कभी साथ चले हाथ, आज खामोशी की दीवार: सचिन, कविता और महिमा की कहानी

कभी जिन हाथों ने एक-दूसरे की हथेली थामकर वक्त से जिद की थी कि साथ रहेंगे चाहे हालात जैसे भी हों, आज उन्हीं हाथों के बीच खामोशी की ऐसी दीवार खड़ी हो चुकी थी जिसे तोड़ने की हिम्मत ना वक्त में थी, ना हालात में।
बस एक उम्मीद थी जो सालों बाद फिर उसी मोड़ पर ले आई थी जहां कभी साथ चला करते थे।

सचिन उस दिन एक पुराने क्लाइंट से मिलने गया था। काम छोटा था, पर लोकेशन वही थी—वही मोहल्ला जहां बरसों पहले वह अपनी पत्नी कविता के साथ चाय पीने आता था।
गलियां वही थीं, दुकानों के नाम बदल गए थे। दीवारें फिर से रंग ली गई थीं, मगर कुछ यादें आज भी उन ईंटों में चुपचाप दबी हुई थीं।

कार से उतरकर सचिन जैसे अतीत में उतर गया।
नुक्कड़ पर एक छोटी सी दुकान दिखी—लकड़ी का ठेला, आम, केले, संतरे, सब्जियां, और एक पुराना गैस चूल्हा जिस पर चाय चल रही थी।
दो बेंचें, लोहे की पेटी, कुछ गिलास और कपड़े का झोला।
उस पूरे सेटअप के बीच एक औरत खड़ी थी—सांवली सी, पसीने से भीगी पेशानी, माथे पर बड़ा तिल और हाथों में चाय की केतली।
वो कभी चाय छानती, कभी फल झाड़ती, कभी ग्राहक से पूछती—”क्या दूं साहब? चाय या फल?”

सचिन के कदम वही रुक गए।
वो चेहरा, वो चाल, वो माथे का तिल—सब पहचानने जैसा था, पर यकीन करने जैसा नहीं।
वो कविता थी। वही कविता जिससे उसने कभी सात फेरे लिए थे।
जिससे वादा किया था—तेरे बिना अधूरा हूं मैं।
और आज, धूप में खड़ी एक चाय और फल की दुकान चला रही थी।
शायद जिंदगी के हालात से लड़ती हुई, शायद अपनी बेटी के इलाज का बोझ उठाती हुई, और सबसे ऊपर—अपने स्वाभिमान को बचाने के लिए हर सुबह खुद से एक नई जंग लड़ती हुई।

सचिन के होठ सूखने लगे।
उसने चेहरा ढक लिया।
अब वह पहले जैसा नहीं था—चेहरा भर गया था, रंग साफ था, कपड़े महंगे थे, चाल में रुतबा था।
लेकिन उस एक पल में वह फिर वही सचिन बन गया था, जो कभी कविता की हर बात उसकी आंखों से पढ़ लिया करता था।

वह कुछ देर चुपचाप खड़ा रहा।
भीड़ थी, आवाजें सुनाई नहीं दे रही थीं।
सिर्फ एक शोर था—अंदर से उठता हुआ।
कविता अपने काम में लगी रही। उसकी आंखों में थकान थी, पर इरादों में कोई समझौता नहीं।

सचिन खुद को संभालकर धीरे-धीरे उसके पास पहुंचा।
थोड़ा साइड में खड़ा हुआ।
कविता ने बिना देखे पूछा, “क्या लेंगे साहब? चाय, फल?”
सचिन की आवाज कांप रही थी, लेकिन उसने खुद को रोका—”एक कड़क चाय और कुछ आम दिखा दीजिए।”

कविता ने चाय छाननी शुरू की और झोले से आम की टोकरी निकाली।
सचिन की नजर टोकरी के पास रखी एक पुरानी तस्वीर पर पड़ी—एक मासूम बच्ची की मुस्कुराती सी झलक।
कमजोर चेहरा, चमकती आंखें, जैसे अब भी किसी को “पापा” कहने की आस हो।
वह ठिटक गया।
वह तस्वीर उसकी रग-रग में उतर गई थी।

