मैं 10 साल गुलामी करूँगा, बस मेरी माँ को बचा लीजिये” – डॉक्टर से एक बेघर बच्चे की विनती। 😭

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“मैं 10 साल गुलामी करूँगा, बस मेरी माँ को बचा लीजिए” — एक बेघर बच्चे की वह विनती जिसने इंसानियत को आईना दिखा दिया

तूफानी रात थी।
आसमान का सीना बिजली चीर-चीर कर रोशन कर रहा था और गड़गड़ाहट इतनी भयानक थी कि पूरा शहर सहमा हुआ था। लेकिन उस शोर से भी तेज़ एक चीज़ चल रही थी—एक दस साल के बच्चे की साँसें।

उसका नाम भुवन था।

उसके पैरों में चप्पल नहीं थी। नुकीले पत्थर, टूटी बोतलों के काँच और सड़क की गंदगी उसके तलवों को छलनी कर चुके थे। बारिश के पानी में घुला खून सड़क पर एक धुंधली लाल लकीर बना रहा था।
लेकिन भुवन को दर्द का होश नहीं था।

उसके कानों में बस एक ही आवाज़ गूंज रही थी—
उसकी माँ लक्ष्मी की उखड़ती साँसें।

लक्ष्मी एक पुराने, जर्जर हाथ-ठेले पर बेसुध पड़ी थी। उसका शरीर बुखार से तप रहा था, इतना कि बारिश की ठंडी बूँदें भी उसे ठंडा नहीं कर पा रही थीं। भुवन अपने पूरे शरीर का ज़ोर लगाकर ठेले को धकेल रहा था। उसकी उँगलियाँ ठंड से नीली पड़ चुकी थीं, लेकिन हैंडल पर पकड़ इतनी कस कर थी कि जोड़ सफेद हो गए थे।

“बस माँ… बस पहुँच गए…”
वह बड़बड़ाया।

आँखों के आगे अँधेरा छा रहा था, फिर भी वह रुका नहीं।

किसी तरह वह शहर के सबसे बड़े और सबसे महंगे सिटी लाइफ हॉस्पिटल के शीशे वाले दरवाज़े तक पहुँचा। एक पल को उसने माँ के माथे को छूकर देखा—वह आग की भट्ठी जैसा जल रहा था। भुवन का दिल बैठ गया।

उसने पूरी ताकत से दरवाज़ा धक्का दिया।

अंदर की दुनिया

अंदर का माहौल किसी और ही दुनिया का था।
एसी की ठंडक ने उसके भीगे, काँपते शरीर को झटका दिया। चमचमाता संगमरमर का फर्श आईने की तरह चमक रहा था। उस पर भुवन के कीचड़ सने छोटे-छोटे कदम काले निशान छोड़ रहे थे।

रिसेप्शन पर बैठी नर्स ने उसे देखते ही नाक सिकोड़ी।

“ए लड़के! कहाँ घुस आया है? ये कोई धर्मशाला नहीं है। बाहर निकल!”

आवाज़ में इतनी कड़वाहट थी कि भुवन वहीं ठिठक गया। उसने अपनी फटी शर्ट निचोड़ने की बेकार कोशिश की।

“मैडम… मेरी माँ बाहर है,”
उसकी आवाज़ काँप रही थी,
“वो साँस नहीं ले पा रही… डॉक्टर साहब को बुला दीजिए।”

नर्स ने बिना उसकी तरफ़ देखे रजिस्टर में लिखते हुए कहा—
“पहले एडमिशन डिपॉजिट लाओ। पाँच सौ रुपये लगेंगे।”

भुवन के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
पाँच सौ रुपये? उसने तो दो दिन से खाना तक नहीं खाया था।

तभी कॉरिडोर से एक रौबदार कद-काठी वाले डॉक्टर आते दिखे—डॉ. अनिरुद्ध। गले में स्टेथोस्कोप, हाथ में फाइल।

भुवन ने सोचना छोड़ दिया।
वह दौड़ा… और डॉक्टर के पैरों में गिर पड़ा।

उसके गंदे, गीले हाथ डॉक्टर के चमचमाते सफेद जूतों पर मिट्टी छोड़ गए।

“डॉक्टर साहब! प्लीज!”
वह चीख पड़ा,
“मेरी माँ मर जाएगी!”

