महादेव के दरबार में न्याय: जब DM पत्नी को सालों बाद मिला अपना अपाहिज पति

प्रस्तावना: नियति का लेखा-जोखा कहते हैं कि बैद्यनाथ धाम में महादेव के दर्शन के लिए वही आता है जिसे बाबा बुलाते हैं। लेकिन कभी-कभी बाबा सिर्फ दर्शन देने के लिए नहीं, बल्कि कर्मों का हिसाब चुकता करने के लिए बुलाते हैं। यह कहानी है “शालिनी” और “राघव” की। 10 साल पहले एक गलतफहमी और गरीबी ने इन्हें अलग कर दिया था। आज शालिनी उस जिले की DM (District Magistrate) है, और राघव उसी मंदिर की चौखट पर एक ऐसी हालत में है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

अध्याय 1: वह अधूरा सफर और कड़वी यादें

10 साल पहले राघव और शालिनी एक छोटे से कस्बे में रहते थे। राघव एक फैक्ट्री में काम करता था और शालिनी का सपना प्रशासनिक अधिकारी बनने का था। राघव ने अपनी पूरी जमा-पूंजी और रातों की नींद शालिनी की पढ़ाई पर कुर्बान कर दी। लेकिन एक दिन फैक्ट्री में हुए एक भीषण हादसे में राघव ने अपने दोनों पैर खो दिए।

अपाहिज होने के बाद राघव को लगा कि वह अब शालिनी के लिए सिर्फ एक बोझ बन जाएगा। उसी समय शालिनी के परिवार ने उस पर दबाव डाला कि वह एक ‘अपाहिज’ के साथ अपनी जिंदगी बर्बाद न करे। राघव ने एक कठोर फैसला लिया। उसने शालिनी से कहा कि वह अब उससे प्यार नहीं करता और उसे किसी अमीर लड़की के साथ रहना है। शालिनी ने राघव को पत्थर दिल समझा और नफरत के साथ घर छोड़ दिया। तलाक के बाद शालिनी ने खुद को पढ़ाई में झोंक दिया और अंततः DM बन गई।

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अध्याय 2: बैद्यनाथ धाम का सावन और DM की यात्रा

सावन का महीना था। बैद्यनाथ धाम (Deoghar) में लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी थी। शालिनी, जो अब उस क्षेत्र की कद्दावर DM थी, सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेने के लिए मंदिर परिसर पहुँची। लाल बत्ती की गाड़ी, पुलिस का काफिला और चारों तरफ “मैडम साहिबा” के नारे। शालिनी का रुतबा देखकर कोई नहीं कह सकता था कि इस सख्त अधिकारी के अंदर एक टूटा हुआ दिल भी धड़कता है।

शालिनी मंदिर की सीढ़ियों की तरफ बढ़ रही थी कि अचानक उसकी नजर मंदिर के एक कोने में पड़े एक शख्स पर पड़ी। वह शख्स एक पुरानी लकड़ी की रेहड़ी (skate-board) पर बैठा था और अपने हाथों के सहारे घिसट रहा था।

अध्याय 3: जब समय ठहर गया

शालिनी के कदम वहीं रुक गए। पुलिस वाले उसे आगे बढ़ने के लिए कह रहे थे, लेकिन शालिनी की नजरें उस ‘अपाहिज’ शख्स पर जमी थीं। वह शख्स फटे-पुराने कपड़ों में था, चेहरा धूल से भरा था, लेकिन उसकी आँखों में वही पुरानी चमक थी जो कभी शालिनी की दुनिया हुआ करती थी।

वह राघव था। शालिनी का पूर्व पति। वह शख्स जिसने शालिनी को ऑफिसर बनाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था, आज मंदिर के बाहर भक्तों द्वारा फेंके गए सिक्कों को इकट्ठा कर रहा था।

शालिनी के हाथ कांपने लगे। उसने अपना चश्मा हटाया और धीरे से पुकारा— “राघव?”

