“इसे अभी उतारो!”, कहा जौहरी ने जब उसने देखा कि मेरे पति ने मुझे जो लॉकेट दिया था, उसके अंदर क्या था…
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“इसे अभी उतारो!” — उस लॉकेट की परत के पीछे छिपा धीमा कत्ल
अध्याय 1: मेट्रो में पकड़ लिया गया मेरा डर
दिल्ली मेट्रो की भीड़ हमेशा की तरह शोर करती हुई आगे बढ़ रही थी—घोषणाएँ, गाड़ियों की खड़खड़ाहट, यात्रियों के कदमों की जल्दी, और मेरे अंदर की एक पुरानी-सी बेचैनी जो पिछले आठ महीनों से मेरी सांसों के साथ चल रही थी। मैं खड़ी थी, एक खंभे से हाथ टिकाए, और दूसरे हाथ की उंगलियाँ अनजाने में मेरे गले में झूलते उस सोने के लॉकेट को छू रही थीं—दो जुड़े दिलों वाला, लंबी चेन पर चमकता हुआ। वही लॉकेट जिसे अजय ने हमारी 31वीं सालगिरह पर “हमारे प्यार का निशान” कहकर पहनाया था।
और तभी—
किसी ने मेरी कलाई पकड़ ली।
मैं बुरी तरह चौंकी। डर मेरे शरीर में बिजली की तरह दौड़ा। मेट्रो में जेबकतरे, छीना-झपटी, हर खबर मुझे याद आ गई। मैंने झटका देकर हाथ छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन पकड़ मजबूत थी—किसी ऐसे आदमी की पकड़, जिसने जीवन में भारी काम किए हों। मैंने मुड़कर देखा।
वह एक मध्यम उम्र का आदमी था, चेहरा सामान्य, कपड़े साधारण, लेकिन आँखों में एक अजीब-सा यकीन। वह मेरी तरफ झुका और बहुत धीमी आवाज़ में बोला—
“मैडम… इसे अभी उतार दीजिए।”
मैंने घबराकर कहा, “क… क्या? आप कौन हैं? मेरा हाथ छोड़िए!”
उसने तुरंत पकड़ ढीली कर दी, जैसे उसे एहसास हो कि मैं डर गई हूँ। फिर भी उसकी आवाज़ सधी हुई थी।
“मैं चोर नहीं हूँ। मैं जौहरी हूँ… पुश्तैनी धंधा। और मुझे… मुझे दिख रहा है कि इस लॉकेट के अंदर क्या है।”
मैं हँस ही पड़ी—नर्वस हँसी, जो डर छिपाने के लिए निकलती है। “अंदर? अंदर क्या हो सकता है? यह बस… सोना है।”
वह आदमी एक पल चुप रहा। फिर बोला—
“यह तोहफा नहीं है, मैडम। यह… धीमा कत्ल है।”
मेरे रोंगटे खड़े हो गए। एक सेकंड के लिए मेट्रो की आवाज़ें दूर हो गईं। मेरे कानों में बस वही शब्द गूंजा—धीमा कत्ल। मुझे अपने पिछले आठ महीने याद आ गए—हर सुबह मतली, उल्टी, कमजोरी, सिर दर्द, नींद का टूटना, और डॉक्टरों के खाली चेहरे जो कहते थे, “सब रिपोर्ट्स नॉर्मल हैं।”
मैंने काँपती आवाज़ में पूछा, “आप… आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?”
वह मेरी गर्दन की तरफ देखने लगा—जहाँ लॉकेट की पिछली सतह मेरी त्वचा को छूती थी। “देखिए… आपकी त्वचा पर हल्की लालिमा है। और इस धातु का रंग… अंदर की तरफ बहुत हल्का-सा हरा पड़ रहा है। यह सिर्फ ऑक्सीडेशन नहीं लगता। यह किसी रसायन की परत हो सकती है।”
मेरी सांस अटक गई।
“आप इसे उतार दीजिए। पुलिस में जाइए। किसी अच्छे जौहरी या लैब से चेक करवाइए। और…” उसकी आँखें मेरे चेहरे पर जम गईं, “सच बोलूँ तो यह काम… कोई करीबी ही कर सकता है।”
अगला स्टेशन आया। वह आदमी उतर गया। भीड़ उसे निगल गई। और मैं—मैं वहीं खड़ी रह गई, अपनी कलाई पर उसकी उँगलियों की छाप और अपने गले में एक “तोहफे” का बोझ लेकर।
उस पल मेरे मन में एक ही नाम चमका—अजय त्रिपाठी। मेरे पति।
और मैं तुरंत खुद से बोली—नहीं। यह संभव नहीं। 31 साल… 31 साल की शादी के बाद कोई ऐसा कैसे कर सकता है?
