जज बेटे ने अपनी सगी मां को नौकरानी कहकर घर से निकाला, फिर वही मां बनी सुप्रीम कोर्ट की सबसे बड़ी जज!
लखनपुर की एक बड़ी सरकारी कॉलोनी में उस शाम कुछ अलग ही चमक थी। हर घर से ज्यादा रोशनी सिविल जज आर्यन प्रताप सिंह के बंगले से निकल रही थी। बाहर गाड़ियां आ जा रही थीं, भीतर महंगी इत्र और खाने की खुशबू घुली थी। यह आर्यन की जिंदगी की पहली बड़ी पार्टी थी, जो एक नए जज बनने की खुशी में दी जा रही थी। शहर के बड़े-बड़े वकील, सीनियर जज, अफसर सब उसी पार्टी का हिस्सा थे।
आर्यन काले बंदगले के चमकदार सूट में हाथ में महंगा गिलास पकड़े इधर-उधर घूम रहा था। हर किसी से हंसकर बातें कर रहा था। उसके साथ खड़ी थी उसकी मंगेतर कृतिका चौधरी, एक मशहूर वकील की बेटी। दोनों शान से हर मेहमान का स्वागत कर रहे थे। कमरा रोशनी से भरा था। बातें चल रही थीं, हंसी गूंज रही थी। सब कुछ बिल्कुल परफेक्ट लग रहा था।
लेकिन उसी बंगले के एक शांत कोने में रसोई के दरवाजे के पास एक औरत चुपचाप खड़ी होकर यह सब देख रही थी। वह थी आर्यन की मां, सरला देवी सिंह। सरल सी सूती साड़ी, पल्लू पर हल्दी का छोटा सा दाग और आंखों में आंसू। लेकिन यह आंसू दुख के नहीं थे, खुशी के थे। वह सोच रही थी, “आज मेरा बेटा जज बन गया। मेरा बेटा सफल हो गया।”
सरला देवी को वह दिन साफ याद थे जब उनके पति महेश प्रसाद सिंह, जो एक साधारण क्लर्क थे, एक हादसे में गुजर गए थे। उस वक्त आर्यन सिर्फ 10 साल का था। घर जैसे टूट गया था, पर मां नहीं टूटी। उन्होंने सिलाई शुरू की, दूसरे घरों में खाना बनाकर भेजा, टिफिन चलाया। लेकिन एक भी दिन अपने बेटे की पढ़ाई में कमी नहीं आने दी। वह खुद भूखा ही सो जातीं पर बेटे को हमेशा खाना खिलाकर सुलातीं।
वह चाहती थीं कि उनका बेटा कभी महसूस न करे कि वह गरीब है। आर्यन होशियार था। पढ़ता गया, बढ़ता गया। दिल्ली जाकर पढ़ाई की और पहले ही प्रयास में जज बन गया। यह सफलता सरला देवी के त्याग का फल था। आज वही मां चुपचाप खड़ी अपने बेटे को बड़े-बड़ों के साथ देख रही थी। उनका दिल गर्व से भर गया था।
उन्होंने देखा कि कई मेहमानों के गिलास खाली हो रहे हैं। सरला देवी ने मन में सोचा, “मेरा बेटा इतनी बड़ी पार्टी दे रहा है। मैं भी थोड़ा मदद कर दूं।” वह रसोई में गई जहां कैटरिंग वाले खड़े थे। उन्होंने चुपचाप खुद अपने हाथ से पनीर के पकोड़े तलने लगीं। उनका हाथ कांप रहा था, लेकिन दिल खुश था। “मेरे हाथ के पकोड़े सब खाएंगे। आज मेरे बेटे की खुशी का दिन है।”
उन्होंने बड़ी मेहनत से ट्रे सजाई और कांपते कदमों से ड्राइंग रूम में आईं। उन्होंने धीरे से आवाज दी, “बेटा आर्यन!”
आर्यन उस समय जस्टिस सुधांशु अग्रवाल से बात कर रहा था। अपनी मां को इस हाल में, तेल की गंध के साथ साधारण कपड़ों में देखकर वह एक पल के लिए रुक गया। उसके पास खड़ी कृतिका ने उसे कोहनी मारी, मानो कह रही हो, “यह यहां क्यों आई हैं?”
इतने में जस्टिस अग्रवाल की पत्नी वंदना अग्रवाल ने नाक सिकोड़ते हुए कृतिका से पूछा, “कृतिका, यह कौन है?”
कृतिका का चेहरा शर्म से लाल हो गया। कुछ कहने की हिम्मत उसे नहीं हुई। इससे पहले की बात बिगड़ती, आर्यन हंसी का नाटक करते हुए अपनी मां के पास पहुंचा। उसने मां के हाथ से ट्रे छीन ली और जोर से बोला, “अरे आंटी, आप भी ना!” फिर वह बोला, “यह सरला अम्मा है। हमारी पुरानी नौकरानी पिताजी के वक्त से हैं। इसलिए हम इन्हें मांसा मानते हैं। अम्मा, आप जाइए, आराम कीजिए। यहां वेटर है ना आपके काम के लिए।”
सरला देवी ने जब “नौकरानी” शब्द सुना, यह एक शब्द उनके सीने में तीर की तरह उतर गया। उनके हाथ कांपने लगे। जो बेटा उनके लिए पूरी दुनिया था, आज उसी बेटे ने उन्हें नौकरानी कहकर दुनिया के सामने छोटा कर दिया। उनकी आंखें भर आईं। गला सूख गया। पर वह कुछ नहीं बोलीं। बस सिर झुका कर मुड़ी और वापस रसोई की तरफ चली गईं। एक टूटा हुआ मन लेकर।
कमरे में हंसी चल रही थी। गिलास उठ रहे थे। पर सरला देवी की दुनिया वहीं रसोई के दरवाजे पर ठहर गई थी। वह अंदर गईं। अपनी ट्रे को नीचे रखा और दीवार पकड़ कर बैठ गईं। उनके दिल से एक ही सवाल उठ रहा था। “क्या मैंने यही दिन देखने के लिए इतने साल अपने हाथों को जला-जलाकर काम किया था?”
तभी बाहर पार्टी में आर्यन की आवाज गूंजी। “पुराने लोग हैं। काम करने की आदत है।” सरला देवी ने उन शब्दों को अपने अंदर डूबते हुए महसूस किया। बहुत गहरी चोट थी। बोल नहीं सकीं, रो नहीं सकीं। पर उनका दिल टूट चुका था पूरी तरह।
बाहर पार्टी में हंसी ठहाके गूंज रहे थे। पर रसोई के अंधेरे कोने में एक मां का दिल धीरे-धीरे मर रहा था। पार्टी खत्म हुई। रात बीती। लोग अपने घर लौट गए। पर सरला देवी उसी छोटे से सर्वेंट क्वार्टर में बैठी पूरी रात रोती रहीं। उनका दिल बार-बार एक ही बात कह रहा था। “क्या मैंने इसी दिन के लिए खुद को जलाया था?”
उनके हाथ जिनसे उन्होंने आर्यन के लिए सपने बुने थे, उन आंखों के सामने उठ गए जिनसे वह रोती जा रही थीं। “क्या यही मेरी परवरिश थी?” वह खुद से पूछ रही थीं। लेकिन जवाब सिर्फ एक था, एक गहरा खामोश दर्द।
सुबह जब सूरज निकला, आसमान तो चमका पर सरला देवी की आंखें सूजी हुई थीं। उन्होंने रात भर एक पल भी नींद नहीं की थी। उधर आर्यन भी जागा। थोड़ा नशा उतारा था। थोड़ी शर्म भी महसूस हुई, पर उससे ज्यादा उसे अपने रुतबे की चिंता थी।
इतने में उसका फोन बजा। कृतिका का फोन। उसने गुस्से में कहा, “आर्यन, मैं यह सब बर्दाश्त नहीं करूंगी। तुम्हारी मां हमारे स्टैंडर्ड के लायक नहीं है। मैं वहां आऊंगी तो यह सब ड्रामा नहीं चलेगा। तुम उन्हें कहीं और शिफ्ट कर दो।”
आर्यन ने बिना सोचे कहा, “हां, तुम सही कह रही हो।” उसे भी लगता था कि उसकी अनपढ़ साधारण मां उसके नए जज वाले स्टेटस पर एक दाग है। उसके अंदर से इंसान मर चुका था। सिर्फ पद और घमंड बचा था।
वह सीधा अपनी मां के क्वार्टर में गया। सरला देवी दरवाजे पर बैठी थीं। उसी तरह जैसे किसी टूटे हुए घर का सामान। आंखें लाल, सूजी हुई पर होंठ चुप थे। जैसे वह सब समझ चुकी हों। आर्यन ने कहा, “मां, तैयार हो जाइए। मैं आपको एक अच्छी जगह घुमाने ले जा रहा हूं।”
उसकी आवाज में जरा भी पछतावा नहीं था। सरला देवी बिना कुछ पूछे उठीं। अपनी छोटी सी पोटली बांधी जिसमें बस दो जोड़े कपड़े थे और एक पुरानी फोटो जिसमें छोटा आर्यन उनकी गोद में हंस रहा था। वह जानती थीं कि बेटे ने मन से उन्हें खो दिया है।

कल रात जो हुआ, उसके बाद इस घर में उनके लिए कोई जगह नहीं बची। आर्यन अपनी चमचमाती गाड़ी लेकर आया। मां को पीछे की सीट पर बिठाया और गाड़ी शहर से बाहर ले गया। कुछ देर बाद गाड़ी एक बड़ी सी इमारत के सामने रुकी। बोर्ड पर लिखा था “आनंद आश्रय वृद्ध निवास।”
सरला देवी का दिल थम गया। हाथ कांप गए। उन्होंने डरते हुए पूछा, “बेटा, यह यह कहां ले आए?”