अध्याय 4: महादेव की गवाही और फुटपाथ का सच

राघव ने जैसे ही वह आवाज सुनी, उसका शरीर सुन्न हो गया। उसने सिर उठाकर देखा—सामने जिले की सबसे बड़ी अधिकारी खड़ी थी। राघव ने अपनी नजरें झुका लीं और अपनी रेहड़ी को तेजी से पीछे धकेलने लगा। वह नहीं चाहता था कि उसकी ‘अफसर’ पत्नी उसे इस हाल में देखे।

शालिनी दौड़कर उसके पास गई और उसके सामने सड़क पर ही घुटनों के बल बैठ गई। “मैडम, आप नीचे मत बैठिए, कपड़े खराब हो जाएंगे,” राघव ने धीमी आवाज में कहा।

शालिनी चीख पड़ी— “ये क्या हाल बना रखा है तुमने? और वह सब झूठ क्यों बोला था कि तुम किसी और के साथ रहना चाहते हो?”

तभी पास ही खड़ा एक पुजारी बोला— “मैडम, आप इस गरीब को जानती हैं? ये पिछले 5 सालों से यहाँ है। जितना भी पैसा इसे भीख में मिलता है, वह सब ये चुपचाप उन लड़कियों की पढ़ाई के लिए दान कर देता है जिनके पास पैसे नहीं होते। ये कहता है कि इसकी पत्नी भी एक बहुत बड़ी अफसर है और उसे उस पर गर्व है।”

अध्याय 5: फूट-फूट कर रो पड़ी इंसानियत

शालिनी को अपनी नफरत पर पछतावा होने लगा। उसे समझ आया कि राघव ने 10 साल पहले वह नाटक सिर्फ इसलिए किया था ताकि शालिनी एक अपाहिज पति की सेवा में अपनी जिंदगी बर्बाद न करे और अपना सपना पूरा कर सके। उसने अपनी खुशियाँ कुर्बान कर दीं ताकि शालिनी के कंधों पर सितारे चमक सकें।

शालिनी ने वहीं महादेव के मंदिर के सामने सबके सामने राघव का हाथ पकड़ा। उसने अपने सुरक्षाकर्मियों से कहा— “गाड़ी लाओ!”

राघव ने मना किया— “शालिनी, तुम एक DM हो। तुम्हारा रुतबा, तुम्हारी इज्जत… समाज क्या कहेगा कि एक ऑफिसर का पति एक भिखारी है?”

शालिनी ने पलट कर जवाब दिया— “समाज ने मुझे ऑफिसर नहीं बनाया, तुमने बनाया है। और आज से यह DM तुम्हारी पत्नी बाद में है, तुम्हारी कर्जदार पहले है।”

अध्याय 6: मंदिर से नई शुरुआत

शालिनी राघव को अपनी सरकारी गाड़ी में बिठाकर अपने बंगले पर ले गई। उसने उसी दिन सबके सामने घोषणा की कि वह अपनी जिंदगी के सबसे बड़े नायक को वापस पा चुकी है। उसने राघव का इलाज करवाया और उसे वह सम्मान दिया जिसका वह हकदार था।

गाँव के लोग और मंदिर के श्रद्धालु यह मंजर देखकर रो पड़े। लोगों को यकीन हो गया कि बैद्यनाथ धाम में सिर्फ बीमारियाँ ठीक नहीं होतीं, बल्कि टूटे हुए रिश्ते और बिखरी हुई जिंदगियाँ भी फिर से जुड़ जाती हैं।

निष्कर्ष: सच्चा प्यार और त्याग यह कहानी हमें सिखाती है कि:

दिखावा और पद क्षणभंगुर हैं, लेकिन त्याग और प्रेम अमर हैं।

किसी के खामोश फैसले के पीछे अक्सर बहुत बड़ा बलिदान छिपा होता है।

सफलता का असली स्वाद तब आता है जब आप उस इंसान के साथ हों जिसने आपको उस मुकाम तक पहुँचाने के लिए खुद को मिटा दिया।

आज बैद्यनाथ धाम की उन सीढ़ियों पर एक बोर्ड लगा है, जो लड़कियों की शिक्षा में मदद करता है। उस बोर्ड को शालिनी ने अपने पति राघव के नाम पर लगवाया है। महादेव के दरबार में न्याय हुआ था।