Machhali Ko Zeba Kiya To Uske Pet Se Insani Bacche Nikali Magar Kaise ? Moral story
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भाग 1: सुबह का मंजर और चमत्कार
गांव के किनारे सुबह का वक्त था। मछलियों की नीलामी लगने ही वाली थी। मछुआरे अपने-अपने जाल समेट रहे थे, कुछ मछलियों का तौल कर रहे थे, तो कोई ऊँची आवाज़ में बोली लगा रहा था। अचानक एक मछुआरे ने जोर से शोर मचा दिया। उसके हाथ कांप रहे थे, चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं। लोगों ने सोचा शायद जाल में कोई अजीब मछली आ गई है। सब उसके पास जमा हो गए।
मछुआरे ने कांपती हुई आवाज़ में कहा, “जरा करीब आकर देखो। अल्लाह की कसम, मैंने जिंदगी में ऐसा मंजर कभी नहीं देखा।”
सामने एक बड़ी सी मछली पड़ी थी, आम मछलियों से कहीं ज्यादा भारी। उसकी आंखें बंद थीं, मगर जिस्म जैसे अभी तक जिंदा हो। कसाब ने हस्बे मामूल छुरी उठाई और मछली का पेट चाक किया। मगर अगले ही लम्हे उसके हाथ रुक गए। उसके मुंह से एक चीख निकली और छुरी जमीन पर गिर गई।
मजमा साकत हो गया। कुछ लोग आगे बढ़कर देखने लगे तो उनकी सांसे रुक गईं। मछली के पेट से एक नन्ही सी बच्ची बाहर आई, जिंदा सांस लेती हुई। उसकी जिल्द पर नमकीन पानी के निशान थे। आंखें बंद थीं, मगर सीना हिल रहा था, जैसे अभी-अभी नींद से जागी हो। चंद लम्हों तक कोई कुछ ना बोल सका। फिर किसी के मुंह से बेइख्तियार निकला, “अल्लाहू अकबर!”
आवाजें बुलंद होने लगीं। औरतें रोने लगीं, मर्द एक दूसरे का मुंह देखने लगे। कोई कह रहा था यह जादू है, कोई कह रहा था यह कयामत की निशानी है। मगर एक सवाल सबके ज़हन में था—यह मासूम बच्ची आखिर आई कहां से? मछली के पेट में जिंदा कैसे रही और किसने इसे दरिया में डाला?
भाग 2: एक मां की दुआ और बाप का गुनाह
बच्ची को फ़ौरन एक औरत ने अपनी चादर में लपेट लिया। वो कांप रही थी, जैसे ठंड लग रही हो। वो अंधाधुंध बच्ची को चूमे जा रही थी और कह रही थी, “या अल्लाह, तूने मेरी दुआओं को सुन लिया। मेरी बच्ची मुझे वापस मिल गई। मैं तेरा जितना शुक्र अदा करूं उतना ही कम है।”
मजमे में मौजूद एक बूढ़े आदमी ने आहिस्ता आवाज में कहा, “यह कोई आम वाक्या नहीं। इसके पीछे किसी मां की दुआ और किसी बाप का गुनाह छुपा हुआ है।”
लोग जल्दी से बोले, “कोई हमें वाक्या सुनाएगा भी कि इस बच्ची के साथ आखिर क्या मामला पेश आया?”
उसी लम्हे एक बुजुर्ग आगे बढ़े और बोले, “अगर तुम यह जानना चाहते हो कि यह बच्ची कहां से आई है तो इसकी कहानी सुननी होगी। यह कहानी एक मछुआरे की है, एक टूटे हुए बाप की, एक मां की दुआ की और एक ऐसे डर की जो इंसान को जालिम बना देता है।”
भाग 3: हाकम मछुआरा, उसकी बीवी और बेटा अली
दरिया के किनारे एक मट्टी की झोपड़ी में हाकम मछुआरा अपनी बीवी और सात साल के बेटे अली के साथ रहता था। गरीबी ने हाकम को वक्त से पहले बूढ़ा कर दिया था। उसके चेहरे पर थकन और आंखों में खामोशी थी। मगर उसकी बीवी अभी जवान थी, हसीन थी और उसे हाकम जरा भी पसंद नहीं था। घर में रोज लड़ाई झगड़ा रहता। गरीबी के ताने, हाकम की कमजोरी का मजाक और तल्ख बातें।
अली यह सब सुनता तो अंदर ही अंदर घुट जाता। जब भी हाकम रोजी-रोटी की तलाश में जाल उठाकर घर से निकलता, उसकी बीवी अपने आशिक को बुला लेती। कहके लगते, बातें होतीं और हाकम की बुराइयां की जातीं। उसका मजाक उड़ाया जाता कि देखो कैसे हमने इस हाकम को पागल बना दिया। कमाता वो है और उड़ाते हम हैं।
अली छोटा जरूर था मगर इतना समझदार था कि जानता था यह सब गलत है। उसके दिल में मां के लिए नफरत बढ़ती जा रही थी। एक दिन उसने गुस्से में अपनी मां से कहा, “मां, यह सब ठीक नहीं है।”
लेकिन मां पर तो आशिकी का भूत सवार था। उसने बेटे के मुंह पर जोरदार थप्पड़ मारा और कहने लगी, “क्या ठीक है? क्या नहीं ठीक? यह तुम मुझे बताओगे?”
