बीमार माँ-बाप को बेटे ने अस्पताल के बाहर फुटपाथ पर छोड़ आया, पर भगवान के घर देर था, अंधेर नहीं
अर्जुन एक नवयुवक था जो विदेश में डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहा था। उसकी पढ़ाई खत्म होने के बाद, वह अपने देश लौटने का फैसला करता है। उसने सोचा कि अब वह अपने परिवार के साथ कुछ समय बिताएगा और अपने दादा-दादी से मिले बिना नहीं रह सकता। एक दिन, जब वह एक बड़े होटल में खाना खाने गया, तो उसकी नजर वहां एक बुजुर्ग महिला पर पड़ी, जो फर्श पर पोछा लगा रही थी। महिला की शक्ल, उसकी आंखें और उसकी झुर्रियों भरी त्वचा, सब कुछ उसकी दादी से इतना मिलता-जुलता था कि वह एक पल के लिए सन्न रह गया।
दादी की याद
अर्जुन ने पास जाकर गौर से देखा। उसकी कांपती आवाज में “दादी” पुकारते ही बुजुर्ग महिला एकदम रुक गई। उसने पोछा फेंककर लड़खड़ाते कदमों से उसके पास आकर उसे अपनी बूढ़ी बाहों में भर लिया। दोनों की आंखों में आंसू थे, जैसे सालों का दर्द उस एक पल में बाहर आ गया हो। अर्जुन का दिल भी चीख उठा, लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह आज के समाज की एक कड़वी सच्चाई को दर्शाता है।
परिवार की कहानी
यह कहानी उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले की है। यहां के रहने वाले रामेश्वर प्रसाद और सावित्री देवी अब उम्र के उस पड़ाव पर थे, जहां उनके हाथ-पैर कांपते थे। उनकी आंखों की रोशनी धीरे-धीरे कम हो रही थी, और हर कदम पर उन्हें किसी के सहारे की जरूरत महसूस होती थी। उनके साथ उनका बेटा संजय, बहू पूजा और इकलौता पोता अर्जुन रहता था। अर्जुन अपने दादा-दादी का सबसे प्यारा लाडला था। जब तक वह गांव में था, घर में खुशियों का माहौल रहता था।
लेकिन जैसे ही अर्जुन विदेश गया, इस घर में सब कुछ बदल गया। रामेश्वर जी और सावित्री देवी की ताकत कम होने लगी। उनका शरीर कमजोर पड़ने लगा और बीमारियां उनके दरवाजे पर दस्तक देने लगीं। कभी रामेश्वर जी का बीपी बढ़ जाता तो कभी सावित्री देवी को शुगर की शिकायत हो जाती। लेकिन उनकी सबसे बड़ी तकलीफ उनकी बीमारी नहीं थी, बल्कि उनके बेटे संजय और बहू पूजा का व्यवहार था।
संजय और पूजा का व्यवहार
संजय को अब अपने बीमार माता-पिता की कोई फिक्र नहीं थी। वह दिन-रात अपने काम में डूबा रहता और पूजा को सिर्फ अपने सुख और आराम से मतलब था। रामेश्वर जी और सावित्री देवी की हालत देखकर पड़ोसियों को भी रोना आ जाता था। यह दोनों बुजुर्ग अपने ही घर में पराए हो गए थे। पूजा अक्सर उन्हें बासी खाना परोस देती थी। सोचिए, जिन माता-पिता ने अपने बच्चों के लिए अपनी नींदें कुर्बान की, उनके पेट भरने के लिए अपनी भूख भुला दी, आज वही माता-पिता बासी रोटियां खाने को मजबूर थे।
जब रामेश्वर जी इस शिकायत को संजय से करते, तो वह उल्टा उन पर ही भड़क जाता। वह गुस्से में चिल्लाता, “अब तुम लोग क्या काम करते हो? जो हर बार ताजा खाना चाहिए, जो मिल रहा है, चुपचाप खा लो। मेरे पास तुम्हारी फालतू बातों के लिए वक्त नहीं है।” यह सुनकर रामेश्वर जी और सावित्री देवी का दिल टूट जाता। वे अपने छोटे से कमरे में चले जाते, दरवाजा बंद करते और एक-दूसरे का हाथ थामकर फूट-फूट कर रोते।
पुरानी यादें
