प्रतीक्षा सदन वृद्धाश्रम की विमला जी की कहानी

सुबह-सुबह प्रतीक्षा सदन वृद्धाश्रम में बैठी विमला जी की नजरें बड़े से लोहे के गेट पर टिकी थीं। हर आती-जाती गाड़ी की आवाज़ पर उनके दिल में उम्मीद की एक किरण जगती, लेकिन अगले ही पल मायूसी छा जाती। एक साल होने को आया था उन्हें इस आश्रम में आए हुए। एक साल पहले अपने पोते के चौथे जन्मदिन पर उनके बेटे-बहू ने शानदार पार्टी दी थी। घर मेहमानों से भरा था। विमला जी को क्या पता था कि वही उनकी आखिरी खुशी थी।

पार्टी के कुछ दिन बाद ही बेटे संजय और बहू रीता ने कनाडा घूमने का प्लान बनाया।
“मां, हम एक महीने के लिए कनाडा जा रहे हैं। आप घर में अकेली कैसे रहेंगी? आपकी देखभाल भी ठीक से नहीं हो पाएगी। बस एक महीने प्रतीक्षा सदन वृद्धाश्रम में रह लीजिए, वहां आपकी उम्र के लोग भी हैं, मन लगा रहेगा। हम लौटते ही आपको सबसे पहले घर ले आएंगे।”

विमला जी ने बच्चों की खुशी के लिए मन मारकर हामी भर दी।
लेकिन जब बेटा-बहू वापस लौटे, तब भी उन्हें लेने कोई नहीं आया। हफ्ता बीता, तो उन्होंने खुद फोन किया।
“अरे मां, हम आते ही घर की मरम्मत का काम शुरू करवा दिया। दीवारों में सीलन थी, आपको तकलीफ होती। काम खत्म होते ही आपको इज्जत से घर लाएंगे।”

मरम्मत का काम लंबा खिंच गया। देखते-देखते तीन महीने बीत गए।
आश्रम की बाकी महिलाओं ने उन्हें समझाया, “विमला बहन, खुद को धोखा मत दो। यह सब बहाने हैं, अब कोई लेने नहीं आएगा।”

पहले विमला जी को विश्वास था कि उनका बेटा ऐसा नहीं कर सकता, लेकिन बहानों और इंतजार ने उनका भरोसा भी तोड़ दिया। अब उन्हें यकीन हो गया था कि कोई लेने नहीं आएगा।
हर रविवार सुबह वे तैयार होकर गेट पर बैठ जातीं, पर वह गाड़ी कभी नहीं आती थी, जिसका उन्हें इंतजार था।

आज उनके पोते पवन का पांचवां जन्मदिन था। बेटे से उम्मीद मर चुकी थी, लेकिन पोते की ममता का धागा अब भी उनकी सांसों से जुड़ा था। वे बस एक बार अपने पवन को देखना चाहती थीं।
एक घंटे तक दरवाजे की ओर ताकते-ताकते उनका सब्र टूट गया। आज उन्होंने तय कर लिया—नहीं, आज तो मैं अपने पवन को देखकर ही रहूंगी, चाहे जो हो जाए।

पर वे जानती थीं कि अपनी असली पहचान के साथ जाएंगी तो रीता उन्हें घर में घुसने नहीं देगी, और संजय भी कोई बहाना बना देगा।
इसलिए उन्होंने रूप बदलकर जाने का फैसला किया।
मैनेजर से छुट्टी लेने के लिए झूठ बोलना पड़ा—“मेरी ननद बहुत बीमार है, मुझे जाना है।”
कुमार जी ने उनकी आंखों में दर्द देख लिया और छुट्टी दे दी।

विमला जी ने अपने कमरे की पड़ोसन सरला जी से उनके पुराने मोटे कांच वाले चश्मे मांग लिए। साड़ी का पल्लू सिर पर डाल लिया, कमर और झुका ली, चाल में लाचारी ला दी। आईने में खुद को देखा—अब वह विमला जी नहीं, बल्कि एक बेनाम, अनजान बूढ़ी औरत थीं।

आश्रम से निकलकर जब वे अपने मोहल्ले की गलियों में पहुंचीं, तो हर मोड़, हर दुकान, हर घर, बचपन की यादों से भर गया।
आखिरकार वे अपने घर के सामने पहुंचीं। घर सजाया गया था, गुब्बारे, झालरें, गेट पर सजावट—पवन के जन्मदिन की पार्टी थी।
घर के बाहर कामवाली बाई रत्ना आई। रीता ने उसे डांटते हुए छुट्टी दे दी और कहा, “अगर तू नहीं आ सकती, तो अपनी सास को भेज दे।”