आर्यन ने आंखें उनसे मिलाए बिना कहा, “मां, यही आपके लिए सबसे अच्छी जगह है। यहां आपके उम्र के लोग हैं। आपका मन लगा रहेगा। मुझे जज के काम से फुर्सत नहीं मिलती।”
यह सुनकर सरला देवी का दिल चीर गया। उन्होंने बेटे की तरफ देखा। वह वही नहीं था जिसे उन्होंने अपने खून से सींचा था। वह कोई और था। एक अजनबी, एक घमंडी इंसान। धीरे से बोलीं, “तुमने मुझे नौकरानी कहा था ना? तो मालिक अपनी पुरानी नौकरानी को वृद्धाश्रम में ही छोड़ता है। है ना?”
आर्यन का चेहरा तमतमा गया। पर उसकी आंखों में शर्म नहीं, सिर्फ अहंकार था। “मां, यह मेरे रुतबे का सवाल है। एक जज की मां ऐसे गंदे कपड़ों में नहीं रह सकती।” वह बोल रहा था और हर शब्द मां के दिल को काट रहा था।
सरला देवी ने उनकी बात पूरी की। “इसलिए, जज साहब, अपनी मां को घर से दूर छोड़ने आए हैं।” उन्होंने अपनी पोटली उठाई। गाड़ी से उतरीं और बोलीं, “जाओ बेटा, तुम अपना रुतबा संभालो। मैं अपनी बची हुई जिंदगी संभाल लूंगी।”
आर्यन अंदर गया। मैनेजर से सारे कागज साइन किए। एक साल का एडवांस जमा किया और बिना पीछे देखे गाड़ी स्टार्ट करके चला गया। सरला देवी ने धीरे से गेट के भीतर कदम रखा। लोहे का बड़ा सा गेट बंद हो गया। जैसे जिंदगी का एक दरवाजा हमेशा के लिए बंद हो गया हो।
वह वहीं खड़ी रह गईं। अपने छोटे से पोटली को सीने से लगाए, आंसुओं को अंदर ही अंदर निगलते हुए उन्होंने आसमान की तरफ देखा और कहा, “हे भगवान, मैंने ऐसा क्या पाप किया था जो तूने मुझे मेरे ही बेटे के हाथों यह सजा दिलवाई।”
वह रोई नहीं। रोने की ताकत भी नहीं बची थी। बस, भीतर कहीं एक मां टूट कर खत्म हो चुकी थी। सरला देवी सिंह को तो पता भी नहीं था कि भगवान उसके लिए कैसी कहानी लिख चुके हैं। जिस बात को वह सजा समझ रही थी, असल में वह एक ऐसी पटकथा की शुरुआत थी जो अगले ही दिन उनके बेटे आर्यन प्रताप सिंह के अहंकार को मिट्टी में मिला देने वाली थी।
सुबह हुई। आर्यन बड़े मजे से सोकर उठा। घर में बिल्कुल सन्नाटा था। ना मां की पूजा की घंटी, ना उनके कदमों की आवाज, ना वह नरम आवाज। “बेटा, सुबह के 8:00 बज गए। उठ जाओ।” आर्यन ने उस सन्नाटे को आजादी का नाम दे दिया। वह मुस्कुरा उठा।
उसे लगा अब उसकी जिंदगी में कोई रुकावट नहीं। जैसे ही वह उठा, उसने अपनी मंगेतर कृतिका चौधरी को फोन किया। “डार्लिंग, रास्ता साफ हो गया है। मां को एक बहुत बढ़िया फाइव स्टार ओल्ड एज होम में शिफ्ट कर दिया है। वह वहां बहुत खुश रहेंगी।”
कृतिका ने राहत की सांस ली। “बहुत अच्छा किया आर्यन। आज शाम को मैं घर देखने आऊंगी।” आर्यन ने घड़ी देखी। आज उसका बड़ा दिन था। पहले दिन उसे लखनपुर उच्च न्यायालय में नए जजों के साथ ओरिएंटेशन प्रोग्राम में शामिल होना था।
वह बाथरूम गया, बाल सेट किए, इटालियन सूट पहना, महंगी घड़ी लगाई और खुद को शीशे में देखकर मुस्कुराया। उसकी चाल में घमंड था। वह भूल चुका था कि इस मुकाम तक वह किसकी उंगली पकड़कर आया था।
वह अपनी चमकदार गाड़ी से हाई कोर्ट पहुंचा। बाहर वकील उसे देखकर सलाम कर रहे थे। “गुड मॉर्निंग जज साहब। नमस्कार जज साहब।” आर्यन का सीना और चौड़ा हो गया। उसके कदमों में अकड़ थी। दिल में घमंड था।
वह भूल चुका था उन सुइयों को जिनमें धागा डालते चलते उसकी मां की उंगलियां लहूलुहान हो जाती थीं। वह कॉरिडोर से गुजर रहा था कि तभी कुछ वकीलों की बातें उसके कानों में पड़ीं। “सुना, आज नई चीफ जस्टिस साहिबा चार्ज लेने वाली हैं। हां, जस्टिस सरला वर्मा, बहुत सख्त हैं। कहते हैं, काम में जरा भी डील पसंद नहीं।”
आर्यन हंसा। “सरला, कितना आम नाम है। कौन जानता था कि वही नाम आज उसकी दुनिया उलटने वाला है।”
वह कोर्ट रूम नंबर वन में दाखिल हुआ। कमरा खचाखच भरा हुआ था। सीनियर जज, बड़े वकील, रजिस्ट्रार, अधिकारी सब मौजूद थे। नए जजों के लिए पहली पंक्ति आरक्षित थी। आर्यन गर्व से वहां बैठ गया। चारों ओर देखकर महसूस कर रहा था कि वह किसी राजा की तरह है।
तभी कोर्ट मास्टर की ऊंची आवाज गूंजी। “सावधान योर लॉर्ड शिप्स!” पूरा कोर्ट रूम एक साथ खड़ा हो गया। सभी की निगाहें एक ही दरवाजे पर टिकी थीं। दरवाजा खुला। तीन जज अंदर आए। दो पुरुष जज और उनके बीच में चलती हुई एक महिला।
आर्यन ने पहली बार सिर उठाकर देखा और उसके पैरों में जान ही खत्म हो गई। उसकी सांस रुक गई। चेहरा सफेद पड़ गया। हाथ कांपने लगे। वह घूरता ही रह गया जैसे उसकी आंखों ने किसी भूत को देख लिया हो।
वह महिला कौन थी? वह थी चीफ जस्टिस सरला वर्मा और सरला वर्मा थी उसकी अपनी मां, सरला देवी सिंह, जिसे उसने कल ही आनंद आश्रय वृद्ध निवास में छोड़कर आया था, जिसे उसने भरी पार्टी में पुरानी नौकरानी कहा था, जो पूरी रात अकेले अपने पोटली से लगकर रोई थी।
आज वही मां सफेद जजों के लिबास में गंभीर चेहरे और रुतबे की चमक के साथ मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठ रही थी। आर्यन की आंखों के आगे अंधेरा छा गया। उसे लगा वह गिर पड़ेगा। कल रात के सारे शब्द उसके कानों में गूंजने लगे। “यह सरला अम्मा है। पुरानी नौकरानी। पुराने लोग हैं। काम की आदत है।”
हर शब्द अब किसी चाबुक की तरह उसके दिल पर पड़ रहा था। वह कुर्सी पर बैठने की कोशिश करता। पर उसके हाथ पैर कांप रहे थे। उसका दिमाग सुन्न हो गया। पीछे बैठे वरिष्ठ वकील उसे देख रहे थे। उनकी नजरों में सम्मान नहीं बल्कि दया और तिरस्कार था।
फिर रजिस्ट्रार ने नए जजों का परिचय कराना शुरू किया। जब उसने कहा, “अब हमारे नए नियुक्त सिविल जज श्री आर्यन प्रताप सिंह,” सरला वर्मा ने पहली बार अपनी नजरें ऊपर उठाई और सीधे अपने बेटे की आंखों में देखा।
उन आंखों में ना कोई पहचान थी, ना कोई गुस्सा, ना कोई प्यार। बस एक जज की ठंडी, कड़ी और नापतोल कर देखने वाली नजर। वह नजर आर्यन के दिल में किसी चाकू की तरह उतरती चली गई। वह एक सेकंड भी उस नजर का सामना नहीं कर पाया। उसने तुरंत अपनी आंखें झुका लीं।
उसे लगा जैसे उसकी पूरी दुनिया उसी पल जमीन में समा गई। कोर्ट रूम में बैठी उसकी मंगेतर कृतिका चौधरी भी सब देख रही थी। पहले उसने चीफ जस्टिस को देखा। फिर कांपते हुए आर्यन को और उसकी आंखों में एक ही पल में सारी तस्वीर साफ हो गई।
