ममता की पुकार और नाग का प्रतिशोध: दूध के कर्ज की दास्तान

अध्याय 1: अंधेरी रात और बेबस ममता

वह शाम बहुत गमगीन थी। आसमान पर गहराते बादलों ने सूरज की रोशनी को निगल लिया था, जैसे उस बूढ़ी मां की खुशियों को वक्त ने निगल लिया था। गांव के किनारे, एक पुराने और जर्जर दरख्त के नीचे बैठी सावित्री की आंखों से आंसू नहीं, बल्कि खून के कतरे गिर रहे थे। उसकी एक आंख की पुतली सफेद पड़ चुकी थी और दूसरी से भी उसे बस धुंधले साये नजर आते थे।

सावित्री ने अपने बेटे दानिश को पालने के लिए अपनी जवानी, अपनी सेहत और अपनी रूह तक गिरवी रख दी थी। लेकिन आज वही दानिश उसे ‘बदसूरत’ और ‘अपशकुन’ कहकर घर से निकाल चुका था। सावित्री के हाथ कांप रहे थे। उसके पास बस दूध की एक छोटी सी बोतल थी, जो एक राहगीर ने तरस खाकर उसे दी थी।

जैसे ही उसने कांपते हाथों से ढक्कन खोला, झाड़ियों में एक भयानक सरसराहट हुई। “साएं… साएं…” की आवाज ने सावित्री के सूखे गले में खौफ भर दिया। तभी उसे एक काला साया अपनी तरफ रेंगता हुआ दिखा। वह एक विशाल नाग था, जिसका शरीर गहरे जख्मों से भरा था। उसके पीछे एक जोगी सपेरा बीन बजाते हुए और हाथ में जलती हुई मशाल लिए उसे मारने के लिए दौड़ रहा था।

सावित्री का बदन कांप उठा, लेकिन उस सांप की आंखों में मौत का खौफ देखकर उसका मां वाला दिल पसीज गया। सांप ने फुफकारते हुए सावित्री के आंचल में पनाह मांगी। अल्लाह की कुदरत देखिए, वह सांप इंसानी जुबान में बोल पड़ा, “मां… मुझे बचा ले। यह सपेरा मुझे अपनी बीन के जाल में फंसाकर मार देगा। मैं बेगुनाह हूं।”

सावित्री ने बिना सोचे-समझे सांप को अपने फटे-पुराने दुपट्टे में छुपा लिया। जब सपेरा वहां पहुंचा और पूछा, “ए बुढ़िया! यहां से एक काला नाग गुजरा है?” सावित्री ने अपनी कांपती आवाज को संभाला और झूठ बोल दिया, “नहीं बेटा, यहां कोई नहीं आया।” सपेरा दूसरे रास्ते निकल गया।

सांप बाहर निकला और उसने सावित्री के चरणों में अपना फन झुका दिया। “मां, आज आपने मुझे नई जिंदगी दी है। मैं नागवंश का हिस्सा हूं, हम एहसान नहीं भूलते। आपने मुझे पनाह दी, अब मैं आपके दूध का कर्ज चुकाऊंगा।”

अध्याय 2: बलिदान की वो कड़वी हकीकत

सांप ने पूछा, “मां, आप इस हाल में क्यों हैं? आपके पास तो रहने को घर भी नहीं।” सावित्री फूट-फूट कर रोने लगी। उसने बताया कि कैसे दानिश के पैदा होते ही उसके पति की मौत हो गई थी। कैसे उसने मेहनत-मजदूरी करके उसे बड़ा किया।

“बेटा, जब दानिश छोटा था, तो एक बड़े हादसे में उसकी आंख की रोशनी चली गई थी। डॉक्टर ने कहा था कि अगर कोई अपनी आंख दान कर दे, तभी वह देख पाएगा। मैंने एक पल भी नहीं सोचा। मैंने अपनी एक आंख अपने कलेजे के टुकड़े को दे दी। मैंने सोचा था कि मेरी दुनिया अंधेरी हो जाए तो कोई बात नहीं, मेरा बेटा पूरी दुनिया देख सके। लेकिन जब वह बड़ा हुआ, तो उसे मेरी एक आंख वाली सूरत से नफरत हो गई। वह अपनी मां को दोस्तों के सामने ‘नौकरानी’ बताने लगा।”

सांप की लाल आंखों में गुस्सा चमक उठा। उसने फुफकारते हुए कहा, “इंसान इतना गिर सकता है? मां, आप चिंता न करें। अब से मैं आपका बेटा हूं। जो दूध आपने मुझे पिलाया है, उसकी हर बूंद का हिसाब मैं उस दानिश से लूंगा।”