उसने पूछा, “ये आम कैसे दिए?”
कविता बोली, “सुबह ही लाई हूं, साहब। मीठे हैं, मुरझा गए हैं थोड़ा। ₹100 किलो, खाकर देख लीजिए।”
सचिन बोला, “सारे दे दो।”
कविता थोड़ी चौकी, फिर मुस्कुराई नहीं—बस झट से तोलने लगी।
“8 किलो हैं, ₹800 होंगे। आप सब ले रहे हैं, तो 640 दे दीजिए।”
सचिन ने चुपचाप दो 500 के नोट पकड़ा दिए और मुड़ने लगा।
तभी पीछे से आवाज आई—”साहब, ₹200 ज्यादा दे दिए, भीख नहीं चाहिए।”

सचिन वहीं रुक गया।
कविता पास आई, उसके हाथ में ₹200 रखे और बोली, “इज्जत बचाने को यह दुकान है, कमजोर नहीं हूं।”

सचिन की आंखें भर आईं।
कुछ पल चुप रहा।
फिर कांपती आवाज में बोला, “तुम्हारा पति कुछ नहीं करता क्या?”
कविता ने एक गहरी सांस ली, चाय की केतली रखते हुए बोली, “12 साल पहले तलाक हो गया साहब।”

सचिन का दिल जैसे किसी ने निचोड़ लिया हो।
वह एक पल के लिए थम गया।
फिर अपने झोले को संभालता हुआ धीमे-धीमे उस दुकान से हटने लगा।
पर उसकी आंखें अब भी उसी तस्वीर पर अटकी थीं।

कविता आम समेट रही थी, गैस का चूल्हा बंद कर चुकी थी।
झोले में बचे हुए फल रखे और थके हुए ढंग से दुकान की पेटी उठाकर चल पड़ी।
सचिन अब भी थोड़ी दूरी पर खड़ा था—हाथ में झोला, दिल में बवंडर।

उसने खुद से पूछा—क्या वो मेरी बेटी थी? क्या मैंने सच में सब कुछ खो दिया?

वो ज्यादा सोच नहीं पाया।
बस उसके कदम खुद-ब-खुद कविता के पीछे चल पड़े।
गली तंग थी—बिजली के झूलते तार, छतों से टपकती बूंदें, दीवारों पर नाम मिटे हुए पोस्टर, हर दरवाजे पर थकी हुई जिंदगी।
लेकिन कविता जहां जाकर रुकी, वो घर अलग था—छोटा सा टूटा-फूटा मकान, सामने बरामदे में दो खटिया।
एक खटिया पर बूढ़ी औरत—सूखे हाथ, धंसी आंखें, चुपचाप आकाश की ओर देख रही थी।
दूसरी खटिया पर दस साल की लड़की—कमजोर, सांवली, सुनी आंखें, बिखरे बाल, पास में एक खिलौना रखा था, लेकिन उसे छू भी नहीं रही थी।

सचिन वहीं रुक गया।
कविता ने घर का दरवाजा खोला, बोझ उतारा, भीतर चली गई।
सचिन की निगाह उस बच्ची पर अटक गई थी—वो बच्ची जो बस खटिया पर लेटी थी, ना हिल रही थी, ना किसी से कुछ कह रही थी।
वह महिमा थी—उसकी अपनी बेटी।
अब कोई तस्वीर नहीं, अब कोई झलक नहीं—अब सच सामने था।

सचिन ने धीरे से एक कदम बढ़ाया, लेकिन उसके सीने में कुछ कसने लगा।
उसकी बेटी इतनी कमजोर, इतनी चुप।
उसे याद आया वो दिन जब महिमा एक साल की थी और उसकी गोद से उतरने का नाम नहीं लेती थी।
आज वह खटिया पर अकेली पड़ी थी, जैसे जिंदगी से भी नाराज हो।

वह और पास नहीं जा सका।
बस दीवार के साए में खड़ा होकर देखता रहा।
उसकी आंखें भर आईं, दिल से सिर्फ एक ख्याल निकला—इतनी मासूम जान मेरी गलती क्यों भुगत रही है?

तभी अंदर से कविता बाहर आई, एक गिलास में पानी लेकर।
जैसे ही उसकी नजर सचिन पर पड़ी, वह ठहर गई।
फिर बिना कुछ कहे उसके पास आई—चेहरे पर ना गुस्सा, ना हैरानी, बस एक थकी हुई लेकिन स्थिर आवाज, “यहां तक आ ही गए?”

