दौलत के शिखर पर था बेटा, और माँ सड़कों पर… कचरा बिनने वाली के पास मिला ये अरबपति — फिर जो हुआ, वो रुला देगा!
एक ठेला चालक की निस्वार्थ सेवा और एक करोड़पति का पछतावा: नियति का चक्र जिसने खोए हुए बेटे को डॉक्टर बना दिया।
भाग 1: धूल भरी सड़क पर एक अनहोनी
दोपहर की चिलचिलाती धूप ने शहर के बाहरी इलाके को झुलसा दिया था। धूल भरी सड़क पर सन्नाटा पसरा था, जिसे केवल एक आलीशान काली एसयूवी के टायरों की आवाज़ काट रही थी। गाड़ी के अंदर एयर कंडीशनर की ठंडक के बावजूद विक्रम मल्होत्रा का माथा पसीने से तर था। पिछले छह दिनों से उसकी आँखों में नींद नहीं थी, सिर्फ एक बेचैनी थी— उसकी माँ, गायत्री देवी, जो शहर के सबसे बड़े उद्योगपति की माँ थीं, अचानक घर से गायब हो गई थीं। पुलिस, जासूस और शहर का हर कोना छान मारा गया था, लेकिन हाथ खाली थे।
अचानक विक्रम की नज़र खिड़की के बाहर पड़ी। धूल के गुबार के बीच उसे कुछ ऐसा दिखा जिसने उसकी रूह को कँपा दिया। सड़क के किनारे एक पुरानी जंग लगी हाथगाड़ी ठेले पर एक बुज़ुर्ग महिला बैठी थी। उसके बाल बिखरे हुए थे, साड़ी मैली-कुचैली थी और वह इतनी कमज़ोर लग रही थी जैसे उसमें जान ही न बची हो।
उस ठेले को धक्का दे रहा था एक दुबला-पतला लड़का जिसकी उम्र मुश्किल से 20 साल होगी। उसके कपड़े फटे थे और पैरों में घिसी हुई हवाई चप्पलें थीं।
विक्रम के मुँह से अनजाने में ही एक चीख़ निकल गई: “रोको गाड़ी रोको! वह माँ है!”
बेटे का दर्द और ठेला चालक की सच्चाई
गाड़ी के रुकने का इंतज़ार किए बिना विक्रम ने दरवाज़ा खोला और बाहर की तरफ़ भागा। धूल उड़ रही थी लेकिन उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था सिवाय उस बूढ़ी औरत के। वह दौड़कर ठेले के पास पहुँचा और घुटनों के बल गिर पड़ा।
“माँ! माँ! मेरी तरफ़ देखो। मैं हूँ आपका विक्रम।” उसका गला रुँध गया था और आँखों से आँसू बहने लगे थे।
गायत्री देवी ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं। उनकी नज़रें धुँधली थीं, जैसे वह पहचान नहीं पा रही थीं कि वह कहाँ हैं।
विक्रम ने उस लड़के की तरफ़ देखा जो डर के मारे पीछे हट गया था। “यह सब क्या है? तुमने इन्हें कहाँ मिली?” विक्रम की आवाज़ में एक अमीर आदमी का रोब नहीं, बल्कि एक लाचार बेटे का दर्द था।
लड़के ने अपनी फटी हुई टी-शर्ट को ठीक करते हुए सहम कर जवाब दिया: “साहब, मेरा नाम राजू है। मुझे यह दो दिन पहले सड़क के किनारे बेहोश मिली थी। लोग इनके पास से गुज़र रहे थे, लेकिन कोई रुक नहीं रहा था। यह अपना नाम तक भूल चुकी थीं। मैं इन्हें वहीं नहीं छोड़ सकता था।”
“तुमने… तुमने इन्हें खाना खिलाया?” विक्रम ने भारी आवाज़ में पूछा।
