Allah wale Buzurg Ne Hafiz Quran Beti Ki Shaadi Ek Bhediye Se Kar Di

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यह कहानी एक नन्ही लड़की ज़ैनब की है, जो अपनी नसीब और कड़ी मेहनत से एक ऐसी हालत से जूझती है, जो उसके लिए सबसे मुश्किल है। इस कहानी में अल्लाह के लिए एक पूरी सल्तनत की मलिका बनने तक का सफर है, जिसमें उसके सफर के हर पड़ाव पर उसके ईमान, उसकी मेहनत, और उसके भगवान के प्रति विश्वास की परीक्षा होती है।

ज़ैनब और उसकी मजबूरी

ज़ैनब, एक हाफिज कुरान थी, और उसके चेहरे पर गुरबत की गर्द के बावजूद, ईमान का नूर चमकता था। वह अल्लाह की उस बंदी थी, जिसने रातों को अपने रब के हुजूर सजदों में रोकर दुआ की थी। उसके पिता चाचा करीम, जो एक जंग में अपनी आंखें गवा चुके थे, एक बिस्तर मर्ग पर पड़े थे और ज़ैनब के लिए उनका सहारा बनी हुई थी। वह गरीब थी, लेकिन उसकी मेहनत और लगन ने उसे सबसे ऊंचा स्थान दिलाने का हौसला दिया था।

वह रात

यह कहानी उस समय की है जब शहजादा शहरियार की पैदाइश हुई थी, और बादशाह सिकंदर बख्त ने अपनी पत्नी मल्लिका के साथ खुशी का जश्न मनाया था। उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था, क्योंकि वर्षों की दुआओं और मन्नतों के बाद उन्हें एक बेटा हुआ था। महल के वसीया हॉल में उमरा और वजीरों की कतार लगी हुई थी। हर तरफ इत्र की खुशबू और महल की रौनक थी, लेकिन एक ऐसा मंजर था, जिसने बादशाह की खुशी को झटका दिया।

अचानक दरबान ने कहा, “बाबा दरवेश तशरीफ ला रहे हैं।” यह वही बुजुर्ग अल्लाह वाले थे, जिनकी दुआ से बादशाह को यह औलाद नसीब हुई थी। बादशाह सिकंदर बख्त ने उन्हें बड़े सम्मान से गोद में उठाया और बेटे की दुआ के लिए उनके पास भेज दिया, ताकि वह उनके लिए दुआ कर सकें।

लेकिन जैसे ही बाबा दरवेश ने बेटे को देखा, उनकी आंखों में हलचल हुई। उन्होंने तुरंत बच्चा देख कर कहा, “तेरा यह बेटा तुझे इज्जत का नहीं, बल्कि रसवाई का कारण बनेगा।” यह सुनकर पूरा दरबार सन्न रह गया। बाबा दरवेश ने कहा, “अगर तुम चाहते हो कि यह बच्चा इंसान बने, तो इसे शाही महल से बाहर निकाल दो और इसे गरीब किसान के पास भेज दो, ताकि यह गरीबी में पलकर बड़ा हो और इंसानियत को समझे।”

बादशाह की नादानी और एक बड़ी गलती

बादशाह सिकंदर बख्त ने बाबा की बातों को नकारते हुए उनकी बातों को खारिज किया और कहा, “तुम मुझे खुशियों में क्यों जलाते हो?” बाबा दरवेश की चेतावनियों को नजरअंदाज कर दिया गया और उन्होंने अपने बेटे को सोने के महल में रखा। बादशाह ने कसम खाई कि वह उसे शाही दुआओं से महफूज रखेंगे।

समय बीतता गया और शहजादा शहरियार अब जवान हो चुका था। उसकी खूबसूरती में कोई कमी नहीं थी, लेकिन साथ ही उसमें वह गुरूर और घमंड भी बढ़ चुका था, जैसा बाबा ने भविष्यवाणी की थी। वह अपने शाही रुतबे में घमंड करता था और गरीबों और नौकरों को अपमानित करता था।