सचिन कुछ बोल नहीं पाया।
आंखें झुका लीं।
कविता ने महिमा की ओर देखा, फिर सचिन की आंखों में झांकते हुए बोली, “अब देख भी लिया, अब शायद समझ भी आ गया होगा कि अकेले कितना मुश्किल होता है सब कुछ उठाना।”

सचिन की आवाज कांप रही थी—”यह महिमा है ना?”
कविता की आंखों में नमी आ गई, लेकिन कोई इल्जाम नहीं लगाया।
“हां, यह वही है जो कभी तुम्हें पापा कहती थी और अब सिर्फ बीमार पड़ी रहती है।”

सचिन के होंठ कांप गए।
खुद को बमुश्किल संभाला।
फिर धीमे से बोला, “मुझे नहीं पता था कि चीज इतनी…”
कविता ने बात बीच में ही काट दी, “पता होता तो क्या करते?”

सचिन चुप हो गया।
महिमा की ओर देखा, जो अब भी वही थी, उसी खटिया पर।
थोड़ी देर बाद महिमा ने धीरे से करवट ली और अपनी सुनी आंखों से एक बार सामने देखा।
वो नजरें सचिन से मिलीं।
सचिन घबरा गया, पीछे हो गया, जैसे किसी गुनाह में पकड़ा गया हो।
पर महिमा ने कुछ नहीं कहा।
वह सिर्फ देख रही थी, जैसे कोई भूली हुई पहचान याद करने की कोशिश कर रही हो।

कविता ने कहा, “अब अगर वाकई कुछ करना चाहते हो तो एक बार सीधे उसके सामने जाकर खड़े हो जाओ। ना भूत की तरह, ना छुप कर—बस एक बार, बाप बनकर।”

सचिन कुछ नहीं बोला।
दीवार से पीठ लगाकर खड़ा रह गया।
महिमा देख रही थी, उसकी आंखों में ना डर था, ना खुशी—बस एक सवाल था जो शायद उसे खुद भी समझ नहीं आ रहा था।

महिमा अब खटिया से थोड़ा उठकर बैठ चुकी थी।
चेहरे पर वही थकी हुई मासूमियत थी, जो उन बच्चों में देखी जाती है जो बोलते कम हैं, सहते ज्यादा हैं।
उसने मां की ओर देखा, फिर उस अनजान आदमी की तरफ, जो दीवार के पास थोड़ी दूरी से उसे देख रहा था।
वह आदमी जिसकी आंखों में डर भी था, पछतावा भी और एक अनकही पहचान की उम्मीद भी।

कविता खामोशी से महिमा के पास गई, धीरे से उसके सर पर हाथ फेरा और हल्के स्वर में कहा, “बेटा, यह तुम्हारे पापा हैं।”
महिमा कुछ नहीं बोली, बस आंखें उठाकर सचिन को देखा, फिर नीचे देखने लगी।
सचिन खुद को रोक नहीं पाया, धीरे-धीरे आगे बढ़ा, महिमा के सामने जमीन पर घुटनों के बल बैठ गया।
आंखों से आंसू बहने लगे।
कांपती आवाज में कहा, “मैं बहुत सालों तक चुप रहा बेटा, बहुत बड़ी गलती कर दी। मैंने तुम्हें भी छोड़ दिया, तुम्हारी मां को भी और खुद को भी खो बैठा। पता नहीं अब हक रह गया है या नहीं, पर क्या तुम बस एक बार मुझे माफ कर सकती हो?”

महिमा की आंखों में सीधा गुस्सा नहीं था, कोई भाव भी नहीं था—बस एक खालीपन था जो कह रहा था, “इतने साल कहां थे पापा?”

