शीर्षक: ऋण: एक अधूरी इबारत और अंतहीन पश्चाताप

नागपुर की वह हृदयहीन सुबह और सीतामढ़ी का कोलाहल नागपुर की सुबह उस दिन भी वैसी ही थी जैसी हर रोज होती है—सड़कों पर दौड़ती बसें, सिग्नल पर रुकती गाड़ियां, ऑटो वालों की चीख-पुकार और फुटपाथ पर रेंगती हुई बेनाम जिंदगियां। शहर का दिल माना जाने वाला सीतामढ़ी का चौराहा अपनी धड़कन के साथ-साथ एक अजीब सी बेपरवाही भी समेटे रहता है। यहाँ हर घंटे हजारों लोग गुजरते हैं, मगर कोई किसी के लिए ठहरता नहीं; जैसे किसी और की मजबूरी देखने मात्र से उनकी अपनी रफ्तार धीमी पड़ जाएगी। इसी चौराहे के एक कोने पर, जहाँ फुटपाथ सड़क से थोड़ा नीचे उतरता है, कमला नाम की एक औरत बैठी थी। उम्र लगभग 50 के आसपास, लेकिन चेहरे पर उम्र से कहीं ज्यादा वर्षों की थकान और झुर्रियां अंकित थीं। उसके सामने एक पुरानी फटी हुई प्लास्टिक की चादर पर आलू, प्याज, टमाटर और थोड़ी सी हरी मिर्च सजी थी। यह कोई भव्य दुकान नहीं थी, बल्कि उसकी सांसों को चलाने का आखिरी सहारा थी। कमला अन्य सब्जी वालों की तरह चिल्लाकर ग्राहक नहीं बुलाती थी; वह बस चुपचाप बैठी रहती, मानो उसके भीतर की कोई बहुत पुरानी आवाज कहीं खो गई हो।

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प्रशासनिक वज्रपात और एक दबे हुए नाम का विस्फोट तभी चौराहे के दूसरे सिरे पर हलचल हुई और तीन सफेद चमचमाती सरकारी गाड़ियां पुलिस की नीली बत्ती वाली जीप के साथ आकर रुकीं। भीड़ में एक सिहरन दौड़ गई—”डीएम साहब आए हैं।” जिला अधिकारी अजय प्रताप सिंह, जिनके चेहरे पर पद की गरिमा और आंखों में अनुशासन की बर्फीली सख्ती थी, गाड़ी से उतरे। उनके एक इशारे पर नगर निगम के कर्मचारी यमदूतों की तरह सक्रिय हो गए और गरीब दुकानदारों का सामान लात मारकर हटाने लगे। जब एक कर्मचारी कमला की चादर खींचने बढ़ा, तो कमला ने पहली बार अपनी सूखी आवाज में कहा, “साहब, 10 मिनट दे दो।” लेकिन सत्ता के अहंकार में विनती का कोई मोल नहीं था; चादर झटके से खींची गई और कमला की उम्मीदें यानी उसकी सब्जियां कीचड़ और धूल में मिल गईं। उसी पल, अजय प्रताप सिंह की नजर उस झुककर टमाटर समेटती औरत पर पड़ी। वह नजर केवल एक अधिकारी की नहीं थी, बल्कि उसमें एक बिजली सी कौंधी। जैसे किसी बहुत पुराने जख्म की पट्टी अचानक खुल गई हो। अजय के कदम पत्थर की तरह जम गए जब कमला के कांपते होंठों से एक वर्जित शब्द निकला—”अजय!”

अतीत का महासागर और एक गुमनाम बलिदान की गाथा अजय प्रताप सिंह के लिए अपना नाम एक सड़क छाप सब्जी वाली के मुंह से सुनना किसी अपमान से कम नहीं होना चाहिए था, लेकिन उनका गला रुंध गया। जब उन्होंने पास जाकर पूछा, “तुमने मुझे कैसे पहचाना?”, तो कमला की पथराई आंखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला। उसने सिसकते हुए कहा, “मैंने ही तो तुझे बोलना सिखाया था बेटा… तू बिल्कुल वैसा ही है जैसे उस दिन था जब तेरे मामा तुझे ले गए थे।” और फिर वह सच्चाई सामने आई जिसने उस पूरे चौराहे को स्तब्ध कर दिया। अजय की सगी मां की मौत के बाद, उसके पिता के जाने के बाद, यह कमला ही थी जिसने तीन साल तक इस अनाथ बच्चे को अपनी सूखी रोटी में से हिस्सा दिया था। कमला ने दूसरों के घरों में बर्तन मांजकर अजय की स्कूल की फीस भरी थी, उसके फटे जूतों को सिला था और रात-रात भर बुखार में उसे अपनी गोद में लेकर बैठी रही थी। वह अजय के लिए केवल एक पड़ोसन नहीं, बल्कि वह फरिश्ता थी जिसने उसे अंधेरे में डूबने से बचाया था। अजय को अचानक वे धुंधली सुबहें याद आने लगीं जब कोई उसे आधा परांठा टिफिन में बांधकर देता था।

