आत्मसम्मान की विजय: जागृति पाठक की कहानी

मेरा नाम जागृति पाठक है। 68 वर्ष की उम्र में, जब लोग सोचते हैं कि जीवन की शाम हो गई है और अब बस दूसरों पर निर्भर रहना ही नियति है, मैंने अपने जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ी और जीती। यह कहानी केवल एक माँ के धोखे की नहीं है, बल्कि एक शिक्षित महिला के पुनर्जन्म की है।

अध्याय 1: खुशियों का घर और संघर्ष के दिन

मेरी शादी 38 साल पहले हरिओम पाठक से हुई थी। हम दोनों मध्यमवर्गीय परिवारों से थे। हरिओम दिल्ली के एक सरकारी दफ्तर में अकाउंटेंट थे और मैं ‘सेंट मैरीज कॉन्वेंट स्कूल’ में एक जूनियर टीचर। हमारे शुरुआती दिन रोहिणी के एक छोटे से किराए के कमरे में बीते, जहाँ रसोई और बिस्तर के बीच बस एक हाथ की दूरी थी।

हम दोनों के सपने बड़े थे। मैं सुबह 5 बजे उठकर घर का काम निपटाती और फिर स्कूल जाती। शाम को लौटकर हम दोनों एक-एक पैसे का हिसाब जोड़ते। हरिओम हमेशा कहते थे, “जागृति, हम आज भले ही कम में गुजारा कर रहे हैं, लेकिन अपने बेटे वरुण को हम दुनिया की हर खुशी देंगे।”

1990 के दशक में, अपनी पाई-पाई जोड़कर हमने गुड़गांव के सेक्टर 56 में एक स्वतंत्र मंजिल (Independent Floor) खरीदी। उस समय उसकी कीमत 15 लाख रुपये थी। हमने उस घर की एक-एक ईंट को अपने पसीने से सींचा था। वरुण हमारा इकलौता बेटा था। उसे हमने बेहतरीन शिक्षा दी, आईआईटी रुड़की से इंजीनियरिंग करवाई। जब उसकी शादी ऋतु से हुई, तो हमने अपनी सारी जमा-पूंजी लगा दी ताकि वह एक खुशहाल जीवन शुरू कर सके।

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अध्याय 2: अंधेरा और बदलती परछाइयां

मार्च 2019 की वह सुबह मेरे जीवन का सबसे काला दिन था। हरिओम पार्क में टहल रहे थे जब उन्हें अचानक मैसिव स्ट्रोक आया। चार दिन आईसीयू में संघर्ष करने के बाद, उन्होंने हमेशा के लिए अपनी आँखें बंद कर लीं।

हरिओम के जाने के बाद घर एकदम सूना हो गया। लेकिन असली सूनापन तब महसूस हुआ जब मेरे अपने बेटे और बहू का व्यवहार बदलने लगा। ऋतु एक एचआर प्रोफेशनल थी, लेकिन घर में उसका व्यवहार किसी निर्दयी मैनेजर जैसा हो गया था। शुरुआत में वे मुझे साथ रहने के लिए कहते थे, लेकिन जल्द ही उनकी बातों में कड़वाहट आने लगी।

एक रात मैंने उन्हें बालकनी में बात करते सुना। ऋतु कह रही थी, “वरुण, यह घर 2 करोड़ से ज्यादा का है। अगर माँ इसे बेच दें, तो हम एक आलीशान 4-BHK ले सकते हैं और तुम्हारा बिजनेस भी सेट हो जाएगा। वैसे भी अकेली बुढ़िया को इतने बड़े घर की क्या जरूरत?”

मेरा दिल टूट गया। जिस बेटे को मैंने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, वह आज मेरी छत छीनने की योजना बना रहा था।

अध्याय 3: मनाली का वो ‘छलावा’ और विश्वासघात

सबसे बड़ा झटका तब लगा जब वरुण और ऋतु ने मुझे ‘फैमिली ट्रिप’ पर मनाली ले जाने का नाटक किया। मैं कितनी खुश थी! मैंने नए गर्म कपड़े खरीदे, अपने पोते आर्यन के लिए तोहफे लिए। यात्रा की पिछली रात ऋतु ने मुझे एक गोली दी, यह कहकर कि इससे सफर में तबीयत खराब नहीं होगी।

अगली सुबह जब मेरी नींद खुली, तो सुबह के 9 बज रहे थे। घर में सन्नाटा था। वरुण और ऋतु के बैग गायब थे। फोन पर ऋतु का एक ठंडा मैसेज था: “माँ, आप बहुत गहरी नींद में थीं, हमें देर हो रही थी इसलिए हम निकल गए। अगली बार चलेंगे।”