कुछ पल खामोशी रही।
फिर महिमा ने धीरे से हाथ बढ़ाया और सचिन के आंसुओं से भीगे चेहरे को छुआ।
कोई शब्द नहीं निकले उसके होठों से, पर स्पर्श में वह सब था जो एक बच्ची ने कभी कह नहीं पाया था।
फिर महिमा उठी और धीरे से सचिन के गले लग गई, बहुत धीमे से, बहुत देर तक।
सचिन ने अपनी बेटी को सीने से चिपका लिया।
वो रो रहा था, पर अब उसकी रुलाई में कमजोरी नहीं थी, बल्कि वह पीड़ा थी जो सालों से उसकी आत्मा में बंद थी।

कविता पास ही खड़ी थी, उसकी आंखें भीग चुकी थीं।
वह कुछ नहीं बोली, बस महिमा के सर पर हाथ रख दिया।
कुछ देर बाद महिमा फिर से खटिया पर लेट गई, करवट लेकर दीवार की ओर मुंह कर लिया।
शायद उसकी आंखें बंद थीं, या शायद वह अब भी उस पर्श को अपने सीने में समेट रही थी।

सचिन वहीं जमीन पर बैठा था—चुप, निशब्द।
उसकी आंखें महिमा पर थीं, पर भीतर कुछ और ही चल रहा था।
मन बार-बार कह रहा था—अब उससे पूछ कि क्या तू उसका पापा बन सकता है फिर से?
अब कविता से कहे कि तू उसके साथ फिर से जिंदगी जीना चाहता है।

लेकिन उसकी आंखें कविता की ओर गईं—वो अब भी खामोश खड़ी थी, ना कोई इशारा, ना कोई रोक।
बस वही पुरानी थकावट थी उसकी पलकों में, जिसे किसी सफाई की जरूरत नहीं थी।

सचिन ने चुपचाप अपनी हथेलियां जमीन पर रखीं, धीरे से खुद को उठाया और फिर एक बार महिमा की ओर देखा।
कुछ बोलना चाहा, पर शब्द दिल के दर्द में डूबकर लौट गए।
वो मुड़ा, एक कदम चला, फिर रुका—जैसे दिल पीछे खींच रहा हो।
लेकिन जुबान कह रही थी—अभी नहीं।
उसने बिना कोई आवाज किए गली से बाहर कदम रख दिए।
ना दरवाजा खटका, ना अलविदा कहा।
बस चल पड़ा—जैसे कोई हारकर नहीं, बल्कि वक्त का कर्ज चुकाने, फिर से लौटने का वादा लेकर गया हो।

गाड़ी के पास पहुंचा, दरवाजा खोला, लेकिन बैठने से पहले आसमान की ओर देखा।
सुनसान आकाश, शांत हवा और बहुत गहराई से उठती एक आवाज—तू लौटेगा ना?

रात भर सचिन सुन नहीं सका।
करवटें बदलते हुए उसकी आंखों के आगे बस एक ही तस्वीर घूमती रही—महिमा का चेहरा।
वो नजरें जो कुछ नहीं बोली और सब कुछ कह गईं।
तकिए पर सिर रखा, लेकिन नींद जैसे सिर्फ बेटी के पास चली गई थी।
जिससे मिलने में उसे 9 साल लग गए थे।

उसने खुद से कहा—मैं आज सिर्फ देखकर लौट आया हूं।
लेकिन अब देखना बाकी है वो प्यार, वो साथ और वो समाज जो एक बेटी को सबसे पहले उसके पापा से मिलना चाहिए।

रात आंखों में बीती थी।
सचिन पलंग पर पड़ा रहा, करवटें बदलता रहा, बार-बार वही एक पल याद आता रहा—महिमा का, वो चुपचाप गले लगना और कविता की वो शांत निगाहें जिसमें सवाल भी थे और शायद जवाब भी।

सुबह होते-होते वो उठ खड़ा हुआ, पर कदमों में अब डर नहीं था—बल्कि एक संकल्प था।
वह सीधा उस कोने वाली दुकान पर गया जहां से वह कभी कविता के लिए चूड़ियां खरीदा करता था।
आज पहली बार उसके हाथ कांप नहीं रहे थे, बल्कि चेहरे पर वही ठहराव था, जो वक्त से बहुत कुछ सीखने के बाद पाया हो।

उसने एक छोटा सा पैकेट बनवाया—कुछ रंगीन चूड़ियां, एक जोड़ी बालियां और एक सिंपल सा मंगलसूत्र।
कुछ कीमती नहीं, लेकिन हर चीज में एक अधूरे रिश्ते की भरपाई छुपी थी।

वह किराने की दुकान गया—दूध, फल, दवाइयां, बिस्कुट, किताबें, एक छोटी सी डॉल—सब कुछ अपने हाथों से पैक करवाता रहा।
वो नहीं चाहता था कि आज फिर कोई बच्ची उसे सिर्फ एक गले लगाने वाले अजनबी की तरह देखे।
आज वह पूरी तरह पापा बनकर जाना चाहता था।

