कुली समझकर सबने ठुकराया… जब सच सामने आया तो इंसानियत भी कांप गई…

औकात की दीवारें

रेलवे स्टेशन पर सुबह का समय था। भीड़ सामान्य से कहीं ज्यादा थी। हर कोई अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त, किसी को ट्रेन पकड़ने की जल्दी थी, कोई किसी को छोड़ने आया था, और कोई बस यूं ही वक्त काट रहा था। उसी भीड़ में अचानक एक लड़की तेज़ी से भागती हुई आई। लाल रंग की फ्रॉक, खुले बाल, आंखों में घबराहट और चेहरे पर मजबूरी। उसकी उम्र मुश्किल से बीस-बाईस साल रही होगी। वह बार-बार पीछे मुड़कर देख रही थी, जैसे कोई उसका पीछा कर रहा हो।

अचानक वह एक कुली से टकरा गई। कुली की उम्र लगभग पच्चीस-छब्बीस साल होगी। साधारण सा पहनावा, कंधे पर लाल कपड़े का थैला, चेहरे पर मेहनत की थकान और आंखों में सादगी। टक्कर इतनी ज़ोरदार थी कि दोनों लड़खड़ा गए। कुली ने गुस्से में कहा, “देखकर नहीं चल सकती क्या?”

लड़की ने घबराई हुई आंखों से उसकी तरफ देखा। कुछ सेकंड तक वह कुछ नहीं बोली। फिर अचानक उसने बोला, “मुझसे शादी कर लो।” प्लेटफार्म पर सन्नाटा छा गया। कुली के हाथ से सामान गिर गया। उसकी आंखें फैल गईं। दिल जैसे एक पल के लिए धड़कना भूल गया। “क्या कहा तुमने?” उसकी आवाज कांप रही थी।

लड़की ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया। अब उसकी आंखों में डर से ज्यादा जिद थी। “हां, मुझसे शादी कर लो। अभी इसी वक्त।” आसपास खड़े लोग रुक गए। कोई मुस्कुरा रहा था, कोई हंस रहा था, कोई वीडियो बनाने लगा। कुली ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की, “पागल हो गई हो क्या? मुझे नहीं पता तुम कौन हो।”

लड़की की सांसें तेज थीं। “मुझे भी नहीं पता तुम कौन हो। लेकिन अभी तुम ही मेरी जिंदगी हो।”

इतने में प्लेटफार्म के दूसरे सिरे से चार बॉडीगार्ड तेजी से आते दिखाई दिए। काले कपड़े, आंखों पर चश्मा और चेहरे पर सख्ती। उनके साथ एक लड़का था, महंगे कपड़े, महंगी घड़ी और आंखों में अहंकार। बॉडीगार्ड ने आते ही कुली की कॉलर पकड़ ली। एक बॉडीगार्ड ने उसकी गर्दन पर पिस्तौल टिका दी। “छोड़ दो मैडम को।” धमकी साफ थी। कुली की सांस रुक गई। उसने जिंदगी में पहली बार इतनी नजदीक से मौत को देखा था।

और तभी लड़की चीख पड़ी, “रुक जाओ!” पूरा प्लेटफार्म शांत हो गया। वो लड़की आगे बढ़ी, कुली के सामने खड़ी हो गई और बोली, “यह मेरा पति होने वाला है।” बॉडीगार्ड्स के साथ आया लड़का गुस्से से लाल हो गया। “क्या बकवास कर रही हो तुम?”

लड़की की आवाज अब शांत थी, लेकिन बेहद मजबूत। “अब मेरी जिंदगी में तुम्हारा कोई हक नहीं है। यह मेरा होने वाला पति है।”

लड़के की मुट्ठियां भींच गईं। “तुम एक कुली से शादी करोगी?”