यही सुनकर विमला जी को एक मौका मिला। अपने स्वाभिमान को दांव पर रखकर, वे कामवाली बाई बनकर घर की घंटी बजा देती हैं।
रीता ने दरवाजा खोला, बिना ध्यान दिए उन्हें अंदर बुला लिया।
घर की जानी-पहचानी खुशबू, दीवारों पर लगी तस्वीरें, सोफे के कुशन—सब देखकर उनकी आंखें भर आईं।
रीता ने उन्हें काम में लगा दिया—बर्तन धोना, सब्जी काटना।

इसी बीच पवन शेरवानी पहने बाहर आया।
विमला जी उसे देखकर वहीं ठिठक गईं। उनका मन हुआ कि दौड़कर उसे गले लगा लें, लेकिन वे जानती थीं कि वे अब दादी नहीं, शांतिबाई हैं। वे बस दूर से उसे निहारती रहीं, अपनी आंखों के आंसू पल्लू से पोंछती रहीं।

दोपहर में संजय आया। उसने रसोई में काम करती बूढ़ी औरत को देखा, एक पल के लिए उसे अपनी मां की याद आई, पर फिर वह अपने काम में लग गया।

शाम को घर मेहमानों से भर गया। पवन ने केक काटा, पहला टुकड़ा संजय और रीता को खिलाया।
विमला जी दूर खड़ी देखती रहीं।
तभी संजय की आंटी मीना जी ने पूछा, “संजय, तुम्हारी मां कहां है? उनके बिना यह उत्सव अधूरा लग रहा है।”

रीता ने झूठ बोला, “मां कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गई हैं। उनकी बरसों से इच्छा थी, हमने ही सारी बुकिंग करवाई है।”

संजय ने भी मिलाकर बातें बनाईं।
मेहमानों ने तारीफों की झड़ी लगा दी—“वाह संजय, तू तो आज का श्रवण कुमार है!”

यह सुनकर विमला जी के हाथ कांप गए। पानी के गिलासों की ट्रे गिर गई, कांच टूट गया। सबका ध्यान उस बूढ़ी बाई पर गया।
जैसे ही वे झुकीं, चश्मा गिर गया, पल्लू हट गया। सब पहचान गए—यह कोई बाई नहीं, बल्कि संजय की मां विमला जी थीं।

मीना आंटी बोलीं, “विमला, तुम हो ना? यह क्या हाल बना रखा है?”

विमला जी ने रोते हुए सच बता दिया—“मैं कैलाश मानसरोवर नहीं गई थी, वृद्धाश्रम में थी। बेटा-बहू मुझे छोड़ आए, फिर कभी लेने नहीं आए। आज बस अपने पोते को देखने आई थी।”

संजय और रीता सिर झुकाए खड़े थे।
विमला जी अपने पोते पवन के पास गईं, घुटनों के बल बैठकर उसे गले लगा लिया।
एक साल की तड़प, ममता, आंसू—सब उस एक आलिंगन में बह गए।

सौरभ, संजय का दोस्त, आगे आया। उसने चश्मा उठाकर विमला जी को दिया और बोला, “मां जी, आप मेरे घर चलिए, मेरे घर में आपकी जगह सिर आंखों पर होगी।”

विमला जी ने मुस्कुराकर आशीर्वाद दिया, “जब अपना ही खून पानी हो गया, तो किसी पराए पर बोझ कैसे बनूं? लेकिन तुम्हारे विचार जानकर अच्छा लगा, बेटा।”

उन्होंने एक नजर बेटे-बहू पर डाली।
अब न गुस्सा था, न नफरत—बस गहरी उदासी थी।
“मेरी जगह अब वहीं है, जहां मेरी किस्मत मुझे ले गई—प्रतीक्षा सदन वृद्धाश्रम।”

इतना कहकर वे घर से बाहर चली गईं।
अब उनके कदमों में कोई लाचारी नहीं थी, बल्कि वह शांति थी जो सब कुछ खो देने के बाद मिलती है।

पीछे रह गया वह आलीशान घर, बिखरे हुए तोहफे, आधा खाया हुआ केक, कांच के टुकड़े और शर्मिंदा संजय-रीता।

मीना आंटी जाते-जाते बोलीं, “संजय, तूने मां के साथ नहीं, इंसानियत के साथ धोखा किया है। भगवान तुझे माफ नहीं करेगा।”

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