पर फिर मेरे शरीर ने जवाब दिया—उसी क्षण मतली की एक हल्की लहर उठी, जैसे मेरा अंदरूनी सच मुझे झूठ बोलने न दे रहा हो।

अध्याय 2: मैं नंदिनी त्रिपाठी हूँ—और यह कहानी मेरे घर से शुरू होती है
मेरा नाम नंदिनी त्रिपाठी है। उम्र 56 साल। जयपुर के वैशाली नगर में रहती हूँ। मैं घर से ही ट्यूशन सेंटर चलाती हूँ—10वीं और 12वीं के बच्चों को गणित और विज्ञान पढ़ाती हूँ। मेरे पास पहले 28 स्टूडेंट्स थे, अब ज़्यादा हैं। पढ़ाना मेरा काम नहीं—मेरी पहचान है। मेरी ताकत है।
अजय त्रिपाठी—मेरे पति—फार्मेसी से जुड़े बिज़नेस में थे। मेहनती, होशियार, और एक समय तक बहुत भरोसेमंद। हमारी शादी अरेंज थी, पर हमने एक-दूसरे को पसंद किया था। शुरुआती सालों में पैसा कम था, पर साथ था। हम हँसते थे, सपने देखते थे, और छोटी-छोटी चीज़ों में खुश हो जाते थे।
फिर वक्त बदला। बिज़नेस बढ़ा, पैसा आया, फ्लैट बड़ा हुआ, बेटी श्रद्धा हुई। श्रद्धा अब दिल्ली में नौकरी करती है। घर में मैं और अजय रह गए थे। और जब बेटी घर छोड़कर गई, तब मुझे पहली बार लगा—अजय भी धीरे-धीरे “घर” छोड़ रहे हैं, बस शरीर से यहाँ हैं।
देर रात लौटना, फोन कॉल्स बाहर जाकर करना, चेहरे पर तनाव, कभी-कभी शराब की गंध। मैं पूछती तो वह टाल देते—“तुम इन चीजों में मत पड़ो।”
और इसी बीच मेरे पिता का देहांत हुआ—तेरह साल पहले। उनके जाने के बाद उनकी पुश्तैनी हवेली मेरे नाम हो गई। सिविल लाइंस की पुरानी हवेली—पत्थरों की दीवारें, लकड़ी के दरवाज़े, बड़ा आँगन, ढेर सारी यादें।
अजय कई बार कह चुके थे—“इसे बेच दो। अच्छी कीमत मिलेगी। बिज़नेस बढ़ेगा।”
पर मैंने हमेशा मना किया। “यह मेरे पिता की निशानी है। यह नहीं बिकेगी। यह श्रद्धा को मिलेगी।”
उनकी आँखों में उस वक्त जो चुभन मैंने देखी थी, वह मुझे आज तक याद है।
और फिर—हमारी 31वीं सालगिरह पर—वह लॉकेट आया।
अध्याय 3: प्यार का निशान… या जहर की परत?
