पंचायत में लड़की को जलील किया जा रहा था… लेकिन अजनबी लड़के ने जो किया, पूरा गाँव हिल गया

सुबह के ठीक 6:30 बज रहे थे। अरावली की ऊंची-नीची पहाड़ियों के बीच बसा छोटा सा गांव रामपुर अपनी सुबह की शांति में डूबा हुआ था। लेकिन गांव के बीचोंबीच एक ऐसा तूफान खड़ा था कि हवा भी थम सी गई थी। कच्ची सड़क पर सैकड़ों लोग जमा थे। मर्द, औरतें, बच्चे, बुजुर्ग, सबके चेहरे पर गुस्सा, शक और घृणा का मिश्रण था। बीच में एक बड़ा गोल घेरा बना था और उस घेरे के ठीक बीच में एक लड़की खड़ी थी—मीरा। उसकी उम्र महज 23 साल थी। वह थरथर कांप रही थी, उसकी आंखों में डर था, कपड़े अस्त-व्यस्त थे, और बाल बिखरे हुए थे। उसका चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था।

गांव की पंचायत उसे चारों तरफ से घेर कर खड़ी थी, जैसे कोई खतरनाक अपराधी पकड़ा गया हो। सरपंच रामेश्वर जोर-जोर से गरज रहा था, “इसने गांव की नाक काट दी। अपने शौहर को धोखा दिया। आज इसे ऐसी सजा मिलेगी कि जिंदगी भर याद रखेगी।” भीड़ चीख उठी, “मारो इसे! सबक सिखाओ! गांव की इज्जत मिट्टी में मिला दी।”

भाग 2: अर्जुन की एंट्री

मीरा ने डर के मारे दो कदम पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन पीछे भी गुस्साई भीड़ थी। उसकी सांसे फूल रही थीं, हाथ कांप रहे थे। आंखें किसी अपने की तलाश में इधर-उधर भटक रही थीं, पर हर चेहरा दुश्मन सा लग रहा था। तभी रामपुर के बस अड्डे पर एक लड़का उतर रहा था—अर्जुन। 25 साल का, शांत स्वभाव का, कविताएं लिखने वाला। वह सुबह-सुबह जयपुर से एक जरूरी काम निपटाने रामपुर आया था।

सड़क पर चलते ही उसे दूर भीड़ दिखी। हंगामे की आवाजें हवा को चीरती हुई उसके कानों तक पहुंच रही थीं। अर्जुन ने मन ही मन सोचा, “इतनी सुबह-सुबह क्या हो गया?” वह तेज कदमों से भीड़ की तरफ बढ़ा। लोगों के कंधों के बीच से झांका और उसके पैर जमीन में धंस गए। बीच में खड़ी लड़की अस्तव्यस्त हालत में आंखों से आंसू की नदी बहा रही थी—और उसका नाम था मीरा।

भाग 3: मीरा का अतीत

अर्जुन की सांस रुक सी गई। वह मीरा को सालों से जानता था। स्कूल के दिनों की दोस्ती, कच्ची उम्र की अनकही मोहब्बत, जो वक्त के साथ कहीं खो गई थी। भीड़ चिल्ला रही थी, “हाथों पकड़ी गई। पराए मर्द के साथ थी। इसे सजा दो!” मीरा की आंखों में बेगुनाही साफ झलक रही थी। वह रोते-रोते लड़खड़ा गई। जमीन पर गिरने ही वाली थी कि पंचायत के एक आदमी ने उसे झटक कर फिर खड़ा कर दिया।

अर्जुन के अंदर आग भड़क उठी। “क्या न्याय था यह? कैसी पंचायत? कैसा गांव?” भीड़ आगे बढ़ने लगी कि मीरा पर हाथ उठा दे। लेकिन ठीक उसी पल अर्जुन ने लोगों को धक्का देते हुए बीच में छलांग लगाई और जोर से चीखा, “रुको! एक कदम भी आगे मत बढ़ाना!” पूरा गांव एक पल को सन्न रह गया।

