7 साल बाद पत्नी DM बनकर लौटी, पति सब्ज़ी बेचता मिला
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भूमिका
शहर के एक भीड़भाड़ वाले मार्केट में, रमेश अपने सब्ज़ी के ठेले पर रोज़ की तरह सब्ज़ी बेच रहा था। बारिश के बाद ताजे टमाटर, हरी मिर्च, धनिया – हर ग्राहक के लिए उसके पास मुस्कान थी। रमेश का दिल बड़ा था, अक्सर गरीबों को उधार दे देता, बच्चों को मुफ्त धनिया दे देता। काका हमेशा उसे समझाते – “दिल छोटा कर ले, तभी पैसा टिकेगा।” लेकिन रमेश जानता था, दिल छोटा कर लिया तो पेट कैसे भरेगा?
सात साल से रमेश यही काम कर रहा था। उसकी पहचान इसी ठेले से थी। इसी बीच मार्केट में खबर फैल गई – आज नई डीएम मैडम खुद मार्केट का निरीक्षण करने आ रही हैं। सब्ज़ी वालों में हलचल मच गई। रमेश को फर्क नहीं पड़ा – डीएम हो या कलेक्टर, सब्ज़ी तो वही बिकेगी।
अचानक मुलाकात
सरकारी गाड़ियों का काफिला आया। सब्ज़ी वाले साइड हो गए। नई डीएम मैडम, आशा, गाड़ी से उतरीं। मार्केट का निरीक्षण शुरू हुआ। आशा ने सब्ज़ी वालों के लाइसेंस चेक किए, सब्ज़ी की ताजगी देखी। जब रमेश के ठेले पर पहुंचीं, उसकी तरफ देर तक देखती रहीं। रमेश ने लाइसेंस दिखाया – “आठ साल से यही काम कर रहा हूं मैडम।”
आशा ने सब्ज़ी का भाव पूछा, भिंडी ताजी है या नहीं, सब कुछ ठीक-ठाक था। लेकिन जब रमेश और आशा की नजरें मिलीं, दोनों को एक अजनबी सी पहचान का एहसास हुआ। आशा ने देर तक रमेश को देखा, फिर आगे बढ़ गई। मार्केट में चर्चा हो गई – “नई डीएम मैडम बहुत पढ़ी लिखी हैं, दिल्ली से ट्रांसफर होकर आई हैं।”

पुरानी यादें
रात को रमेश अपने ठेले के पास बैठा था। तभी आशा उसके पास आई। दोनों की आंखों में सात साल पुरानी यादें तैरने लगीं। आशा ने पूछा – “तुम अभी भी सब्ज़ी का ठेला लगाते हो?”
रमेश ने मुस्कराकर कहा – “आप मुझे छोड़कर चली गई थीं, धंधा तो यही है।”
आशा बोली – “इतने सालों में एक चिट्ठी भी नहीं भेजी?”
रमेश ने जवाब दिया – “पता नहीं था कहां भेजूं। दिल्ली बहुत बड़ी है।”
आशा ने बताया – “मैंने भेजी थी।”
रमेश बोला – “मुझे नहीं मिली।”
फिर दोनों ने अपने-अपने हालात बताने शुरू किए। आशा ने कहा – “मैंने पढ़ाई जारी रखी, तुम सब्ज़ी बेचने लगे।”
रमेश बोला – “तुमने मना किया था, मैंने सुना नहीं। गरीबी जल्दी समझदार बना देती है।”
रिश्तों की उलझन
आशा ने पूछा – “तुम्हें शर्म आती है मुझे ऐसे देख कर?”
रमेश ने कहा – “नहीं।”
आशा बोली – “तो नजर क्यों झुका रखी है?”
रमेश बोला – “क्योंकि ऊपर देखूं तो फर्क दिखता है। तुम ऑफिसर हो, मैं सब्ज़ी वाला।”
आशा ने कहा – “तुम मेरे हस्बैंड थे।”
रमेश ने मुस्कराकर कहा – “अब भी हो?”
आशा बोली – “क्यों छोड़ा था?”
रमेश ने जवाब दिया – “तुम घर छोड़कर गईं, मैंने तुम्हें जाने दिया। मजबूर था।”
आशा बोली – “मुझे सबसे ज्यादा यह चुभता है कि तुमने एक बार भी नहीं कहा – मत जाओ।”
रमेश ने कहा – “अगर कहता तो तुम रुक जाती। और फिर पूरी जिंदगी उसका ब्लेम मुझ पर डालती।”
आशा ने कहा – “तुम बहुत समझदार बन गए हो।”
रमेश बोला – “गरीबी जल्दी समझदार बना देती है।”
खोई हुई खुशियाँ
आशा ने पूछा – “तुम खुश हो?”
रमेश ने कहा – “नहीं।”
आशा बोली – “डीएम होकर भी?”
रमेश ने मुस्कराकर कहा – “हां।”
आशा बोली – “मैं भी खुश नहीं हूं।”
रमेश ने पूछा – “मां कैसी है?”
आशा ने आंखें झुका ली – “चली गई, तीन साल पहले।”
रमेश बोला – “बताने वाला कौन था?”
आशा ने कहा – “यहां खड़े रहना ठीक नहीं।”
रमेश बोला – “तो मत रहो।”
आशा ने पूछा – “क्या तुम खुश हो?”
रमेश ने कहा – “मैं खुश नहीं हूं।”
आशा बोली – “डीएम होकर भी?”
