोटी बहन महक। फारूक ने बहुत जल्दी यह समझ लिया था कि अब उसे ही घर संभालना होगा। वह सुबह बहुत जल्दी उठता, गाँव के होटल पर जाता, लोगों के सामने चाय रखता, पानी पिलाता, बर्तन धोता और थोड़ी सी मजदूरी लेकर घर लौट आता।
शाम को जब वह थका-हारा वापस आता, महक कहती, “भैया, आप थक जाते होंगे।” और फारूक मुस्कुरा कर कहता, “मैं ठीक हूँ। हम दोनों साथ हैं ना, बस यही काफी है।”
समय बीतता गया। फारूक छोटा था, लेकिन हालात ने उसे जल्दी बड़ा कर दिया। कुछ साल बाद वह 16-17 साल का नौजवान हो चुका था। काम भी ज्यादा मिलने लगा। जिंदगी भी बेहतर होने लगी। दिल में उसने बस एक बात ठान ली, “मैं अपनी बहन को किसी तकलीफ में नहीं आने दूंगा।”
एक दिन गाँव की एक औरत अपने शौहर के साथ महक का रिश्ता लेकर आई। ढंग के शरीफ लोग थे। जांच-परख के बाद फारूक ने हाँ कर दी। कुछ दिनों में महक की शादी सादगी और खुशी के साथ हो गई। रुखसती के वक्त फारूक ने उसे गले लगाया। आँखों में मोहब्बत, दुआ और हल्की सी नमी, लेकिन दिल में सुकून क्योंकि उसकी बहन एक अच्छे परिवार में जा रही थी।
माँ का अंतिम अंजाम
दूसरी तरफ शबाना की जिंदगी पूरी तरह बिखर चुकी थी। जिस लड़के के साथ वह घर से भाग कर गई थी, कुछ वक्त बाद उसी ने उसे घर से निकाल दिया। शर्म और बदनामी के डर से शबाना में गाँव वापस जाने की हिम्मत भी नहीं थी। उसे हर वक्त यही डर सताता रहता, “मैं गाँव किस मुँह से जाऊँ? लोग क्या कहेंगे?”
बदनामी उसके पीछे ऐसे लगी थी कि ना कोई उससे शादी करना चाहता और ना कोई सहारा देने को तैयार था। हालात से मजबूर होकर वह सड़कों पर भीख मांगने पर आ गई। उसके चेहरे पर पछतावे, थकान और बेबसी की गहरी परछाई साफ दिखती थी। जिंदगी उसे उस मोड़ पर ले आई थी जहाँ ना पीछे लौटने की जगह थी और ना आगे बढ़ने की कोई उम्मीद।
एक आखिरी मुलाकात
एक दिन फारूक किसी काम से शहर गया हुआ था। तेज गर्मी का दिन और सड़क किनारे बाजार के पास सिर्फ एक औरत बैठकर भीख मांग रही थी। फारूक ने चलते-चलते उसके कटोरे में कुछ पैसे डाले। लेकिन जैसे ही औरत ने सर उठाया, फारूक के कदम वहीं रुक गए। वह हैरानी और सदमे से उसे देखने लगा। यह वही चेहरा, वही आँखें। यह तो उसकी माँ शबाना थी।
लरजती आवाज में वह बोला, “अम्मी, आप कहाँ थी? आपकी यह हालत कैसे हो गई?” यह देखकर फारूक फफक कर रो पड़ा। शबाना ने उसे पहचान तो लिया, मगर वह इतनी कमजोर थी कि बोल भी नहीं पा रही थी। भूख, बीमारी और थकान ने उसे लगभग तोड़ दिया था।
फारूक तुरंत उसे सहारा देकर अस्पताल ले गया। जांच के बाद डॉक्टर ने भारी आवाज में कहा, “इनकी हालत बहुत खराब है। यह कई दिनों से बीमार हैं और बेहद कमजोर हो चुकी हैं। हम कोशिश करेंगे, लेकिन इनके बचने के चांस बहुत कम हैं।” यह सुनते ही फारूक के पैरों तले जमीन खिसक गई।
उसने तुरंत महक को फोन किया, “महक, अम्मी मिल गई हैं। अस्पताल में है। जल्दी आओ।” जब महक अस्पताल पहुंची और उसने अपनी माँ को इस हालत में देखा, जोर से रो पड़ी। वह माँ का हाथ पकड़ कर कहती रही, “अम्मी, आप हमें छोड़कर क्यों चली गई थी? एक बार हमें बुला लेती।”
शबाना टूटी हुई आवाज में सिर्फ इतना कह सकी, “माफ कर देना, बच्चों।” कुछ ही पल बाद उसकी साँसें धीमी होने लगी और वह हमेशा के लिए खामोश हो गई। फारूक और महक चीख-चीख कर रोने लगे। जिस माँ ने कभी अपनी गलती पर कुछ नहीं कहा था, आज वह सब छोड़कर चली गई थी।
दोनों ने उसे गाँव ले जाकर उसका जनाजा पढ़वाया। लोग चुप खड़े थे। हर कोई उसकी कहानी सुनकर उदास था। जनाजे के बाद शबाना को गाँव के कब्रिस्तान में दफना दिया गया।
अंतिम अध्याय: टूटे सपनों की रोशनी
माँ की कब्र के पास फारूक और महक खड़े थे। आँसू उनकी आँखों में थे, लेकिन दिल में एक नई हिम्मत। उन्होंने एक-दूसरे का हाथ थामा, “अब हम कभी एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ेंगे।”
गाँव के लोग कहते हैं, “यह कहानी सिर्फ दो बच्चों की नहीं, बल्कि हर उस इंसान की है जो मुश्किलों में भी उम्मीद नहीं छोड़ता।”
समाप्त
News
उस दिन के बाद ऑफिस का पूरा माहौल बदल गया। अब कोई भी किसी की औकात या कपड़ों से तुलना नहीं करता था। सब एक-दूसरे की मदद करने लगे। अर्जुन सबसे प्रेरणा देने वाला इंसान बन गया। रिया भी अब पूरी तरह बदल चुकी थी। वह विनम्रता से छोटे काम करने लगी और धीरे-धीरे सबका विश्वास जीतने की कोशिश करने लगी।
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