अध्याय 3: नाग का मायावी रूप और नई दुनिया

उस रात सांप ने अपनी शक्ति का इस्तेमाल किया। उसने सावित्री के लिए जंगल के एक एकांत कोने में ताजा मिट्टी और खुशबूदार लकड़ियों से एक सुंदर झोपड़ी तैयार की। सुबह जब सावित्री की आंख खुली, तो उसने खुद को एक साफ-सुथरे बिस्तर पर पाया। सामने एक खूबसूरत नौजवान खड़ा था।

“मां, मैं वही सांप हूं। दिन में मैं आपकी सेवा के लिए यह इंसानी रूप लूंगा और रात को मैं सांप बनकर आपकी झोपड़ी का पहरा दूंगा। दानिश ने आपको निकाला है, लेकिन मैं आपको रानी बनाकर रखूंगा।”

महीने बीतते गए। वह नौजवान सावित्री के लिए जंगल से मीठे फल, शहद और जड़ी-बूटियां लाता। वह उसके पैर दबाता और उसे कहानियां सुनाता। सावित्री को लगा जैसे उसे अपना खोया हुआ बेटा वापस मिल गया है। लेकिन सांप का मकसद सिर्फ सेवा करना नहीं था, उसका मकसद उस दूध का कर्ज चुकाना था जो उसने सावित्री के हाथों पिया था।

अध्याय 4: दानिश और उसकी बेरहम पत्नी

उधर गांव में दानिश अपनी पत्नी कामिनी के साथ रह रहा था। कामिनी बहुत सुंदर थी, लेकिन उसका दिल पत्थर का था। उसने दानिश को पूरी तरह अपने बस में कर रखा था। जब सावित्री घर से गई, तो कामिनी बहुत खुश थी। लेकिन जल्द ही उनके घर में मातम छाने वाला था।

कामिनी ने एक सुंदर बेटे को जन्म दिया। दानिश बहुत खुश था। उसने पूरे गांव में मिठाइयां बांटीं। लेकिन उसी रात, जब सब सो रहे थे, झोपड़ी से वह नाग निकला। उसकी आंखों में आग थी। वह रेंगता हुआ दानिश के घर पहुंचा और खिड़की के रास्ते पालने तक गया।

सांप ने बच्चे को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया, बल्कि उसे अपनी कोमल गिरफ्त में लिया और जंगल की झोपड़ी में ले आया। सुबह जब दानिश और कामिनी की आंख खुली, तो पालना खाली था। कामिनी की चीखें आसमान चीरने लगीं। दानिश पागलों की तरह बच्चे को ढूंढने लगा, लेकिन बच्चा कहीं नहीं मिला।

अध्याय 5: प्रतिशोध की पांच रातें

सांप का बदला यहीं नहीं रुका। अगले पांच सालों में कामिनी ने पांच बेटों को जन्म दिया। लेकिन हर बार, जैसे ही बच्चा पैदा होता, वह रहस्यमयी तरीके से गायब हो जाता। गांव में अफवाह फैल गई कि दानिश के घर पर कोई बद्दुआ है।

कामिनी पागल जैसी हो गई थी। वह बाल बिखेरकर गलियों में चिल्लाती, “मेरे बच्चे कहां हैं? कोई मेरे बच्चों को वापस लाओ!” दानिश का घमंड अब मिट्टी में मिल चुका था। वह दाने-दाने को मोहताज होने लगा क्योंकि उसकी किस्मत ने उसका साथ छोड़ दिया था।

झोपड़ी में सावित्री उन बच्चों को पाल रही थी। वह जानती थी कि यह उस सांप का काम है, लेकिन वह सांप को रोक नहीं पाती थी। सांप कहता, “मां, यह बच्चे आपके हैं। यह आपके बुढ़ापे का सहारा बनेंगे, जबकि उस दानिश को तड़पना होगा।”

अध्याय 6: एक रूहानी बुजुर्ग का आगमन

जब दानिश और कामिनी पूरी तरह टूट गए, तो गांव में एक नूरानी बुजुर्ग (एक संत) आए। उन्होंने दानिश की हालत देखकर कहा, “बेटा, तूने जिस मां की आंखों की रोशनी छीनी, आज तू अपनी आंखों के नूर (बच्चों) के लिए तरस रहा है। यह सब तेरे कर्मों का फल है।”

दानिश रोते हुए उनके पैरों में गिर गया। “बाबा, मुझे क्या करना होगा? मेरी मां कहां है?”