लड़की ने बिना झिझक जवाब दिया, “हां, कम से कम यह इंसान है।”

कुछ पल तक दोनों के बीच तीखी बातचीत हुई। फिर पुलिस बुला ली गई। भीड़ को प्लेटफार्म से बाहर निकाला गया। स्टेशन के बाहर काले रंग की लग्जरी गाड़ियों का काफिला आकर रुका। हर गाड़ी से सुरक्षा गार्ड उतरे। फिर बीच वाली गाड़ी का दरवाजा खुला। एक रोबीला आदमी बाहर निकला। सफेद बाल, सख्त चेहरा, आंखों में रुतबा। लड़की का पिता।

उसने आते ही लड़की का हाथ पकड़ा। “बस बहुत हो गया। अब घर चलो।” लड़की ने पीछे मुड़कर उस कुली की तरफ देखा। उसकी आंखों में डर भी था और उम्मीद भी। “इन्हें भी साथ ले चलिए,” लड़की ने कहा। “क्या?” पिता चौंक गए।

“मैं इनसे शादी करूंगी।” लड़की की आवाज कांप रही थी, लेकिन इरादा अटल था। इज्जत, समाज और बदनामी सब कुछ दांव पर लग गया। और उसी दिन बिना खुशी, बिना रजामंदी, बिना किसी की दुआ के शादी हो गई।

शादी के बाद का जीवन

कुली लड़का अचानक एक ऐसी दुनिया में आ गया जहां फर्श संगमरमर के थे, खाना सोने की प्लेट में परोसा जाता था, और इंसानों को उनकी औकात से तोला जाता था। लेकिन इस घर में उसे इंसान नहीं समझा गया। डाइनिंग टेबल पर उसे कभी बैठने नहीं दिया गया। कभी कहा गया, “तुम स्टेशन पर खुले में खाते थे ना। नीचे बैठकर खाने की आदत होगी।”

वह चुप रहता। कभी कोई भाई हंसता, कभी कोई बहन मजाक उड़ाती, “कुली जी आज बोझ नहीं उठाओगे?” वह सब सहता रहा।

एक दिन उसने हिम्मत जुटाई और कुछ कहने की कोशिश की। लेकिन तभी लड़की के दादा की आवाज गूंजी, “बस यह इस घर का दामाद है। इसे नीची नजर से देखना बंद करो।” कमरे में सन्नाटा छा गया। लेकिन ताने रुके नहीं।

दादाजी की आवाज भारी थी। कमरे में बैठे हर इंसान पर जैसे किसी ने पत्थर रख दिया हो। कुछ पल के लिए सच में सन्नाटा छा गया। लेकिन सन्नाटा हमेशा के लिए नहीं होता। दादाजी के कमरे से बाहर जाते ही घर की दीवारों में फिर वही फुसफुसाहटें लौट आईं। कोई खुलकर नहीं बोल रहा था, लेकिन हर नजर कुछ कह रही थी।

डाइनिंग हॉल में चांदी की प्लेटें सजी थी। टेबल पर तरह-तरह के व्यंजन रखे थे। वह लड़का चुपचाप एक कोने में खड़ा था। लड़की ने हल्के से कहा, “आप यहां बैठ जाइए।” लेकिन उसकी मां ने तुरंत टोक दिया, “रहने दो। इन्हें इसकी आदत नहीं होगी। स्टेशन पर ही खाते-पीते रहे होंगे।”

हंसी की एक हल्की सी लहर उठी। भाई ने चुटकी ली, “हां भाभी नीचे बैठकर खाने की आदत होगी। यहां कुर्सी पर बैठकर असहज महसूस करेंगे।” लड़की की उंगलियां कांप गईं। उसने पति की तरफ देखा। वह लड़का मुस्कुराया, लेकिन उस मुस्कान में कोई खुशी नहीं थी। वह मुस्कान थी अपमान को पी जाने की। वह चुपचाप नीचे बैठ गया।

लड़की का दिल जैसे फटने लगा। उस रात पहली बार वह रोई। कमरे में अकेले खिड़की के पास खड़ी होकर उसने सोचा था कि शादी के बाद हालात बदल जाएंगे। लेकिन यहां तो उसके पति को इंसान से ज्यादा बोझ समझा जा रहा था।

रोज़ का अपमान

वह लड़का हर सुबह समय पर उठता, नहाता, साफ कपड़े पहनता और फिर कुछ नहीं करता। कोई काम नहीं, कोई जिम्मेदारी नहीं। घर वाले यही कहते, “इसे क्या काम देंगे? कुली है, बोझ उठाने के अलावा क्या करेगा?”