कल रात की पार्टी, सरला अम्मा, पुरानी नौकरानी, वृद्धाश्रम। उसे याद आ गया कि आर्यन ने किस तरह अपनी मां का अपमान किया था और आज सामने बैठी वही औरत इस प्रदेश की सबसे बड़ी जज थी। कृतिका के भीतर घृणा भर गई।
उसे लगने लगा कि आर्यन नाम का इंसान किसी के प्यार, किसी के सम्मान के लायक ही नहीं। लेकिन आर्यन उसके दिल पर एक-एक शब्द हथौड़े की तरह पढ़ रहे थे। उसने अपनी मां को हमेशा अनपढ़, साधारण, गमवार समझा।
उसे कभी यह जानने की इच्छा भी नहीं हुई कि उस मां की साड़ी के पीछे कितना बड़ा संघर्ष छिपा है। वह नहीं जानता था। सरला देवी सिंह शादी से पहले सरला वर्मा थी। दिल्ली की एक बेहद तेजतर्रार वकील।
पर जब आर्यन कुछ महीनों का था, तभी उसके पिता महेश प्रसाद सिंह का देहांत हो गया। एक औरत, वो भी अकेली। लेकिन मां होने का साहस उससे कहीं बड़ा था। उसने अपने करियर को छोड़ दिया। अपनी वकालत को ताला लगाया और अपना जीवन एक ही लक्ष्य पर लगा दिया। “मेरा बेटा एक दिन बड़ा आदमी बने।”
उसने सिलाई की जिससे उसके हाथ खून से लाल हो जाते थे। उसने दूसरों के घरों में खाना बनाया जिससे उसके पैर सूझ जाते थे। उसने टिफिन चलाया। खुद भूख ही रहती पर बेटे की किताबें खरीदती। आर्यन बड़ा हुआ, दिल्ली गया, जज बना और मां अकेली रह गई।
तभी उसके दिल में पुराना सपना फिर जागा। कानून पढ़ना है, जज बनना है। 40 की उम्र में लोग जहां जिंदगी की रफ्तार धीमी कर देते हैं, वहां इस मां ने फिर से अपनी कानून की किताबें खोलीं। रात-रात भर पढ़ाई की, नींद छोड़ी, सिलाई छोड़ी और फिर परीक्षा दी। हायर जुडिशियल सर्विस, एचजेएस और अपनी प्रतिभा और मेहनत से सीधी डिस्ट्रिक्ट जज बन गई।
10 सालों से वह जज थी, पर दूसरे राज्य मध्य प्रदेश में। आर्यन को कभी पता ही नहीं चला क्योंकि उसने कभी पूछा ही नहीं। “मां, तुम अकेली क्या करती हो?” वह बस हर महीने पैसे डाल देता था और खुद को फर्ज पूरा करने वाला बेटा समझता था।
किस्मत का खेल देखिए। उसी मां को प्रमोशन मिला और वह चीफ जस्टिस बनकर उसी शहर में आ गई जहां उनका बेटा अपनी पहली पोस्टिंग पर था। वह कल ही पहुंची थी। वह चाहती थी कि आज बेटे को सरप्राइज दें।
“कि उसकी मां अब उसी हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस है।” लेकिन बेटे ने तो उससे एक रात पहले ऐसा वार किया था जिससे मां का दिल ही टूटकर बिखर गया।
अब वही मां अदालत की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठी थी और बेटा सबसे नीचे खड़ा कांप रहा था। चीफ जस्टिस सरला वर्मा जब उस ऊंची गद्दी पर बैठीं, उनका सफेद जजों वाला लिबास ऐसा चमक रहा था जैसे कोई तेज रोशनी पूरे कमरे में फैल गई हो।
उनके चेहरे पर ना किसी मां की ममता दिखाई दे रही थी, ना कोई दुख, ना कोई पहचान। बस एक कठोर, सख्त और निष्पक्ष जज बैठी थी जो कानून की देवी बनकर सामने आई थी। आर्यन प्रताप सिंह को लगा कि उसकी सांसे रुक जाएंगी।
वह कुर्सी से उठने की हिम्मत नहीं कर रहा था। एक पल को तो लगा कि वह बेहोश होकर गिर जाएगा। उसने खुद से कहा, “नहीं, यह मेरी मां नहीं हो सकती। मेरी मां तो सरला देवी सिंह है। यह तो जस्टिस सरला वर्मा है।”
उसका दिमाग बहानों की तलाश करने लगा। “शायद यह सिर्फ उनकी हमशक्ल है। नाम तो आम है। हो सकता है यह कोई और हो।” लेकिन उसके दिल सच जान चुका था। यह वही आंखें थीं जो कभी रात भर जागकर उसकी पढ़ाई में उसका हाथ पकड़कर बैठी थीं।
यह वही चेहरा था जिसे वह कल ही अपने हाथों से वृद्धाश्रम में छोड़कर आया था। और आज वही चेहरा न्याय की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठा था। रजिस्ट्रार की आवाज पूरे कमरे में गूंजी। “माननीय लखनपुर उच्च न्यायालय की नई मुख्य न्यायाधीश, चीफ जस्टिस सरला वर्मा का स्वागत करें।”
पूरा कमरा तालियों से गूंज उठा और आर्यन का दिल बैठ गया। वह सोच रहा था, “मेरी मां चीफ जस्टिस, यह कैसे संभव है?” लेकिन सच से कोई कब तक भाग सकता है? कार्यवाही शुरू हुई। रजिस्ट्रार ने नए जजों का परिचय कराना शुरू किया और जैसे ही उसने कहा, “अब नए नियुक्त सिविल जज श्री आर्यन प्रताप सिंह,” आर्यन के पैर कांप उठे।
वह किसी तरह खड़ा हुआ। चीफ जस्टिस सरला वर्मा ने पहली बार अपनी नजरें कागजों से उठाई और सीधे अपने बेटे की आंखों में देखा। उन आंखों में ना कोई पहचान थी, ना कोई गुस्सा, ना प्यार। बस एक जज की ठंडी, कड़ी और नापतोल कर देखने वाली नजर।
वह नजर आर्यन के दिल में किसी चाकू की तरह उतरती चली गई। वह एक सेकंड भी उस नजर का सामना नहीं कर पाया। उसने तुरंत अपनी आंखें झुका लीं।
उसे लगा जैसे उसकी पूरी दुनिया उसी पल जमीन में समा गई। कोर्ट रूम में बैठी उसकी मंगेतर कृतिका चौधरी भी सब देख रही थी। पहले उसने चीफ जस्टिस को देखा। फिर कांपते हुए आर्यन को और उसकी आंखों में एक ही पल में सारी तस्वीर साफ हो गई।
कल रात की पार्टी, सरला अम्मा, पुरानी नौकरानी, वृद्धाश्रम। उसे याद आ गया कि आर्यन ने किस तरह अपनी मां का अपमान किया था और आज सामने बैठी वही औरत इस प्रदेश की सबसे बड़ी जज थी। कृतिका के भीतर घृणा भर गई।
उसे लगने लगा कि आर्यन नाम का इंसान किसी के प्यार, किसी के सम्मान के लायक ही नहीं। लेकिन आर्यन उसके दिल पर एक-एक शब्द हथौड़े की तरह पढ़ रहे थे। उसने अपनी मां को हमेशा अनपढ़, साधारण, गमवार समझा।
उसे कभी यह जानने की इच्छा भी नहीं हुई कि उस मां की साड़ी के पीछे कितना बड़ा संघर्ष छिपा है। वह नहीं जानता था। सरला देवी सिंह शादी से पहले सरला वर्मा थी। दिल्ली की एक बेहद तेजतर्रार वकील।
पर जब आर्यन कुछ महीनों का था, तभी उसके पिता महेश प्रसाद सिंह का देहांत हो गया। एक औरत, वो भी अकेली। लेकिन मां होने का साहस उससे कहीं बड़ा था। उसने अपने करियर को छोड़ दिया। अपनी वकालत को ताला लगाया और अपना जीवन एक ही लक्ष्य पर लगा दिया। “मेरा बेटा एक दिन बड़ा आदमी बने।”
उसने सिलाई की जिससे उसके हाथ खून से लाल हो जाते थे। उसने दूसरों के घरों में खाना बनाया जिससे उसके पैर सूझ जाते थे। उसने टिफिन चलाया। खुद भूख ही रहती पर बेटे की किताबें खरीदती। आर्यन बड़ा हुआ, दिल्ली गया, जज बना और मां अकेली रह गई।
