दामाद ने “स्पेशल डिश” खिलाई… मैंने प्लेट बदली, फिर खेल पलट गया!
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प्लेट का खेल: एक पिता की चुपचाप लड़ाई
1. रविवार की दोपहर
दिल्ली एनसीआर की बारिश भरी दोपहर थी। खिड़की पर बूंदें थपक रही थीं। सोसाइटी का गेट दूर से चमक रहा था। घर के ड्राइंग रूम में टीवी की धीमी आवाज थी। मैं, यानी विजय सक्सेना, 68 साल का, अपने ही घर के डाइनिंग टेबल पर बैठा था। वही घर जिसमें मैंने अपनी पत्नी के साथ सपने जोड़े थे, लोन चुकाया था, और अब जिसमें मेरी बेटी नेहा और दामाद रोहित रहते थे।
नेहा कई दिनों से चुप थी। पहले वह मेरी आंखों में देखकर बात करती थी, अब नजरें चुराने लगी थी। जैसे मेरी आंखों में कोई सवाल लिखा हो, और वह उसे पढ़ना नहीं चाहती। रोहित, मेरा दामाद, छह साल से इस घर में था। शुरू से ही मुझे वह जरूरत से ज्यादा मीठा और चालाक लगा। आज वह अचानक खाना बनाकर ले आया था—जबकि वह खुद चाय भी नहीं बनाता।
2. “स्पेशल डिश” की चाल
रोहित मुस्कुराते हुए मेरी प्लेट मेरे सामने रखता है, “पापा, आज जरा खा लीजिए, खास आपके लिए बनाया है।” उसकी मुस्कान में मिठास कम, धार ज्यादा थी। मैंने प्लेट देखी—ग्रेवी गाढ़ी, ऊपर हल्की चमक, प्रेजेंटेशन परफेक्ट। अनुभव ने सिखाया है, जब कोई अचानक परफेक्ट बनने लगे, तो या तो बदल रहा है या कुछ छुपा रहा है।
मैंने कांटा उठाया, एक छोटा सा निवाला लिया, बस करीब लाकर सूंघा। मसालों की खुशबू के नीचे एक अजीब सी तीखी परत थी—जो किचन वाली नहीं लग रही थी। मैंने चेहरे पर भाव नहीं आने दिए।
“वाह, आज तो बड़ा स्पेशल लग रहा है,” मैंने धीमे से कहा। रोहित मेरी तरफ झुका, जैसे जीत पक्की हो। “पापा, आज बस खा लीजिए, बहुत दिनों से आपकी तबीयत…”
नेहा ने सलाद की पत्तियां उलटपलट की, मेरी तरफ नहीं देखा। उसकी उंगलियां कांप रही थीं। मैंने उसी पल फैसला किया—आज बहस नहीं करूंगा, सिर्फ देखूंगा। क्योंकि जिनके पास सच नहीं होता, वो आवाज़ बढ़ाते हैं। और जिसको सच चाहिए, वो सबूत जोड़ता है।
3. प्लेट बदलने की चाल
“पानी तो ले आना जरा,” मैंने रोहित से कहा। वह उठा, किचन की तरफ गया। मैंने अपनी कुर्सी आगे सरकाई, टेबल पर दो प्लेटें थी—मेरी और उसकी। नेहा की प्लेट अलग थी, उसने उसमें हाथ भी नहीं लगाया था।
मैंने अपनी प्लेट को बहुत साधारण तरीके से थोड़ा दाईं तरफ कर दिया और रोहित की प्लेट अपनी तरफ खींच ली। यह कोई फिल्मी स्वैप नहीं था, बस एक हल्की सी चाल थी—इतनी हल्की कि कोई गौर ना करे, पर इतनी साफ कि मेरा बचाव हो जाए।
रोहित पानी लेकर आया, बैठा, और आराम से खाना खाने लगा। मैं भीतर से ठंडा था, क्योंकि अब दो रास्ते थे—एक, उठकर सबको बोल दूं, “तुम मुझे मारना चाहते हो,” दूसरा, चुप रहूं और देखूं कि सच किसके चेहरे पर कितनी देर टिकता है। मैंने दूसरा चुना।

