करोड़पति लड़का बोला: खाना दूँगा, पर रूम चलो—गरीब लड़की ने सोचा भी नहीं था, आगे जो हुआ…

वाराणसी के अस्सी घाट पर शाम धीरे-धीरे उतर रही थी।
गंगा मैया की आरती की तैयारी अपने पूरे वैभव में थी। घंटियों की आवाज़, शंख की ध्वनि, दीपों की कतारें—सब कुछ इतना पवित्र, इतना दिव्य कि लगता था, इस घाट पर दुख टिक ही नहीं सकता।

लेकिन उसी घाट की एक सीढ़ी पर, भीड़ से थोड़ा हटकर, एक लड़की बैठी थी।

उसका नाम मीरा था।

उम्र सिर्फ़ बीस साल…
लेकिन उसका शरीर ऐसा लगता था जैसे उसने ज़िंदगी के पचास साल जी लिए हों।

सलवार-सूट कभी किसी रंग का रहा होगा, अब पहचान में नहीं आता था। दुपट्टे में इतने छेद थे कि वह ढकने से ज़्यादा उसकी बेबसी दिखा रहा था। पैरों में चप्पल नहीं थी—एड़ियाँ फटी हुई, सूखी ज़मीन की तरह। आँखों के नीचे गहरे काले घेरे, जैसे नींद ने बरसों पहले उसका रास्ता भूल लिया हो। होंठ इतने सूखे कि हर सांस के साथ चटक जाते थे।

लेकिन सबसे ज़्यादा जो चीख रहा था, वह था उसका पेट।

भूख…
ऐसी भूख जो आवाज़ नहीं करती, लेकिन अंदर से इंसान को खोखला कर देती है।

मीरा गंगा की ओर नहीं देख रही थी।
वह लोगों को देख रही थी।

हर गुजरते चेहरे को…
हर आते-जाते कदम को…

उसकी आँखों में भीख नहीं थी।
बस एक सवाल था—

“क्या मैं इंसान नहीं हूँ?”

लोग आरती देखते, प्रसाद लेते और अपने-अपने घरों को लौट जाते। किसी की नज़र उस लड़की पर नहीं ठहरती थी, जो उन्हीं सीढ़ियों पर बैठी ज़िंदगी से लड़ रही थी।

तभी भीड़ के बीच से एक हलवाई गुज़रा।
हाथ में गरम-गरम समोसे।

घी की खुशबू हवा में फैल गई।

मीरा का पेट ऐंठ गया।
उसकी उंगलियाँ अनजाने में सिमट गईं।

हलवाई ने एक समोसा उठाया और पास बैठे एक कुत्ते की ओर उछाल दिया। कुत्ता झपटा।

फिर उसने दूसरा समोसा मीरा की तरफ़ फेंका।

एक पल के लिए समय जैसे थम गया।

कुत्ता भी लपका।
मीरा भी आगे बढ़ी।

लेकिन तभी मीरा रुक गई।

समोसा ज़मीन पर गिरा पड़ा था—कुत्ते के बिल्कुल पास।

मीरा ने उसे नहीं उठाया।

इतनी भूख में भी…
उसका स्वाभिमान ज़िंदा था।

उसने सोचा—
“जानवर और मुझमें कुछ तो फर्क होना चाहिए।”

वह चुपचाप पीछे हट गई।

कुत्ता समोसा लेकर भाग गया।

भीड़ में खड़ा एक युवक यह सब देख रहा था।

उसका नाम था—आदित्य प्रताप सिंह।

उम्र करीब अट्ठाइस साल।
लंबा कद, सधा हुआ व्यक्तित्व, महंगे कपड़े।

बनारस के एक पुराने रईस खानदान का वारिस।

शहर में “रूहानी रसोई” नाम से उसका एक मशहूर हेरिटेज रेस्टोरेंट था—जहाँ इलायची, केसर और देसी घी की खुशबू हवा में तैरती रहती थी।

पैसे की कोई कमी नहीं थी।
नाम था। पहचान थी।

लेकिन उसके भीतर…
कहीं एक खालीपन था।

एक ऐसा खालीपन, जिसे कोई दौलत नहीं भर पाई थी।

वह अक्सर शाम को घाट पर आता था—सुकून की तलाश में।

आज उसकी नज़र मीरा पर ठहर गई थी।

उसने देखा—
भूख से तड़पती लड़की, ज़मीन पर पड़ा समोसा, और उसे न उठाने का साहस।

आदित्य की आँखों में एक अलग सी चमक आई।

वह भीड़ को चीरता हुआ मीरा की ओर बढ़ा।

मीरा ने जब सामने एक आदमी को खड़ा देखा, तो डर गई।
उसने अपने पैर सिकोड़ लिए।

उसे लगा—
शायद यह भी कोई ताना मारने आया है।
या कोई पुलिसवाला, जो उसे यहाँ से भगा देगा।

लेकिन आदित्य ने जेब से पैसे नहीं निकाले।

वह उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया।

और बहुत नरम आवाज़ में पूछा—
“भूख लगी है?”

