गॉव की लड़की को गुमनाम पार्सल आता था लेकिन एक दिन जो हुआ |

गुमनाम पार्सल और अधूरा प्रेम

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले का एक छोटा सा गांव ‘कंचनपुर’। धूल भरी गलियां, खेतों की हरियाली और दोपहर की शांति इस गांव की पहचान थी। लेकिन इस शांति के पीछे एक ऐसी दास्तां छिपी थी, जिसने बाद में पूरे गांव को झकझोर कर रख दिया।

मुस्कान: सुंदरता और सादगी का संगम

कंचनपुर की गलियों में एक लड़की अक्सर अपनी पुरानी साइकिल पर कॉलेज जाती दिखती थी। उसका नाम था ‘मुस्कान’। उम्र करीब 22-23 साल, बीए फाइनल ईयर की छात्रा। मुस्कान नाम की तरह ही उसके चेहरे पर हमेशा एक सौम्य मुस्कान रहती थी। वह इतनी सुंदर थी कि जो उसे एक बार देख लेता, देखता ही रह जाता। लेकिन उसकी सुंदरता से ज्यादा उसकी सादगी लोगों को प्रभावित करती थी।

मुस्कान के पिता मुंबई की एक प्राइवेट कंपनी में काम करते थे ताकि बेटी की पढ़ाई और घर का खर्च चल सके। घर पर मुस्कान अपनी मां के साथ रहती थी। कॉलेज से आने के बाद वह घर के कामों में हाथ बटाती और अपनी दो गायों की देखभाल करती। जब वह गायों को चारा डालती और मेहनत से उसके माथे पर पसीना आता, तो उसका चेहरा किसी कीमती शीशे की तरह चमकने लगता था।

ऑनलाइन का दौर और सिद्धू का आगमन

आजकल जमाना बदल चुका था। कंचनपुर जैसे छोटे गांव में भी अब मोबाइल और ऑनलाइन शॉपिंग का क्रेज बढ़ गया था। गांव की सात-आठ लड़कियों का एक ग्रुप था जो आए दिन मीशो, फ्लिपकार्ट और अमेज़न से कुछ न कुछ मंगाती रहती थीं। चाहे 100-150 रुपये की लिपस्टिक हो या कोई सस्ता सा सूट, हर दूसरे दिन गांव में पार्सल आता था।

इन पार्सलों को पहुंचाने का काम एक लड़का करता था जिसका नाम था ‘सिद्धू’। सिद्धू एक सीधा-साधा, सांवला और मेहनती युवक था। वह अपनी बाइक पर बड़े-बड़े बैग लादकर कंचनपुर आता और गांव के मुहाने पर खड़े एक विशाल पीपल के पेड़ के नीचे अपना अड्डा जमाता। वह वहीं से लड़कियों को फोन करता और वे वहां आकर अपना सामान ले जातीं।

सिद्धू जब भी वहां आता, उसकी नजरें अनजाने में ही सामने वाले घर की तरफ उठ जातीं। वही घर जहां मुस्कान रहती थी। मुस्कान कभी सामान नहीं मंगाती थी, क्योंकि न तो उसके पास खुद का मोबाइल था और न ही फालतू पैसे। लेकिन जब उसकी सहेलियां पीपल के पेड़ के नीचे शोर मचातीं, तो मुस्कान भी कभी-कभार उत्सुकता में वहां चली आती।

सिद्धू अक्सर सोचता, “इतनी सुंदर लड़की, इतनी समझदार… बाकी लड़कियां तो फैशन के चक्कर में रोज कुछ न कुछ मंगाती हैं, पर इसे देखो, कितनी सादगी है।” मुस्कान भी कभी-कभी सिद्धू से पूछ लेती, “ये जो तुम सामान लाते हो, क्या सच में सस्ता होता है?” सिद्धू मुस्कुराकर जवाब देता, “हां दीदी, मार्केट से काफी सस्ता और अच्छा मिल जाता है।” सिद्धू उसे ‘दीदी’ तो कहता था, लेकिन उसके दिल के किसी कोने में मुस्कान के लिए एक गहरा सम्मान और आकर्षण पनप रहा था।

