रात के ठीक ग्यारह बजे थे।
पटना की सड़कें किसी सुनसान सपने की तरह फैली थीं। स्ट्रीटलाइट्स की पीली रोशनी ज़मीन पर ऐसे गिर रही थी मानो अँधेरा भी थक कर बैठ गया हो। हवा में हल्की नमी थी, और हर गुजरती सांस के साथ सन्नाटा और गहरा होता जा रहा था।

उस रात कोई नहीं जानता था कि यह सन्नाटा कुछ ही घंटों में एक ऐसी चीख में बदलेगा, जो पूरे देश को झकझोर देगी।

इसी सन्नाटे में तेज़ क़दमों से चलती आ रही थी—
अनिता चौहान।

एक सख़्त, अनुशासित और ईमानदार IPS अधिकारी।
ड्यूटी उसके लिए नौकरी नहीं, ज़िम्मेदारी थी।
वह थकी हुई थी, लेकिन थकान से ज़्यादा उसके चेहरे पर दृढ़ता थी।

लेकिन यह कहानी अनिता से बहुत पहले शुरू हो चुकी थी…


एक साधारण परिवार, एक असाधारण त्रासदी

कर्नाटक के उडुपी ज़िले में ब्रह्मावर तालुका के एक शांत से इलाके में स्थित था मिलन अपार्टमेंट
यहीं रहता था गणिका परिवार।

रामकृष्ण गणिका — दुबई में काम करने वाला एक NRI।
उसकी पत्नी — विशाला गणिका, शांत, पढ़ी-लिखी, सलीकेदार महिला।
और उनकी सात साल की बेटी — मासूम, चंचल, माँ की परछाईं।

साल 2021 की गर्मियों में विशाला अपनी बेटी के साथ भारत आई थी।
पति दुबई में ही था।
घर वही फ्लैट — जिसे रामकृष्ण ने बड़े शौक से खरीदा था।

29 जून को वे भारत पहुँचे।
कुछ दिन शांति से बीते।
फिर 12 जुलाई आया।


12 जुलाई — वो सुबह जो आख़िरी बन गई

सुबह करीब 9 बजे, विशाला अपनी बेटी और माता-पिता के साथ ऑटो से मायके पहुँची।
थोड़ी देर रुककर उसने कहा—
“मैं बैंक जाकर आती हूँ, कुछ पैसे निकालने हैं।”

उसने बेटी को पिता के हाथों सौंपा और उसी ऑटो से निकल गई।

किसी ने नहीं सोचा था कि यह उनकी आख़िरी मुलाक़ात होगी।

घंटे बीत गए।
फोन नहीं उठा।
चिंता बढ़ने लगी।

पिता ने सोचा शायद फ्लैट चली गई होगी।
वे बड़ी बेटी को लेकर सीधे वहाँ पहुँचे।

दरवाज़ा अधखुला था।

अंदर का दृश्य…
मानो किसी ने घर को उधेड़ दिया हो।

और फिर—
फर्श पर पड़ी थी विशाला।

निश्चल।
निःशब्द।

गले पर गहरे निशान।
पास में मोबाइल चार्जर।

माँ चीख पड़ी।
पिता वहीं बैठ गए — जैसे ज़मीन खिसक गई हो।

पुलिस आई।
पोस्टमॉर्टम हुआ।
निष्कर्ष साफ़ था — गला घोंटकर हत्या।


शक की पहली परत

घर में लूट का नाटक था।
गहने गायब थे।

लेकिन कुछ अजीब था।

चाय के दो कप रखे थे।
गैस पर उबली चाय ठंडी हो चुकी थी।

मतलब कोई ऐसा था जो घर में आराम से बैठा था।
जिसे चाय पिलाई गई थी।

और वह कोई अजनबी नहीं हो सकता था।


परतें खुलने लगीं

पुलिस ने कॉल डिटेल खंगाली।

एक बात चौंकाने वाली थी—
विशाला ने मरने से ठीक पहले अपने पति से बात की थी।

रामकृष्ण उस समय दुबई में था।

फोन पर बात सामान्य थी, लेकिन कॉल के तुरंत बाद उसने भारत के एक अनजान नंबर पर कॉल किया था।

यहीं से शक गहराया।

जाँच आगे बढ़ी।

पता चला—
रामकृष्ण ने महीनों पहले ही एक “काम” की योजना बनाई थी।

उसका दोस्त धर्मेंद्र सुहानी
और उसके ज़रिये संपर्क हुआ सुपारी किलर स्वामीनाथन निषाद से।

डील तय हुई — ₹5 लाख में हत्या।


साजिश का खाका

रामकृष्ण ने जानबूझकर विशाला को भारत बुलाया।
बहाना — प्रॉपर्टी के काग़ज़।

उसने जानबूझकर उसे अकेला छोड़ा।
फिर फोन कर कहा—
“मेरे दोस्त आए हैं, तुम्हारे लिए गिफ्ट लाए हैं।”

विशाला को ज़रा भी शक नहीं हुआ।

उसने चाय बनाई।
हँसकर बात की।

और वही चाय…
उसकी आख़िरी चाय बन गई।

चार्जर के तार से उसका गला घोंटा गया।
फिर घर में लूट का नाटक रचा गया।


सच का खुलासा

पुलिस ने एक-एक कड़ी जोड़ी।

कॉल रिकॉर्ड।
बैंक ट्रांजेक्शन।
सीसीटीवी फुटेज।
गवाह।

अंततः सब सामने आ गया।

रामकृष्ण ने स्वीकार किया—
उसे अपनी पत्नी पर शक था।
उसकी हँसी, उसकी आज़ादी, उसका बात करना उसे खटकता था।

बिना सबूत, बिना सच्चाई—
उसने शक को सच मान लिया।

और एक ज़िंदगी खत्म कर दी।


न्याय की गूंज

सभी आरोपी गिरफ्तार हुए।
चार्जशीट दाख़िल हुई।
अदालत में मामला चला।

विशाला अब नहीं थी।
लेकिन उसकी कहानी ज़िंदा थी।

एक माँ, एक पत्नी, एक बेटी—
जो सिर्फ़ इसलिए मारी गई
क्योंकि उसने खुलकर जीना चाहा।


अंतिम सच

यह सिर्फ़ एक हत्या नहीं थी।
यह भरोसे की हत्या थी।
एक औरत की आज़ादी की हत्या थी।

और सबसे बड़ा सवाल—

क्या शक, प्यार से बड़ा हो सकता है?

अगर हाँ…
तो समाज को खुद से डरना चाहिए।

क्योंकि जब शक इंसान बन जाता है,
तो इंसान दरिंदा बन जाता है।