दोपहर ढलने लगी थी, गर्मी भी कुछ कम हो गई थी।
सचिन ने कार का डिक्की बंद की और उसी गली की तरफ बढ़ गया जहां कल उसकी जिंदगी का सबसे गहरा आईना मिला था।

गली अब भी वैसी ही थी—टपकती टंकियां, तंग दरवाजे, हर चौखट पर वही थकी हुई जिंदगी।
लेकिन आज सचिन का चलना अलग था—कल उसके कदम कांप रहे थे, आज उसकी चाल में भरोसा था।

कविता का घर नजदीक आने लगा, दूर से ही महिमा खटिया पर बैठी दिखी—आज वह लेटी नहीं थी, बैठकर कोई पुरानी कॉपी में कुछ लिख रही थी।
उसके पास वही खिलौना रखा था, जिसे शायद सालों से किसी ने छुआ भी नहीं था।

सचिन रुक गया, गहरी सांस ली, धीरे-धीरे घर की ओर बढ़ा जिसे उसने खुद से कभी बहुत दूर कर दिया था।
महिमा ने उसे देखा और इस बार उसके चेहरे पर अजनबियत नहीं थी—थोड़ी चौकी जरूर, पर आंखों में हल्की चमक थी।
“पापा,” उसने धीमे से कहा।

सचिन रुक नहीं सका—झट से बाहें फैलाईं, महिमा दौड़कर गले लग गई।
इस बार वह लिपटने में नहीं हिचकी—जैसे भरोसा हो गया हो कि यह गले लगना बस एक पल की चीज नहीं, अब यह रोज का होगा।

वो उसे गोद में उठाए भीतर पहुंचा।
कविता दरवाजे पर खड़ी थी—ना मुस्कान, ना सवाल, बस इंतजार का सन्नाटा उसकी आंखों में।

सचिन ने महिमा को खटिया पर बैठाया, डिक्की से लाया थैला खोला—दवाइयां, दूध, किताबें, फल, खिलौने, सब कुछ सामने रख दिया।
फिर जेब से छोटा पैकेट निकाला, कविता की तरफ बढ़ाया—”यह तुम्हारे लिए है।”

कविता कुछ पल उसे देखती रही, फिर पैकेट खोला।
चूड़ियों के बीच रखा मंगलसूत्र देखकर चौंक गई।
आंखें भीग गईं।
कुछ बोलना चाहा, आवाज भीतर ही टूट गई।

सचिन उसके पास आया, बहुत धीमे से बोला—”उस दिन तुमने कुछ नहीं कहा था, लेकिन तुम्हारी आंखों में मैं देख पाया था कि तुमने अभी सब पूरी तरह खोया नहीं है।
अगर माफ कर सको तो इस बार सिर्फ मेरी बेटी को नहीं, मुझे भी अपना बना लो।”

कविता कांप रही थी।
हाथ बढ़ाया, मंगलसूत्र थामा, देर तक उसे देखती रही।
फिर धीरे से कहा, “अगर आज के बाद फिर वही गलती की तो ये चूड़ियां फिर कभी नहीं पहनूंगी।”

सचिन की आंखें भर आईं।
सिर झुका लिया, बस इतना कहा—”इस बार तुमसे नहीं, अपने आप से भी कोई झूठ नहीं बोलूंगा।”

उस शाम सचिन पहली बार उस घर में ठहरा, जहां कल तक वह चुपचाप खड़ा रहता था।
आज उसी घर के अंदर से महिमा की खिलखिलाहट सुनाई दे रही थी।
कविता रसोई में थी, चूल्हे पर चाय चढ़ी थी और गैस की धीमी आवाज के साथ चूड़ियों की खनक भी गूंज रही थी।
वो मंगलसूत्र अब उसकी गर्दन में था, जिसे सालों पहले आंसुओं में बहा दिया गया था।
महिमा दरवाजे के पास बैठी अपनी नई किताबों के पन्ने पलट रही थी, बीच-बीच में सचिन को देखकर मुस्कुरा रही थी—जैसे हर बार आंखों से कहती हो, “अब कभी मत जाना पापा।”