पहला गुमनाम पार्सल

एक दोपहर, जब सूरज अपनी पूरी तपिश पर था, सिद्धू पीपल के पेड़ के नीचे खड़ा था। उसने मुस्कान को आवाज दी। मुस्कान बाहर आई तो सिद्धू ने एक पार्सल उसकी ओर बढ़ाया।

“ये लीजिए मुस्कान जी, आपका पार्सल,” सिद्धू ने कहा।

मुस्कान हैरान रह गई। “मेरा पार्सल? पर मैंने तो कुछ ऑर्डर ही नहीं किया। तुम गलत समझ रहे हो सिद्धू।”

सिद्धू ने लेबल दिखाया। उस पर स्पष्ट अक्षरों में मुस्कान का नाम और पता लिखा था। बगल में खड़ी सहेलियां चहक उठीं, “अरे दीदी, खोलिए तो सही! शायद किसी ने तोहफा भेजा हो।”

जब मुस्कान ने घर जाकर पार्सल खोला, तो उसकी आंखों में आंसू आ गए। अंदर एक बहुत ही सुंदर और मजबूत कॉलेज बैग था। मुस्कान का पुराना बैग कई जगह से फट चुका था और वह उसे सिलाई करके चला रही थी। उसे समझ नहीं आया कि किसने उसकी इस जरूरत को इतनी खामोशी से समझा। पार्सल पर भेजने वाले का नाम नहीं था, न ही कोई फोन नंबर।

सिलसिला और बढ़ती नजदीकियां

इसके बाद तो जैसे सिलसिला ही शुरू हो गया। हर दस-पंद्रह दिन में मुस्कान के नाम एक नया पार्सल आता। कभी महंगी कॉपियां और पेन का सेट, तो कभी हाथ की घड़ी। एक बार तो उसके लिए एक नई साइकिल का ऑर्डर आ गया। मुस्कान डर भी रही थी और खुश भी थी। उसने अपनी मां से कहा कि शायद कॉलेज की तरफ से मेधावी छात्रों को ये इनाम मिल रहे हैं। उसकी भोली मां ने भी इस बात पर यकीन कर लिया।

सिद्धू जब भी पार्सल लाता, मुस्कान उससे पूछती, “सिद्धू, सच बताओ ये कौन भेज रहा है? तुम तो डिलीवरी करते हो, तुम्हें तो पता होगा।”

सिद्धू नजरें चुराते हुए कहता, “मुस्कान जी, हमें बस सामान पहुंचाने के पैसे मिलते हैं। बुकिंग ऑनलाइन होती है, वहां नाम गुप्त रखा जा सकता है। बस इतना जान लीजिए कि कोई है जो आपका बहुत ख्याल रखता है।”

मुस्कान के मन में उस ‘अजनबी’ के लिए एक छवि बनने लगी थी। उसे लगने लगा था कि कोई फरिश्ता है जो उसकी हर छोटी जरूरत को पहचान लेता है। धीरे-धीरे सिद्धू और मुस्कान के बीच भी एक अजीब सा रिश्ता बन गया। वे घंटों बातें नहीं करते थे, लेकिन उन चंद मिनटों की मुलाकातों में बहुत कुछ अनकहा रह जाता था।

वो एक ‘निजी’ पार्सल और शर्म

एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने मुस्कान को भीतर तक हिला दिया। उस दिन गांव में और किसी का पार्सल नहीं था। सिद्धू आया और उसने मुस्कान को बुलाया। मुस्कान ने वहीं पीपल के पेड़ के नीचे पार्सल खोला। पार्सल खोलते ही उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया।

अंदर कुछ बहुत ही निजी कपड़े (अंडरगार्मेंट्स) और कुछ सौंदर्य प्रसाधन थे। मुस्कान ने तुरंत पार्सल बंद किया और बिना कुछ कहे घर के अंदर भाग गई। उस रात वह सो नहीं पाई। वह सोचने लगी, “वो अजनबी कौन है जो मेरे शरीर की माप तक जानता है? क्या वो मुझे हर वक्त देखता रहता है?”