तभी उसके दिल में पुराना सपना फिर जागा। कानून पढ़ना है, जज बनना है। 40 की उम्र में लोग जहां जिंदगी की रफ्तार धीमी कर देते हैं, वहां इस मां ने फिर से अपनी कानून की किताबें खोलीं। रात-रात भर पढ़ाई की, नींद छोड़ी, सिलाई छोड़ी और फिर परीक्षा दी। हायर जुडिशियल सर्विस, एचजेएस और अपनी प्रतिभा और मेहनत से सीधी डिस्ट्रिक्ट जज बन गई।
10 सालों से वह जज थी, पर दूसरे राज्य मध्य प्रदेश में। आर्यन को कभी पता ही नहीं चला क्योंकि उसने कभी पूछा ही नहीं। “मां, तुम अकेली क्या करती हो?” वह बस हर महीने पैसे डाल देता था और खुद को फर्ज पूरा करने वाला बेटा समझता था।
किस्मत का खेल देखिए। उसी मां को प्रमोशन मिला और वह चीफ जस्टिस बनकर उसी शहर में आ गई जहां उनका बेटा अपनी पहली पोस्टिंग पर था। वह कल ही पहुंची थी। वह चाहती थी कि आज बेटे को सरप्राइज दें।
“कि उसकी मां अब उसी हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस है।” लेकिन बेटे ने तो उससे एक रात पहले ऐसा वार किया था जिससे मां का दिल ही टूटकर बिखर गया।
अब वही मां अदालत की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठी थी और बेटा सबसे नीचे खड़ा कांप रहा था। चीफ जस्टिस सरला वर्मा जब उस ऊंची गद्दी पर बैठीं, उनका सफेद जजों वाला लिबास ऐसा चमक रहा था जैसे कोई तेज रोशनी पूरे कमरे में फैल गई हो।
उनके चेहरे पर ना किसी मां की ममता दिखाई दे रही थी, ना कोई दुख, ना कोई पहचान। बस एक कठोर, सख्त और निष्पक्ष जज बैठी थी जो कानून की देवी बनकर सामने आई थी। आर्यन प्रताप सिंह को लगा कि उसकी सांसे रुक जाएंगी।
वह कुर्सी से उठने की हिम्मत नहीं कर रहा था। एक पल को तो लगा कि वह बेहोश होकर गिर जाएगा। उसने खुद से कहा, “नहीं, यह मेरी मां नहीं हो सकती। मेरी मां तो सरला देवी सिंह है। यह तो जस्टिस सरला वर्मा है।”
उसका दिमाग बहानों की तलाश करने लगा। “शायद यह सिर्फ उनकी हमशक्ल है। नाम तो आम है। हो सकता है यह कोई और हो।” लेकिन उसके दिल सच जान चुका था। यह वही आंखें थीं जो कभी रात भर जागकर उसकी पढ़ाई में उसका हाथ पकड़कर बैठी थीं।
यह वही चेहरा था जिसे वह कल ही अपने हाथों से वृद्धाश्रम में छोड़कर आया था। और आज वही चेहरा न्याय की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठा था। रजिस्ट्रार की आवाज पूरे कमरे में गूंजी। “माननीय लखनपुर उच्च न्यायालय की नई मुख्य न्यायाधीश, चीफ जस्टिस सरला वर्मा का स्वागत करें।”
पूरा कमरा तालियों से गूंज उठा और आर्यन का दिल बैठ गया। वह सोच रहा था, “मेरी मां चीफ जस्टिस, यह कैसे संभव है?” लेकिन सच से कोई कब तक भाग सकता है? कार्यवाही शुरू हुई। रजिस्ट्रार ने नए जजों का परिचय कराना शुरू किया और जैसे ही उसने कहा, “अब नए नियुक्त सिविल जज श्री आर्यन प्रताप सिंह,” आर्यन के पैर कांप उठे।
वह किसी तरह खड़ा हुआ। चीफ जस्टिस सरला वर्मा ने पहली बार अपनी नजरें कागजों से उठाई और सीधे अपने बेटे की आंखों में देखा। उन आंखों में ना कोई पहचान थी, ना कोई गुस्सा, ना प्यार। बस एक जज की ठंडी, कड़ी और नापतोल कर देखने वाली नजर।
वह नजर आर्यन के दिल में किसी चाकू की तरह उतरती चली गई। वह एक सेकंड भी उस नजर का सामना नहीं कर पाया। उसने तुरंत अपनी आंखें झुका लीं।
उसे लगा जैसे उसकी पूरी दुनिया उसी पल जमीन में समा गई। कोर्ट रूम में बैठी उसकी मंगेतर कृतिका चौधरी भी सब देख रही थी। पहले उसने चीफ जस्टिस को देखा। फिर कांपते हुए आर्यन को और उसकी आंखों में एक ही पल में सारी तस्वीर साफ हो गई।
कल रात की पार्टी, सरला अम्मा, पुरानी नौकरानी, वृद्धाश्रम। उसे याद आ गया कि आर्यन ने किस तरह अपनी मां का अपमान किया था और आज सामने बैठी वही औरत इस प्रदेश की सबसे बड़ी जज थी। कृतिका के भीतर घृणा भर गई।
उसे लगने लगा कि आर्यन नाम का इंसान किसी के प्यार, किसी के सम्मान के लायक ही नहीं। लेकिन आर्यन उसके दिल पर एक-एक शब्द हथौड़े की तरह पढ़ रहे थे। उसने अपनी मां को हमेशा अनपढ़, साधारण, गमवार समझा।
उसे कभी यह जानने की इच्छा भी नहीं हुई कि उस मां की साड़ी के पीछे कितना बड़ा संघर्ष छिपा है। वह नहीं जानता था। सरला देवी सिंह शादी से पहले सरला वर्मा थी। दिल्ली की एक बेहद तेजतर्रार वकील।
पर जब आर्यन कुछ महीनों का था, तभी उसके पिता महेश प्रसाद सिंह का देहांत हो गया। एक औरत, वो भी अकेली। लेकिन मां होने का साहस उससे कहीं बड़ा था। उसने अपने करियर को छोड़ दिया। अपनी वकालत को ताला लगाया और अपना जीवन एक ही लक्ष्य पर लगा दिया। “मेरा बेटा एक दिन बड़ा आदमी बने।”
उसने सिलाई की जिससे उसके हाथ खून से लाल हो जाते थे। उसने दूसरों के घरों में खाना बनाया जिससे उसके पैर सूझ जाते थे। उसने टिफिन चलाया। खुद भूख ही रहती पर बेटे की किताबें खरीदती। आर्यन बड़ा हुआ, दिल्ली गया, जज बना और मां अकेली रह गई।
तभी उसके दिल में पुराना सपना फिर जागा। कानून पढ़ना है, जज बनना है। 40 की उम्र में लोग जहां जिंदगी की रफ्तार धीमी कर देते हैं, वहां इस मां ने फिर से अपनी कानून की किताबें खोलीं। रात-रात भर पढ़ाई की, नींद छोड़ी, सिलाई छोड़ी और फिर परीक्षा दी। हायर जुडिशियल सर्विस, एचजेएस और अपनी प्रतिभा और मेहनत से सीधी डिस्ट्रिक्ट जज बन गई।
10 सालों से वह जज थी, पर दूसरे राज्य मध्य प्रदेश में। आर्यन को कभी पता ही नहीं चला क्योंकि उसने कभी पूछा ही नहीं। “मां, तुम अकेली क्या करती हो?” वह बस हर महीने पैसे डाल देता था और खुद को फर्ज पूरा करने वाला बेटा समझता था।
किस्मत का खेल देखिए। उसी मां को प्रमोशन मिला और वह चीफ जस्टिस बनकर उसी शहर में आ गई जहां उनका बेटा अपनी पहली पोस्टिंग पर था। वह कल ही पहुंची थी। वह चाहती थी कि आज बेटे को सरप्राइज दें।
“कि उसकी मां अब उसी हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस है।” लेकिन बेटे ने तो उससे एक रात पहले ऐसा वार किया था जिससे मां का दिल ही टूटकर बिखर गया।
अब वही मां अदालत की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठी थी और बेटा सबसे नीचे खड़ा कांप रहा था। चीफ जस्टिस सरला वर्मा जब उस ऊंची गद्दी पर बैठीं, उनका सफेद जजों वाला लिबास ऐसा चमक रहा था जैसे कोई तेज रोशनी पूरे कमरे में फैल गई हो।