मीरा कुछ नहीं बोली।
बस उसकी आँखों में देखती रही—डरी हुई, सन्न।

आदित्य ने दोबारा कहा—
“मैं तुम्हें खाना खिला सकता हूँ।”

लेकिन फिर वह रुका।

“एक शर्त है।”

“शर्त” शब्द सुनते ही मीरा का दिल धक से रह गया।

गरीबों की दुनिया में शर्तों का मतलब अक्सर एक ही होता है।

उसकी मुट्ठियाँ कस गईं।

आदित्य ने शायद उसका डर समझ लिया।

उसने तुरंत हाथ जोड़ लिए—
“गलत मत समझना।”

फिर बोला—
“मैं मुफ्त में खाना नहीं दूँगा।”

मीरा की सांस अटक गई।

“तुम्हें मेरे साथ चलना होगा।”
“मेरे रेस्टोरेंट में काम करना होगा।”

“बदले में खाना मिलेगा, रहने की जगह मिलेगी… और मेहनत की इज़्ज़त।”

एक पल रुककर उसने कहा—
“भीख मांगकर पेट भरोगी… या काम करके सिर उठाओगी?”

“फ़ैसला तुम्हारा है।”

मीरा सन्न रह गई।

आज तक लोगों ने उसे सिक्के दिए थे।
गालियाँ दी थीं।
हिकारत दी थी।

लेकिन किसी ने उसे काम नहीं दिया था।
किसी ने उसे बराबरी से नहीं देखा था।

वह आदित्य की आँखों में देख रही थी।

वहाँ न हवस थी…
न दया…

बस भरोसा था।

उसके होंठ काँपे—
“मुझे काम नहीं आता, साहब…”

आदित्य मुस्कुराया—
“कोई माँ के पेट से सीखकर नहीं आता।”

“नियत साफ हो तो पत्थर भी कारीगरी सीख लेता है।”

मीरा धीरे-धीरे उठी।

उसके पैर लड़खड़ा रहे थे।

और वह आदित्य की काली चमचमाती गाड़ी की ओर बढ़ गई…

काली गाड़ी घाट की भीड़ से निकलकर संकरी गलियों में मुड़ गई।
मीरा पिछली सीट पर सिमटी बैठी थी। खिड़की से बाहर भागता हुआ बनारस उसे किसी और ही दुनिया का शहर लग रहा था—पुराने घरों की दीवारें, छोटे मंदिर, जलते दिए, सड़क किनारे सोते लोग।

उसका दिल तेज़-तेज़ धड़क रहा था।

यह डर की धड़कन थी…
या उम्मीद की—वह खुद नहीं जानती थी।

उसके हाथ उसकी गोद में जकड़े हुए थे, जैसे ज़रा ढील दी तो सब कुछ बिखर जाएगा।

ड्राइवर ने शीशे में एक बार मीरा को देखा और नाक सिकोड़ी।

आदित्य ने यह देख लिया।

“सीधे रेस्टोरेंट चलो,”
उसने शांत लेकिन साफ़ आवाज़ में कहा।

कुछ ही देर में गाड़ी एक पुरानी हवेली के सामने रुकी।
ऊँचे फाटक, पीली रोशनी और भीतर से आती मसालों की खुशबू।

रूहानी रसोई।

जहाँ इलायची, केसर और देसी घी की महक हवा में तैरती रहती थी।

मीरा गाड़ी से उतरी तो उसे अपने पैरों पर भरोसा नहीं था।
इतनी साफ़ जगह… इतने सजे लोग…
और वह खुद—फटे कपड़े, बिखरे बाल, झुकी नज़रें।

आदित्य उसके साथ-साथ चला—
ना जल्दी,
ना दूरी।

अंदर कदम रखते ही रसोई का स्टाफ ठिठक गया।

किसी ने फुसफुसाया।
किसी ने सवालिया नज़र डाली।

मैनेजर आगे बढ़ा।
उसकी आवाज़ में संकोच और असहजता थी—

“सर… यह… यह तो भिखारिन है…”

आदित्य की चाल रुक गई।

उसने मैनेजर की ओर देखा।

“यह थी भिखारिन,”
उसने ठंडे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा,
“अब यह यहाँ काम करेगी।”

किचन में सन्नाटा छा गया।

“काकी,”
आदित्य ने रसोई के एक कोने में खड़ी बुज़ुर्ग महिला को पुकारा,
“इसे नहाने के लिए ले जाओ।
साफ़ कपड़े दो…
और पेट भरकर खाना खिलाओ।”