एक दिन छोटी बहन ने हंसते-हंसते कहा, “भैया जरा मेरा सूट उठाकर ऊपर रख दो। आप तो प्रोफेशनल हो।” हंसी फिर गूंजी। लड़का चुपचाप सूट उठा लेता है।

उसी रात लड़की ने पहली बार उससे पूछा, “आप बुरा नहीं मानते?”

वह कुछ सेकंड चुप रहा। फिर बोला, “मानने से क्या बदल जाएगा?” उसकी आवाज में शिकायत नहीं थी, बस थकान थी।

दिन बीतते गए। घर में एक नियम सा बन गया था। वह लड़का दिखेगा लेकिन गिना नहीं जाएगा। उसे किसी फैसले में शामिल नहीं किया जाता। कोई उसकी राय नहीं पूछता। कोई उससे सीधे बात नहीं करता, सिवाय उस लड़की के। वह हर रात उसके लिए खाना अपने हाथ से लाती। धीरे से पूछती, “आज कैसा लगा?” और वह हर बार एक ही जवाब देता, “ठीक है।”

लेकिन ठीक है, असल में ठीक नहीं था।

पार्टी में अपमान

एक शाम घर में पार्टी थी। बड़े लोग आए हुए थे। महंगे सूट, महंगी साड़ियां और उससे भी महंगा घमंड। एक मेहमान ने मजाक में पूछा, “तो दामाद जी क्या करते हैं?” कमरा शांत हो गया। मां ने जल्दी से जवाब दिया, “अभी कुछ नहीं। थोड़ा एडजस्ट कर रहे हैं।” दूसरा हंस पड़ा, “अरे- अरे मतलब स्टेशन से सीधे बंगले में।” सब हंसने लगे।

लड़का चुप रहा। लेकिन इस बार लड़की खड़ी हो गई। “वह मेरे पति हैं।” उसकी आवाज कांप रही थी। मेहमान ने कंधे उचका दिए, “अरे बेटा, मजाक कर रहे हैं।”

मजाक जो रोज उसकी रूह पर चोट कर रहा था।

उस रात लड़का छत पर अकेला बैठा था। आसमान में तारे थे और आंखों में एक पुराना सपना। उसने मोबाइल निकाला। एक मैसेज पढ़ा, फिर दूसरा। उसकी उंगलियां कांप रही थी। लेकिन उसने फोन बंद कर दिया। नीचे से किसी के हंसने की आवाज आ रही थी। उसे लगा जैसे यह घर उसका नहीं है।

ऑफिस का पहला दिन

एक दिन लड़की के पिता ने सबके सामने कहा, “कल से यह भी मेरे साथ ऑफिस आएगा। देखते हैं, वहां क्या कर सकता है।” भाई ने फौरन कहा, “पापा ऑफिस कोई स्टेशन नहीं है।” फिर हंसी, लेकिन पिता चुप रहे।

अगले दिन वह लड़का पहली बार एक महंगी गाड़ी में बैठा। ऑफिस पहुंचा। लोग उसे देखकर अजीब नजर से देख रहे थे। कोई पहचान नहीं, कोई सम्मान नहीं। लेकिन वह सब देख रहा था, समझ रहा था। मीटिंग रूम में बैठकर वह हर बात ध्यान से सुनता रहा। किसी ने उसकी तरफ देखा भी नहीं।

मीटिंग खत्म हुई। सब बाहर चले गए। वह अकेला बैठा रहा। टेबल पर रखे पेपर्स को देखा, फाइल्स पलटीं, कुछ नोट्स बनाए। उसकी आंखों में अचानक चमक आ गई, जैसे कोई सोया हुआ शेर जाग रहा हो।

उसी शाम घर में फिर वही ताने, “तो ऑफिस कैसा लगा?” भाई ने चुटकी ली, “कुर्सी भारी तो नहीं लगी?”