उनके चेहरे पर ना किसी मां की ममता दिखाई दे रही थी, ना कोई दुख, ना कोई पहचान। बस एक कठोर, सख्त और निष्पक्ष जज बैठी थी जो कानून की देवी बनकर सामने आई थी। आर्यन प्रताप सिंह को लगा कि उसकी सांसे रुक जाएंगी।
वह कुर्सी से उठने की हिम्मत नहीं कर रहा था। एक पल को तो लगा कि वह बेहोश होकर गिर जाएगा। उसने खुद से कहा, “नहीं, यह मेरी मां नहीं हो सकती। मेरी मां तो सरला देवी सिंह है। यह तो जस्टिस सरला वर्मा है।”
उसका दिमाग बहानों की तलाश करने लगा। “शायद यह सिर्फ उनकी हमशक्ल है। नाम तो आम है। हो सकता है यह कोई और हो।” लेकिन उसके दिल सच जान चुका था। यह वही आंखें थीं जो कभी रात भर जागकर उसकी पढ़ाई में उसका हाथ पकड़कर बैठी थीं।
यह वही चेहरा था जिसे वह कल ही अपने हाथों से वृद्धाश्रम में छोड़कर आया था। और आज वही चेहरा न्याय की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठा था। रजिस्ट्रार की आवाज पूरे कमरे में गूंजी। “माननीय लखनपुर उच्च न्यायालय की नई मुख्य न्यायाधीश, चीफ जस्टिस सरला वर्मा का स्वागत करें।”
पूरा कमरा तालियों से गूंज उठा और आर्यन का दिल बैठ गया। वह सोच रहा था, “मेरी मां चीफ जस्टिस, यह कैसे संभव है?” लेकिन सच से कोई कब तक भाग सकता है? कार्यवाही शुरू हुई। रजिस्ट्रार ने नए जजों का परिचय कराना शुरू किया और जैसे ही उसने कहा, “अब नए नियुक्त सिविल जज श्री आर्यन प्रताप सिंह,” आर्यन के पैर कांप उठे।
वह किसी तरह खड़ा हुआ। चीफ जस्टिस सरला वर्मा ने पहली बार अपनी नजरें कागजों से उठाई और सीधे अपने बेटे की आंखों में देखा। उन आंखों में ना कोई पहचान थी, ना कोई गुस्सा, ना प्यार। बस एक जज की ठंडी, कड़ी और नापतोल कर देखने वाली नजर।
वह नजर आर्यन के दिल में किसी चाकू की तरह उतरती चली गई। वह एक सेकंड भी उस नजर का सामना नहीं कर पाया। उसने तुरंत अपनी आंखें झुका लीं।
उसे लगा जैसे उसकी पूरी दुनिया उसी पल जमीन में समा गई। कोर्ट रूम में बैठी उसकी मंगेतर कृतिका चौधरी भी सब देख रही थी। पहले उसने चीफ जस्टिस को देखा। फिर कांपते हुए आर्यन को और उसकी आंखों में एक ही पल में सारी तस्वीर साफ हो गई।
कल रात की पार्टी, सरला अम्मा, पुरानी नौकरानी, वृद्धाश्रम। उसे याद आ गया कि आर्यन ने किस तरह अपनी मां का अपमान किया था और आज सामने बैठी वही औरत इस प्रदेश की सबसे बड़ी जज थी। कृतिका के भीतर घृणा भर गई।
उसे लगने लगा कि आर्यन नाम का इंसान किसी के प्यार, किसी के सम्मान के लायक ही नहीं। लेकिन आर्यन उसके दिल पर एक-एक शब्द हथौड़े की तरह पढ़ रहे थे। उसने अपनी मां को हमेशा अनपढ़, साधारण, गमवार समझा।
उसे कभी यह जानने की इच्छा भी नहीं हुई कि उस मां की साड़ी के पीछे कितना बड़ा संघर्ष छिपा है। वह नहीं जानता था। सरला देवी सिंह शादी से पहले सरला वर्मा थी। दिल्ली की एक बेहद तेजतर्रार वकील।
पर जब आर्यन कुछ महीनों का था, तभी उसके पिता महेश प्रसाद सिंह का देहांत हो गया। एक औरत, वो भी अकेली। लेकिन मां होने का साहस उससे कहीं बड़ा था। उसने अपने करियर को छोड़ दिया। अपनी वकालत को ताला लगाया और अपना जीवन एक ही लक्ष्य पर लगा दिया। “मेरा बेटा एक दिन बड़ा आदमी बने।”
उसने सिलाई की जिससे उसके हाथ खून से लाल हो जाते थे। उसने दूसरों के घरों में खाना बनाया जिससे उसके पैर सूझ जाते थे। उसने टिफिन चलाया। खुद भूख ही रहती पर बेटे की किताबें खरीदती। आर्यन बड़ा हुआ, दिल्ली गया, जज बना और मां अकेली रह गई।
तभी उसके दिल में पुराना सपना फिर जागा। कानून पढ़ना है, जज बनना है। 40 की उम्र में लोग जहां जिंदगी की रफ्तार धीमी कर देते हैं, वहां इस मां ने फिर से अपनी कानून की किताबें खोलीं। रात-रात भर पढ़ाई की, नींद छोड़ी, सिलाई छोड़ी और फिर परीक्षा दी। हायर जुडिशियल सर्विस, एचजेएस और अपनी प्रतिभा और मेहनत से सीधी डिस्ट्रिक्ट जज बन गई।
10 सालों से वह जज थी, पर दूसरे राज्य मध्य प्रदेश में। आर्यन को कभी पता ही नहीं चला क्योंकि उसने कभी पूछा ही नहीं। “मां, तुम अकेली क्या करती हो?” वह बस हर महीने पैसे डाल देता था और खुद को फर्ज पूरा करने वाला बेटा समझता था।
किस्मत का खेल देखिए। उसी मां को प्रमोशन मिला और वह चीफ जस्टिस बनकर उसी शहर में आ गई जहां उनका बेटा अपनी पहली पोस्टिंग पर था। वह कल ही पहुंची थी। वह चाहती थी कि आज बेटे को सरप्राइज दें।
“कि उसकी मां अब उसी हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस है।” लेकिन बेटे ने तो उससे एक रात पहले ऐसा वार किया था जिससे मां का दिल ही टूटकर बिखर गया।
अब वही मां अदालत की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठी थी और बेटा सबसे नीचे खड़ा कांप रहा था। चीफ जस्टिस सरला वर्मा जब उस ऊंची गद्दी पर बैठीं, उनका सफेद जजों वाला लिबास ऐसा चमक रहा था जैसे कोई तेज रोशनी पूरे कमरे में फैल गई हो।
उनके चेहरे पर ना किसी मां की ममता दिखाई दे रही थी, ना कोई दुख, ना कोई पहचान। बस एक कठोर, सख्त और निष्पक्ष जज बैठी थी जो कानून की देवी बनकर सामने आई थी। आर्यन प्रताप सिंह को लगा कि उसकी सांसे रुक जाएंगी।
वह कुर्सी से उठने की हिम्मत नहीं कर रहा था। एक पल को तो लगा कि वह बेहोश होकर गिर जाएगा। उसने खुद से कहा, “नहीं, यह मेरी मां नहीं हो सकती। मेरी मां तो सरला देवी सिंह है। यह तो जस्टिस सरला वर्मा है।”
उसका दिमाग बहानों की तलाश करने लगा। “शायद यह सिर्फ उनकी हमशक्ल है। नाम तो आम है। हो सकता है यह कोई और हो।” लेकिन उसके दिल सच जान चुका था। यह वही आंखें थीं जो कभी रात भर जागकर उसकी पढ़ाई में उसका हाथ पकड़कर बैठी थीं।
यह वही चेहरा था जिसे वह कल ही अपने हाथों से वृद्धाश्रम में छोड़कर आया था। और आज वही चेहरा न्याय की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठा था। रजिस्ट्रार की आवाज पूरे कमरे में गूंजी। “माननीय लखनपुर उच्च न्यायालय की नई मुख्य न्यायाधीश, चीफ जस्टिस सरला वर्मा का स्वागत करें।”
पूरा कमरा तालियों से गूंज उठा और आर्यन का दिल बैठ गया। वह सोच रहा था, “मेरी मां चीफ जस्टिस, यह कैसे संभव है?” लेकिन सच से कोई कब तक भाग सकता है? कार्यवाही शुरू हुई। रजिस्ट्रार ने नए जजों का परिचय कराना शुरू किया और जैसे ही उसने कहा, “अब नए नियुक्त सिविल जज श्री आर्यन प्रताप सिंह,” आर्यन के पैर कांप उठे।