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राजू ने सिर झुका लिया। “जी साहब। मेरे पास जो थोड़ा-बहुत रूखा-सूखा था, मैंने वही दिया।”
विक्रम सन्न रह गया। उसकी माँ जो महलों में रहती थीं, भूखी-प्यासी सड़कों पर थीं, और इस गरीब लड़के ने, जिसके पास ख़ुद खाने को कुछ नहीं था, अपने हिस्से का खाना उन्हें दिया था! विक्रम की आँखों से पश्चाताप के आँसू छलक पड़े।
उसने अपनी माँ को गोद में उठाया। “हम अस्पताल जा रहे हैं!” फिर वह राजू की तरफ़ मुड़ा। “तुम कहाँ जा रहे हो? गाड़ी में बैठो! तुम हमारे साथ चल रहे हो।”
राजू हिचकिचाया, अपनी गरीबी पर शर्म महसूस हुई। लेकिन विक्रम ने दृढ़ता से कहा: “तुमने मेरी माँ का साथ तब दिया जब उनका कोई नहीं था। अब मैं तुम्हें यहाँ अकेला नहीं छोडूंगा। प्लीज, बैठो।”
राजू धीरे से गाड़ी के कोने में सिमट कर बैठ गया, इस डर से कि कहीं उसके छूने से गाड़ी गंदी न हो जाए।
भाग 2: जीवन और मृत्यु का जुआ
गाड़ी अस्पताल की तरफ़ दौड़ पड़ी। विक्रम ने अपनी माँ को सीने से लगा रखा था। उनकी साँसें बहुत धीमी थीं। तभी अचानक गायत्री देवी का सिर एक तरफ़ लुढ़क गया और उनका हाथ विक्रम की पकड़ से छूट गया।
राजू ने घबराकर उनकी कलाई थाम ली। उसकी उँगलियाँ उनकी नब्ज़ टटोल रही थीं। “साहब, मुझे… मुझे इनकी धड़कन महसूस नहीं हो रही है!”
विक्रम का दिल एक पल के लिए रुक गया। कुछ ही मिनटों में गाड़ी अस्पताल के इमरजेंसी गेट पर रुकी। विक्रम अपनी माँ को गोद में उठाकर अंदर भागा।
डॉक्टरों ने उन्हें आईसीयू की तरफ़ ले जाना चाहा, लेकिन एक डॉक्टर ने विक्रम को दरवाज़े पर रोक दिया। विक्रम वहीं दीवार के सहारे ज़मीन पर बैठ गया, अपना चेहरा हाथों में छिपा लिया।
राजू, जो अब तक एक कोने में खड़ा था, धीरे-धीरे आगे बढ़ा और विक्रम के पास जाकर धीमे स्वर में बोला: “साहब, वह बहुत मज़बूत हैं। उन्होंने दो दिन तक सड़क पर बिना खाने-पानी के मौत से लड़ाई की है। वह हार नहीं मानेंगी।”
विक्रम ने हिम्मत जुटाई और राजू से उसके बारे में पूछा। राजू ने बताया कि वह कभी विज्ञान का सबसे होनहार छात्र था, लेकिन माता-पिता के चले जाने के बाद गरीबी के बोझ तले डॉक्टर बनने का सपना दब गया था।
विक्रम ने महसूस किया कि यह लड़का सिर्फ़ एक मज़दूर नहीं, बल्कि हालातों का मारा एक प्रतिभाशाली दिमाग़ था। “तुमने मेरी माँ को बचाकर मुझे नई ज़िंदगी दी है, राजू। मैं तुम्हारा यह एहसान कभी नहीं भूलूँगा।”

भाग 3: मौत से तीसरी लड़ाई
तभी, आईसीयू के बंद कमरे से आती मशीनों की आवाज़ अचानक एक लंबी, डरावनी सीटी में बदल गई— “पीईईईईईईप…”
मॉनिटर पर चलती लकीरें सीधी हो गईं। “कोड ब्लू! सीपीआर शुरू करो!” डॉक्टर की तेज़ आवाज़ सुनाई दी।
विक्रम झटके से खड़ा हुआ। “माँ! नहीं, ऐसा नहीं हो सकता!”