कर्तव्य की बेड़ियाँ और ममता का मौन साक्षात्कार अजय प्रताप सिंह अब डीएम नहीं, बल्कि उस कर्ज के नीचे दबे एक इंसान थे जिसे चुकाना नामुमकिन था। उन्होंने तुरंत नगर निगम के अभियान को रोकने का आदेश दिया, जिससे वहां मौजूद अफसर हैरान रह गए। अजय कमला को अपनी गाड़ी में बिठाकर सीधे सरकारी अस्पताल ले गए। अस्पताल की सफेद दीवारों के बीच कमला का मैला आंचल और अजय की सफेद कमीज एक अजीब कंट्रास्ट पैदा कर रहे थे। डॉक्टर की रिपोर्ट ने अजय के कलेजे को चीर दिया—कमला के शरीर में खून की भारी कमी थी, हड्डियां घिस चुकी थीं और दिल कमजोर पड़ रहा था। यह कोई बीमारी नहीं थी, यह उस बलिदान का नतीजा था जो उसने एक पराए बच्चे को ‘अफसर’ बनाने के लिए दिया था। अजय ने जब भर्राई आवाज में पूछा, “तुमने मुझे कभी ढूंढा क्यों नहीं?”, तो कमला ने एक ऐसी बात कही जो किसी भी महान दर्शन से बड़ी थी—”बेटा, तू खुश था और सफल था, मेरी गरीबी तेरी ऊंची कुर्सी पर कहीं दाग न लगा दे, बस इसीलिए मैं दूर रही।”

व्यवस्था का विरोध और एक नया प्रशासनिक दर्शन अगले कुछ दिन अजय के लिए किसी युद्ध से कम नहीं थे। दफ्तर में कानाफूसी शुरू हो गई कि डीएम साहब एक ‘सब्जी वाली’ के चक्कर में पड़ गए हैं। मंत्रालय से गुप्त निर्देश आए कि कानून सबके लिए बराबर है और ‘अतिक्रमण’ को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। लेकिन अजय के भीतर अब एक दूसरी ही आग जल रही थी। उन्होंने महसूस किया कि जो कानून इंसान की बुनियादी गरिमा की रक्षा नहीं कर सकता, वह कानून नहीं बल्कि जुल्म है। उन्होंने रातों-रात एक फाइल तैयार की—”फुटपाथ विक्रेताओं के लिए गरिमापूर्ण पुनर्वास।” उन्होंने तर्क दिया कि शहर केवल कंक्रीट की इमारतों से नहीं, बल्कि उन लोगों से भी बनता है जो अपनी मेहनत से इसे सींचते हैं। जब नगर निगम के आयुक्त ने विरोध किया, तो अजय ने अपनी मेज ठोककर कहा, “अगर इस शहर में एक माँ के लिए जगह नहीं है, तो मुझे इस कुर्सी पर बैठने का कोई हक नहीं है।”

अंतिम विदाई और पश्चाताप की अंतहीन गूंज कमला की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। उसने अस्पताल से वापस अपने उसी फुटपाथ वाले कोने पर जाने की जिद की। वह जानती थी कि उसका अंत करीब है। अजय उसे अपनी गाड़ी में लेकर चौराहे पर आए, जहाँ अब उसके लिए एक व्यवस्थित छोटी सी दुकान बना दी गई थी। अजय ने सबके सामने, कैमरे और पुलिस के घेरे के बीच, कमला के पैर छुए। यह एक अधिकारी का समर्पण नहीं, बल्कि एक बेटे का प्रायश्चित था। उस रात कमला ने अजय के माथे पर हाथ रखा और कहा, “अजय, अब मैं चैन से मर सकती हूँ क्योंकि मेरा बेटा केवल बड़ा आदमी नहीं, एक अच्छा इंसान भी बन गया है।” अगली सुबह जब सूरज उगा, तो सीतामढ़ी के उस कोने पर शांति थी। कमला अब इस दुनिया में नहीं थी। अजय प्रताप सिंह वहां खड़े थे, हाथ में उसकी चादर का एक टुकड़ा लिए। उन्होंने शहर को तो बदल दिया, लेकिन उनके भीतर का वह छोटा बच्चा आज भी रो रहा था क्योंकि उसने अपनी मां को दूसरी बार खो दिया था। यह कहानी आज भी नागपुर की हवाओं में गूंजती है कि कभी-कभी सबसे बड़ा न्याय कागजों में नहीं, बल्कि उन आंसुओं में होता है जो एक फटे हुए आंचल को भिगोते हैं।


उपसंहार: अजय प्रताप सिंह ने उसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा, लेकिन हर साल उस दिन वह उस चौराहे पर जाते हैं और एक टमाटर उस धूल में छोड़ देते हैं—उस दिन की याद में जब सत्ता ने ममता को ठुकराया था और ममता ने सत्ता को माफ कर दिया था।