वे अपने पुराने दिनों को याद करते, जब उनका बेटा उनकी हर बात मानता था। जब घर में प्यार और सम्मान का माहौल था। जब हर शाम उनके चेहरे पर मुस्कान होती थी। लेकिन अब वह सब बस एक सपना बनकर रह गया था। जब तक अर्जुन गांव में था, तब तक रामेश्वर जी और सावित्री देवी की जिंदगी में थोड़ी सी रोशनी थी। अर्जुन अपने दादा-दादी से बेइंतहा मोहब्बत करता था। वह उनकी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रखता था।
कभी बाजार से उनकी दवाइयां लाता, कभी अपनी पॉकेट मनी से उनके लिए फल खरीदता और कभी-कभी रात को उनके पास बैठकर उनकी पुरानी कहानियां सुनता। वह अपने माता-पिता को भी समझाता, “मम्मी-पापा, दादा-दादी अब बूढ़े हो गए हैं। इनका ध्यान रखो। इन्हें अच्छा खाना दो। इनकी सेहत का ख्याल रखो।” उसकी बातों से थोड़ा बहुत असर भी होता था।

बुरे दिन
लेकिन अब अर्जुन विदेश में था। संजय और पूजा का व्यवहार दिन प्रतिदिन और भी सख्त और बेरहम होता गया। वे दोनों रामेश्वर जी और सावित्री देवी को बोझ समझने लगे। उनकी छोटी-छोटी जरूरतें भी अब उनके लिए परेशानी बन गई थीं। अगर रामेश्वर जी को दवाई चाहिए होती तो पूजा ताने मारती, “हर बार दवाई चाहिए। पता नहीं कितना खर्च करवाओगे।” अगर सावित्री देवी कुछ कहती तो संजय की बेरुखी भरी बातें उन्हें चुप करा देती थीं।
इसी तरह उनके दुख भरे दिन कट रहे थे। लेकिन एक दिन सुबह-सुबह रामेश्वर जी की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई। उनकी सांसे तेज-तेज चल रही थीं। सीने में दर्द हो रहा था और शरीर में इतनी कमजोरी थी कि वे बिस्तर से उठ भी नहीं पा रहे थे। सावित्री देवी डर गईं। उन्होंने कांपते पैरों से संजय के पास जाकर कहा, “बेटा, तेरे पिताजी की हालत बहुत खराब है। उन्हें जल्दी अस्पताल ले चलो, वरना कुछ अनहोनी हो जाएगी।” लेकिन संजय ने उनकी बात को हल्के में लिया।
संजय की बेरुखी
वह गुस्से से भड़क उठा और बोला, “मुझे बस यही काम बचा है क्या? दिनभर काम करता हूं। थक कर चूर हो जाता हूं। और तुम लोग हर बार नई मुसीबत लेकर आते हो। अस्पताल ले जाऊंगा तो मेरा पूरा दिन बर्बाद हो जाएगा। जो करना है खुद कर लो।” यह कहकर वह अपने कमरे से निकल गया। ना तो उसने अपने पिता का हाल पूछा, ना ही उन्हें एक पैसे की मदद दी।
रामेश्वर जी बिस्तर पर पड़े कराह रहे थे। और सावित्री देवी उनकी हालत देखकर रो रही थीं। दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। उनकी आंखों में लाचारी थी, दर्द था और एक मुख सवाल था कि क्या उनका बेटा सच में इतना बदल गया है? लेकिन सावित्री देवी ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने कांपते हाथों से रामेश्वर जी को सहारा दिया और बोलीं, “चलो, मैं तुम्हें खुद अस्पताल ले जाऊंगी। हमारा बेटा भले हमें छोड़ दे, लेकिन मैं तुम्हें नहीं छोड़ूंगी।”
अस्पताल की ओर
दोनों किसी तरह तैयार हुए। सावित्री देवी ने अपनी पुरानी साड़ी के पल्लू में कुछ पैसे बांधे रखे थे। जो उन्होंने सालों से जोड़े थे। उसी से उन्होंने एक ऑटो लिया और रामेश्वर जी को लेकर गांव के पास के सरकारी अस्पताल पहुंची। वहां डॉक्टर ने रामेश्वर जी को देखा और गंभीर आवाज में कहा, “इनका बीपी बहुत ज्यादा बढ़ गया है और शुगर भी कंट्रोल से बाहर है। इन्हें तुरंत दवाइयां शुरू करनी होंगी और पूरा आराम करना होगा। अगर ध्यान नहीं दिया तो हालत और बिगड़ सकती है।”