भाग 4: अर्जुन का साहस

सरपंच रामेश्वर भौचक्का रह गया। “तू कौन है? और बीच में क्यों कूद रहा है?” अर्जुन ने एक पल गंवाए बिना पास पड़ी एक नीली चादर उठाई। तेजी से मीरा के कंधों पर डाल दी ताकि उसकी इज्जत बची रहे। फिर भीड़ की तरफ मुड़कर गरजा, “मैं इस लड़की को जानता हूं। यह कभी गलत नहीं हो सकती। इसका चरित्र साफ है। साफ था और साफ रहेगा।”

गांव में फुसफुसाहट दौड़ गई। “यह कौन है? मीरा को कैसे जानता है?” मीरा का शौहर सुरेश चीख उठा, “झूठ बोल रहा है। पहले इसे पकड़ो!” चार-पांच आदमी अर्जुन की तरफ लपके। लेकिन अर्जुन अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ। उसकी आवाज फिर गूंजी, “जिसने हाथ लगाया उसका नाम लेकर अभी थाने फोन करूंगा। 10 मिनट में पुलिस यहां होगी।” लोग ठिठक गए। सरपंच भी पीछे सरक गया।

भाग 5: मीरा की कहानी

अर्जुन ने सबकी आंखों में आंखें डालकर कहा, “किसी ने मीरा की बात सुनी? किसी ने पूछा कि सच क्या है? बस आरोप लगा दिए और इसे जलील कर रहे हो।” भीड़ खामोश। किसी के पास जवाब नहीं था। अर्जुन धीरे से मीरा के पास गया। उसकी टूटी आंखों में देखा और फुसफुसाया, “डरो मत मीरा। मैं आ गया हूं।” मीरा के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे, लेकिन अब वे दर्द के नहीं, एक उम्मीद के थे।

गांव वाले अब भी समझ नहीं पा रहे थे। यह अजनबी इतना क्यों लड़ रहा है? उन्हें क्या पता था कि मीरा और अर्जुन की कहानी स्कूल की उन पुरानी बेंचों पर कच्ची उम्र की उन अनकही बातों में लिखी गई थी, जो आज इन आरोपों की आग में फिर से सुलग उठी थी। धीरे-धीरे भीड़ तितर-बितर होने लगी। कुछ लोग दूर खड़े होकर अभी भी तमाशा देख रहे थे।

भाग 6: मीरा का साहस

सुबह की हल्की धूप अब कच्ची सड़क पर फैल चुकी थी। मीरा का चेहरा उस धूप में और भी ज्यादा थका और कमजोर लग रहा था। अर्जुन ने धीरे से कहा, “मीरा, यहां खड़ी रहना ठीक नहीं। चलो थोड़ा हटकर बैठते हैं।” मीरा ने बिना कुछ बोले सिर हिलाया। वह चल तो रही थी पर कदम डगमगा रहे थे। अर्जुन ने उसे छूना ठीक नहीं समझा, बस पास-पास चलता रहा।

थोड़ा आगे एक बरगद का पुराना पेड़ था। उसकी घनी छांव में जमीन ठंडी थी। अर्जुन ने कहा, “बैठ जाओ। थोड़ा संभाल लो खुद को। मैं यहीं हूं।” मीरा वही धड़ाम से बैठ गई। उसके हाथ अब भी कांप रहे थे। आंखें सूजी हुई थीं। कुछ मिनट तक वह चुप रही। अर्जुन भी चुप बैठा रहा क्योंकि उसे पता था कि टूटे दिल पर जल्दी शब्द नहीं डालने चाहिए।

भाग 7: मीरा का दर्द

काफी देर बाद मीरा ने मुश्किल से कहा, “अर्जुन, तुम यहां कैसे? क्यों आए?” अर्जुन ने धीमे से उसकी तरफ देखा। “मीरा, मैं तो बस एक कर्जदार का पैसा लेने आया था। लेकिन जब तुम्हें उस हालत में देखा, खुद को रोक नहीं पाया।” मीरा की आंखें फिर भर आईं। उसने चादर का पल्ला चेहरे पर रख लिया। “शायद मेरी किस्मत में सिर्फ अपमान ही लिखा है।”

अर्जुन ने फौरन टोका, “ऐसा मत कहो। किसी की गलती की सजा तुम अकेले क्यों भुगतोगी? मैंने देखा है। तुम्हारी आंखें झूठ नहीं बोलतीं।” यह सुनकर पहली बार मीरा ने उसे सीधे देखा। उस नजर में दर्द था और एक अजनबीसी राहत भी। कुछ पल चुप्पी के बाद अर्जुन ने नरमी से पूछा, “मीरा, सच क्या हुआ था? सुरेश ने तुम्हें ऐसा क्यों बदनाम किया?”