वह किसी तरह खड़ा हुआ। चीफ जस्टिस सरला वर्मा ने पहली बार अपनी नजरें कागजों से उठाई और सीधे अपने बेटे की आंखों में देखा। उन आंखों में ना कोई पहचान थी, ना कोई गुस्सा, ना प्यार। बस एक जज की ठंडी, कड़ी और नापतोल कर देखने वाली नजर।
वह नजर आर्यन के दिल में किसी चाकू की तरह उतरती चली गई। वह एक सेकंड भी उस नजर का सामना नहीं कर पाया। उसने तुरंत अपनी आंखें झुका लीं।
उसे लगा जैसे उसकी पूरी दुनिया उसी पल जमीन में समा गई। कोर्ट रूम में बैठी उसकी मंगेतर कृतिका चौधरी भी सब देख रही थी। पहले उसने चीफ जस्टिस को देखा। फिर कांपते हुए आर्यन को और उसकी आंखों में एक ही पल में सारी तस्वीर साफ हो गई।
कल रात की पार्टी, सरला अम्मा, पुरानी नौकरानी, वृद्धाश्रम। उसे याद आ गया कि आर्यन ने किस तरह अपनी मां का अपमान किया था और आज सामने बैठी वही औरत इस प्रदेश की सबसे बड़ी जज थी। कृतिका के भीतर घृणा भर गई।
उसे लगने लगा कि आर्यन नाम का इंसान किसी के प्यार, किसी के सम्मान के लायक ही नहीं। लेकिन आर्यन उसके दिल पर एक-एक शब्द हथौड़े की तरह पढ़ रहे थे। उसने अपनी मां को हमेशा अनपढ़, साधारण, गमवार समझा।
उसे कभी यह जानने की इच्छा भी नहीं हुई कि उस मां की साड़ी के पीछे कितना बड़ा संघर्ष छिपा है। वह नहीं जानता था। सरला देवी सिंह शादी से पहले सरला वर्मा थी। दिल्ली की एक बेहद तेजतर्रार वकील।
पर जब आर्यन कुछ महीनों का था, तभी उसके पिता महेश प्रसाद सिंह का देहांत हो गया। एक औरत, वो भी अकेली। लेकिन मां होने का साहस उससे कहीं बड़ा था। उसने अपने करियर को छोड़ दिया। अपनी वकालत को ताला लगाया और अपना जीवन एक ही लक्ष्य पर लगा दिया। “मेरा बेटा एक दिन बड़ा आदमी बने।”
उसने सिलाई की जिससे उसके हाथ खून से लाल हो जाते थे। उसने दूसरों के घरों में खाना बनाया जिससे उसके पैर सूझ जाते थे। उसने टिफिन चलाया। खुद भूख ही रहती पर बेटे की किताबें खरीदती। आर्यन बड़ा हुआ, दिल्ली गया, जज बना और मां अकेली रह गई।
तभी उसके दिल में पुराना सपना फिर जागा। कानून पढ़ना है, जज बनना है। 40 की उम्र में लोग जहां जिंदगी की रफ्तार धीमी कर देते हैं, वहां इस मां ने फिर से अपनी कानून की किताबें खोलीं। रात-रात भर पढ़ाई की, नींद छोड़ी, सिलाई छोड़ी और फिर परीक्षा दी। हायर जुडिशियल सर्विस, एचजेएस और अपनी प्रतिभा और मेहनत से सीधी डिस्ट्रिक्ट जज बन गई।
10 सालों से वह जज थी, पर दूसरे राज्य मध्य प्रदेश में। आर्यन को कभी पता ही नहीं चला क्योंकि उसने कभी पूछा ही नहीं। “मां, तुम अकेली क्या करती हो?” वह बस हर महीने पैसे डाल देता था और खुद को फर्ज पूरा करने वाला बेटा समझता था।
किस्मत का खेल देखिए। उसी मां को प्रमोशन मिला और वह चीफ जस्टिस बनकर उसी शहर में आ गई जहां उनका बेटा अपनी पहली पोस्टिंग पर था। वह कल ही पहुंची थी। वह चाहती थी कि आज बेटे को सरप्राइज दें।
“कि उसकी मां अब उसी हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस है।” लेकिन बेटे ने तो उससे एक रात पहले ऐसा वार किया था जिससे मां का दिल ही टूटकर बिखर गया।
अब वही मां अदालत की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठी थी और बेटा सबसे नीचे खड़ा कांप रहा था। चीफ जस्टिस सरला वर्मा जब उस ऊंची गद्दी पर बैठीं, उनका सफेद जजों वाला लिबास ऐसा चमक रहा था जैसे कोई तेज रोशनी पूरे कमरे में फैल गई हो।
उनके चेहरे पर ना किसी मां की ममता दिखाई दे रही थी, ना कोई दुख, ना कोई पहचान। बस एक कठोर, सख्त और निष्पक्ष जज बैठी थी जो कानून की देवी बनकर सामने आई थी। आर्यन प्रताप सिंह को लगा कि उसकी सांसे रुक जाएंगी।
वह कुर्सी से उठने की हिम्मत नहीं कर रहा था। एक पल को तो लगा कि वह बेहोश होकर गिर जाएगा। उसने खुद से कहा, “नहीं, यह मेरी मां नहीं हो सकती। मेरी मां तो सरला देवी सिंह है। यह तो जस्टिस सरला वर्मा है।”
उसका दिमाग बहानों की तलाश करने लगा। “शायद यह सिर्फ उनकी हमशक्ल है। नाम तो आम है। हो सकता है यह कोई और हो।” लेकिन उसके दिल सच जान चुका था। यह वही आंखें थीं जो कभी रात भर जागकर उसकी पढ़ाई में उसका हाथ पकड़कर बैठी थीं।
यह वही चेहरा था जिसे वह कल ही अपने हाथों से वृद्धाश्रम में छोड़कर आया था। और आज वही चेहरा न्याय की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठा था। रजिस्ट्रार की आवाज पूरे कमरे में गूंजी। “माननीय लखनपुर उच्च न्यायालय की नई मुख्य न्यायाधीश, चीफ जस्टिस सरला वर्मा का स्वागत करें।”
पूरा कमरा तालियों से गूंज उठा और आर्यन का दिल बैठ गया। वह सोच रहा था, “मेरी मां चीफ जस्टिस, यह कैसे संभव है?” लेकिन सच से कोई कब तक भाग सकता है? कार्यवाही शुरू हुई। रजिस्ट्रार ने नए जजों का परिचय कराना शुरू किया और जैसे ही उसने कहा, “अब नए नियुक्त सिविल जज श्री आर्यन प्रताप सिंह,” आर्यन के पैर कांप उठे।
वह किसी तरह खड़ा हुआ। चीफ जस्टिस सरला वर्मा ने पहली बार अपनी नजरें कागजों से उठाई और सीधे अपने बेटे की आंखों में देखा। उन आंखों में ना कोई पहचान थी, ना कोई गुस्सा, ना प्यार। बस एक जज की ठंडी, कड़ी और नापतोल कर देखने वाली नजर।
वह नजर आर्यन के दिल में किसी चाकू की तरह उतरती चली गई। वह एक सेकंड भी उस नजर का सामना नहीं कर पाया। उसने तुरंत अपनी आंखें झुका लीं।
उसे लगा जैसे उसकी पूरी दुनिया उसी पल जमीन में समा गई। कोर्ट रूम में बैठी उसकी मंगेतर कृतिका चौधरी भी सब देख रही थी। पहले उसने चीफ जस्टिस को देखा। फिर कांपते हुए आर्यन को और उसकी आंखों में एक ही पल में सारी तस्वीर साफ हो गई।
कल रात की पार्टी, सरला अम्मा, पुरानी नौकरानी, वृद्धाश्रम। उसे याद आ गया कि आर्यन ने किस तरह अपनी मां का अपमान किया था और आज सामने बैठी वही औरत इस प्रदेश की सबसे बड़ी जज थी। कृतिका के भीतर घृणा भर गई।
उसे लगने लगा कि आर्यन नाम का इंसान किसी के प्यार, किसी के सम्मान के लायक ही नहीं। लेकिन आर्यन उसके दिल पर एक-एक शब्द हथौड़े की तरह पढ़ रहे थे। उसने अपनी मां को हमेशा अनपढ़, साधारण, गमवार समझा।