अजय ने उस दिन मुझे ऐसे देखा था जैसे फिर से वही पुराना अजय लौट आया हो। उन्होंने मेरे हाथ में छोटा-सा बॉक्स रखा और कहा, “नंदिनी, यह खास लॉकेट है। इसे हमेशा पहनना। यह हमारे प्यार का निशान है।”
मैं पिघल गई। 31 साल की शादी में तोहफे कम मिलते हैं—और जब मिलते हैं, तो उनके पीछे उम्मीदें बहुत होती हैं। मैंने उसे उसी दिन पहन लिया—नहाते समय भी नहीं उतारती थी। मुझे अच्छा लगता था कि कोई तो चीज़ है जो कहती है—“अभी भी मैं किसी के लिए खास हूँ।”
तीन हफ्ते बाद मेरी सुबहें बदलने लगीं।
मतली। उल्टी। कमजोरी। खाना न पचना। वजन कम होना। सिर भारी रहना। नींद टूटना।
मैं डॉक्टर के पास गई। टेस्ट हुए। सब नॉर्मल। दूसरा डॉक्टर, तीसरा डॉक्टर। वही जवाब—“कुछ नहीं है।”
पर मेरा शरीर चीख रहा था कि “कुछ” है।
अजय परेशान दिखते थे। मेरे लिए सूप बनाते, कहते “चेकअप करवाओ।” कभी-कभी उनका ध्यान इतना ज़्यादा लगता था कि मुझे अपराधबोध होता—शायद मैं ही ज्यादा सोच रही हूँ। पर फिर अगले दिन सुबह वही उल्टी… और मेरा अपराधबोध भी उल्टी के साथ बाहर निकल जाता।
फिर तीन महीने पहले, दिल्ली में केमिस्ट्री टीचर्स की एक वर्कशॉप के लिए मुझे जाना पड़ा। मैं श्रद्धा के घर रुकी। जल्दी-जल्दी में लॉकेट पहनना भूल गई। और उन्हीं तीन दिनों में—मतली बंद हो गई।
पूरी तरह।
पहले दिन लगा संयोग है। दूसरे दिन लगा—अजीब है। तीसरे दिन लगा—यह संयोग नहीं है।
जब मैं घर लौटी और लॉकेट फिर पहन लिया, उसी शाम हल्की मतली लौट आई। अगली सुबह उल्टी। जैसे किसी ने स्विच ऑन कर दिया हो।
मैं केमिस्ट्री टीचर हूँ। मैं “किस्मत” से पहले “कारण” ढूँढती हूँ। मैंने खुद पर प्रयोग किया।
एक दिन लॉकेट नहीं पहना—मतली नहीं हुई।
अगले दिन पहना—शाम तक मतली।
फिर उतारा—धीरे-धीरे राहत।
मैंने लॉकेट को मैग्नीफाइंग ग्लास से देखा। जहाँ वह त्वचा से चिपकता था, वहाँ अंदर की सतह पर बहुत हल्का-सा हरा रंग था—जैसे किसी रसायन की महीन परत।
और मेरे दिमाग में एक शब्द उभरा—आर्सेनिक।
मेरे हाथ काँपने लगे। आर्सेनिक—धीमा जहर। लंबे समय तक कम मात्रा में मिले तो शरीर को अंदर से तोड़ देता है—मतली, उल्टी, कमजोरी, सिर दर्द… सब वही।
पर प्रश्न सबसे बड़ा था—अगर यह सच है… तो यह परत लॉकेट पर आई कैसे?
और अगर किसी ने जानबूझकर लगाई… तो वह कौन?
मैं अपने ही मन से लड़ने लगी।
“अजय नहीं।”
“पर अजय के अलावा कौन?”
“31 साल का पति…”
“हवेली…”
“कर्ज…”
“फोन कॉल…”
जवाब मेरे घर के अंदर ही कहीं छिपा था।
अध्याय 4: सबूत—और एक पुरानी छात्रा का फोन
मैंने सबूत इकट्ठा करने शुरू किए।
हाँ, मैंने अपनी उल्टी के नमूने बोतलों में रखे। तारीख लिखी। छिपा दिए। मैंने एक डायरी बनाई—किस दिन लॉकेट पहना, कितने बजे उतारा, कब मतली शुरू हुई, कब रुकी। यह मेरे जीवन का सबसे घिनौना, पर सबसे जरूरी प्रयोग था।
फिर मुझे याद आई—प्रिया सक्सेना। मेरी पुरानी छात्रा। अब एसएमएस अस्पताल में फॉरेंसिक साइंटिस्ट।
मैंने उसे फोन किया। वह तुरंत मिलने को तैयार हो गई। कॉफी शॉप में मैंने लॉकेट, नमूने, डायरी सब उसके सामने रख दिए। वह गंभीर हो गई। उसने लॉकेट को घुमाकर देखा, और बस इतना कहा—
“मैम… यह हरा रंग… शक वाला है। मैं लैब टेस्ट करवा सकती हूँ… लेकिन अनऑफिशियल। और अगर सच वही निकला जो आप सोच रही हैं… तो आपको बहुत सावधान रहना होगा।”
उसके शब्द मेरे भीतर पत्थर की तरह बैठ गए।
अगले दो हफ्ते मेरी जिंदगी का सबसे लंबा समय था। मैं अजय के सामने लॉकेट पहनती ताकि उसे शक न हो। लेकिन रात को, जब वह सो जाता, मैं उसे उतार देती—जैसे किसी साँप को अलग रख रही हूँ।
और उसी दौरान मैंने अजय को देखना शुरू किया—वाक्यों के बीच के शब्द, मुस्कान के पीछे की घबराहट, और उन आँखों की छिपी हुई जल्दी… जैसे वह समय के खिलाफ दौड़ रहा हो।
एक रात, जब वह सो गए, मैंने उनका फोन उठाया। पासवर्ड मुझे पता था—उनकी जन्मतिथि। और वहाँ… संदेशों की एक दुनिया थी—पैसे, दबाव, धमकी।
“ब्याज बढ़ रहा है।”
“85 लाख हो गया।”
“पैसे नहीं दिए तो अंजाम बुरा होगा।”
मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।
85 लाख? अजय पर?