भाग 8: सच का सामना

मीरा ने गहरी सांस ली और बोली, “क्योंकि सच उसके मुंह से नहीं, उसके फोन से निकला था।” अर्जुन चौंका। मीरा ने सिर हिलाया। “हां, कल रात मैं बेचैन थी। सुरेश सो चुका था। मैंने उसका फोन चुपके से उठाया। फिंगरप्रिंट से खोला। मुझे लगा शायद मैं गलत शक कर रही हूं। लेकिन जो देखा उसने मुझे तोड़ दिया। किसी दूसरी लड़की के मैसेज, फोटो, वीडियो कॉल्स महीनों से चल रहा था और मैं, मैं उसके लिए बस एक बोझ थी।”

अर्जुन का हाथ गुस्से से सिकुड़ गया। पर उसने खुद को संभाला। मीरा आगे बोली, “मैंने उसे रात में ही जगा दिया। पूछा यह सब क्या है? वो पहले घबराया फिर बोला पुरानी बातें हैं। मिटा दूंगा। किसी को मत बताना। मैं रोई, चीखी पर माफ कर दिया क्योंकि औरत चाहे कितनी भी मजबूत हो, अपने घर के टूटने का नाम सुनकर डर जाती है।”

भाग 9: मीरा की मजबूरी

अर्जुन ध्यान से सुन रहा था। मीरा ने कहा, “सुबह तो सब कुछ तबाह हो गया। जैसे ही मैं तैयार होकर कमरे से निकली, उसने मेरे बाल पकड़कर खींचा, गालियां दी। घर से घसीटते हुए बाहर लाया और चिल्लाने लगा, ‘यह पराए मर्द के साथ थी।’ पूरी गली में तमाशा किया।” अर्जुन की मुट्ठियां कस गईं। “वो पागल है क्या?”

मीरा ने आंसू पोछे। “नहीं, उसे डर था कि मैं उसकी सच्चाई सबको बता दूंगी। अपनी बेवफाई छिपाने के लिए उसने मुझे ही बदनाम कर दिया। और गांव वाले यहां सच से किसी को मतलब नहीं। बस तमाशा चाहिए।” मीरा ने कड़वी हंसी-हंसने की कोशिश की जो रोने में बदल गई।

भाग 10: अर्जुन का वादा

अर्जुन ने नरमी से कहा, “मीरा, तुम अकेली नहीं हो। मैं हूं। मैं साबित करूंगा कि तुम बेगुनाह हो।” मीरा ने सिर हिलाया। “कोई नहीं मानेगा अर्जुन। मैंने मायके फोन किया था। उन्होंने भी कह दिया, ‘आज से तू हमारी बेटी नहीं।’ जब अपने ही साथ छोड़ दें तो इंसान क्या करें?” अर्जुन के चेहरे पर दर्द उभरा। “तुम्हारे मां-बाप ने ऐसा कहा?”

“हां,” मीरा फूट-फूट कर रो पड़ी। “सब खत्म हो गया अर्जुन। सब।” अर्जुन ने बहुत धीरे से उसका हाथ थामा। वर्षों बाद पहली बार वह पकड़ मजबूती की नहीं थी। बस यह बताने के लिए कि वह अकेली नहीं है।

भाग 11: नया सफर

“मीरा, अब मैं पूछता हूं तुम्हें कहां जाना है?” मीरा ने धीरे से कहा, “अब कई जगह नहीं बची। ना मायका, ना ससुराल, ना इस दुनिया में मेरे लिए कोई कोना।” और जैसे वह यह कह ही रही थी कि दूर से एक ट्रक हॉर्न बजाता आ रहा था। मीरा अचानक खड़ी हुई और सड़क की ओर बढ़ने लगी। कदम ऐसे जैसे सब कुछ खत्म करने जा रही हो।