शहजादा शहरियार का घमंड और उसकी बर्बादी

शहजादा शहरियार को अपनी खूबसूरती पर इतना नाज था कि वह घंटों महल के आईने में खुद को देखता रहता था। उसकी आंखों में अपने आप को सबसे ऊपर समझने की भावना थी। वह गरीबों को सिर्फ जानवरों जैसा समझता था और किसी के सामने कभी भी दया या सहानुभूति का कोई भाव नहीं था।

एक दिन शहजादा अपने महल के दरवाजे से बाहर जा रहा था, जब उसने एक बूढ़े मजदूर को गलती से घोड़े के सामने गिरते देखा। शहजादा का दिल गरम हो गया और उसने अपनी पूरी ताकत से हंटर से उस बूढ़े मजदूर पर वार किया। वह कहता था, “तुम जैसे जानवरों को सजा मिलनी चाहिए।”

यह घटना पूरी बस्ती में फैल गई और सब ने देखा कि शहजादा अब कितना बदमाश और निर्दयी हो चुका है। उसकी बर्बादी की शुरुआत उसी दिन से हो गई थी जब उसने गरीबों और मजबूरों को इस तरह अपमानित किया था।

ज़ैनब का संघर्ष और उसकी दुआ

इस घटना के बाद, एक गरीब बस्ती में ज़ैनब रहती थी। वह एक हाफिज कुरान थी और एक नेक इंसान थी। एक दिन वह अपने नाबीना बाप के साथ दवाखाने जा रही थी, जब शहजादा शहरियार की सवारी आई। ज़ैनब और उसके पिता ने रास्ता देने की कोशिश की, लेकिन शहजादा ने उनके साथ बर्बरता से पेश आया। उसने ज़ैनब के पिता को लात मार दी और उसकी दर्दनाक हालत को देखकर ज़ैनब ने ऊपर आसमान की ओर उंगली उठाई।

उसने अल्लाह से दुआ की, “ए मेरे रब! तू देख रहा है, ये लोग हमें जानवरों से भी बदतर समझते हैं। अल्लाह, तेरा इंसाफ तुझसे उम्मीद करती हूं। इस शहजादे को इंसानियत का एहसास करवा दे।”

वक्त का चमत्कार और शहजादा शहरियार का बदलाव

जैसे ही ज़ैनब की दुआ आसमान में पहुंची, शहजादा शहरियार ने महसूस किया कि उसकी शख्सियत में कुछ अजीब सा हो रहा है। अचानक उसकी शक्ल बदलने लगी, उसके शरीर में दर्द महसूस होने लगा और उसकी खूबसूरती की जगह एक भयानक रूप ने ले लिया। वह धीरे-धीरे एक काले भेड़िये में बदल गया।

जब शहजादा की हालत बिगड़ी, वह पूरी तरह से एक जानवर में तब्दील हो गया। वह अब उस दयालु लड़की ज़ैनब की बद्दुआ का शिकार था, जिसने अपनी जान की परवाह किए बिना उसकी दरिंदगी का जवाब दिया था।

ज़ैनब की दुआ का असर और शहजादा का पश्चाताप

सालों बाद, जब बादशाह सिकंदर बख्त ने अपने बेटे की हालत देखी, तो वह समझ गया कि उसका बेटा अब कभी इंसान नहीं रहेगा। उसने ज़ैनब की दुआ को याद किया और वह पूरी तरह से पछताया कि उसने कभी उस फकीर के शब्दों को नजरअंदाज किया।

ज़ैनब की दुआ ने उसकी जिंदगी बदल दी थी। वह अब एक आदर्श इंसान की तरह जीवित था, और उसकी बद्दुआ ने शहजादा शहरियार को हमेशा के लिए बदल दिया।

कहानी का संदेश

यह कहानी हमें यह सिखाती है कि इंसान को उसकी हकीकत से पहचानना चाहिए और अपनी बुराई और घमंड को छोड़ देना चाहिए। अल्लाह की दुआ और नेक नियत से कोई भी इंसान अपने जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है।