डॉ. अनिरुद्ध चौंक कर पीछे हटे।

“ये बदतमीज़ी क्या है?”
उन्होंने गुस्से से कहा,
“सिक्योरिटी!”

“नहीं साहब, रुकिए!”
भुवन ने उनके कोट का कोना पकड़ लिया।

उसने काँपते हाथों से अपनी जेब टटोली।
कुछ सिक्के… और एक गीला, मुड़ा हुआ ₹10 का नोट

“मेरे पास पैसे नहीं हैं…”
उसकी आवाज़ टूट गई।

फिर उसने सिर उठाया।
उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन साथ ही ऐसी चमक भी थी जिसने पूरे कॉरिडोर को चुप करा दिया।

“लेकिन मैं मेहनत कर सकता हूँ…”
एक पल रुका, फिर बोला—

“आप मेरी माँ का इलाज कर दीजिए… बदले में मैं 10 साल तक यहाँ झाड़ू-पोछा करूँगा। आपकी गाड़ी साफ करूँगा। जो कहेंगे, करूँगा। एक पैसा नहीं माँगूँगा। मैं 10 साल गुलाम बनने को तैयार हूँ… बस मेरी माँ को बचा लीजिए!”

पूरा कॉरिडोर सन्न।

एसी की सनसनाहट तक तेज़ लगने लगी।


अहंकार की दीवार

डॉ. अनिरुद्ध ने भुवन के हाथ में पकड़े गंदे ₹10 के नोट को देखा। फिर अपनी बेदाग शर्ट की आस्तीन झाड़ दी, जैसे बच्चे की परछाईं से भी उन्हें गंदगी लग रही हो।

“यहाँ ड्रामा मत करो,”
उनकी आवाज़ बर्फ जैसी ठंडी थी,
“यह अस्पताल है, फिल्म का सेट नहीं।
तुम्हारे ये दस रुपये यहाँ ओपीडी की पर्ची के भी नहीं हैं।
और दस साल गुलामी? ये सब फिल्मों में अच्छा लगता है।”

उन्होंने गार्ड की तरफ़ इशारा किया—
“इसे बाहर निकालो। और वो ठेला भी हटाओ।”

भुवन की आँखों में जलती आख़िरी उम्मीद बुझ गई।

दो गार्ड आगे बढ़े। एक ने उसकी पतली बाँह को कसकर पकड़ लिया। भुवन ने फर्श पकड़ने की कोशिश की, लेकिन चिकने संगमरमर पर उसकी उँगलियाँ फिसल गईं।

चर्रर…
नाखूनों के रगड़ने की आवाज़ किसी चीख जैसी गूंजी।

गार्ड उसे घसीटते हुए बाहर ले गए।
सीढ़ियों से धक्का…
और वह कीचड़ भरे पानी में जा गिरा।

बारिश और तेज़ हो गई।


माँ की खामोशी

भुवन लड़खड़ाते हुए उठा।
घुटनों से खून बह रहा था।

वह ठेले तक भागा।
लक्ष्मी का एक हाथ नीचे लटक रहा था।
वह खतरनाक रूप से शांत थी।

“माँ…”
उसने ठंडा गाल थपथपाया,
“आँखें खोलो…”

कोई जवाब नहीं।

उसने पूरी ताकत से माँ को उठाने की कोशिश की।
नन्हा शरीर जवाब दे गया।

वह वहीं माँ के सीने पर सिर रखकर फूट-फूट कर रो पड़ा—

“कोई तो मदद करो! मेरी माँ मर रही है!”