4. प्रॉपर्टी की बात
खाते-खाते रोहित बोला, “पापा, आपने कभी सोचा है, आपकी प्रॉपर्टी का क्या होगा आगे?” मेरे दिल में हल्का सा झटका लगा, पर चेहरे पर नहीं। “क्यों? तुम्हें क्या लग रहा है?” उसकी आंखों में चमक थी।
“ऐसे ही बस सोच रहा था, नेहा को सिक्योर करना है ना।” नेहा ने कांटा रख दिया, उसका गला बंद हो गया। उसने पानी पीने की कोशिश की, हाथ कांप गया। मैंने मन में नोट किया—प्रॉपर्टी की बात, डर, और अचानक केयर—तीनों एक साथ। यह संयोग नहीं, पैटर्न था।
कुछ मिनट बाद रोहित की पलकों की गति बदलने लगी। वह बार-बार आंखें मसलने लगा। “अजीब लग रहा है,” वह बड़बड़ाया। नेहा की आवाज तेज हो गई, “रोहित, क्या हुआ?” वह उठने की कोशिश करता है, फिर वापस कुर्सी पर गिर जाता है। माथे पर पसीना, सांस भारी, आंखों में पहली बार डर।
मैंने बिना हड़बड़ाए फोन उठाया, “मैं एंबुलेंस बुला रहा हूं।” नेहा रोने लगी। “पापा, यह कैसे?” मैंने उसकी तरफ देखा, “नेहा, घबराओ मत, अभी मदद आती है।” मेरे दिमाग में एकदम शांति थी। पैनिक बाद में होता है, पहले सुरक्षित रहना होता है।
5. सबूत बचाना
एंबुलेंस आई, पैरामेडिक्स ने रोहित को उठाया। सवाल हुए—क्या खाया, कुछ दवा ली, पहले कभी ऐसा हुआ? नेहा घबरा कर कुछ भी बोल सकती थी। मैं बीच में आया, “उसने खाना बनाया था, शायद उसे ही सूट नहीं हुआ।” नेहा ने मेरी तरफ पहली बार देखा—उस नजर में गिल्ट था या रिलीफ, तय नहीं कर पाया।
वो दोनों हॉस्पिटल चले गए। घर अचानक बहुत शांत हो गया। बारिश की आवाज साफ सुनाई देने लगी। मैंने किचन में जाकर प्लेटें अलग रखी, ग्रेवी की छोटी मात्रा सील्ड डिब्बे में, पानी की बोतल भी अलग। डॉक्टर नहीं हूं, लेकिन लाइफ ने सिखाया है—जब शक हो, चीजें गायब मत करो, बचाओ।
6. रात की बेचैनी
रात काफी हो गई, नेहा का कॉल नहीं आया। करीब 1:30 बजे फोन बजा। “पापा…” उसकी आवाज कांप रही थी। “रोहित स्टेबल है। डॉक्टर बोल रहे हैं, उसके बॉडी में कुछ…” मैंने धीरे से पूछा, “कुछ क्या?” “वो लोग पुलिस को भी बोल रहे हैं कि केस सस्पिशियस लग रहा है।”
मेरे भीतर ठंडी लहर दौड़ गई। “नेहा, तुम ठीक हो?” वो रो पड़ी। “पापा, मुझे नहीं पता मैं क्या कर रही हूं।” मैंने उसकी बात वहीं रोक दी। “अभी हॉस्पिटल में रहो, सुबह बात करेंगे।”
मैंने अपनी स्टडी में जाकर पुरानी डायरी निकाली। अब उसमें तारीख, समय, किसने क्या कहा, किसका व्यवहार कब अलग हुआ—सब लिखने लगा। अपनी ही बेटी के खिलाफ लिखना भारी था, पर उससे भी भारी यह था कि अगर मैं चुप रहा, तो अगली बार शायद लिखने लायक नहीं बचूंगा।
7. अस्पताल की सच्चाई
सुबह नेहा घर लौटी, आंखें लाल, चेहरा थका हुआ। किचन में आई, “पापा, कल खाना आपको अजीब लगा था क्या?” मैंने जानबूझकर झूठ बोला, “नहीं बेटा, बस मसाले थोड़ा तेज थे।” उसकी सांस रुकी, फिर चलने लगी। उसे राहत मिली, और मुझे उसी राहत ने डरा दिया।