लड़का मुस्कुराया, “नहीं, बस इतना ही बोला।” उसकी आवाज में न गुस्सा था, न शिकायत। ऐसा लगा जैसे वो सवाल ही उस तक पहुंचा नहीं।

भाई ने उसकी तरफ देखा, फिर हल्की हंसी-हंसी, “अरे यार, आदत नहीं होगी ना। जिंदगी भर तो बोझ उठाया है।” घर फिर हंसी से भर गया।

लेकिन इस बार लड़की नहीं हंसी। उसने देखा उसका पति चुपचाप उठकर अपने कमरे की तरफ चला गया। उस रात वह देर तक सो नहीं पाया। कमरे की लाइट बंद थी। खिड़की से आती हल्की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी। उसकी आंखें छत पर टिकी थी, लेकिन दिमाग कहीं और था। स्टेशन की वह सुबह, लड़की का कांपता हुआ हाथ और फिर यह घर, जहां हर दिन उसका आत्मसम्मान धीरे-धीरे मर रहा था।

मोबाइल फिर उसके हाथ में आया। एक नाम स्क्रीन पर चमका। उसने फोन उठाया, फिर कुछ सेकंड बाद काट दिया। उसने खुद से कहा, “अभी नहीं।”

बदलाव की शुरुआत

अगली सुबह घर में हलचल थी। लड़की की मां की आवाज गूंजी, “आज पार्टी है। सब लोग समय पर तैयार रहना।” पार्टी एक और मौका, उसके मजाक उड़ने का।

लड़की उसके पास आई, धीरे से बोली, “अगर आप चाहे तो ना आए।” वह पहली बार उसकी आंखों में सीधा देखकर बोला, “मैं आऊंगा।” उसकी आवाज शांत थी, लेकिन आंखों में कुछ अलग था।

शाम को पूरा घर रोशनी से जगमगा रहा था। मेहमान ऊंची हंसी और चमकदार बातें कर रहे थे। वह लड़का साधारण कपड़ों में आया, न कोई दिखावा, न कोई बनावट। कुछ लोग उसे देखकर रुक गए। फिर धीरे-धीरे फुसफुसाहटें शुरू हुईं, “यही है वो। हां, स्टेशन वाला। बेचारी लड़की।”

लड़की का हाथ उसके हाथ में था। लेकिन वह महसूस कर सकता था, लोग उसकी नहीं, उसकी औकात देख रहे थे।

एक मेहमान ने पूछा, “तो दामाद जी अब क्या कर रहे हैं?” सबकी नजरें उस पर टिक गईं। उसने एक पल सोचा, फिर बोला, “सीख रहा हूं।” मेहमान हंसा, “अच्छी बात है। सीखते रहिए।”

सीख, वह सीख रहा था कि इंसान की कदर उसके काम से नहीं, उसकी कुर्सी से की जाती है।

उसी पार्टी में एक बड़ा उद्योगपति आया। घर के लोग उसके पीछे-पीछे घूम रहे थे। वह आदमी अचानक रुक गया। उसकी नजर उस लड़के पर पड़ी। वह एक पल के लिए ठिटका। फिर धीरे-धीरे उसके चेहरे पर हैरानी आ गई। “आप?” उस उद्योगपति ने कहा।

कमरा अचानक शांत हो गया। घर वालों ने देखा, वह आदमी उसे पहचानता है। लड़के ने हल्की सी मुस्कान दी, “जी, आप यहां?” उसकी आवाज में सवाल था।

लड़के ने चारों तरफ देखा, फिर बोला, “यह मेरा घर है।” घर वालों के चेहरों पर अजीब सा भाव आ गया। उद्योगपति कुछ कहना चाहता था, लेकिन लड़के ने हल्के से सिर हिला दिया। वह समझ गया, “ओह अच्छा, फिर कभी बात करेंगे।” और आगे बढ़ गया।

जैसे ही वह गया, भाई ने झुंझलाकर कहा, “अरे तुम्हें वह जानता कैसे है?” लड़के ने जवाब नहीं दिया। लेकिन लड़की ने सब देख लिया था।