वह कोई साधारण गोली नहीं थी, वह एक ‘सेडेटिव’ (नींद की दवा) थी। उन्होंने जानबूझकर मुझे नशे में रखा ताकि वे अकेले जा सकें। उस खाली घर में बैठकर मैं घंटों रोती रही। लेकिन उसी पल, मेरे अंदर की ‘प्रिंसिपल जागृति पाठक’ जाग गई। मैंने तय किया कि अब रोने का समय खत्म हुआ।

अध्याय 4: रणनीति और कानूनी हथियार

मैं 32 साल तक प्रिंसिपल रही थी। मैंने दर्जनों कानूनी मामले और स्कूल की प्रॉपर्टी के विवाद सुलझाए थे। मैंने अपनी पुरानी दोस्त निर्मला भट्ट को फोन किया, जो फैमिली कोर्ट में जज रह चुकी थीं। निर्मला ने मुझे कड़े शब्दों में समझाया, “जागृति, यह ‘एल्डर अब्यूज’ (बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार) है। अगर तुम आज नहीं लड़ी, तो कल ये तुम्हें सड़क पर फेंक देंगे।”

मैंने चुपचाप अपनी तैयारी शुरू की:

    वसीयत में बदलाव: मैंने अपनी वसीयत बदली। अब प्रॉपर्टी का आधा हिस्सा वरुण को और आधा मेरी भतीजी रूही को जाना था।

    डिजिटल सुरक्षा: मैंने घर के सारे ताले बदलवा दिए और सोसाइटी के गार्ड्स को सख्त निर्देश दिए कि मेरी अनुमति के बिना कोई अंदर न आए।

    सबूतों का संग्रह: मैंने हर अपमानजनक मैसेज और उनकी बातों की रिकॉर्डिंग करना शुरू किया। वह ‘नींद की गोली’ जो ऋतु ने दी थी, मैंने उसे लैब में टेस्ट करवाया, जो एक भारी नशीली दवा निकली।

अध्याय 5: अंतिम मुकाबला

जब वरुण और ऋतु ट्रिप से लौटे और उन्होंने देखा कि उनके पास घर की चाबी काम नहीं कर रही है, तो उनका असली चेहरा सामने आ गया। वरुण चिल्लाया, “माँ, यह क्या तमाशा है? यह मेरा घर है!”

मैंने शांति से इंटरकॉम पर कहा, “वरुण, यह घर हरिओम पाठक और जागृति पाठक का है। और जब तक मैं जीवित हूँ, यहाँ मेरी मर्जी चलेगी।”

उन्होंने मुझ पर ‘मानसिक रूप से बीमार’ होने का आरोप लगाकर कोर्ट में घसीटने की कोशिश की। लेकिन वे भूल गए थे कि उनका मुकाबला एक ऐसी महिला से है जिसने हजारों बच्चों का भविष्य बनाया था। कोर्ट में जब मेरी वकील अदिति नायर ने ऋतु द्वारा दी गई दवा की रिपोर्ट, मेरी डायरी के पन्ने और रिकॉर्डिंग्स पेश कीं, तो जज साहब दंग रह गए।

अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया:

वरुण और ऋतु को आदेश दिया गया कि वे मुझसे 500 मीटर दूर रहें।

वरुण को हर महीने 10,000 रुपये का गुजारा भत्ता (Maintenance) मुझे देने का आदेश मिला।

उन पर ‘एल्डर अब्यूज’ का केस दर्ज हुआ, जिससे उनकी नौकरियों पर भी आंच आ गई।

अध्याय 6: प्रायश्चित और नई सुबह

हारने के बाद, वरुण और ऋतु की सामाजिक प्रतिष्ठा धूल में मिल गई। उनके दोस्तों और रिश्तेदारों ने उनसे मुंह मोड़ लिया। जब उनकी आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी और उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ, तब वे सच में टूटने लगे।

महीनों बाद, मेरा पोता आर्यन मुझसे मिलने आया। उसकी मासूमियत ने मेरे गुस्से को थोड़ा कम किया। वरुण और ऋतु ने सार्वजनिक रूप से और अदालत में लिखित माफी मांगी। मैंने उन्हें एक आखिरी मौका दिया, लेकिन अपनी शर्तों पर।

आज, सेक्टर 56 का वह 18 करोड़ का घर फिर से चहल-पहल से भरा है, लेकिन अब वहां का नियम मेरी ‘मर्यादा’ है। वरुण अब मेरी संपत्ति का वारिस बनने के बजाय, मेरा सम्मान करने वाला बेटा बनने की कोशिश कर रहा है।

उपसंहार

मैं जागृति पाठक, आज उन सभी बुजुर्गों से कहना चाहती हूँ कि खुद को बेसहारा मत समझिए। आपके पास अनुभव की वह शक्ति है जो युवाओं के पास नहीं है। अपने हक के लिए लड़ना गलत नहीं है। अगर माँ प्यार देना जानती है, तो वह अनुशासन सिखाना भी जानती है।

मेरी जीत केवल मेरी संपत्ति की जीत नहीं थी, यह एक माँ के आत्मसम्मान की जीत थी।