“पिता ICU में तड़प रहा था… मां बाप को लावारिस छोड़कर भागे बेटा बहु, अस्पताल में मचा बवाल!”
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स्वाभिमान की अग्नि: जब अपनों ने ही दिया दगा
अध्याय 1: अस्पताल की वह भयानक रात
पुणे के उस पॉश इलाके में स्थित ‘लाइफकेयर मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल’ की रोशनी नीलिमा की आँखों में चुभ रही थी। चारों तरफ मशीनें बीप कर रही थीं और सफेद कोट पहने डॉक्टर इधर-उधर भाग रहे थे। लेकिन नीलिमा के मन में जो कोहराम मचा था, वह अस्पताल के शोर से कहीं ज्यादा तेज था।
उसके पति, रमेश जी, ICU में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे। कल रात उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। नीलिमा को याद था कि कैसे वह बदहवास होकर अपने बेटे रवि और बहू स्वाति के कमरे का दरवाजा पीट रही थी। उनके चेहरे पर पिता के लिए चिंता नहीं, बल्कि आधी रात को नींद खराब होने का गुस्सा था। काफी मिन्नतों के बाद वे उन्हें अस्पताल लाने को तैयार हुए, लेकिन रवि उन्हें किसी सरकारी अस्पताल के बजाय इस महंगे प्राइवेट अस्पताल में ले आया।
नीलिमा को लगा था कि शायद बेटा बदल गया है, शायद वह अपने पिता को सर्वश्रेष्ठ इलाज देना चाहता है। लेकिन जैसे ही रमेश जी को भर्ती किया गया, रवि यह कहकर नीचे गया कि “बस दवाइयां लेकर आता हूँ,” और फिर कभी वापस नहीं लौटा।
दोपहर से शाम हो गई। अस्पताल का बिल लाखों में पहुँच चुका था। मैनेजमेंट के लोग नीलिमा को घेर कर खड़े थे। “देखिए माता जी, अगर अगले एक घंटे में 5 लाख का भुगतान नहीं हुआ, तो हमें पुलिस बुलानी पड़ेगी,” एक अधिकारी ने कड़ाई से कहा।
नीलिमा का सिर चकरा रहा था। पास में खड़े लोग फुसफुसा रहे थे— “देखो, कैसे लावारिस छोड़कर भाग गए बच्चे।” “पैसा है नहीं और आ जाते हैं बड़े अस्पतालों में।” उन तानों ने नीलिमा के कलेजे को छलनी कर दिया था।

तभी भीड़ में से डॉ. रघुवीर आगे आए। उन्होंने शांत स्वर में कहा, “इन बुजुर्गों को परेशान मत कीजिए। मैंने उस जोड़े को रात में भागते देखा था। इनका बिल मैं खुद भरूँगा।”
वह पल नीलिमा के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। लेकिन एक सवाल उसके सीने में खंजर की तरह गड़ा था— क्या एक माँ-बाप का मोल उनके बच्चों के लिए सिर्फ एक बिल की रकम जितना रह गया है?
अध्याय 2: खुशियों का वो पुराना बनारस
नीलिमा अक्सर यादों के गलियारों में खो जाती। उनकी जिंदगी हमेशा ऐसी नहीं थी। बनारस की तंग गलियों में उनका एक छोटा सा, लेकिन खुशहाल घर था। रमेश जी एक प्राइवेट स्कूल में मास्टर थे और शाम को LIC एजेंट का काम करते थे। नीलिमा एक साधारण गृहणी थी, जिसका पूरा संसार उसकी रसोई थी।
उनका इकलौता बेटा रवि उनकी आँखों का तारा था। उसे पढ़ाने के लिए रमेश जी ने अपनी पूरी जमापूंजी लगा दी। नीलिमा ने कभी नई साड़ी नहीं माँगी ताकि रवि की कॉलेज की फीस भरी जा सके। जब रवि की नौकरी पुणे की एक बड़ी IT कंपनी में लगी, तो पूरे मुहल्ले में मिठाइयां बांटी गईं।
“अजी सुनते हो, हमारा बेटा अब बड़ा आदमी बन गया है,” नीलिमा ने गर्व से कहा था। रवि ने पुणे में फ्लैट लिया, तो उसने जिद की कि माँ-बाप भी वहीं आ जाएं। बेटे के मोह में रमेश जी ने अपना पुश्तैनी घर बेच दिया और सारी रकम रवि के नए फ्लैट में लगा दी। उन्हें लगा कि बुढ़ापा अब बेटे की छाँव में सुकून से कटेगा।
अध्याय 3: बहू का आना और बदलते सुर
रवि ने स्वाति से प्रेम विवाह किया। स्वाति आधुनिक विचारों वाली, महत्वाकांक्षी लड़की थी। शुरुआत में सब ठीक रहा, लेकिन धीरे-धीरे दूरियां बढ़ने लगीं। स्वाति को नीलिमा का पहनावा ‘देहाती’ लगता था और रमेश जी का सादा जीवन ‘क्लासलेस’।
एक दिन रवि के प्रमोशन की पार्टी एक फाइव स्टार होटल में थी। नीलिमा ने बड़े चाव से अपनी सिल्क की साड़ी निकाली और रमेश जी ने अपना पसंदीदा कुर्ता-पजामा पहना। जब वे तैयार होकर बाहर आए, तो स्वाति खिलखिलाकर हंस पड़ी।