उसे कभी यह जानने की इच्छा भी नहीं हुई कि उस मां की साड़ी के पीछे कितना बड़ा संघर्ष छिपा है। वह नहीं जानता था। सरला देवी सिंह शादी से पहले सरला वर्मा थी। दिल्ली की एक बेहद तेजतर्रार वकील।
पर जब आर्यन कुछ महीनों का था, तभी उसके पिता महेश प्रसाद सिंह का देहांत हो गया। एक औरत, वो भी अकेली। लेकिन मां होने का साहस उससे कहीं बड़ा था। उसने अपने करियर को छोड़ दिया। अपनी वकालत को ताला लगाया और अपना जीवन एक ही लक्ष्य पर लगा दिया। “मेरा बेटा एक दिन बड़ा आदमी बने।”
उसने सिलाई की जिससे उसके हाथ खून से लाल हो जाते थे। उसने दूसरों के घरों में खाना बनाया जिससे उसके पैर सूझ जाते थे। उसने टिफिन चलाया। खुद भूख ही रहती पर बेटे की किताबें खरीदती। आर्यन बड़ा हुआ, दिल्ली गया, जज बना और मां अकेली रह गई।
तभी उसके दिल में पुराना सपना फिर जागा। कानून पढ़ना है, जज बनना है। 40 की उम्र में लोग जहां जिंदगी की रफ्तार धीमी कर देते हैं, वहां इस मां ने फिर से अपनी कानून की किताबें खोलीं। रात-रात भर पढ़ाई की, नींद छोड़ी, सिलाई छोड़ी और फिर परीक्षा दी। हायर जुडिशियल सर्विस, एचजेएस और अपनी प्रतिभा और मेहनत से सीधी डिस्ट्रिक्ट जज बन गई।
10 सालों से वह जज थी, पर दूसरे राज्य मध्य प्रदेश में। आर्यन को कभी पता ही नहीं चला क्योंकि उसने कभी पूछा ही नहीं। “मां, तुम अकेली क्या करती हो?” वह बस हर महीने पैसे डाल देता था और खुद को फर्ज पूरा करने वाला बेटा समझता था।
किस्मत का खेल देखिए। उसी मां को प्रमोशन मिला और वह चीफ जस्टिस बनकर उसी शहर में आ गई जहां उनका बेटा अपनी पहली पोस्टिंग पर था। वह कल ही पहुंची थी। वह चाहती थी कि आज बेटे को सरप्राइज दें।
“कि उसकी मां अब उसी हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस है।” लेकिन बेटे ने तो उससे एक रात पहले ऐसा वार किया था जिससे मां का दिल ही टूटकर बिखर गया।
अब वही मां अदालत की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठी थी और बेटा सबसे नीचे खड़ा कांप रहा था। चीफ जस्टिस सरला वर्मा जब उस ऊंची गद्दी पर बैठीं, उनका सफेद जजों वाला लिबास ऐसा चमक रहा था जैसे कोई तेज रोशनी पूरे कमरे में फैल गई हो।
उनके चेहरे पर ना किसी मां की ममता दिखाई दे रही थी, ना कोई दुख, ना कोई पहचान। बस एक कठोर, सख्त और निष्पक्ष जज बैठी थी जो कानून की देवी बनकर सामने आई थी। आर्यन प्रताप सिंह को लगा कि उसकी सांसे रुक जाएंगी।
वह कुर्सी से उठने की हिम्मत नहीं कर रहा था। एक पल को तो लगा कि वह बेहोश होकर गिर जाएगा। उसने खुद से कहा, “नहीं, यह मेरी मां नहीं हो सकती। मेरी मां तो सरला देवी सिंह है। यह तो जस्टिस सरला वर्मा है।”
उसका दिमाग बहानों की तलाश करने लगा। “शायद यह सिर्फ उनकी हमशक्ल है। नाम तो आम है। हो सकता है यह कोई और हो।” लेकिन उसके दिल सच जान चुका था। यह वही आंखें थीं जो कभी रात भर जागकर उसकी पढ़ाई में उसका हाथ पकड़कर बैठी थीं।
यह वही चेहरा था जिसे वह कल ही अपने हाथों से वृद्धाश्रम में छोड़कर आया था। और आज वही चेहरा न्याय की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठा था। रजिस्ट्रार की आवाज पूरे कमरे में गूंजी। “माननीय लखनपुर उच्च न्यायालय की नई मुख्य न्यायाधीश, चीफ जस्टिस सरला वर्मा का स्वागत करें।”
पूरा कमरा तालियों से गूंज उठा और आर्यन का दिल बैठ गया। वह सोच रहा था, “मेरी मां चीफ जस्टिस, यह कैसे संभव है?” लेकिन सच से कोई कब तक भाग सकता है? कार्यवाही शुरू हुई। रजिस्ट्रार ने नए जजों का परिचय कराना शुरू किया और जैसे ही उसने कहा, “अब नए नियुक्त सिविल जज श्री आर्यन प्रताप सिंह,” आर्यन के पैर कांप उठे।
वह किसी तरह खड़ा हुआ। चीफ जस्टिस सरला वर्मा ने पहली बार अपनी नजरें कागजों से उठाई और सीधे अपने बेटे की आंखों में देखा। उन आंखों में ना कोई पहचान थी, ना कोई गुस्सा, ना प्यार। बस एक जज की ठंडी, कड़ी और नापतोल कर देखने वाली नजर।
वह नजर आर्यन के दिल में किसी चाकू की तरह उतरती चली गई। वह एक सेकंड भी उस नजर का सामना नहीं कर पाया। उसने तुरंत अपनी आंखें झुका लीं।
उसे लगा जैसे उसकी पूरी दुनिया उसी पल जमीन में समा गई। कोर्ट रूम में बैठी उसकी मंगेतर कृतिका चौधरी भी सब देख रही थी। पहले उसने चीफ जस्टिस को देखा। फिर कांपते हुए आर्यन को और उसकी आंखों में एक ही पल में सारी तस्वीर साफ हो गई।
कल रात की पार्टी, सरला अम्मा, पुरानी नौकरानी, वृद्धाश्रम। उसे याद आ गया कि आर्यन ने किस तरह अपनी मां का अपमान किया था और आज सामने बैठी वही औरत इस प्रदेश की सबसे बड़ी जज थी। कृतिका के भीतर घृणा भर गई।
उसे लगने लगा कि आर्यन नाम का इंसान किसी के प्यार, किसी के सम्मान के लायक ही नहीं। लेकिन आर्यन उसके दिल पर एक-एक शब्द हथौड़े की तरह पढ़ रहे थे। उसने अपनी मां को हमेशा अनपढ़, साधारण, गमवार समझा।
उसे कभी यह जानने की इच्छा भी नहीं हुई कि उस मां की साड़ी के पीछे कितना बड़ा संघर्ष छिपा है। वह नहीं जानता था। सरला देवी सिंह शादी से पहले सरला वर्मा थी। दिल्ली की एक बेहद तेजतर्रार वकील।
पर जब आर्यन कुछ महीनों का था, तभी उसके पिता महेश प्रसाद सिंह का देहांत हो गया। एक औरत, वो भी अकेली। लेकिन मां होने का साहस उससे कहीं बड़ा था। उसने अपने करियर को छोड़ दिया। अपनी वकालत को ताला लगाया और अपना जीवन एक ही लक्ष्य पर लगा दिया। “मेरा बेटा एक दिन बड़ा आदमी बने।”
उसने सिलाई की जिससे उसके हाथ खून से लाल हो जाते थे। उसने दूसरों के घरों में खाना बनाया जिससे उसके पैर सूझ जाते थे। उसने टिफिन चलाया। खुद भूख ही रहती पर बेटे की किताबें खरीदती। आर्यन बड़ा हुआ, दिल्ली गया, जज बना और मां अकेली रह गई।
तभी उसके दिल में पुराना सपना फिर जागा। कानून पढ़ना है, जज बनना है। 40 की उम्र में लोग जहां जिंदगी की रफ्तार धीमी कर देते हैं, वहां इस मां ने फिर से अपनी कानून की किताबें खोलीं। रात-रात भर पढ़ाई की, नींद छोड़ी, सिलाई छोड़ी और फिर परीक्षा दी। हायर जुडिशियल सर्विस, एचजेएस और अपनी प्रतिभा और मेहनत से सीधी डिस्ट्रिक्ट जज बन गई।
10 सालों से वह जज थी, पर दूसरे राज्य मध्य प्रदेश में। आर्यन को कभी पता ही नहीं चला क्योंकि उसने कभी पूछा ही नहीं। “मां, तुम अकेली क्या करती हो?” वह बस हर महीने पैसे डाल देता था और खुद को फर्ज पूरा करने वाला बेटा समझता था।