सच का खुलासा

उस रात लड़की ने उससे सीधे पूछा, “आप सच में कौन हैं?” वह देर तक चुप रहा। फिर बोला, “अगर मैं सच बता दूं, तो क्या तुम वही रहोगी जो स्टेशन पर थी?” लड़की की आंखों में पानी आ गया, “मैं आज भी वहीं हूं।”

उसने पहली बार गहरी सांस ली, “फिर थोड़ा और इंतजार करो।”

दिन बीतते गए। घर में अपमान जारी रहा। लेकिन अब कुछ चीजें बदलने लगी थीं। पिता धीरे-धीरे उसकी राय सुनने लगे। ऑफिस में लोग उसकी बात नोटिस करने लगे।

एक दिन पिता ने फाइलें मेज पर पटक दीं, “कोई हल नहीं मिल रहा।” लड़का चुपचाप आगे आया, “अगर आप चाहें तो मैं देख सकता हूं।” भाई हंस पड़ा, “तू?” लेकिन पिता ने कहा, “देखने दो।”

उसने फाइल पढ़ी, कुछ मिनट सोचा, फिर बोला, “यहां गलती है।” सब चुप हो गए। उसने समाधान बताया। कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया। पिता ने फाइल बंद की, धीरे से कहा, “यह काम कर सकता है।”

पहली बार किसी ने उसकी काबिलियत देखी। लेकिन फिर भी घर का व्यवहार नहीं बदला।

एक दिन भाई ने ताना मारा, “लगता है अब कुली से क्लर्क बन जाएगा।” लड़का मुस्कुराया। उस रात उसने फोन उठाया। इस बार कॉल काटी नहीं। “हां,” उसने कहा। दूसरी तरफ से आवाज आई, “अब वक्त आ गया है।” उसने आंखें बंद कर ली, “हां, अब वक्त आ गया है।”

फोन कट गया। कमरे में एक अजीब सी शांति थी, जैसे तूफान से पहले की खामोशी। वह देर तक वहीं बैठा रहा। फिर उठा, खिड़की खोली और बाहर देखा। यह वही घर था जहां उसे हर दिन नीची नजर से देखा गया, जहां उसकी चुप्पी को उसकी कमजोरी समझा गया, जहां उसकी सादगी का मजाक उड़ाया गया। लेकिन अब उसकी चुप्पी टूटने वाली थी।

असली पहचान

अगली सुबह घर में रोज की तरह हलचल थी। नाश्ते की मेज सजी थी। वह समय पर आया, साफ कपड़े, शांत चेहरा। मां ने देखा, फिर अनदेखा कर दिया। भाई मोबाइल में व्यस्त था। बहन ने हल्की सी हंसी फेंकी, “आज जल्दी तैयार हो गए।”

भाई ने ताना मारा, “हां, आज थोड़ा जरूरी काम है।” “कुली को भी जरूरी काम!” भाई हंसा। वह कुछ नहीं बोला। लेकिन लड़की ने देखा, आज उसकी आंखों में वो पुरानी थकान नहीं थी। आज वहां एक फैसला था।

ऑफिस में आज माहौल अलग था। रिसेप्शन पर खड़े लोग उसकी तरफ ज्यादा ध्यान से देख रहे थे। वह सीधे मीटिंग रूम में गया। कुछ ही देर में एक के बाद एक बड़े लोग आने लगे। पिता हैरान थे, “आज यह सब क्यों बुलाए गए हैं?” उन्होंने सेक्रेटरी से पूछा।

“सर, यह मीटिंग…” सेक्रेटरी रुकी, “दामाद जी ने बुलवाई है।” पिता चौंक गए।

मीटिंग शुरू हुई। वह चुपचाप खड़ा था। एक प्रेजेंटेशन स्क्रीन पर चला। पहली स्लाइड कंपनी का नाम। दूसरी स्लाइड भविष्य की योजना। तीसरी स्लाइड वो मॉडल जिस पर महीनों से काम अटका था। कमरे में सन्नाटा छा गया। “यह वही हल था जो किसी से नहीं निकल पा रहा था।”