दोपहर में अस्पताल गया, दामाद की तबीयत पूछने के बहाने। रोहित बिस्तर पर लेटा था, मुझे देखकर डर गया, लेकिन मुस्कान पहन ली। “पापा, आप आए?” “घर का आदमी है,” मैंने कहा। काम, मौसम, डॉक्टर की बातें की। उठते वक्त हल्के से पूछा, “कल की रेसिपी कहां से सीखी?” “YouTube,” उसने सिर हिलाया।
कॉरिडोर में नर्स शोभा मिली। “पापा जी, एक मिनट कैंटीन में चलें।” उसने चाय का कप रखा, फिर बोली, “आपके घर से यह दूसरा केस आया है। पहला केस आपकी बेटी, कुछ हफ्ते पहले रात में लाई गई थी, बहुत ज्यादा सिडेशन।” नेहा ने मुझे नहीं बताया था। शोभा बोली, “कभी-कभी लोग पहले टेस्ट करते हैं, फिर नेक्स्ट स्टेप लेते हैं।”
8. सच्चाई की तह तक
घर लौटकर मैंने बैंक अलर्ट्स, प्रॉपर्टी पेपर्स, ईमेल्स सब चेक किए। एक पुराना फॉरवर्डेड मेल दिखा, जिसमें लोन और प्रॉपर्टी का हिंट था। मेरी प्रॉपर्टी, मेरे नाम से, मेरी सिग्नेचर जैसी कुछ। सिर्फ डिनर नहीं था, यह प्रॉपर्टी वॉर थी।
नेहा सीढ़ियों पर फुसफुसाते हुए बोली, “पापा को पता चल गया तो सब खत्म हो जाएगा।” अब सवाल यह नहीं था कि रोहित ने क्या मिलाया था, सवाल यह था नेहा किसको बचा रही थी—मुझे या खुद को?
9. सिस्टम से लड़ाई
मैंने शोर नहीं मचाया, सिस्टम से काम लेना शुरू किया। बैंक गया, ब्रांच मैनेजर से पूछा, “मेरे नाम से कोई नई एक्टिविटी?” उसने बताया, “इमंडेट रिक्वेस्ट आई थी, सिग्नेचर मिसमैच फ्लैग हुआ था।” ओटीपी अटेम्प्ट्स, रजिस्टर्ड मोबाइल वही जो घर में सब जानते हैं। मैंने खाते पर एक्स्ट्रा सिक्योरिटी लगवाई, नया ईमेल आईडी रजिस्टर कराया।
घर लौटकर नेहा की मुस्कान नकली थी। मैंने कहा, “आज बैंक गया था, कुछ अलर्ट्स आए थे।” उसका चेहरा सफेद पड़ गया। मैंने उसी शाम सीसीटीवी कैमरा खरीदा, स्टडी रूम और डाइनिंग एरिया में लगाया।
10. सबूतों का जाल
रात को रोहित मिठाई का डिब्बा लेकर आया, “पापा, यह आपके लिए।” मैंने मुस्कुरा कर ले लिया। अगले दो दिनों में मैंने अपने पुराने सीए, वकील, और सोसाइटी के इंस्पेक्टर से बात की। सबूत के बिना आरोप मत लगाइए, पेपर्स की सर्टिफाइड कॉपीज बनवाइए, किसी भी कागज पर बिना पढ़े साइन नहीं।
तीसरे दिन रात को नेहा मेरे कमरे के बाहर आई, “पापा, आप मुझसे नाराज हैं क्या?” मैंने कहा, “नाराज क्यों?” उसने कहा, “आपने मुझे अलग सा देखना शुरू कर दिया है।” मैंने कहा, “नेहा, मैं तुम्हें अलग नहीं देख रहा, मैं सच देखना शुरू कर रहा हूं।”
“तुम हॉस्पिटल कब गई थी?” उसका चेहरा फ्रीज हो गया। “पापा, वो एक्सीडेंटल था।” “और तुमने मुझे नहीं बताया?” वो रो पड़ी, “रोहित ने कहा था, अगर आपको पता चला तो आप उसे घर से निकाल देंगे। और लोग क्या कहेंगे पापा?”