अर्जुन डर गया। “मीरा, रुक जाओ!” लेकिन मीरा जैसे सुन ही नहीं रही थी। उसकी आंखों में सिर्फ निराशा थी। अर्जुन ने पूरी ताकत से दौड़ लगाई। मीरा का हाथ पकड़ कर जोर से खींच लिया। ट्रक झटके से पास से गुजर गया। धूल का गुबार उड़ा। मीरा अर्जुन की बाहों में गिर पड़ी।

भाग 12: अर्जुन का साहस

अर्जुन कांपती आवाज में बोला, “पागल हो गए हो? ऐसे नहीं। मैं तुम्हें हारने नहीं दूंगा।” मीरा रोते-रोते बोली, “तो फिर कहां जाऊं? कौन अपनाएगा मुझे?” अर्जुन ने उसके चेहरे की तरफ देखा। गहरी ठंडी पर प्यार भरी आवाज में बोला, “अगर दुनिया ने ठुकरा दिया तो मैं हूं ना। अगर कहीं जगह नहीं मिली तो मेरे साथ चलो मीरा।”

मीरा ने उसे देखा पहली बार पूरी उम्मीद के साथ। “तुम मुझे अपनाओगे?” अर्जुन ने धीरे से कहा, “हमारी कहानी जहां रुकी थी, वहीं से फिर शुरू होगी। इस बार बिना डर, बिना झूठ, बिना किसी पंचायत के।” अर्जुन की यह बात मीरा के दिल के सबसे गहरे घाव पर मरहम की तरह लगी।

भाग 13: मीरा की ताकत

वह एक पल को स्थिर हो गई। किसी ने उसे इस तरह अपनाने की बात आखिरी बार कब कही थी, याद नहीं। लेकिन तभी उसके भीतर का टूटा आत्मसम्मान जाग उठा। उसने धीरे से खुद को अर्जुन की बाहों से अलग किया। कमजोरी से नहीं, खुद को संभालने की ताकत से। मीरा ने कांपती आवाज में कहा, “अर्जुन, जो तुम कह रहे हो वो आसान नहीं। गांव कल तक मुझे गलत कह रहा था। अगर आज मैं तुम्हारे साथ चली गई तो कल यही कहेगा कि मैं सच में भाग गई थी।”

अर्जुन ने उसकी आंखों में गहराई से देखा। “लोगों का काम है बोलना। मीरा, उनका सच मायने नहीं रखता। तुम्हारा सच कोई नहीं छीन सकता।” मीरा ने पलकें झुकाई। एक आंसू फिर गाल पर लुढ़क गया। “मुझे डर लगता है अर्जुन। अगर मैं फिर टूट गई तो…”

भाग 14: नया रास्ता

अर्जुन ने एक कदम आगे बढ़ाया। “इस बार मैं गिरने नहीं दूंगा।” कुछ पल खामोशी रही पर उस खामोशी में भरोसा था, डर था और एक अनकही चाहत भी। अचानक मीरा ने धीरे से पूछा, “लेकिन हम जाएंगे कहां?” अर्जुन ने चारों तरफ नजर दौड़ाई। गांव अब लगभग खाली हो चुका था। पर कुछ बूढ़े अभी भी दूर फुसफुसा रहे थे।

अर्जुन ने कहा, “इस गांव में नहीं। यहां तुम्हें सिर्फ दर्द मिलेगा। चलो, मैं तुम्हें अपने शहर ले जाता हूं। जयपुर। वहां मेरी मौसी रहती है। कमला बुआ बहुत नेक दिल है। वो तुम्हारी बात सुनेंगी, समझेंगी। और अगर हम दोनों चाहे, तो वहीं से नई जिंदगी शुरू कर सकते हैं।”

मीरा का दिल फिर धड़क उठा। “नई जिंदगी” शब्द उसके लिए सपने जैसे थे, लेकिन वह अब भी डरी हुई थी। “अर्जुन, क्या मौसी मुझे स्वीकार कर लेंगी? अगर नहीं किया तो…”