और फिर… मुझे उनका एक दूसरा फोन मिला—सीक्रेट फोन। उसमें व्हाट्सऐप चैट्स थीं—सट्टा, जुआ, हार, और डर।
मेरे अंदर का आखिरी भ्रम टूटने लगा। अजय मुश्किल में थे—और हवेली की कीमत करीब 3.5 करोड़ थी। वह हवेली… जिसे मैं बेचने को तैयार नहीं थी।
अब तस्वीर साफ थी और उतनी ही भयानक भी।
अध्याय 5: रिपोर्ट—और मेरा फैसला
दो हफ्ते बाद प्रिया का फोन आया।
“मैम… रिजल्ट आ गए हैं। आपको मिलना होगा।”
उसने मुझे रिपोर्ट दी। हाथ काँप रहे थे। शब्द साफ थे—लॉकेट की अंदरूनी सतह पर आर्सेनिक कंपाउंड की पतली परत। और मेरे नमूनों में भी आर्सेनिक की मौजूदगी—कम मात्रा में, लगातार।
यह कोई बीमारी नहीं थी।
यह योजना थी।
और योजना मेरे पति के हाथों की हो सकती थी।
प्रिया ने कहा, “मैम यह अटेम्प्टेड मर्डर है। आपको पुलिस में जाना चाहिए।”
मैंने कहा, “जाऊँगी… लेकिन पहले मैं ऐसा केस बनाऊँगी कि वह बच न सके।”
मैंने अपनी बचपन की दोस्त—सुधा गर्ग—को बुलाया। वह क्रिमिनल वकील थी। मैंने उसे सब दिखाया—रिपोर्ट, स्क्रीनशॉट, डायरी।
उसने मेरी आँखों में देखकर कहा, “नंदिनी, यह बहुत गंभीर है। हमें साबित करना होगा कि अजय को पता था, और उसने जानबूझकर यह कराया।”
हम जौहरी की दुकान तक पहुँचे—रामलाल ज्वेलर्स। वहाँ के असिस्टेंट ने अजय को पहचान लिया। और उसकी गवाही—मेरी रीढ़ में ठंडी सुई की तरह उतर गई।
“साहब ने एक छोटी बोतल लाई थी… पाउडर था… कहा ‘यह स्पेशल मेडिसिन है, अंदर बहुत पतली परत लगाओ… ताकि दिखे नहीं।’”
मेडिसिन? लॉकेट के अंदर?
मुझे वही मेट्रो वाले जौहरी की आवाज़ याद आई—“यह धीमा कत्ल है।”
अब मेरे पास सबूत था। लेकिन सुधा ने एक और बात कही—
“पहले अपनी हवेली सुरक्षित करो। इसे तुरंत श्रद्धा के नाम कर दो। गिफ्ट डीड। रजिस्ट्री। ताकि अगर तुम्हें कुछ हो जाए, अजय उस पर दावा न कर सके।”
मैंने श्रद्धा को बुलाया। वह रो रही थी। बार-बार बोल रही थी—“माँ… पापा ऐसा नहीं कर सकते…”
मैंने उसे बस रिपोर्ट पकड़ा दी। कागज कभी झूठ नहीं बोलते, बेटा।
हमने हवेली श्रद्धा के नाम कर दी। चुपचाप।
और उसी रात—मैंने अपनी डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा—
“अब मैं चुप नहीं रहूँगी।”
अध्याय 6: अंतिम छल—और अजय का असली चेहरा
कुछ दिन बाद मैं एक दिन के लिए अलवर गई थी। लौटकर आई तो अलमारी खुली मिली—मेरे सारे जेवर गायब। चेन, कंगन, बालियाँ, अंगूठियाँ—सब।
अजय आया तो मैंने पूछा, “मेरे जेवर कहाँ हैं?”
उसने इतनी शांति से कहा कि मेरा खून जम गया—
“मैंने बेच दिए।”
“क्या? बिना पूछे?”