11. असली जंग
अगले दिन रोहित घर में बहुत स्वीट था। “पापा, कल एक पेपर दिखाना है, हेल्थ इंश्योरेंस का अपडेट है, नोटरी वाली चीज है।” मेरे दिमाग में सायरन बज गया। मैंने सीसीटीवी फुटेज चेक किया। रात में दो बार स्टडी का दरवाजा खुला, रोहित अंदर आया, अलमारी से फोल्डर निकाला, कुछ मिनट देखा, फिर वापस रखा।
शाम को रजिस्ट्रार ऑफिस गया, स्टेटस चेक की। कोई फाइनल एंट्री नहीं थी, लेकिन एक सर्च रिक्वेस्ट आई थी—ओनर फैमिली बनकर। साथ में एक औरत भी थी—नेहा। घर पहुंचा तो रोहित फोन पर, “कल तक सिग्नेचर हो जाएगा।”
रात को मैंने एक ट्रैप सेट किया—डेस्क पर फेक एनवलोप रखा, अंदर कुछ पुराने ज़ेरॉक्स और एक कागज, “जो चोर होता है, वो जल्दी पकड़ में आता है।” रात 2:30 पर मोशन अलर्ट आया—रोहित अंदर आया, एनवलोप खोला, लाइन पढ़ी, चेहरा बदल गया।
12. धमकी और केस
अगली सुबह रोहित बोला, “पापा, कल नोटरी चलेंगे, बस एक छोटा सा सिग्नेचर चाहिए।” तभी मेरे फोन पर अननोन नंबर से मैसेज आया, “अगर आप रुकावट बने तो अगली बार प्लेट नहीं बदलेगी।” मैंने इंस्पेक्टर भाई को कॉल किया, उन्होंने कहा, “कल नोटरी के लिए मत जाइए अकेले, आज ही सीसीटीवी क्लिप्स भेज दीजिए।”
फोन कटते ही डोर बेल बजी, बाहर दो पुलिस वाले थे। “आपको थाने चलना होगा, आपके दामाद ने कंप्लेंट दी है कि आपने उसे खाने में कुछ मिलाकर मारने की कोशिश की।” अंदर से रोहित की वही मीठी आवाज, “पापा, मैंने कहा था ना पॉजिटिविटी।”
मैंने पुलिस वालों से शांत होकर कहा, “मैं चलूंगा, लेकिन पहले वकील को कॉल करूंगा।” इंस्पेक्टर भाई ने कहा, “घबराइए नहीं, जो सबूत आपने बनाए हैं, वही आपकी ढाल है।”
13. सच का सामना
थाने में सवाल हुए—क्या हुआ, खाने में क्या था, क्यों बुलाया एंबुलेंस? मैंने कहा, “मुझे शक है कि मुझे फंसाया जा रहा है।” मेरे वकील और इंस्पेक्टर आए, पेनड्राइव टेबल पर रखी। फुटेज चला—रोहित स्टडी में घुस रहा है, फेक एनवलोप ट्रैप वाला फुटेज।
बैंक की रिटन नोट, ई मैंडेट अटेम्प्स, सिग्नेचर मिसमैच, रजिस्ट्रार ऑफिस की क्वेरी, धमकी वाला मैसेज—सब एक साथ। कहानी पलट गई। अब मैं आरोपी नहीं, विक्टिम लगने लगा।
नेहा को भी थाने बुलाया गया। रोहित ने उसे चुप रहने का इशारा किया। एसएओ ने नेहा से पूछा, “तुम्हारे हस्बैंड ने जो कंप्लेंट दी है, तुम उसके साथ हो?” नेहा ने निगल कर बोला, “मैं… नहीं जानती।” फुटेज दिखाया गया, रोहित स्टडी में घुस रहा था। नेहा ने धीरे से कहा, “यह मेरे सामने भी नहीं करता था।”
इंस्पेक्टर भाई बोले, “बेटी, सच बोलो, डरने की जरूरत नहीं।” नेहा टूट गई, “पापा, मैंने आपको धोखा नहीं देना चाहा, लेकिन रोहित ने कहा था अगर मैंने साथ नहीं दिया तो वो मेरी कुछ फोटो और वो हॉस्पिटल वाली बात सब बाहर कर देगा।”