किस्मत का खेल देखिए। उसी मां को प्रमोशन मिला और वह चीफ जस्टिस बनकर उसी शहर में आ गई जहां उनका बेटा अपनी पहली पोस्टिंग पर था। वह कल ही पहुंची थी। वह चाहती थी कि आज बेटे को सरप्राइज दें।
“कि उसकी मां अब उसी हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस है।” लेकिन बेटे ने तो उससे एक रात पहले ऐसा वार किया था जिससे मां का दिल ही टूटकर बिखर गया।
अब वही मां अदालत की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठी थी और बेटा सबसे नीचे खड़ा कांप रहा था। चीफ जस्टिस सरला वर्मा जब उस ऊंची गद्दी पर बैठीं, उनका सफेद जजों वाला लिबास ऐसा चमक रहा था जैसे कोई तेज रोशनी पूरे कमरे में फैल गई हो।
उनके चेहरे पर ना किसी मां की ममता दिखाई दे रही थी, ना कोई दुख, ना कोई पहचान। बस एक कठोर, सख्त और निष्पक्ष जज बैठी थी जो कानून की देवी बनकर सामने आई थी। आर्यन प्रताप सिंह को लगा कि उसकी सांसे रुक जाएंगी।
वह कुर्सी से उठने की हिम्मत नहीं कर रहा था। एक पल को तो लगा कि वह बेहोश होकर गिर जाएगा। उसने खुद से कहा, “नहीं, यह मेरी मां नहीं हो सकती। मेरी मां तो सरला देवी सिंह है। यह तो जस्टिस सरला वर्मा है।”
उसका दिमाग बहानों की तलाश करने लगा। “शायद यह सिर्फ उनकी हमशक्ल है। नाम तो आम है। हो सकता है यह कोई और हो।” लेकिन उसके दिल सच जान चुका था। यह वही आंखें थीं जो कभी रात भर जागकर उसकी पढ़ाई में उसका हाथ पकड़कर बैठी थीं।
यह वही चेहरा था जिसे वह कल ही अपने हाथों से वृद्धाश्रम में छोड़कर आया था। और आज वही चेहरा न्याय की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठा था। रजिस्ट्रार की आवाज पूरे कमरे में गूंजी। “माननीय लखनपुर उच्च न्यायालय की नई मुख्य न्यायाधीश, चीफ जस्टिस सरला वर्मा का स्वागत करें।”
पूरा कमरा तालियों से गूंज उठा और आर्यन का दिल बैठ गया। वह सोच रहा था, “मेरी मां चीफ जस्टिस, यह कैसे संभव है?” लेकिन सच से कोई कब तक भाग सकता है? कार्यवाही शुरू हुई। रजिस्ट्रार ने नए जजों का परिचय कराना शुरू किया और जैसे ही उसने कहा, “अब नए नियुक्त सिविल जज श्री आर्यन प्रताप सिंह,” आर्यन के पैर कांप उठे।
वह किसी तरह खड़ा हुआ। चीफ जस्टिस सरला वर्मा ने पहली बार अपनी नजरें कागजों से उठाई और सीधे अपने बेटे की आंखों में देखा। उन आंखों में ना कोई पहचान थी, ना कोई गुस्सा, ना प्यार। बस एक जज की ठंडी, कड़ी और नापतोल कर देखने वाली नजर।
वह नजर आर्यन के दिल में किसी चाकू की तरह उतरती चली गई। वह एक सेकंड भी उस नजर का सामना नहीं कर पाया। उसने तुरंत अपनी आंखें झुका लीं।
उसे लगा जैसे उसकी पूरी दुनिया उसी पल जमीन में समा गई। कोर्ट रूम में बैठी उसकी मंगेतर कृतिका चौधरी भी सब देख रही थी। पहले उसने चीफ जस्टिस को देखा। फिर कांपते हुए आर्यन को और उसकी आंखों में एक ही पल में सारी तस्वीर साफ हो गई।
कल रात की पार्टी, सरला अम्मा, पुरानी नौकरानी, वृद्धाश्रम। उसे याद आ गया कि आर्यन ने किस तरह अपनी मां का अपमान किया था और आज सामने बैठी वही औरत इस प्रदेश की सबसे बड़ी जज थी। कृतिका के भीतर घृणा भर गई।
उसे लगने लगा कि आर्यन नाम का इंसान किसी के प्यार, किसी के सम्मान के लायक ही नहीं। लेकिन आर्यन उसके दिल पर एक-एक शब्द हथौड़े की तरह पढ़ रहे थे। उसने अपनी मां को हमेशा अनपढ़, साधारण, गमवार समझा।
उसे कभी यह जानने की इच्छा भी नहीं हुई कि उस मां की साड़ी के पीछे कितना बड़ा संघर्ष छिपा है। वह नहीं जानता था। सरला देवी सिंह शादी से पहले सरला वर्मा थी। दिल्ली की एक बेहद तेजतर्रार वकील।
पर जब आर्यन कुछ महीनों का था, तभी उसके पिता महेश प्रसाद सिंह का देहांत हो गया। एक औरत, वो भी अकेली। लेकिन मां होने का साहस उससे कहीं बड़ा था। उसने अपने करियर को छोड़ दिया। अपनी वकालत को ताला लगाया और अपना जीवन एक ही लक्ष्य पर लगा दिया। “मेरा बेटा एक दिन बड़ा आदमी बने।”
उसने सिलाई की जिससे उसके हाथ खून से लाल हो जाते थे। उसने दूसरों के घरों में खाना बनाया जिससे उसके पैर सूझ जाते थे। उसने टिफिन चलाया। खुद भूख ही रहती पर बेटे की किताबें खरीदती। आर्यन बड़ा हुआ, दिल्ली गया, जज बना और मां अकेली रह गई।
तभी उसके दिल में पुराना सपना फिर जागा। कानून पढ़ना है, जज बनना है। 40 की उम्र में लोग जहां जिंदगी की रफ्तार धीमी कर देते हैं, वहां इस मां ने फिर से अपनी कानून की किताबें खोलीं। रात-रात भर पढ़ाई की, नींद छोड़ी, सिलाई छोड़ी और फिर परीक्षा दी। हायर जुडिशियल सर्विस, एचजेएस और अपनी प्रतिभा और मेहनत से सीधी डिस्ट्रिक्ट जज बन गई।
10 सालों से वह जज थी, पर दूसरे राज्य मध्य प्रदेश में। आर्यन को कभी पता ही नहीं चला क्योंकि उसने कभी पूछा ही नहीं। “मां, तुम अकेली क्या करती हो?” वह बस हर महीने पैसे डाल देता था और खुद को फर्ज पूरा करने वाला बेटा समझता था।
किस्मत का खेल देखिए। उसी मां को प्रमोशन मिला और वह चीफ जस्टिस बनकर उसी शहर में आ गई जहां उनका बेटा अपनी पहली पोस्टिंग पर था। वह कल ही पहुंची थी। वह चाहती थी कि आज बेटे को सरप्राइज दें।
“कि उसकी मां अब उसी हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस है।” लेकिन बेटे ने तो उससे एक रात पहले ऐसा वार किया था जिससे मां का दिल ही टूटकर बिखर गया।
अब वही मां अदालत की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठी थी और बेटा सबसे नीचे खड़ा कांप रहा था। चीफ जस्टिस सरला वर्मा जब उस ऊंची गद्दी पर बैठीं, उनका सफेद जजों वाला लिबास ऐसा चमक रहा था जैसे कोई तेज रोशनी पूरे कमरे में फैल गई हो।
उनके चेहरे पर ना किसी मां की ममता दिखाई दे रही थी, ना कोई दुख, ना कोई पहचान। बस एक कठोर, सख्त और निष्पक्ष जज बैठी थी जो कानून की देवी बनकर सामने आई थी। आर्यन प्रताप सिंह को लगा कि उसकी सांसे रुक जाएंगी।
वह कुर्सी से उठने की हिम्मत नहीं कर रहा था। एक पल को तो लगा कि वह बेहोश होकर गिर जाएगा। उसने खुद से कहा, “नहीं, यह मेरी मां नहीं हो सकती। मेरी मां तो सरला देवी सिंह है। यह तो जस्टिस सरला वर्मा है।”
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