सावित्री देवी ने कांपते हाथों से दवाइयां लीं और रामेश्वर जी को लेकर घर की ओर चल पड़ीं। लेकिन उस दिन किस्मत भी उनके साथ नहीं थी। रास्ते में अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। आसमान से पानी इस तरह बरस रहा था, जैसे वह भी उनके दर्द को देखकर रो रहा हो। दोनों एक ऑटो में बैठे थे। लेकिन गांव की पतली और कीचड़ भरी गलियों में ऑटो नहीं जा सकता था। ऑटो वाला रुक गया और बोला, “यहां से उतर जाइए। मेरा ऑटो आगे नहीं जाएगा। मुझे और सवारी लेनी है।”
मजबूरी
सावित्री देवी ने हाथ जोड़कर मिन्नत की। “बेटा, थोड़ा रुक जाओ। बारिश बहुत तेज है। अभी उतरे तो हम भीग जाएंगे और मेरे पति की तबीयत और खराब हो जाएगी। बस बारिश थोड़ी कम हो जाए। फिर हम चले जाएंगे।” लेकिन ऑटो वाले का दिल ना पसीजा। वह बोला, “मुझे जल्दी है। मां जी, अगर मैं यहां रुका तो मेरा रोजगार छीन जाएगा। आप उतर जाइए।” मजबूरन दोनों उस तेज बारिश में ऑटो से उतरे।
सावित्री देवी ने रामेश्वर जी का हाथ थामा। अपनी साड़ी का पल्लू उनके सिर पर रखा ताकि वे कम से कम भीगे और कीचड़ भरे रास्ते पर धीरे-धीरे घर की ओर बढ़ने लगीं। रामेश्वर जी का शरीर कमजोर था। उनके पैर लड़खड़ा रहे थे। लेकिन सावित्री देवी ने उन्हें हर कदम पर संभाला। बारिश की बूंदें उनके चेहरे पर गिर रही थीं और उनके आंसू उस पानी में मिल गए थे।

संजय और पूजा का ताना
तभी संजय और पूजा घर से बाहर निकले और यह नजारा देख लिया। पूजा ने ताने मारते हुए संजय से कहा, “देखो, इन लोगों ने तो हमारी इज्जत मिट्टी में मिला दी। इस उम्र में भी शर्म नहीं है। गांव वाले देख लेंगे तो क्या कहेंगे कि हमारे माता-पिता बारिश में ऐसे घूम रहे हैं।” यह सुनकर संजय का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। जैसे ही रामेश्वर जी और सावित्री देवी घर पहुंचे, गीले कपड़ों में ठठुरते हुए संजय उन पर चिल्लाने लगा, “तुम लोगों को बुढ़ापे में यह सब करना सूझ रहा है। यह उम्र है बाहर घूमने की? बारिश में ऐसे चलने की? कुछ तो शर्म करो।”
सावित्री देवी ने रोते हुए जवाब दिया, “बेटा, तेरे पिताजी की तबीयत खराब थी। तूने तो हमें अस्पताल ले जाने से मना कर दिया था। बारिश में अगर मैं उन्हें ना संभालती तो वे कीचड़ में गिर जाते। क्या मैं उन्हें ऐसे छोड़ देती?” लेकिन संजय का दिल ना पसीजा। वह उन्हें घूरता हुआ अंदर चला गया।
दंपति का दुख
रामेश्वर जी और सावित्री देवी अपने कमरे में गए। गीले कपड़े बदले। एक-दूसरे को देखा और फिर फूट-फूट कर रोने लगे। वे अपने पोते अर्जुन को याद करने लगे, जो उनकी हर तकलीफ में उनका सहारा बनता था। वे सोचने लगे, “काश, हमारा अर्जुन यहां होता। वह हमें कभी इस हाल में ना छोड़ता।” धीरे-धीरे शाम ढल गई और घर में सन्नाटा पसर गया। पूजा ने संजय से कहा, “ऐसे तो काम नहीं चलेगा। इनका कुछ करना पड़ेगा। हर बार यह लोग हमें शर्मिंदा करते हैं। गांव वाले ताने मारेंगे कि हम अपने माता-पिता का ख्याल नहीं रखते।”
संजय की योजना