14. न्याय की जीत
रोहित चिल्लाया, “यह झूठ बोल रही है, यह इमोशनल है।” एसएओ ने उसे रोक दिया। नेहा ने पूरा सच नहीं, पर इनफ सच बोल दिया। रोहित पर डेड था, डेवलपर दलाल के साथ उसका जल्दी पैसा वाला चक्कर था। मेरा घर सबसे आसान कोलटरल था।
एसएओ ने रोहित की तरफ देखा, “अब बोलो।” रोहित ने नया खेल शुरू किया, “ये सब फैमिली मैटर है, कॉम्प्रोमाइज कर लेते हैं।” पर अब मास्क काम नहीं करता। कैमरा और बैंक लॉक सामने हो।
उस रात मेरी रिटन स्टेटमेंट दर्ज हुई—धोखाधड़ी की कोशिश, धमकी, एल्डर अब्यूज। पुलिस ने मेरे लिए सेफ्टी प्लान बनाया। घर के पेपर्स सुरक्षित, किसी भी ट्रांजैक्शन पर रोक।
15. रिश्तों की मरम्मत
सोसाइटी के ग्रुप में अफवाहें उड़ने लगीं—अंकल ने दामाद को पोइजन कर दिया, घर की लड़ाई, बहू-बेटी का ड्रामा। मैंने पहली बार परवाह छोड़ दी। ग्रुप में लिखा, “बस एक कानून अपना काम करेगा। अफवाहों से नहीं, सबूतों से फैसला होगा।”
अदालत में मामला गया, रोहित के वकील ने वही कोशिश की, “यह बुजुर्ग हैं, पर अनोया है।” मेरे वकील ने स्क्रीन ऑन की, फुटेजेस रख दीं। जज ने नेहा की तरफ देखा, नेहा ने सच के साथ खड़ा होना चुना।
रोहित के चेहरे पर पहली बार डर आया। उसे घर के अंदर आने से रोका गया, प्रोटेक्टिव ऑर्डर मिला। नेहा अकेली घर लौटी, दरवाजे पर खड़ी थी। उसकी आंखों में बच्ची थी, जो कभी मेरी उंगली पकड़ कर स्कूल जाती थी, और पीछे औरत थी, जो “लोग क्या कहेंगे” में फंसकर अपने ही पिता को खोने वाली थी।
“पापा, आप मुझे माफ कर देंगे?” मैंने कहा, “माफी और भरोसा एक चीज नहीं होते नेहा। माफी मैं दे सकता हूं, लेकिन भरोसा वापस आने में समय लगेगा।”
16. अंत की शुरुआत
नेहा के लिए काउंसलिंग डॉक्टर अपॉइंटमेंट फिक्स किया। उसे अपने पास रखा, लेकिन रूल्स के साथ—कोई हिडन पासवर्ड्स नहीं, कोई पति ने कहा नहीं, और सबसे जरूरी, मेरी फाइलें अब लॉक में थीं, चाबी सिर्फ मेरे पास।
कुछ महीनों बाद मामला सेटल होने लगा। वकील ने कहा, “आप चाहे तो उसे पूरी तरह तोड़ सकते हैं।” मैंने कहा, “मैं उसे तोड़ना नहीं चाहता, मैं बस अपने घर को बचाना चाहता हूं।”
एक शाम नेहा ने पूछा, “पापा, आपने उस दिन मुझे निकाल क्यों नहीं दिया?” मैंने कहा, “क्योंकि तुम मेरी बेटी हो। और सच बोलने वाला इंसान अभी बच सकता है। लेकिन जिसने सच को हथियार बनाया, उसे कॉन्सिक्वेंसेस भुगतने होंगे।”
नेहा रोई, पर यह रोना डर का नहीं था, यह रोना जागने का था। मैंने डायरी बंद की—आखिरी लाइन लिखी, “सच हमेशा शोर नहीं करता, सच सबूत बनकर सही समय पर सही जगह पर खड़ा होता है।”
समाप्त
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