अगले दो-चार दिनों तक मुस्कान घर से बाहर नहीं निकली। लेकिन उसके मन में उस अजनबी से मिलने की तड़प और बढ़ गई। उसे लगने लगा कि ये कोई साधारण चाहने वाला नहीं है, बल्कि कोई ऐसा है जो उसकी आत्मा तक को पढ़ चुका है।

पिता की वापसी और तूफान

साल 2024 के अंत में मुस्कान के पिता मुंबई से वापस आए। वे मुस्कान की शादी तय करने के इरादे से आए थे। उन्होंने जब घर में नई साइकिल, नया मोबाइल (जो हाल ही में एक पार्सल में आया था) और महंगी चीजें देखीं, तो उनका माथा ठनका।

“ये सब कहां से आया मुस्कान?” पिता ने कड़क कर पूछा।

मुस्कान ने डरते हुए वही कॉलेज वाली कहानी दोहराई। पर पिता पुराने खयालात के थे, उन्होंने कॉलेज जाकर पता किया तो मालूम पड़ा कि वहां से ऐसा कुछ नहीं भेजा गया। घर लौटकर उन्होंने तांडव मचा दिया।

“मैं शहर में खून-पसीना एक कर रहा हूं और यहां मेरी बेटी की आबरू के साथ कोई खिलवाड़ कर रहा है! कौन है वो कमीना जो ये सब भेजता है?” पिता की आवाज पूरे मोहल्ले में गूंज रही थी।

तभी सिद्धू एक और पार्सल लेकर आ गया। पिता ने सिद्धू का कॉलर पकड़ लिया। “तू ही लाता है न ये सब? बता कौन भेज रहा है वरना अभी पुलिस बुलाता हूं!”

सिद्धू घबरा गया। “साहब, मुझे कुछ नहीं पता। मैं तो बस अपनी नौकरी कर रहा हूं।”

पिता ने सिद्धू को वहां से भगा दिया और चेतावनी दी कि अगर दोबारा इस घर के पास दिखा तो टांगें तोड़ देंगे। मुस्कान के लिए घर से बाहर निकलना बंद हो गया। उसका मोबाइल छीन लिया गया और उसकी शादी एक दूसरे गांव के लड़के से तय कर दी गई।

आखिरी खत और सच्चाई का खुलासा

शादी में सिर्फ एक महीना बचा था। मुस्कान का दिल हर पल रोता था। उसे उस अजनबी से एक बार मिलना था। उधर सिद्धू ने भी कंचनपुर आना छोड़ दिया था। कंपनी ने उसकी जगह एक नया लड़का भेज दिया था।

एक दिन, जब मुस्कान के पिता बाहर गए थे, वही नया लड़का आया। उसने एक छोटा सा पार्सल और एक चिट्ठी मुस्कान की मां को दी और कहा, “ये सिद्धू भाई ने भेजा है, मुस्कान जी को दे देना।”

मुस्कान ने कांपते हाथों से वो चिट्ठी खोली। उसमें लिखा था:

“मुस्कान, शायद जब तुम ये पढ़ रही होगी, मैं इस गांव और शायद इस दुनिया से बहुत दूर जा चुका होऊंगा। तुम हमेशा पूछती थी न कि ये पार्सल कौन भेजता है? वो मैं ही था मुस्कान।

पहली बार जब मैंने तुम्हें देखा था, तभी अपना दिल हार बैठा था। पर मैं अपनी औकात जानता था। मैं एक मामूली डिलीवरी बॉय, छोटी जात का लड़का… और तुम एक ऊंची बिरादरी की पढ़ी-लिखी सुंदर लड़की। मुझे पता था कि मैं तुम्हें कभी पा नहीं सकूंगा। इसलिए मैंने सोचा कि कम से कम तुम्हारी जरूरतें तो पूरी कर सकूं।