संजय ने एक खतरनाक योजना बनाई। उसने पूजा से कहा, “चिंता मत करो। कल मैं इनका पक्का इंतजाम कर दूंगा। फिर हमें कोई परेशानी नहीं होगी।” पूजा ने उसकी बात पर हामी भरी। अगले दिन सुबह संजय ने रामेश्वर जी और सावित्री देवी से बड़े प्यार से कहा, “मां-पिताजी, आपकी तबीयत हमेशा खराब रहती है। आज मैं आपको शहर के बड़े अस्पताल में ले जाऊंगा। वहां आपका अच्छा इलाज होगा। हो सकता है दो-तीन दिन रुकना पड़े, तो अपने कुछ कपड़े और जरूरी सामान ले लो।”
यह सुनकर रामेश्वर जी और सावित्री देवी को थोड़ा आश्चर्य हुआ। उन्हें लगा कि शायद उनके बेटे को अब अपनी गलती का एहसास हो गया है। वे खुशी-खुशी तैयार हो गए। सावित्री देवी ने अपनी पुरानी साड़ियां और रामेश्वर जी के लिए दो जोड़ी कपड़े एक छोटे से थैले में रखे। दोनों के चेहरों पर थोड़ी सी उम्मीद की चमक थी कि शायद अब सब ठीक हो जाएगा।
धोखा
फिर संजय उन्हें लेकर गांव से निकला। वह उन्हें स्टेशन ले गया और दिल्ली जाने वाली ट्रेन में उनके साथ बैठ गया। रास्ते में वह बड़े प्यार से बातें करता रहा ताकि उन्हें कोई शक ना हो। दिल्ली पहुंचने के बाद, वह उन्हें एक बड़े अस्पताल के सामने ले गया। वहां एक पुराना पीपल का पेड़ था, जिसके नीचे एक चबूतरा बना हुआ था। संजय ने उन्हें उस चबूतरे पर बिठाया और बोला, “मां-पिताजी, आप यहां थोड़ा आराम करो। मैं अंदर जाकर डॉक्टर से बात करके आता हूं। फिर हम आपका इलाज करवाएंगे।”
रामेश्वर जी और सावित्री देवी ने उसकी बात मान ली। वे उस चबूतरे पर बैठ गए। अपने थैले को पास रखा और अपने बेटे का इंतजार करने लगे। लेकिन दोस्तों, वो इंतजार कभी खत्म नहीं हुआ। घंटे बीत गए। सूरज ढल गया। शाम हो गई और फिर अंधेरा छा गया। लेकिन संजय वापस नहीं आया।
माता-पिता का दुख
रामेश्वर जी और सावित्री देवी को पहले तो लगा कि शायद उसे देर हो रही होगी। लेकिन जैसे-जैसे रात गहरी होती गई, उनके दिल में एक डर बैठने लगा। आखिरकार सावित्री देवी ने कांपती आवाज में रामेश्वर जी से कहा, “लगता है हमारा बेटा हमें यहां छोड़कर चला गया।” यह सुनकर रामेश्वर जी की आंखें भर आईं। वे बोले, “सावित्री, क्या हमने अपने बेटे को इसी दिन के लिए पाला था?”
दोनों उस चबूतरे पर बैठे फूट-फूट कर रोने लगे। उनके पास ना पैसे थे, ना कोई सहारा। जो थोड़े बहुत पैसे सावित्री ने साड़ी में बांधे थे, वे रास्ते में खर्च हो गए थे। वे उस बड़े शहर में अकेले थे, जहां ना कोई उनका जानने वाला था, ना कोई मदद करने वाला। लेकिन सावित्री देवी ने हार नहीं मानी। उन्होंने रामेश्वर जी का हाथ थामा और बोलीं, “हम मरेंगे नहीं। मैं कुछ काम ढूंढूंगी। हम अपने लिए रास्ता बनाएंगे।”
संघर्ष की शुरुआत
वे पास के एक छोटे से होटल में गईं। वहां उन्होंने होटल के मालिक से हाथ जोड़कर कहा, “बेटा, मुझे कुछ काम दे दो। मैं बर्तन मांझ दूंगी। झाड़ू-पोछा कर दूंगी। बदले में हमें सिर्फ खाना दे देना। मेरे पति बीमार हैं। हमारा इस दुनिया में कोई नहीं है।” होटल का मालिक एक दयालु इंसान था। उसने सावित्री देवी की बात मान ली और उन्हें काम दे दिया।