राजू भी अपनी जगह पर जम गया था। वह उस महिला की मौत को इतनी करीब से नहीं देख सकता था, जिसे उसने ख़ुद अपने हाथों से बचाया था।
अंदर डॉक्टर बिजली के झटके देने वाली मशीन (डिफ़िब्रिलेटर) का इस्तेमाल कर रहे थे। विक्रम दीवार के सहारे ज़मीन पर बैठ गया और फूट-फूट कर रो रहा था।
राजू अनजाने में ही आईसीयू के दरवाज़े के पास घुटनों के बल बैठ गया। उसने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए, जैसे वह किसी मंदिर में हो।
“माँ जी,” राजू सिसकते हुए धीरे से कहा। “आप तो बहुत बहादुर हैं। आपने हार नहीं मानी थी। अब आप ऐसे कैसे जा सकती हैं? प्लीज, वापस आ जाइए। आपके बेटे को आपकी ज़रूरत है।”
राजू की यह बातें शायद उस अदृश्य शक्ति तक पहुँच गई थीं, जो जीवन और मृत्यु का फ़ैसला करती है। तभी मॉनिटर से एक हल्की बीप की आवाज़ आई, और फिर एक कमज़ोर, लेकिन स्थिर लय गूँजने लगी।
“नब्ज़ वापस आ गई है!” डॉक्टर ने राहत की साँस लेते हुए घोषणा की।
विक्रम ने दौड़कर राजू को गले लगा लिया। “तुमने दुआ की राजू! तुम्हारी दुआ ने उन्हें बचा लिया!”
भाग 4: राजू का नया जन्म
कुछ घंटे बाद, गायत्री देवी को रिकवरी रूम में शिफ़्ट कर दिया गया। जब उन्होंने आँखें खोलीं, तो उनकी नज़र दरवाज़े पर खड़े राजू पर पड़ी। उन्होंने उसे पहचानने की कोशिश की।
“तुम…?” वह फुसफुसाईं। “वही लड़का जिसने मुझे बचाया।”
राजू डरते-डरते आगे बढ़ा और उनके पैर छुए। “नमस्ते माँ जी, मैं राजू हूँ।”
गायत्री देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा। “भगवान तुम्हारा भला करे बेटा। तुमने मुझे दूसरा जीवन दिया है।”
विक्रम ने एक गहरा फ़ैसला लिया। वह राजू की ओर मुड़ा और उसके कंधे पर हाथ रखा।
“राजू, तुमने मेरी माँ को तब बचाया जब तुम्हारे पास ख़ुद कुछ नहीं था। अब मेरी बारी है। तुम डॉक्टर बनना चाहते थे न? अब तुम डॉक्टर बनोगे। आज से तुम अनाथ नहीं हो। तुम हमारे परिवार का हिस्सा हो।”
राजू के कानों को विश्वास नहीं हो रहा था। जिस सपने को वह गरीबी की धूल में दफ़न कर चुका था, वह अचानक उसके सामने हक़ीक़त बनकर खड़ा था। वह कुछ बोल नहीं पाया, बस फूट-फूट कर रोने लगा।
लेकिन यह ख़ुशी का पल बहुत छोटा था। वार्ड का दरवाज़ा खुला और डॉक्टर गुप्ता की नर्स बदहवास हालत में अंदर दौड़ी। दिमाग़ के स्कैन में बड़ा रक्त का थक्का (Blood Clot) दिखा था।
डॉक्टर गुप्ता ने साफ़-साफ़ बताया: “रास्ता केवल एक है— आपातकालीन सर्जरी। लेकिन उनकी उम्र और कमज़ोरी की वजह से सफलता की संभावना बहुत कम है। यह एक जोखिम भरा जुआ है।”
विक्रम टूट गया। “एक तरफ़ कुआँ, दूसरी तरफ़ खाई!”