मीरा को जैसे अपने कानों पर यक़ीन नहीं हुआ।

काकी ने मीरा का हाथ पकड़ा।

वह हाथ…
जो बरसों से किसी ने थामा नहीं था।

बिना डर।
बिना गिनती।

नहाने के बाद जब मीरा बाहर आई,
तो उसके बदन पर एक पुराना लेकिन साफ़ गुलाबी सलवार-सूट था।

गीले बाल कंधों पर ढलके हुए।

आईने में उसने खुद को देखा—
तो एक पल को ठिठक गई।

धूल और भूख के नीचे दबा चेहरा
धीरे-धीरे उभर रहा था।

साँवली…
लेकिन सजीव।
थकी हुई…
लेकिन खूबसूरत।

काकी ने उसके सामने थाली रखी—
दाल, चावल और गर्म रोटियाँ।

मीरा ने पहला निवाला मुँह में रखा…

और रो पड़ी।

यह रोना भूख का नहीं था।
यह उस एहसास का था,
जिसे वह बरसों से नहीं जानती थी—

अपनापन।

आदित्य दूर खड़ा यह सब देख रहा था।

उसके दिल में एक अजीब-सा सुकून उतरा।
ऐसा सुकून,
जो महंगी डील्स और बड़ी तालियों से कभी नहीं मिला था।

अगली सुबह मीरा का काम शुरू हुआ।

बर्तन।
ढेर सारे जूठे बर्तन।

स्टाफ उससे दूरी बनाकर रखता।
कोई सीधे बात नहीं करता।
कोई उसे छूने से बचता।

कुछ नज़रें अब भी उसे उसी घाट की लड़की समझती थीं।

मीरा चुपचाप काम करती रही।

घंटों खड़े रहकर बर्तन मांझती।
हाथों में कट लग जाते।
साबुन चुभता।
कमर दुखती।

लेकिन वह एक शब्द नहीं कहती।

क्योंकि वह जानती थी—

बाहर की जिल्लत से
यह दर्द बेहतर है।

आदित्य अक्सर दूर से उसे देखता।
ना टोका।
ना सराहा।

बस देखता रहा।

एक शाम रसोई में अचानक हड़बड़ी मच गई।

शाही पनीर के ऑर्डर बहुत ज़्यादा थे।

मुख्य बावर्ची घबराहट में
ग्रेवी में नमक ज़्यादा डाल चुका था।

नया बनाने का वक्त नहीं था।

आवाज़ें तेज़ होने लगीं।
चेहरों पर डर था।

मीरा कोने में बर्तन धो रही थी।

वह आगे बढ़ी…
फिर रुक गई…

फिर धीरे से बोली—

“अगर… अगर इसमें थोड़ा दूध और भुना हुआ बेसन डाल दें…
और ऊपर से नींबू का रस…”
“तो नमक कम लगने लगेगा।”

बावर्ची ने गुस्से से उसे देखा—

“तू हमें सिखाएगी?”

उसी पल आदित्य किचन में आ गया।

“रुकिए,”
उसने कहा,
“जैसा यह कह रही है, वैसा कीजिए।”

सब चुप हो गए।

ग्रेवी दोबारा चढ़ी।

कुछ देर बाद आदित्य ने चखा।

उसकी आँखें ठहर गईं।

स्वाद सिर्फ़ संतुलित नहीं हुआ था…
वह और निखर गया था।

“तुम्हें यह कैसे पता?”
आदित्य ने मीरा से पूछा।

मीरा ने नज़रें झुका ली—

“मेरी माँ…”
“जब कभी नमक ज़्यादा हो जाता था,
तो ऐसे ही ठीक करती थीं।”

फिर धीमे से बोली—

“गरीबी सिखा देती है, साहब…
खाना फेंकना नहीं,
सुधारना।”

उस दिन के बाद
मीरा के काम बदल गए।

अब वह सब्ज़ी काटती।
मसाले तैयार करती।

रसोई की धड़कन बनती जा रही थी।

एक बरसाती दोपहर,
रेस्टोरेंट खाली था।

मीरा मसालों के डिब्बे साफ़ कर रही थी।

आदित्य पास आकर रुका।

“तुम पढ़ना जानती हो?”
उसने पूछा।

मीरा ने सिर हिलाया—
“नहीं…”

“फिर मसाले कैसे पहचानती हो?”

मीरा ने एक डिब्बा उठाया।
आँखें बंद कीं।
गहरी सांस ली—

“महक से,”
वह बोली,
“हर मसाले की अपनी कहानी होती है…
जैसे हर इंसान की।”

आदित्य उसे देखता रह गया।

उसी पल उसे समझ आया—

मीरा साधारण नहीं थी।