शीर्षक: “वर्दी की मर्यादा बनाम सत्ता का मद”

अध्याय १: शांत सुबह और अशांत सायरन

उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में जनवरी की वह दोपहर सुनहरी धूप से नहाई हुई थी। सरसों के पीले खेत ऐसे लग रहे थे जैसे धरती ने सोने की चादर ओढ़ ली हो। शांति ऐसी थी कि परिंदों के पंखों की फड़फड़ाहट भी सुनाई दे जाए। इसी शांत संकरे रास्ते पर भारतीय सेना का एक ‘ओली ग्रीन’ रंग का २.५ टन का ट्रक अपनी तय गति से आगे बढ़ रहा था।

ट्रक के केबिन में कर्नल विक्रम सिंह बैठे थे। ४५ वर्षीय कर्नल विक्रम का चेहरा किसी तराशे हुए पत्थर की तरह था—अनुशासन, धैर्य और अनुभव की लकीरों से भरा हुआ। उनके साथ लांसनायक गुरदीप स्टीयरिंग संभाले हुए था। पीछे चार जवान अपनी ड्यूटी के बाद की थकान को हल्की बातों से दूर कर रहे थे।

तभी, इस शांति को एक कर्कश और तीखे सायरन ने चीर दिया। यह किसी आपातकालीन सेवा की आवाज़ नहीं थी, बल्कि सत्ता के अहंकार का शोर था। पीछे धूल का एक विशाल बवंडर उठ रहा था। बाहुबली विधायक रतन प्रताप सिंह का ९ गाड़ियों का काफिला किसी तूफान की तरह बढ़ रहा था।

“साहब, पीछे कोई वीआईपी लग रहा है,” गुरदीप ने शीशे में देखते हुए कहा। कर्नल विक्रम ने बिना विचलित हुए कहा, “उन्हें जगह दे दो गुरदीप। हमें किसी से रेस नहीं लगानी। हम अपनी लेन में रहेंगे।”

गुरदीप ने ट्रक को बाईं ओर कच्ची पटरी पर उतार दिया। लेकिन विधायक के अहंकार को ‘रास्ता’ नहीं, ‘समर्पण’ चाहिए था।

.

.

.

अध्याय २: अहंकार का अवरोध

विधायक की सफेद ‘लेजेंडर’ ने ट्रक को ओवरटेक किया और अचानक उसके सामने आकर कट मारकर ब्रेक लगा दिए। गुरदीप ने पूरी ताकत से ब्रेक दबाए। टायरों के घर्षण से निकली चीख ने वातावरण में दहशत भर दी। ट्रक विधायक की कार से महज कुछ इंच की दूरी पर रुका।

गाड़ियों के दरवाजे एक साथ खुले। सफारी सूट पहने गनमैन और निजी गुंडे बंदूकों के साथ बाहर निकले। विधायक रतन प्रताप सिंह अपने चेहरे पर सत्ता का नशा लिए नीचे उतरा।

“ओए ड्राइवर! नीचे उतर! तुझे पता नहीं पीछे कौन आ रहा है?” विधायक ने ट्रक के दरवाजे पर हाथ मारते हुए चिल्लाया।

कर्नल विक्रम सिंह शांत भाव से नीचे उतरे। उनकी वर्दी की कड़क और आँखों का ठहराव विधायक के लिए अपरिचित था। विधायक ने कर्नल के कंधे पर उंगली रखते हुए कहा, “तुम्हारे जैसे दो कौड़ी के कर्नल मैंने बहुत देखे हैं। अभी यहीं सबकी मौजूदगी में तेरी वर्दी उतरवा दूंगा।”

यह शब्द किसी भी सैनिक के लिए मौत से बढ़कर अपमान थे। पीछे खड़े जवानों की उंगलियां अपनी राइफलों पर कस गईं, लेकिन कर्नल का एक मौन इशारा उन्हें रोक गया। कर्नल ने बहुत ही संयमित स्वर में कहा, “मिस्टर रतन प्रताप, यह वर्दी किसी नेता की खैरात नहीं है। इसे पहनने के लिए खून-पसीना बहाना पड़ता है। आप रास्ता छोड़ दें।”


अध्याय ३: सोशल मीडिया का डिजिटल प्रहार (नया विस्तार)

विधायक अपनी ताकत के नशे में अंधा था, लेकिन वह समय की बदलती चाल को नहीं समझ पा रहा था। सड़क के किनारे खेतों में काम कर रहे कुछ कॉलेज के लड़कों ने इस पूरे मंजर को अपने मोबाइल कैमरों में कैद करना शुरू कर दिया था।