भाग 15: नया सफर

अर्जुन ने पहली बार मुस्कुराया। “वो दुनिया को पंचायत की नजर से नहीं देखती। उनके लिए इंसान की इज्जत कपड़ों या अफवाहों से नहीं, उसके आंसुओं और सच्चाई से पहचानी जाती है।” मीरा ने भरोसा करने की कोशिश की। पर उसका अतीत अभी भी जकड़े हुए था। तभी दूर से सुरेश की चीख सुनाई दी, “रुक मीरा! अगर आज इस लड़के के साथ गई तो हमेशा के लिए बदनाम हो जाएगी।”

सुरेश लड़खड़ाता हुआ दौड़ा चला रहा था। पीछे पंचायत के दो आदमी भी। मीरा का चेहरा डर से सफेद पड़ गया। वह पीछे हट गई। अर्जुन ने मीरा को अपने पीछे कर लिया। “सुरेश, यह मेरी बीवी है। मेरी इज्जत है। तू कौन होता है बीच में आने वाला?”

भाग 16: अर्जुन का साहस

अर्जुन की आंखें जल उठीं। “इज्जत? जिसने अपनी बीवी को आधे कपड़ों में गांव के सामने खड़ा किया। जिसने अपनी बेवफाई छिपाने के लिए उसे बदनाम किया। वो इज्जत की बात कर रहा है?” सुरेश चीखा, “सबूत दे!” अर्जुन शांत पर तेज आवाज में बोला, “चलो पंचायत के सामने। सबके सामने तेरा फोन खोलते हैं। फोटो, मैसेज, कॉल लॉक सब दिखाते हैं। फिर देखते हैं इज्जत किसकी कहां खड़ी है।”

सुरेश का चेहरा पड़ गया। उसके पैर पीछे खिसक गए। पंचायत के आदमी भी रुक गए। अर्जुन ने एक-एक शब्द चबाते हुए कहा, “मीरा बेगुनाह है और तू बस एक कायर है। अपनी गलती की शर्म में बीवी को मिट्टी में मिलाना चाहता था।” सुरेश के पास बोलने को कुछ नहीं बचा।

भाग 17: गांव का फैसला

तभी दो बुजुर्ग औरतें भीड़ से निकलकर आईं। गांव की दादी-नानी, जिन्होंने सब दूर से देखा था। एक बोली, “सुरेश, हमें सब पता है। तेरी रात की हरकतें, तेरे फोन की बातें। गांव में कौन नहीं जानता? बस चुप थे।” दूसरी ने कहा, “आज मीरा के साथ जो हुआ, वो तेरी वजह से हुआ। गांव की औरतें तेरी सजा मांगती हैं।”

सुरेश लज्जित होकर पीछे हट गया। मीरा सब सुन रही थी। उसके चेहरे पर दर्द था। पर आज पहली बार न्याय की किरण भी। अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा। “अब तू बता, किसके साथ जाना चाहती है?” मीरा ने गांव वालों, सुरेश, पंचायत सबकी तरफ देखा। फिर अर्जुन की आंखों में देखा। उसकी आंखों में अब यकीन साफ था।

भाग 18: नया सफर

धीरे से बोली, “अर्जुन, मैं तुम्हारे साथ जाना चाहती हूं।” अर्जुन ने कहा, “तो चलो मीरा, जाने से पहले इस मिट्टी को बता दें। एक औरत की इज्जत उसके कपड़ों से नहीं, उसके दिल की सच्चाई से होती है।” मीरा ने सिर हिलाया। आंसू थे पर हिम्मत के। अर्जुन ने उसका हाथ थामा। इस बार मीरा ने नहीं छोड़ा।

दोनों गांव को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने लगे। उस कच्ची सड़क पर जहां धूप अब गर्म हो चली थी। जैसे ऊपर वाला भी कह रहा हो, “चलो, नई शुरुआत इंतजार कर रही है।” दोनों कुछ देर चुपचाप चलते रहे। पीछे धुआं सा अतीत था—गालियां, ताने, अपमान। सामने खाली सड़क थी, पर उम्मीद से भरी।

भाग 19: नई जिंदगी की शुरुआत

बस स्टैंड पर पहुंचकर दोनों टूटी बेंच पर बैठ गए। ऊपर टीन की छत, चारों तरफ मिट्टी की खुशबू। आज यह साधारण जगह भी खास लग रही थी। यहीं से मीरा की जिंदगी दोबारा शुरू होने वाली थी। मीरा ने धीरे से पूछा, “अर्जुन, अगर मैं बोझ बन गई तो?” अर्जुन मुस्कुराया। “इंसान बोझ तब बनता है जब वो उम्मीद लेकर जिए। तुम सिर्फ सहारा मांग रही हो। मैं अपनी मर्जी से दे रहा हूं। बोझ कहां?”