अली रोते हुए बाहर एक कोने में आकर बैठ गया। कई बार उसका दिल चाहा कि बाप को सब कुछ बता दे। मगर फिर वह यह सोचकर खामोश हो जाता कि उसका बूढ़ा बाप यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाएगा।
भाग 4: मां का भाग जाना, बाप का टूटना
अली ने दिल ही दिल में फैसला कर लिया कि अब वो घर में नहीं रहेगा और ना ही उस गंदगी को रोज देखेगा। उसने सोचा, “मैं अपने बाप के साथ मछलियां पकड़ने जाया करूंगा।”
अगले दिन वो बाप के साथ दरिया की तरफ चला गया। दिन भर की मेहनत के बाद जब दोनों शाम को वापस आए तो झोपड़ी का मंजर बदला हुआ था। दरवाजे खुले थे, अंदर खामोशी थी, मां कहीं नजर नहीं आ रही थी।
हाकम ने हमसायों से पूछा तो सच सामने आ गया। किसी ने आहिस्ता से कहा, “तुम्हारी बीवी अपने आशिक के साथ भाग गई है।”
यह सुनते ही हाकम के कदम वहीं के वहीं रुक गए और अली को लगा जैसे उसके अंदर कुछ टूट कर बिखर गया हो।
हाकम शर्म और बदनामी के डर से घर से बाहर निकलना छोड़ गया। गांव वालों की नजरें, सरगोशियां और इशारे उसे अंदर ही अंदर खा रहे थे। अली के दिल में औरत के नाम से ही नफरत बैठ चुकी थी।
भाग 5: बाप की मौत और अली की तन्हाई
अली अपने बाप की बिगड़ती हालत देखकर उसे दिलासा देता। मगर बाप का दिल टूट चुका था। बीमारी और सदमे ने उसे अंदर से खोखला कर दिया। आखिर एक दिन वो मीठी नींद सो गया। अली चीख-चीख कर अपने बाप को हिलाता रहा मगर बाप की आंख ना खुली। उस दिन अली यतीम हो गया।
गांव के लोगों ने अली को बहुत दिलासे दिए और हाकम की मय्यत को जैसे-तैसे दफन किया। अली सारा-सारा दिन बाप की कब्र के सरहाने बैठा रहता था। ना कुछ खाता, ना पीता। गांव की औरतें कहतीं, “बेटा, हमारे घर आ जाओ। तुम अकेले हो।”
मगर अली के दिल में औरत के नाम से ही नफरत बैठ चुकी थी। वो किसी की बात सुनने को तैयार नहीं था।
भाग 6: कश्ती ही घर बन गई
जब भूख ने हद से ज्यादा सताया तो उसने फैसला किया कि वो अपने बाप का काम संभालेगा। उसने अपने बाप का पुराना जाल उठाया और दरिया की मछलियां पकड़ने चल पड़ा। वही कश्ती अब उसका घर बन गई। वहीं सोता, वहीं जागता, वहीं अपने बाप को याद करता।
वक्त यूं ही उड़ता गया और अली अब 20 साल का हो चुका था। लोग उसे “समंदर का बेटा” कहकर पुकारते थे। जब भी वह मछलियां बाजार में बेचने जाता, लोग कहते, “बेटे, जिंदगी तन्हा नहीं कटती। शादी कर लो।”
मगर अली हर बार यही जवाब देता, “मैंने शादी का अंजाम अपनी आंखों से देखा है। जो मेरी मां ने मेरे बाप के साथ किया, वो मैं आज तक नहीं भूला।”
भाग 7: ज़ैनब की कहानी और अली का इम्तिहान
एक दिन अली कश्ती में सोकर उठा और समंदर के किनारे टहलने गया। वहां उसने एक नौजवान औरत को बेहोश पड़ा देखा। उसका चेहरा मट्टी से लथड़ा हुआ था। अली ने इंसानियत के नाते उसकी मदद की, उसे कश्ती में लाया, दूध पिलाया।
लड़की का नाम ज़ैनब था। उसकी कहानी सुनकर अली सन्न रह गया। उसकी मां मर चुकी थी, सुतेला बाप उसे बोझ समझता था, और एक दिन उसने ज़ैनब को एक सेठ के हाथ बेच दिया। ज़ैनब किसी तरह वहां से भागी और दरिया के किनारे पहुंच गई।