अब सावित्री देवी दिनभर होटल में काम करतीं, बर्तन धोतीं, फर्श साफ करतीं और जो थोड़ा बहुत खाना बचता, उसे अपने और रामेश्वर जी के लिए ले आतीं। रामेश्वर जी दिनभर होटल के एक कोने में कुर्सी पर बैठे रहते। उनकी हालत ऐसी थी कि वे ज्यादा चल-फिर भी नहीं सकते थे। रात को जब होटल बंद होता तो सावित्री मालिक से कहतीं, “बेटा, अगर तुम्हें ऐतराज ना हो तो हम यहां सो जाएं। हमारे पास कोई ठिकाना नहीं है।” मालिक ने उन्हें इजाजत दे दी।
एक नई जिंदगी
अब वे दोनों रात को होटल के फर्श पर एक पतली चादर बिछाकर सोते। लेकिन हर रात वे अपने बेटे और बहू को कोसते। वे अपने पोते अर्जुन को याद करते और सोचते, “काश, हमारा अर्जुन यहां होता। वह हमें कभी इस हाल में ना देखता।” उनकी आंखों से आंसू बहते और वे चुपचाप सो जाते।
इधर, जब विदेश में अर्जुन का डॉक्टरी का कोर्स पूरा हो गया, उसने अपने माता-पिता को फोन किया और कहा, “मम्मी-पापा, मेरा कोर्स खत्म हो गया है। मैं जल्दी ही इंडिया आ रहा हूं। मुझे दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में इंटरव्यू देना है। लेकिन पहले दादा-दादी से बात कराओ। मुझे उनसे बात किए हुए बहुत दिन हो गए।” संजय ने झूठ बोला, “बेटा, वे लोग तीर्थ यात्रा पर गए हैं। जहां वे हैं वहां फोन का नेटवर्क नहीं है। तू दिल्ली आजा। फिर हम बात करेंगे।”
अर्जुन का लौटना
अर्जुन को थोड़ा अजीब लगा। लेकिन उसने ज्यादा सवाल नहीं किए। उसने अपना सामान पैक किया और इंडिया के लिए रवाना हो गया। वह दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरा। एक कैब ली और उस अस्पताल पहुंचा जहां उसका इंटरव्यू था। इंटरव्यू अच्छा रहा। बाहर निकलते वक्त उसे जोर की भूख लगी। पास में वही होटल था जहां सावित्री देवी काम करती थीं। अर्जुन ने सोचा, “चलो, यहां खाना खा लेता हूं।”
दादी से मिलन
होटल में घुसते ही उसकी नजर एक बुजुर्ग महिला पर पड़ी, जो फर्श पर पोछा लगा रही थी। उस महिला की शक्ल उसे जानी-पहचानी लगी। उसने दिमाग पर जोर डाला और अचानक उसके दिल की धड़कन तेज हो गई। वह महिला उसकी दादी सावित्री देवी जैसी दिख रही थी। पहले तो उसने सोचा, “नहीं, यह मेरा वहम होगा। दादी तो तीर्थ यात्रा पर गई हैं। वे यहां क्या करेंगी?” लेकिन फिर उसने हिम्मत की और पास गया।
जैसे ही वह करीब पहुंचा, उसे यकीन हो गया। उसने जोर से पुकारा, “दादी!” सावित्री देवी ने उस आवाज को सुना। अपना सिर उठाया और सामने अपने पोते अर्जुन को देखा। उनकी आंखें छलक पड़ीं। वे पोछा छोड़कर उठीं और अर्जुन से लिपट गईं। दोनों फूट-फूट कर रोने लगे। रामेश्वर जी भी पास ही कुर्सी पर बैठे थे। अर्जुन ने उन्हें देखा और दौड़कर उनके पैर छुए।
परिवार का पुनर्मिलन
“दादाजी, आप यहां कैसे?” उसने कांपती आवाज में पूछा। सावित्री देवी और रामेश्वर जी ने उसे सारी कहानी सुनाई। कैसे संजय उन्हें इलाज के बहाने दिल्ली लाया और छोड़ गया। कैसे वे बेसहारा हो गए और कैसे अब वे इस होटल में काम करके गुजारा कर रहे थे। अर्जुन का खून खोल उठा। उसकी आंखें गुस्से से लाल हो गईं। उसने अपने दादा-दादी को गले लगाया और कहा, “आप चिंता मत करो। अब मैं हूं आपके साथ। मैं आपको इस हाल में नहीं छोड़ूंगा।”