पिता की आंखें फैल गईं, “ये किसने बनाया?” वह आगे बढ़ा, शांत आवाज में बोला, “मैंने।”

कमरे में बैठे लोग एक दूसरे का चेहरा देखने लगे। भाई का चेहरा उतर गया, “तुम?” उसने अविश्वास से कहा। वह मुस्कुराया, “हां।”

मीटिंग खत्म होते-होते सबकी राय बदल चुकी थी। एक सीनियर डायरेक्टर ने कहा, “अगर यह लागू हुआ, तो कंपनी कई साल आगे निकल जाएगी।” पिता कुर्सी पर बैठ गए। उन्हें पहली बार एहसास हुआ, यह लड़का सिर्फ स्टेशन का कुली नहीं हो सकता।

सच का सामना

शाम को घर में एक अजीब सी बेचैनी थी। पिता बार-बार सोच में डूब रहे थे। भाई चुप था। बहनें फुसफुसा रही थीं। लड़की अपने कमरे में बैठी थी। उसका दिल तेज़ धड़क रहा था।

दरवाजा खुला, वह अंदर आया, “आज सब ठीक रहा?” उसने पूछा। लड़की ने सिर हिलाया, “आपने कुछ छुपाया है।”

वह कुर्सी पर बैठ गया, धीरे से बोला, “मैंने छुपाया नहीं, मैंने बस इंतजार किया।”

“किस बात का?” उसकी आवाज भर आई।

“इस बात का कि लोग मुझे मेरे नाम से नहीं, मेरे काम से पहचाने।”

उसी वक्त नीचे शोर मच गया। एक के बाद एक काली गाड़ियां आकर रुकीं। घर के बाहर सूट-बूट में लोग उतरे। भाई ने एक खिड़की से देखा, “यह सब कौन है?”

पिता भी बाहर आए। तभी एक आदमी आगे बढ़ा, हाथ जोड़कर बोला, “सर, हम आपसे मिलने आए हैं।”

“किस सिलसिले में?” पिता ने पूछा।

आदमी ने नजर उठाई, सीधे उस लड़के की तरफ, “हम अपने सीईओ से मिलने आए हैं।”

पूरा घर जैसे जम गया, “कौन?” मां के मुंह से निकला।

आदमी ने साफ शब्दों में कहा, “यही।”

घर की दीवारें जैसे हिल गईं। भाई के हाथ से मोबाइल गिर पड़ा। बहनों की हंसी गले में अटक गई। मां की आंखों में डर आ गया। पिता ने कांपती आवाज में पूछा, “ये क्या कह रहे हो?”

वह आगे आया, आज पहली बार उसने सिर झुका कर नहीं, सीधा खड़े होकर बात की, “हां, मैं ही हूं।”

सन्नाटा।

वह आगे बोला, “मैंने कभी झूठ नहीं बोला। मैंने बस अपनी पहचान नहीं बताई।”

“क्यों?” पिता की आवाज टूट रही थी।

उसने घर की तरफ देखा, एक-एक चेहरा, “क्योंकि मैं जानना चाहता था कि इंसान को उसकी औकात से तोला जाता है या उसके दिल से।”

उसकी नजर लड़की पर गई, “और क्योंकि एक लड़की ने मुझे स्टेशन पर मेरी औकात नहीं, मेरी इंसानियत देखी थी।”

लड़की की आंखों से आंसू बहने लगे। घर में किसी के पास कोई जवाब नहीं था। जिस घर में हर दिन ताने गूंजते थे, आज वहां सिर्फ खामोशी थी। वह खामोशी जो शब्दों से ज्यादा भारी होती है।

पिता कुर्सी पर धीरे-धीरे बैठ गए। उनके चेहरे से रुतबा गायब हो चुका था। आज पहली बार वे एक पिता नहीं, एक इंसान लग रहे थे जो हार चुका था। उनकी आवाज कांप रही थी, “तुम सब कुछ होते हुए भी चुप रहे?”

वह लड़का उनके सामने खड़ा था, आज भी उतना ही सादा जितना स्टेशन पर था, “हां, क्योंकि मैं जानना चाहता था कि अगर मेरे पास कुछ ना हो, तो क्या मैं तभी इंसान रहूंगा?”