“मम्मी जी! आप इस हुलिए में वहां चलेंगी? वहां बड़े-बड़े लोग आएंगे, इंग्लिश में बात करेंगे। आप वहां चलेंगी तो हमारी बेइज्जती हो जाएगी। लोग कहेंगे कि रवि के माँ-बाप गवार हैं,” स्वाति के शब्द तेजाब की तरह थे।
रवि ने भी अपनी पत्नी का साथ दिया, “हाँ माँ, स्वाति सही कह रही है। आप घर पर ही रहिए, हम आपके लिए बाहर से खाना ले आएंगे।”
उस रात नीलिमा और रमेश जी ने बिना कुछ खाए आँसुओं का घूँट पिया। जिस बेटे को उन्होंने चलना सिखाया, आज उसे उनके साथ चलने में शर्म आ रही थी।
अध्याय 4: रसोई का हुनर और तानों का नमक
स्वाति अक्सर नीलिमा के खाने में कमियां निकालती। “इतना तेल कौन खाता है? बिल्कुल गवारों वाला खाना है।” जब नीलिमा YouTube से देखकर चाइनीज या इटालियन बनाती, तो ताना मिलता— “80 साल की उम्र में ये सब पचेगा क्या? सादा खाना बनाइये।”
रमेश जी को भी नहीं बख्शा जाता था। रवि अक्सर कहता, “पापा, आपने जिंदगी में किया ही क्या है? एक छोटे से स्कूल में मास्टर रहे। अगर थोड़े स्मार्ट होते तो आज हमारे पास भी बड़ा बैंक बैलेंस होता।”
अपमान का घड़ा तब भर गया जब रमेश जी एक बार बीमार पड़े और स्वाति ने कहा, “आप दोनों तो हम पर बोझ हैं। मर भी जाएं तो हमें फर्क नहीं पड़ता।”
अध्याय 5: शून्य से सृजन तक का सफर
अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद, नीलिमा और रमेश जी ने तय किया कि वे उस घर में वापस नहीं जाएंगे जहाँ उनकी कोई इज्जत नहीं थी। डॉ. रघुवीर की मदद से नीलिमा ने अपने हुनर को पहचान दी।
“बेटा, मुझे खाना बनाना आता है। क्या मुझे कहीं काम मिल सकता है?” नीलिमा ने हिचकिचाते हुए पूछा था।
डॉ. रघुवीर ने जब नीलिमा के हाथ के बने ‘छोले-पूरी’ खाए, तो वह दंग रह गया। उसने नीलिमा को अपने पिता के फाइव स्टार होटल में ‘स्पेशल नॉर्थ इंडियन शेफ’ के तौर पर काम दिलाया। शुरुआत में घबराहट हुई, लेकिन रमेश जी ने उसका हाथ थामे रखा। धीरे-धीरे ‘अम्मा की थाली’ उस होटल का सबसे मशहूर मेनू बन गया।
नीलिमा अब सिर्फ एक माँ नहीं थी, वह एक ‘शेफ’ थी। रमेश जी होटल के प्रशासनिक कार्यों में मदद करने लगे। उन्होंने अपना छोटा सा फ्लैट ले लिया। उनकी मेहनत ने उन्हें न केवल आर्थिक स्वतंत्रता दी, बल्कि खोया हुआ आत्मसम्मान भी लौटा दिया।
अध्याय 6: न्याय का चक्र
कुछ महीनों बाद, होटल में एक कॉर्पोरेट इवेंट था। नीलिमा को उनकी सफलता के लिए स्टेज पर सम्मानित किया जाना था। जब वह स्टेज पर चढ़ी, तो सामने की टेबल पर रवि और स्वाति बैठे थे। उनके हाथों से कांटे और छुरी गिर गए। वे अपनी आँखों पर यकीन नहीं कर पा रहे थे कि जिस माँ को वे ‘देहाती’ कहकर घर छोड़ आए थे, आज पूरा शहर उसके लिए तालियां बजा रहा था।
कार्यक्रम के बाद रवि और स्वाति उनके पास आए। स्वाति ने झूठी ममता दिखाते हुए कहा, “माँ! हम तो आपको ढूंढ रहे थे। चलिए घर चलिए।”
रमेश जी ने कड़क कर कहा, “हमारा घर अब स्वाभिमान की जमीन पर है, तुम्हारे एहसानों की छत पर नहीं।”
तभी नीलिमा स्वाति को होटल के पिछले हिस्से (वाशिंग एरिया) में ले गई। वहां एक बुजुर्ग दस्ताने पहने बर्तन धो रहे थे। जैसे ही वह मुड़े, स्वाति के पैर तले जमीन खिसक गई।
वह उसके अपने पिता, नरेंद्र जी थे!
स्वाति के भाई ने उन्हें धोखा देकर उनकी जायदाद हड़प ली थी और वे सड़क पर आ गए थे। नीलिमा और रमेश जी ने ही उन्हें सहारा दिया और इस होटल में काम दिलवाया।
नरेंद्र जी ने रोती हुई स्वाति से कहा, “बेटी, तू मुझे क्या ले जाएगी? तूने तो अपने सास-ससुर को लावारिस छोड़ दिया था। आज मैं इन फरिश्तों (नीलिमा और रमेश) की वजह से जिंदा हूँ। अपनी मेहनत की रोटी में जो स्वाद है, वह तेरे महलों में नहीं।”
रवि और स्वाति सिर झुकाए खड़े थे। उनके पास न शब्द थे, न माफी का हक। नीलिमा ने रमेश जी का हाथ पकड़ा और सिर उठाकर अपने नए जीवन की ओर बढ़ गई।
सीख (Moral of the Story):
बुढ़ापा लाचारी नहीं होता, अगर इंसान के पास अपना हुनर और आत्मसम्मान हो। बच्चे अगर साथ छोड़ दें, तो जिंदगी खत्म नहीं होती, बल्कि एक नए संघर्ष और जीत की शुरुआत होती है।
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