बुजुर्ग ने इशारा किया, “जंगल की उस गहरी घाटी में जा। वहां एक मां अपने पांच पोतों को पाल रही है और एक नाग उनकी रक्षा कर रहा है। अगर तू वहां जाकर माफी मांग सके, तभी तेरे बच्चे वापस आएंगे।”

अध्याय 7: जंगल की कठिन यात्रा और अंतिम टकराव

दानिश और कामिनी जंगल की तरफ भागे। कांटों ने उनके पैर लहूलुहान कर दिए, लेकिन ममता और पछतावे की आग उन्हें रुकने नहीं दे रही थी। जैसे ही वे झोपड़ी के करीब पहुंचे, एक विशाल फुफकार ने उन्हें रोक दिया।

सामने वही काला नाग फन फैलाए खड़ा था। उसकी सुर्ख आंखें अंगारों की तरह दहक रही थीं। “रुक जाओ गद्दारों! इस झोपड़ी के अंदर कदम रखने की हिम्मत मत करना। यह उस मां का घर है जिसे तुमने दर-बदर किया था।”

दानिश हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा, “भाई! मुझे मेरी गलती का एहसास हो गया है। मुझे मेरी मां से मिलने दो। मैं अपनी आंखें निकाल कर उसे दे दूंगा, बस मुझे माफ कर दो।”

कामिनी भी रोने लगी, “मां! मुझे मेरे बच्चे दे दो। मैं आपकी दासी बनकर रहूंगी।”

सांप ने गर्जना की, “जब मां भूखी थी, तब तुमने उसे रोटी नहीं दी। जब वह बीमार थी, तब तुमने उसे दवा नहीं दी। अब जब तुम्हारे बच्चे मेरे पास हैं, तब तुम्हें मां याद आ रही है? आज मैं तुम्हारा लहू पी जाऊंगा!”

अध्याय 8: मां का हृदय और कर्ज की अदायगी

झोपड़ी का दरवाजा खुला। सावित्री बाहर निकली, उसके पीछे पांचों बच्चे थे। “बस कर मेरे बेटे!” सावित्री ने सांप को पुकारा।

सांप का गुस्सा एक पल में शांत हो गया। उसने अपना फन नीचे कर लिया। सावित्री दानिश के पास गई और उसके सिर पर हाथ रखा। “बेटा, मां कभी अपने बच्चों से बदला नहीं लेती। तूने मुझे जो दुख दिया, मैंने वह कब का माफ कर दिया था।”

सांप ने कहा, “मां, मैंने आपके दूध का कर्ज चुकाने के लिए इन्हें सजा दी। अब यह बच्चे इन्हें वापस मिल सकते हैं, लेकिन एक शर्त पर।”

दानिश ने तपाक से कहा, “हर शर्त मंजूर है!”

सांप ने अपनी शक्तियों से दानिश की आंखों की रोशनी वापस ली और उसे सावित्री की अंधी आंख में स्थानांतरित कर दिया। कुदरत का करिश्मा हुआ, सावित्री को फिर से दिखाई देने लगा। दानिश ने अपनी एक आंख का त्याग करके अपनी मां को रोशनी लौटाई।

अध्याय 9: सुखद अंत और वफादारी की मिसाल

दानिश और कामिनी सावित्री को सम्मान के साथ वापस घर ले आए। वह सांप अब उनके घर की दहलीज पर पहरा देता था। गांव के लोग हैरान थे कि एक जानवर ने इंसान को इंसानियत सिखा दी।

दानिश ने अपनी मां की खूब सेवा की। वह अब गांव का सबसे नेक इंसान बन गया था। सांप ने अपना वादा पूरा किया था—उसने मां को उसका खोया हुआ सम्मान, उसके बच्चे और उसकी रोशनी वापस दिला दी थी।

एक दिन, वह सांप सावित्री के सपने में आया और बोला, “मां, अब मेरे जाने का वक्त आ गया है। मैंने आपके दूध का कर्ज चुका दिया है। हमेशा खुश रहना।” सुबह होने पर वह सांप कहीं नजर नहीं आया, लेकिन गांव के मंदिर के बाहर उसकी एक पत्थर की प्रतिमा बन गई, जो वफादारी का प्रतीक थी।


शिक्षा: मां की सेवा ही सबसे बड़ी इबादत है। अगर इंसान अपनी मां का अपमान करता है, तो कुदरत उसे ऐसी सजा देती है कि रूह तक कांप जाए। और वफादारी सिर्फ इंसानों की जागीर नहीं, जानवर भी दूध का कर्ज चुकाना जानते हैं।


समाप्त