मां की आंखों से आंसू गिर पड़े, “हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई।” वह बुदबुदाई।

लड़का कुछ नहीं बोला, क्योंकि कुछ गलतियां माफी से भी बड़ी होती हैं।

भाई आगे आया, जिसने सबसे ज्यादा मजाक उड़ाया था, “मैं… माफ कर दो।” लड़के ने उसकी तरफ देखा, कोई गुस्सा नहीं, कोई अहंकार नहीं, बस एक थकी हुई शांति, “माफी तब मायने रखती है जब इंसान बदल जाए।”

बहनें सिर झुकाए खड़ी थीं। वे वही थीं जो कभी हंसती थीं, आज उन्हें अपनी हंसी से डर लग रहा था।

लड़की अब तक चुप थी। वह धीरे-धीरे आगे आई, उसके आंसू थम नहीं रहे थे, “आपने… मुझे सब कुछ बता सकते थे।” वह मुस्कुराया, “अगर बता देता, तो तुम्हें कभी पता नहीं चलता कि लोग तुम्हारे पति को किस नजर से देखते हैं।”

लड़की रो पड़ी, “मैं आपको बचा नहीं पाई।” उसने उसके हाथ पकड़ लिए।

“तुमने मुझे बचाया था,” उसने कहा, “उसी दिन स्टेशन पर।”

पूरा घर उस पल को देख रहा था। एक ऐसा पल, जहां पैसा, रुतबा और घमंड सब हार चुके थे।

नई शुरुआत

कुछ दिन बाद घर बदल चुका था। डाइनिंग टेबल वही थी, लेकिन अब वह लड़का सबके साथ बैठता था। कुर्सी अब भारी नहीं लगती थी। मां खुद खाना परोसती थी। पिता हर फैसले में उसकी राय पूछते थे। लेकिन वह अब भी वही था, सादा, शांत इंसान।

एक दिन पिता ने पूछा, “तुमने यह सब क्यों किया?”

वह खिड़की से बाहर देखता रहा, फिर बोला, “क्योंकि अगर मैं उसी दिन अपनी पहचान बता देता, तो लोग मुझसे नहीं, मेरे नाम से डरते। और मैं डर नहीं, सम्मान चाहता था।”

उस दिन उस घर ने सीखा, सम्मान खरीदा नहीं जाता, वह दिया जाता है।

कुछ हफ्तों बाद वह स्टेशन फिर आया। वही प्लेटफार्म, वही भीड़। आज कोई उसे नहीं जानता था, और उसे इसकी जरूरत भी नहीं थी। एक बूढ़ा कुली भारी सामान उठाने की कोशिश कर रहा था। वह आगे बढ़ा, सामान उठाया। बूढ़े ने कहा, “बेटा, तू भी कुली है?” वह मुस्कुराया, “हां, कुली होना शर्म की बात नहीं। शर्म की बात है किसी इंसान को उसके काम से छोटा समझना।”

घर लौटते वक्त लड़की ने पूछा, “अगर आज भी सब कुछ छोड़ना पड़े तो?”

वह बिना सोचे बोला, “तो भी मैं वहीं रहूंगा, जो तुम्हें स्टेशन पर मिला था।” लड़की ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया, क्योंकि अब वह जान चुकी थी, असली अमीरी बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि उस इंसान में होती है जो हालात बदल जाने पर भी ना बदले।

समाप्ति

किसी इंसान की कीमत उसकी नौकरी, कपड़े या कुर्सी से मत आंको। क्योंकि वक्त जब पलटता है, तो सबसे ज्यादा शर्म नीची नजर से देखने वालों को आती है।

कहानी यहीं खत्म नहीं होती, बल्कि हर उस दिल में शुरू होती है, जो किसी को उसकी औकात नहीं, उसकी इंसानियत से देखता है।

अगर यह कहानी आपके दिल को छू गई हो, तो अपने विचार जरूर साझा करें। क्या आप भी मानते हैं कि सम्मान इंसान से मिलना चाहिए, उसकी हैसियत से नहीं?