वो पार्सल भेजने के लिए मैं अपनी आधी तनख्वाह बचा लेता था। जब तुम्हारी पुरानी साइकिल की चेन बार-बार उतरती थी, तो मेरा दिल दुखता था, इसलिए मैंने नई साइकिल भेजी। जब तुम्हारा बैग फटा देखा, तो बैग भेजा। वो निजी कपड़े भेजते वक्त मेरी नीयत खराब नहीं थी, बस मैं चाहता था कि तुम्हें किसी चीज के लिए किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े।

तुम्हारे पिता की बातें सुनकर मुझे अहसास हुआ कि प्यार सिर्फ दिल से नहीं, जात-पात और हैसियत से भी तौला जाता है। मैं तुम्हें अपनी वजह से बदनाम नहीं करना चाहता। तुम्हारी शादी तय हो गई है, सुनकर खुशी हुई। ये आखिरी पार्सल है, इसमें कुछ पैसे हैं, अपनी शादी में अपनी पसंद का कुछ ले लेना।

अलविदा… शायद अगले जन्म में हम एक ही बिरादरी में पैदा हों।”

एक दर्दनाक अंत

चिट्ठी पढ़कर मुस्कान पागलों की तरह रोने लगी। उसे अब समझ आया कि वो अजनबी कोई और नहीं, बल्कि वही सिद्धू था जो रोज उसके सामने खड़ा रहता था। उसने तुरंत अपनी सहेली की मदद ली और सिद्धू के गांव का पता लगाया, जो वहां से 25 किलोमीटर दूर था।

मुस्कान किसी तरह बहाना बनाकर सिद्धू के गांव पहुंची। पर वहां पहुंचते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। सिद्धू के घर के बाहर लोगों की भीड़ लगी थी। उसकी मां दहाड़ें मारकर रो रही थी।

“मेरा बच्चा चला गया! पता नहीं क्या गम था उसके दिल में, जहर खा लिया मेरे शेर ने!”

मुस्कान का संसार उजड़ गया। सिद्धू जा चुका था। वह उस समाज की भेंट चढ़ गया था जहां प्यार से बड़ी ‘बिरादरी’ होती है। मुस्कान ने उसकी तस्वीर के सामने खड़े होकर मन ही मन कहा, “सिद्धू, तुम कितने पागल थे। एक बार कह तो दिया होता, मैं इस दुनिया से तुम्हारे लिए लड़ जाती।”

आज की स्थिति

साल 2025 आ चुका है। मुस्कान की शादी हो गई है। वह अपने ससुराल में है, उसके पास सब कुछ है—पति का प्यार, पैसा और आराम। लेकिन उसके घर के एक कोने में आज भी वो पुराना फटा हुआ कॉलेज बैग और वो आखिरी चिट्ठी सुरक्षित रखी है।

जब भी कोई कोरियर वाला उसके दरवाजे पर आता है, मुस्कान का दिल एक पल के लिए धड़कना बंद कर देता है। उसे लगता है शायद सिद्धू फिर से कोई पार्सल लेकर आएगा और मुस्कुराकर कहेगा, “ये लीजिए मुस्कान जी, आपकी खुशियां।”

पर जाने वाले कभी लौटकर नहीं आते। पीछे रह जाती है तो बस यादें और एक अधूरा प्रेम।

निष्कर्ष: यह कहानी हमें सिखाती है कि प्रेम में बिरादरी या हैसियत नहीं, बल्कि समर्पण मायने रखता है। काश सिद्धू ने अपनी जान देने के बजाय मुस्कान पर भरोसा किया होता, तो शायद आज कंचनपुर की गलियों में एक और प्रेम कहानी अमर होती।