अली ने महसूस किया कि औरत हमेशा फितना नहीं होती, कभी-कभी वह खुद सबसे बड़ा शिकार होती है। चाचा करमू ने सलाह दी कि अली ज़ैनब से शादी कर ले। अली ने शर्त रखी, “तुम बच्चा पैदा नहीं करोगी। जिस दिन बच्चा पैदा हुआ, हमारा साथ खत्म।”
भाग 8: ज़ैनब का डर, बच्ची का जन्म और अली का खौफ
ज़ैनब ने शर्त मान ली। मगर वक्त के साथ वह मां बनने वाली थी। उसने यह बात अली से छुपाई। छह महीने बाद जब अली को पता चला, उसने गुस्से में कहा, “तुमने वादा तोड़ दिया। अब तुम्हारा और मेरा साथ खत्म।”
ज़ैनब ने अली के बाप की तस्वीर दिखाकर उसे कसम दी। अली का दिल पसीज गया। कुछ दिनों बाद ज़ैनब ने एक प्यारी सी बच्ची को जन्म दिया। बच्ची का चेहरा बिल्कुल उसकी दादी जैसा था। यही देखकर अली का पुराना खौफ जाग उठा। उसने रात को बच्ची को दरिया के हवाले कर दिया।
भाग 9: अल्लाह की कुदरत और मछली का चमत्कार
ज़ैनब ने बच्ची को खोकर खाना-पीना छोड़ दिया, बस दुआएं करती रही। अली भी बेचैन था, दरिया ने भी उसकी रोजी छीन ली थी। एक दिन जब अली ने जाल डाला, उसमें एक बड़ी मछली फंसी। जब उसने मछली का पेट चाक किया, तो उसमें वही नन्ही बच्ची जिंदा निकली।
ज़ैनब ने बच्ची को सीने से लगा लिया, अल्लाह का शुक्र अदा किया। अली को एहसास हुआ कि असल दुश्मन उसका अपना डर था। उसने बच्ची को पहली बार अपने बाजुओं में लिया, माथा चूमा और कहा, “मेरी बेटी, तू मेरी सजा नहीं, मेरी नजात है।”
भाग 10: गांव में चमत्कार की चर्चा और सच्चाई का उजागर होना
मछली के पेट से बच्ची निकलने की खबर पूरे इलाके में फैल गई। दूर-दूर से लोग देखने आए। एक फकीरनी आई, वही आंखें, वही चेहरा जो बच्ची का था। अली ने अपनी मां को पहचान लिया। मां ने माफी मांगी, अपने गुनाहों का इकरार किया।
ज़ैनब का बाप भी वहां आया, जिसने ज़ैनब को बेचा था। फकीरनी ने सबके सामने अपने गुनाह कबूल किए। उसने कहा, “मां का एक गलत कदम बेटे को अली जैसा बना देता है और बेटी को ज़ैनब जैसा।”
अली ने अपनी मां को माफ कर दिया, नफरत का बोझ उतार दिया। गांव वालों ने जालिम आदमी को कानून के हवाले किया।
भाग 11: सबक और मकाफात-ए-अमल
अली के घर में फिर से चूल्हा जलने लगा। ज़ैनब ने मां को संभाला, बच्ची की हंसी फिर झोपड़ी में गूंजने लगी। वही घर जो कभी जख्म था, अब सुकून बन गया। अली की मां ने सबके सामने अपने गुनाह कबूल किए और औरतों को सलाह दी, “मोहब्बत चाहो, इज्जत चाहो मगर हलाल रास्ते में।”
अली ने अपनी मां का हाथ थाम लिया, ज़ैनब ने बच्ची को सीने से लगाया। गांव के लोगों ने उस दिन सिर्फ एक मोजजा नहीं देखा, उन्होंने मकाफात-ए-अमल को चलते-फिरते देख लिया।
अंतिम संदेश
इस कहानी का आखिरी सबक यही है कि ख्वाहिश का एक कदम सब्र के हजार दिनों को जला देता है और मां का एक फैसला नस्लों की तकदीर बदल देता है। अल्लाह हम सबको अपनी ख्वाहिशों से नहीं, अपनी जिम्मेदारियों से जीने की तौफीक अता फरमाए। आमीन।
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