सचिन चुपचाप खिड़की के पास बैठा था—चेहरा शांत था।
कई सालों बाद उसे कोई दौलत, कोई दुकान, कुछ भी याद नहीं आ रहा था।
बस ये तीन जिंदगियां दिख रही थीं, जो आज एक साथ सांस ले रही थीं।

पर सुख की शुरुआत से पहले कुछ अधूरे पन्ने बंद करने जरूरी थे।
अगले दिन सुबह सचिन फिर अपनी दुकान पर पहुंचा।
जैसे ही अंदर गया, बड़ा भाई सामने आ गया—वही चेहरा, वही आवाज, लेकिन अब आंखों में ताजुब था।
“सचिन कहां था? दो दिन से फोन भी बंद, दुकान का हिसाब रुका है।”

सचिन शांत रहा, धीरे से कुर्सी खींची, बैठा, फिर स्थिर आवाज में कहा—”अब से ये दुकान और ये जिंदगी मेरी होगी, मेरी मर्जी से चलेगी।”

भाई चौंका, हंसने की कोशिश की—”क्या मतलब है तेरा?”
सचिन आंखों में आंखें डालकर बोला, “मतलब ये कि अब मैं अपने रिश्तों को फिर से जीना चाहता हूं।
अपने गुनाहों को माफ नहीं, सुधारना चाहता हूं।”

भाई चिल्लाया—”तेरी जिंदगी तो हमने संभाली, तू कहीं का नहीं रहा था।”
सचिन ने बात काट दी—”हां, मैं कहीं का नहीं रहा था क्योंकि मैं खुद को खो चुका था।
अब मैंने खुद को वापस पा लिया है—कविता और महिमा के पास जाकर।”

“वो औरत जो तुझे छोड़ गई थी?” भाई जहर उगलने लगा।
सचिन पास जाकर बोला, “नहीं, वो औरत जो कभी मेरा सब कुछ थी और जिसे मैंने चुप रहकर खो दिया था।
अब मैं चुप नहीं रहूंगा।”

भाई तमतमा गया—”तो क्या दुकान छोड़ देगा?”
सचिन ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “नहीं, अब दुकान मेरे साथ चलेगी पर इंसानियत के साथ।
पैसों के पीछे दौड़ते हुए नहीं—बेटी की हंसी और पत्नी की इज्जत के साथ।”

भाई कुछ नहीं बोल सका।
कई सालों बाद वह अपने छोटे भाई को एक आदमी की तरह खड़ा देख रहा था, जो अब झुक नहीं रहा था।

सचिन उस दिन घर लौटते हुए रास्ते में चुप रहा, लेकिन अंदर की शांति उसके चेहरे पर दिख रही थी।
फल लिए, दवाई ली, दो नए स्कूल बैग खरीदे।
कविता के घर पहुंचा, कविता दरवाजे पर खड़ी थी—जैसे इंतजार कर रही हो।
सचिन ने झोले रखे, महिमा को आवाज दी—”अब कोई तुम्हें हमसे अलग नहीं कर पाएगा।”
महिमा दौड़कर आई, उसकी कमर से लिपट गई।
कविता पीछे से आई, उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया।

तीनों चुप थे।
लेकिन उस खामोशी में अब कोई दर्द नहीं था।

**कहानी यहीं समाप्त नहीं होती है, बल्कि यहीं से एक नई शुरुआत होती है।
जहां बिखरे हुए रिश्ते फिर से एक कमरे में सांस लेने लगे।
और एक टूट चुका इंसान फिर से एक पिता, एक पति और सबसे पहले एक इंसान बन गया।**

दोस्तों, कभी-कभी हम चुप रहकर उन बातों को होने देते हैं जो रिश्तों को भीतर से तोड़ देती हैं।
पर जब वक्त दूसरा मौका दे, तो वह सजा देने नहीं आता, बल्कि आईना लेकर आता है जिसमें हम देख सकें कि हमने कितना कुछ खो दिया।

अब आप सभी से एक सवाल—क्या आपने भी कभी किसी अपने को सिर्फ इसलिए खो दिया क्योंकि आप घरवालों के कारण बोल नहीं पाए या वक्त रहते साथ नहीं दे पाए?
नीचे कमेंट में जरूर बताइए—क्या आप आज भी किसी के लौटने का इंतजार कर रहे हैं?

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