राजू ने फिर हिम्मत बँधाई। “डॉक्टर साहब, आप बस अपना काम शुरू कीजिए। मैं बस ऑपरेशन थिएटर के बाहर उनके लिए इंतज़ार करूँगा। मैं उन्हें तीसरी बार खोता हुआ नहीं देख सकता।”
भाग 5: नियति का चक्र पूरा हुआ
गायत्री देवी को तुरंत ऑपरेशन थिएटर (OT) में ले जाया गया। विक्रम और राजू दरवाज़े के बाहर एक ही बेंच पर बैठ गए।
विक्रम ने एक चेक बुक निकाली और राजू को देते हुए कहा: “राजू, तुम यह चेक लो। अगर माँ को कुछ हो भी गया, तो भी तुम्हारा डॉक्टर बनने का सपना नहीं टूटेगा। मैं हमेशा तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा।“
राजू ने चेक लेने से मना कर दिया। “साहब, मुझे आपका पैसा नहीं चाहिए। मुझे बस मेरी माँ जी वापस चाहिए।”
OT के बाहर की लाल बत्ती लगभग छह घंटे तक जलती रही। अंततः, डॉक्टर गुप्ता राहत भरे चेहरे के साथ बाहर निकले: “ऑपरेशन सफल रहा! यह एक चमत्कार है कि उनका शरीर इतने बड़े सदमे को झेल गया।”
विक्रम के घुटने जवाब दे गए। वह ज़मीन पर बैठ गया और इस बार उसके आँसू असीम राहत और कृतज्ञता के थे। उसने उठकर राजू को कसकर गले लगाया। “तुम सच में मेरे लिए भगवान के दूत हो।”
विक्रम ने अपना वादा निभाया। राजू ने अपनी पढ़ाई पूरी लगन से शुरू कर दी। उसके दिमाग़ में दबी प्रतिभा को अब उड़ान भरने का मौक़ा मिला।
18 साल बाद…
वो राजू जो कभी एक मैला-कुचैला मज़दूर था, अब डॉक्टर राजवेंद्र वर्मा के नाम से जाना जाता था— एक शानदार और कुशल न्यूरोसर्जन।
विक्रम मल्होत्रा गर्व से कहते थे: “राज मेरा बेटा नहीं, मेरा गुरु है। उसने मुझे सिखाया कि जीवन में पैसे से ज़्यादा इंसानियत मायने रखती है।”
नियति का चक्र एक सर्द सुबह पूरा हुआ। गायत्री देवी एक बार फिर फिसल गईं, और उनके दिमाग़ में एक और बड़ा रक्त का थक्का जम गया। हालत नाज़ुक थी।
यह मामला सीधे डॉक्टर गुप्ता के पास गया, लेकिन जैसे ही वह ऑपरेशन थिएटर की ओर भागे, उन्होंने देखा कि उनका सबसे काबिल जूनियर सर्जन पहले से ही OT में खड़ा था।
“डॉक्टर राजवेंद्र!” डॉक्टर गुप्ता ने आश्चर्य से कहा।
डॉ. राजवेंद्र वर्मा, जिसका बचपन का नाम राजू था, शांत और स्थिर खड़ा था। उसने अपनी माँ जैसी गायत्री देवी की ओर देखा। “जी सर। मैं तैयार हूँ। मैं यह ऑपरेशन ख़ुद करूँगा।”
उसने अपनी सारी प्रतिभा, ज्ञान और सबसे महत्वपूर्ण, अपना सारा प्यार उस ऑपरेशन में लगा दिया। कुछ घंटों बाद, उसने ऑपरेशन को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया। उसने उस महिला की जान तीसरी बार बचाई थी— एक बार सड़क पर, दूसरी बार इमरजेंसी में, और तीसरी बार ऑपरेशन थिएटर के अंदर एक विशेषज्ञ सर्जन के रूप में।
नियति ने राजू को उस धूल भरी सड़क पर इसीलिए छोड़ा था, ताकि वह अपनी कहानी को पूरी कर सके। यह कहानी हमें सिखाती है कि असली इंसानियत अमीरी या ग़रीबी नहीं देखती, और निस्वार्थ सेवा का फल हमेशा मिलता है। करुणा ही जीवन में सबसे बड़ी दौलत है।
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