रमेश ने जवाब दिया – “हां।”
फिर से मुलाकात
अगली शाम आशा फिर मार्केट आई। रमेश सब्ज़ी बेच रहा था। किसी ने इललीगल ठेलों की शिकायत की थी। जांच शुरू हुई। रमेश ने लाइसेंस दिखाया। आशा ने सब्ज़ी वालों की समस्या सुनी, सबको बराबरी का मौका दिया।
रमेश ने कहा – “सब परेशान ही करते हैं।”
आशा बोली – “रहने दीजिए। आप कुछ कहना चाहते हैं?”
रमेश ने सिर हिलाया – “नहीं।”
आशा ने कहा – “अगर कह दिया तो लोग कहेंगे ऑफिसर की पहचान का फायदा उठाया। अगर नहीं कहेंगे तो बोलेंगे ऑफिसर ने अनदेखा किया। लोग कुछ ना कुछ तो कहेंगे।”
रमेश बोला – “मैंने कोई एहसान नहीं किया।”
आशा बोली – “मैंने भी मांगा नहीं।”
रमेश ने मुस्कराकर कहा – “कुछ तो रिश्ता होगा।”
आशा ने कहा – “यहां सब बराबर है।”
रमेश बोला – “बस यही चाहिए था।”
रात की बात
रात को आशा ने रमेश को बुलाया। दोनों पार्क में एक बेंच पर बैठे। आशा ने कहा – “यह जगह मुझे अजनबी लगती है।”
रमेश बोला – “मुझे हर जगह लगती है।”
आशा बोली – “मैंने सोचा था ऑफिसर बन जाऊंगी तो सब आसान हो जाएगा।”
रमेश ने कहा – “आसान कुछ नहीं होता।”
आशा ने पूछा – “तुम नाराज हो?”
रमेश ने कहा – “नहीं।”
आशा बोली – “तो इतने साल चुप क्यों रहे?”
रमेश ने जवाब दिया – “क्योंकि बोलता तो तुम रुक जाती। और अगर रुक जाती तो तुम जिंदगी भर खुद से नाराज रहती।”
आशा ने कहा – “मैंने तुम्हें पीछे छोड़ दिया।”
रमेश बोला – “तुम आगे बढ़ी।”
आशा बोली – “तुम साथ आ सकते थे।”
रमेश ने कहा – “कंधों पर बोझ था।”
आशा बोली – “मैं मदद करती।”
रमेश ने कहा – “तुम खुद बोझ में थी।”
आशा बोली – “आज बाजार में तुम्हें देखा तो लगा मैं जीत गई।”
रमेश बोला – “जीत का मतलब सबके लिए एक जैसा नहीं होता। तुम्हारी जीत फाइल्स में है, मेरी रोज की रोटी में।”
आशा ने पूछा – “तुम अब भी मेरी फिक्र करते हो?”
रमेश ने मुस्कराकर कहा – “आदत है।”
आशा बोली – “और मैं?”
रमेश ने कहा – “तुम्हारी भी।”
उम्मीद की किरण
आशा बोली – “मैं यहां ज्यादा दिन नहीं रहूंगी। ट्रांसफर है।”
रमेश ने पूछा – “फिर?”
आशा बोली – “फिर वही काम।”
रमेश ने कहा – “और तुम?”
आशा बोली – “सुबह थैला।”
रमेश ने हिम्मत करके पूछा – “अगर मैं कहूं चलो फिर से कोशिश करें?”
आशा ने मुस्कराकर कहा – “किस हैसियत से?”
रमेश बोला – “आशा की।”
आशा बोली – “और मैं रमेश।”
रमेश ने कहा – “मैं तुम्हें कंधों पर नहीं बैठा सकता।”
आशा बोली – “मुझे कुर्सी नहीं चाहिए। मेरे पास वक्त कम है।”
रमेश बोला – “मेरे पास भी।”
आशा बोली – “लोग बातें करेंगे।”
रमेश ने मुस्कराकर कहा – “लोग हमेशा बोलते हैं।”
आशा बोली – “अगर हम फिर साथ हुए तो किसी के एहसान से नहीं।”
रमेश ने कहा – “मैं चाहती भी नहीं।”
आशा बोली – “और अगर नहीं हुए तो भी आज की रात सच थी।”
विदाई
आशा ने कहा – “मुझे जाना होगा। सुबह जल्दी है।”
रमेश बोला – “आज तुमने मुझे बराबरी दी।”
आशा मुस्कराकर बोली – “हमेशा थी।”
रमेश ने आशा को जाते हुए देखा। उसके दिल में एक हल्की सी उम्मीद थी – शायद कभी फिर से दोनों की राहें मिल जाएं। दोनों की दुनिया अलग थी, मंजिलें अलग थीं, लेकिन दिल के किसी कोने में एक-दूसरे की फिक्र हमेशा थी।
निष्कर्ष
यह कहानी सिर्फ एक पति-पत्नी के पुनर्मिलन की नहीं, बल्कि सपनों, संघर्ष, आत्म-सम्मान और बराबरी की है। आशा ने समाज के बंधनों को तोड़कर अपना मुकाम हासिल किया, रमेश ने गरीबी में भी अपनी सच्चाई और ईमानदारी नहीं छोड़ी। दोनों ने अपने-अपने रास्ते चुने, लेकिन दिल के किसी कोने में एक-दूसरे के लिए आदर और फिक्र हमेशा रही।
कभी-कभी जिंदगी में जीत और हार का मतलब अलग-अलग होता है। एक की जीत फाइलों में है, दूसरे की रोज की रोटी में। लेकिन असली जीत बराबरी और इज्जत में है।
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