उसने तुरंत दिल्ली में एक छोटा सा किराए का घर लिया। अपने दादा-दादी को वहां शिफ्ट किया और उनकी देखभाल के लिए दो नौकर रखे। एक खाना बनाने के लिए और दूसरा उनकी सेवा के लिए। फिर उसने उनसे कहा, “दादाजी, दादी, आप यहां आराम करो। मैं अभी आता हूं। मुझे कुछ जरूरी काम निपटाना है।”
संजय और पूजा की सच्चाई
रामेश्वर जी और सावित्री देवी को थोड़ा सुकून मिला। उन्हें लगा कि अब उनका लाडला पोता उनके साथ है, तो सब ठीक हो जाएगा। फिर अर्जुन गांव लौटा। संजय और पूजा ने उसे देखा तो खुशी से झूम उठे। “अरे, हमारा बेटा आ गया!” पूजा ने अच्छे-अच्छे पकवान बनाए। रात को पूरा परिवार एक साथ खाना खाने बैठा।
खाते वक्त अर्जुन ने कहा, “मम्मी-पापा, मुझे विदेश में एक अच्छी नौकरी मिल गई है। वहां मुझे अच्छा पैसा मिलेगा। लेकिन मैं आपको यहां अकेले नहीं छोड़ सकता। आप मेरे साथ चलो।” संजय और पूजा खुश हो गए। फिर अर्जुन ने कहा, “मम्मी-पापा, अपना सामान पैक कर लो। हम कल दिल्ली से विदेश के लिए निकलेंगे।” दोनों ने जल्दी-जल्दी सामान पैक किया।
अर्जुन की योजना
जो थोड़े बहुत पैसे उनके पास थे, उसे एक बैग में रखा। रास्ते में संजय ने वह बैग अर्जुन को दे दिया और बोला, “बेटा, इसे तू संभाल। हमसे कहीं गिर गया तो मुसीबत हो जाएगी।” अर्जुन उन्हें दिल्ली एयरपोर्ट ले गया। वहां पहुंचकर उसने कहा, “मम्मी-पापा, आप यहां थोड़ा इंतजार करो। मैं टिकट कंफर्म करवा कर आता हूं।” वो अंदर गया लेकिन दूसरे गेट से निकलकर अपने दादा-दादी के पास चला गया।
परिवार का बिखराव
संजय और पूजा उसका इंतजार करते रहे। घंटों बीत गए लेकिन अर्जुन नहीं आया। उसका फोन भी स्विच ऑफ हो गया। आखिरकार उन्हें समझ आया कि अर्जुन उन्हें छोड़कर चला गया। उनके पास ना पैसे थे, ना कोई सहारा। वे उस बड़े एयरपोर्ट पर बेसहारा बैठे रोने लगे।
अर्जुन का सबक
इधर, अर्जुन अपने दादा-दादी को लेकर घंटों बाद फिर से एयरपोर्ट पहुंचा। संजय और पूजा अभी भी वहां थे। वह उनके पास गया और बोला, “मम्मी-पापा, जो आपने दादाजी और दादी के साथ किया, वही मैंने आपके साथ भी किया है। अब आपको उनका दर्द समझ आया?” संजय और पूजा शर्मिंदा हो गए। संजय रोते हुए अपने माता-पिता रामेश्वर जी और सावित्री देवी के पैरों में गिर पड़ा और बोला, “मां-पिताजी, मुझे माफ कर दो। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई।”
पुनर्मिलन
रामेश्वर जी और सावित्री देवी ने उसे माफ कर दिया। क्योंकि लाख दुख सहने के बाद भी माता-पिता अपनी औलाद की खुशी के लिए हर दुख भूल जाते हैं। आखिरकार पूरा परिवार फिर से एक बार साथ रहने लगा। दोस्तों, अर्जुन ने अपने माता-पिता को सबक सिखाया और अपने दादा-दादी को वह सम्मान दिलाया जिसके वे हकदार थे।
सीख
यह कहानी हमें सिखाती है कि अपनों का सम्मान करो। वरना एक दिन आपको भी अपने कर्मों का फल भुगतना पड़ सकता है। लेकिन आप बताइए, क्या अर्जुन ने सही किया? संजय और पूजा को क्या सजा मिलनी चाहिए थी? और रामेश्वर जी और सावित्री देवी का दर्द आज के समाज की सच्चाई है या नहीं? अपनी राय जरूर बताएं और अगर कहानी अच्छी लगी हो तो अपना आशीर्वाद दें। वीडियो को लाइक करें और हमारे चैनल “स्टोरी बाय आरके” को जरूर सब्सक्राइब करें। मिलते हैं अगली वीडियो में। जय हिंद, जय भारत!
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