मीरा ने नजरें झुका लीं। पहली बार किसी ने बिना शर्त अपनाया था। बस आई। अर्जुन ने मीरा को पहले चढ़ाया। फिर पास की सीट पर बैठ गया। खिड़की से गांव पीछे छूटता गया। वो घर, वो गली, वो लोग जिन्होंने कभी आंसू नहीं, सिर्फ आरोप देखे। मीरा ने सिर खिड़की पर टिकाया। हवा उसके बालों से गुजर रही थी जैसे अतीत की धूल झाड़ रही हो।

भाग 20: नया सफर

अर्जुन ने पूछा, “पछतावा तो नहीं?” मीरा ने पहली बार हल्की मुस्कान दी। “अगर आज तुम नहीं आते तो शायद मैं जिंदा भी नहीं होती।” अर्जुन की आंखें नम हो गईं। “तो समझ लो भगवान ने मुझे वहीं भेजा जहां मुझे होना था।”

कई घंटे बाद बस जयपुर पहुंची। अर्जुन मीरा को लेकर मौसी कमला बुआ के घर गया। पुराना मगर साफ-सुथरा घर। आंगन में तुलसी का पौधा। दरवाजे पर खड़ी कमला बुआ ने मीरा को देखकर मुस्कुरा दिया। बिना एक सवाल पूछे बोली, “बेटी, अंदर आ। हाथ-मुंह धो लो। बहुत थकी लग रही हो।” मीरा की आंखें भर आईं। किसी ने बिना जज किए अपनाया था।

भाग 21: नया घर

शाम तक मीरा ने सारी बात बता दी। कमला बुआ ने सिर पर हाथ फेरा। “बेटी, तू गलत नहीं थी। गलत वो थे जो सुनने से पहले ठोकर मारते हैं। यह घर अब तेरा भी है। जब तक चाहे रह। और अगर नई जिंदगी शुरू करना चाहे, तो अर्जुन तेरे साथ है।” मीरा फूट-फूट कर रो पड़ी। इस बार राहत के आंसू।

अर्जुन दरवाजे पर खड़ा मुस्कुरा रहा था। उसकी आंखों में सिर्फ सम्मान था। दिन गुजरते गए। मीरा के जख्म भरने लगे। वह घर के काम में हाथ बटाने लगी। पास के स्कूल में बच्चों को पढ़ाने लगी। जिंदगी फिर से रंगीन होने लगी।

भाग 22: नई पहचान

एक दिन अर्जुन ने धीरे से पूछा, “मीरा, अगर मैं कहूं कि हम अपने रिश्ते को नाम दे दें तो क्या तू तैयार है?” मीरा कुछ देर चुप रही। फिर बोली, “अर्जुन, नाम तो हमारी कहानी को पहले ही मिल चुका है। बस समाज को बताने की देर है।” अर्जुन मुस्कुराया।

उस दिन दोनों मंदिर गए। सात फेरे लिए और अपनी कहानी को नई पहचान दी। मीरा की आंखों में चमक थी। उसकी जिंदगी टूट कर भी फिर जुड़ गई थी। इस बार और ज्यादा मजबूती से अर्जुन ने उसका हाथ थामा और कहा, “अब दुनिया चाहे जो फैसला करें, हम अपना फैसला हमेशा साथ मिलकर करेंगे।”

भाग 23: सच्ची मर्दानगी

मंदिर की घंटियां जैसे भगवान की हामी भर रही थीं। दोस्तों, औरत को तोड़ना आसान है। लेकिन उसे समझना, उसका हाथ थामना—यही असली मर्दानगी है। अगर आप अर्जुन की जगह होते तो क्या मीरा को नई जिंदगी देते?

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