उसकी चीख बारिश और बादलों में दब गई।


कीचड़ में उतरा फरिश्ता

तभी अस्पताल के पोर्च में खड़ी एक काली Mercedes का शीशा नीचे सरका। अंदर बैठे एक बुज़ुर्ग यह सब देख चुके थे।

वे थे सेठ दीनानाथ—शहर के प्रसिद्ध दानवीर, और इस अस्पताल के ट्रस्टी।

कार का दरवाज़ा खुला। ड्राइवर छाता लेकर दौड़ा—
“साहब, कीचड़ है…”

लेकिन दीनानाथ ने नहीं सुना।
वे सीधे उसी कीचड़ में उतर गए।

उन्होंने झुककर भुवन के काँपते कंधे पर हाथ रखा।

“उठो बेटा,”
आवाज़ भारी थी, लेकिन पिता जैसी नरम,
“तुम्हारी माँ को कुछ नहीं होगा।”

उन्होंने गार्ड्स पर दहाड़ लगाई—
“खड़े क्या देख रहे हो? स्ट्रेचर लाओ!”

गार्ड्स के चेहरे उड़ गए।
“ट्रस्टी साहब!”


एक चेक, एक धमकी

अंदर हड़कंप मच गया।
डॉ. अनिरुद्ध कॉफी लिए बाहर आए—और ठिठक गए।

सेठ दीनानाथ उनके सामने खड़े थे।

उन्होंने चेकबुक निकाली।
एक खाली चेक फाड़ा।

फटाक!

“इलाज शुरू करो,”
धीमी लेकिन खतरनाक आवाज़,
“पैसा जितना भरना है भर लेना।
लेकिन अगर इस बच्चे की माँ को कुछ हुआ… तो यह अस्पताल कल सुबह नहीं देखेगा।”

डॉ. अनिरुद्ध का चेहरा सफेद पड़ गया।


सौदा

आईसीयू के बाहर दीनानाथ भुवन के पास बैठे।

“तुमने कहा था, 10 साल गुलामी करोगे?”
भुवन ने सिर हिलाया।

दीनानाथ मुस्कुराए।
“गुलामी नहीं बेटा…
तुम 10 साल किताबों की सेवा करोगे।”

“तुम डॉक्टर बनोगे।”

भुवन की आँखें फैल गईं।

“पढ़ाई का खर्च मेरा,”
दीनानाथ बोले,
“और बदले में—तुम सेवा करोगे।”

भुवन ने रोते हुए सिर झुका दिया—
“मंजूर है बाबूजी।”


10 साल बाद

वही बारिश।
वही अस्पताल।

लेकिन आज एक लंबी चमचमाती कार रुकी।

एक नौजवान उतरा—
नीला सूट, गले में स्टेथोस्कोप।

डॉ. भुवन।

वही कॉरिडोर, जहाँ कभी उसे घसीटा गया था।

आज सब झुके हुए थे।

डॉ. अनिरुद्ध फिर चिल्ला रहे थे एक गरीब पर।

भुवन रुका।

कागज़ उठाया।
सोने के पेन से लिखा—

ADMITTED.

तभी व्हीलचेयर पर सेठ दीनानाथ आए।

“मिलो,”
उन्होंने कहा,
“ये है इस अस्पताल का नया चेयरमैन—डॉ. भुवन।”

डॉ. अनिरुद्ध के पैरों तले दुनिया खिसक गई।


₹10 की कीमत

भुवन ने जेब से वही पुराना, लैमिनेट किया हुआ ₹10 का नोट निकाला।

“उस रात मेरे पास बस यही था,”
उसने कहा,
“और एक माँ।”

डॉ. अनिरुद्ध घुटनों पर गिर पड़े।

“माफ कर दो…”

भुवन ने उन्हें उठाया।

“माफी मुझसे नहीं—
उन मरीजों से माँगिए जिन्हें आपने लौटाया।”


नई शुरुआत

अस्पताल के बाहर नया बोर्ड लगा—

“यहाँ इलाज नोटों से नहीं, नियत से होता है।”

लक्ष्मी अपने बेटे का हाथ थामे खड़ी थी।

“तू जीत गया मेरे लाल…”

भुवन मुस्कुराया।

“नहीं माँ…
तुम्हारी दुआ जीत गई।”

बारिश फिर शुरू हो गई।

लेकिन आज—
वह किसी को तोड़ नहीं रही थी,
बल्कि ज़मीन को सींच रही थी।

क्योंकि असली अमीरी पैसों की नहीं—
दुआओं की होती है।