विधायक कर्नल को गालियां दे रहा था, उन्हें भीख मांगने की धमकी दे रहा था और अपनी पहुँच का बखान कर रहा था। उसे नहीं पता था कि उसका हर शब्द इंटरनेट की दुनिया में ‘लाइव’ हो रहा था।

१० मिनट के भीतर, वह वीडियो ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) और फेसबुक पर ट्रेंड करने लगा। हैशटैग #RespectTheUniform और #ArrestRatanPratap बिजली की गति से फैल गए। पूर्व जनरलों, क्रिकेटरों और आम जनता ने इस पर अपना रोष प्रकट करना शुरू कर दिया। दिल्ली के रक्षा मंत्रालय से लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय तक फोन बजने शुरू हो गए।


अध्याय ४: सिस्टम का कांपना और सत्ता का पतन

विधायक का पीए (PA) भागता हुआ आया, उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था। उसने विधायक के कान में बुदबुदाया, “साहब, प्रदेश अध्यक्ष का फोन है। पूरा इंटरनेट आपके वीडियो से भरा पड़ा है। ऊपर से बहुत दबाव है।”

विधायक के माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगीं। तभी दूर से पुलिस और प्रशासन के सायरन सुनाई दिए। ज़िले के डीएम (IAS) और एसएसपी (IPS) भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुँचे। विधायक को लगा कि अब उसका ‘सिस्टम’ उसे बचा लेगा।

लेकिन दृश्य उलट था। डीएम और एसएसपी गाड़ी से उतरे और विधायक को अनदेखा करते हुए सीधे कर्नल विक्रम सिंह के पास गए। उन्होंने कर्नल को एक कड़क ‘सैल्यूट’ किया।

“कर्नल सर, हमें इस असुविधा के लिए खेद है। प्रशासन पूरी तरह आपके साथ है,” डीएम ने पूरी विनम्रता से कहा।

विधायक चिल्लाया, “डीएम साहब! आप प्रोटोकॉल भूल रहे हैं? मैं यहाँ का विधायक हूँ!” एसएसपी ने घूमकर विधायक की आँखों में देखा और बिना किसी लिहाज के कहा, “मिस्टर रतन प्रताप, आप अपनी हदें भूल गए हैं। लखनऊ से सीधे आदेश हैं। आपके खिलाफ सरकारी काम में बाधा डालने और सेना के अपमान का केस दर्ज किया जा रहा है।”


अध्याय ५: अंतहीन अंधेरा और प्रायश्चित (नया अध्याय)

विधायक का काफिला वहीं सीज़ (Seize) कर लिया गया। उसकी लाल बत्ती वाली गाड़ियाँ अब क्रेन से खींचकर थाने ले जाई जा रही थीं। विधायक को पुलिस की वैन में बैठाया गया—वही वैन जिसमें वह अपराधियों को भिजवाता था।

उस रात, पार्टी ने विधायक को प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया। उसका राजनीतिक भविष्य चंद घंटों में राख हो गया।

कुछ महीने बाद, जब कर्नल विक्रम सिंह उसी रास्ते से अपनी पर्सनल जिप्सी में गुजर रहे थे, उन्होंने देखा कि उस स्थान पर गांव वालों ने एक छोटा सा स्मारक बनाया है। उस पर लिखा था— “वह स्थान जहाँ वर्दी ने अहंकार को झुकना सिखाया।”

विधायक अब जेल में था, अपनी जमानत के लिए वकीलों के चक्कर काट रहा था। उसकी वह ‘लेजेंडर’ अब पुलिस थाने के यार्ड में कबाड़ बन रही थी।


अध्याय ६: कर्नल का संदेश (उपसंहार – नया अध्याय)

कहानी केवल विधायक के पतन की नहीं थी, बल्कि कर्नल विक्रम के उस ‘संयम’ की थी जिसने एक बड़ी हिंसा को टाल दिया। कर्नल ने अपनी यूनिट में जवानों को संबोधित करते हुए एक बात कही जो आज भी वहां की दीवारों पर लिखी है:

“असली ताकत उंगली को ट्रिगर पर दबाने में नहीं, बल्कि उस उंगली को तब थामे रखने में है जब सामने वाला आपको ललकार रहा हो। वर्दी हमें लड़ना ही नहीं, जीतना भी सिखाती है—बिना एक भी गोली चलाए।”

गांव का वह बुजुर्ग किसान आज भी उस रास्ते से गुजरने वाले हर फौजी ट्रक को सलाम करता है। उसे अब बाहुबलियों से डर नहीं लगता, क्योंकि उसे पता है कि सरहद पर ही नहीं, उसके गांव की पगडंडियों पर भी देश का सम्मान सुरक्षित है।


समाप्त