“पैसों की जरूरत थी। घर का ही तो है।”
उस “घर का ही तो है” में मुझे अपना मूल्य दिखा—एक सामान। एक संसाधन। एक बोझ, जिसे हटाकर हवेली तक पहुँचा जा सकता था।
उस रात मेरे भीतर की आखिरी नरमी भी मर गई।
अध्याय 7: परिवार की बैठक—जहाँ प्यार का नकाब उतर गया
मैंने योजना बनाई। शनिवार शाम को “परिवार की छोटी मीटिंग”। मैंने अजय से कहा—“मैं सोच रही हूँ हवेली बेच देते हैं।”
उसकी आँखें चमक उठीं। उसी चमक में मुझे सच दिख गया—वह चमक मेरी नहीं, पैसे की थी।
शाम को सब आए—श्रद्धा, मेरी बहन, अजय का भाई, और सुधा। अजय को लगा यह हवेली की बिक्री के लिए है। मैंने चाय दी। सब बैठ गए।
और फिर मैंने कहा—
“अजय, तुम्हें याद है तुमने मुझे लॉकेट दिया था?”
वह मुस्कुराया। “हाँ।”
“तुम्हें याद है तुमने उसमें अंदर क्या लगवाया था? वह पाउडर?”
उसकी मुस्कान जैसे किसी ने चाकू से काट दी।
मैंने टेबल पर फाइल रखी—फॉरेंसिक रिपोर्ट।
“यह आर्सेनिक की रिपोर्ट है। और यह मेरी रिपोर्ट है। आठ महीने से मुझे धीमा जहर दिया जा रहा था।”
कमरे में सन्नाटा उतर आया। श्रद्धा की आँखें भर आईं। मेरी बहन चीख पड़ी। अजय का चेहरा सफेद पड़ गया। वह हकलाया—“यह… यह बकवास है…”
सुधा ने गवाही का नाम लिया। मैंने स्क्रीनशॉट दिखाए। कर्ज का सच। जुए का सच।
अजय रोने लगा। बोला—“मैं मजबूर था… उन्होंने धमकी दी थी…”
मैंने कहा, “तो तुमने मुझे मारने का फैसला किया?”
उसके पास जवाब नहीं था।
और तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई—पुलिस। सुधा पहले से बुला चुकी थी। इंस्पेक्टर ने सबूत देखे, अजय को हथकड़ी लगाई।
वह मेरे सामने गिड़गिड़ाया—“माफ कर दो…”
मैंने बस एक बात कही—
“माफी… मुझसे माँगने का हक तुमने उसी दिन खो दिया था, जिस दिन तुमने मुझे ‘तोहफे’ में जहर दिया।”
अध्याय 8: कोर्ट, सजा, और मेरा नया जीवन
अगले महीनों में केस चला। मैं हर तारीख पर गई। अजय की तरफ से दलीलें आईं—“उसे पता नहीं था… जौहरी की गलती…” पर गवाही, रिपोर्ट, डायरी, सबूत—सब एक ही दिशा में थे।
अंततः फैसला आया—अजय दोषी। हत्या की कोशिश। सजा—10 साल। जुर्माना—50 लाख।
मैंने कोर्ट में उसे देखा। वह टूट चुका था। एक पल को 31 साल की यादें सामने आ गईं। पर फिर मुझे अपनी सुबहों की उल्टी याद आई, अपनी कमजोरी याद आई, और अपने गले में झूलता वह जहर याद आया—और मेरा दिल पत्थर हो गया।
मैंने तलाक लिया। अपना जीवन वापस लिया। हवेली श्रद्धा के नाम सुरक्षित थी। हमने उसे हेरिटेज होमस्टे में बदला—यादों को व्यापार नहीं, सम्मान में बदला। मैं पढ़ाती रही—और अब अपने स्टूडेंट्स को एक नया पाठ भी देती हूँ—
“विज्ञान सिर्फ किताब नहीं, जीवन बचाने की ताकत है।”
आज मैं बालकनी में खड़ी होकर चाय पीती हूँ। सूरज उगता देखती हूँ। और खुद से कहती हूँ—
मैं बच गई, क्योंकि मैंने सवाल पूछना बंद नहीं किया।
मैं बच गई, क्योंकि मैंने सच से डरना बंद नहीं किया।
और मैं बच गई, क्योंकि मैंने यह मान लिया—कभी-कभी सबसे बड़ा खतरा… घर के अंदर ही होता है।
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