बेरोजगार लड़का स्टेशन पर बैठा था… लड़की ने दिया ऐसा मौका कि इंसानियत भी रो पड़ी

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सुबह की हल्की ठंडक अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी। शहर के पुराने रेलवे स्टेशन का प्लेटफार्म धीरे-धीरे जाग रहा था। दूर से आती ट्रेनों की सीटी, चाय वालों की पुकार और यात्रियों की आवाजाही मिलकर एक अजीब सी हलचल पैदा कर रही थी। कोई अपने सामान के साथ जल्दी-जल्दी भाग रहा था, कोई बेंच पर बैठकर ट्रेन का इंतजार कर रहा था। इसी भीड़-भाड़ के बीच प्लेटफार्म के एक कोने में एक छोटी सी लकड़ी की दुकान थी। दुकान पुरानी थी, उसके रंग कई जगह से उखड़ चुके थे, लेकिन सामने करीने से सजी किताबें किसी भी राहगीर को रुकने के लिए मजबूर कर देती थीं।

उस दुकान के पीछे बैठी थी आरती। लगभग तेईस साल की साधारण सी लड़की। गेहुँआ रंग, शांत चेहरा और आंखों में एक अजीब सी चमक। उसने हल्की नीली सलवार-कमीज पहन रखी थी और अपने लंबे बालों को ढीली चोटी में बांध रखा था। उसके सामने एक पुरानी मेज थी जिस पर कुछ कॉपियां, पेन और एक छोटी डायरी रखी रहती थी।

यह दुकान उसके लिए सिर्फ रोजी-रोटी का जरिया नहीं थी। यह उसकी दुनिया थी, उसकी जिम्मेदारी थी और कहीं न कहीं उसके पिता की आखिरी निशानी भी।

कुछ साल पहले तक यही दुकान उसके पिता चलाते थे। वे स्टेशन पर किताबें और मैगजीन बेचते थे। उन्हें पढ़ने का बहुत शौक था और वे हमेशा कहते थे कि किताबें इंसान को बदल देती हैं। जब तक वे जिंदा थे, दुकान पर हमेशा चहल-पहल रहती थी। यात्री आते, अखबार खरीदते, मैगजीन पलटते और कभी-कभी किताबें भी ले जाते।

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। एक दिन अचानक उनके पिता की तबीयत खराब हो गई। इलाज चला, उम्मीदें बनी रहीं, लेकिन कुछ ही महीनों में वे इस दुनिया से चले गए। उस दिन के बाद आरती की जिंदगी जैसे बदल गई।

घर में कमाने वाला कोई नहीं था। रिश्तेदारों ने सलाह दी कि दुकान बेच दो या कोई दूसरा काम ढूंढ लो। कई लोगों ने कहा कि स्टेशन पर अकेली लड़की दुकान कैसे संभालेगी। लेकिन आरती ने हार नहीं मानी। उसने तय कर लिया कि वह अपने पिता की दुकान को बंद नहीं होने देगी।

धीरे-धीरे उसने दुकान को फिर से व्यवस्थित किया। पुराने अखबारों और पत्रिकाओं के साथ उसने बच्चों की किताबें भी रखनी शुरू कीं। कुछ कहानी की किताबें, कुछ प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबें, कुछ छोटी-छोटी चित्र पुस्तिकाएं। उसका मानना था कि स्टेशन से गुजरने वाले हजारों लोगों में से कोई ना कोई ऐसा जरूर होगा जिसे किताबों की जरूरत होगी।

हर सुबह वह सबसे पहले दुकान खोलती, किताबों की धूल साफ करती और उन्हें सलीके से सजाती। दिनभर लोग आते-जाते रहते। कोई किताब खरीदता, कोई बस देखकर चला जाता। लेकिन आरती को इससे कोई शिकायत नहीं थी।

स्टेशन के बाहर एक और दुनिया भी थी। वहां कुछ छोटे-छोटे बच्चे रहते थे। कोई चाय के गिलास उठाता, कोई खाली बोतलें इकट्ठा करता, कोई बस प्लेटफार्म के इधर-उधर घूमता रहता। उनके कपड़े मैले होते थे और चेहरे पर बचपन के साथ संघर्ष भी झलकता था।

कभी-कभी वे बच्चे आरती की दुकान के सामने खड़े होकर किताबों को देखते रहते। उनकी आंखों में उत्सुकता होती, लेकिन वे पास आने की हिम्मत नहीं करते थे।

एक दिन आरती ने उन्हें देखा और मुस्कुरा कर कहा,
“अगर देखना है तो पास आकर देखो।”

बच्चे पहले तो झिझके, फिर धीरे-धीरे दुकान के पास आ गए। एक छोटा सा लड़का किताब की तस्वीरों को देखकर बोला,
“दीदी, इसमें क्या लिखा है?”

आरती मुस्कुराई। उसने किताब खोली और धीरे-धीरे कहानी पढ़ना शुरू कर दिया। बच्चे चुपचाप सुनने लगे। उनकी आंखों में चमक आ गई। उस दिन के बाद से वे बच्चे अक्सर दुकान के पास आने लगे। जब भी समय मिलता, आरती उन्हें कहानी सुना देती।

उधर स्टेशन पर हर दिन नए-नए चेहरे आते थे। कोई कहीं जाने की जल्दी में होता, कोई किसी का इंतजार कर रहा होता। लेकिन एक दिन एक ऐसा चेहरा भी प्लेटफार्म पर आया जिसकी कहानी अभी शुरू होने वाली थी।

उसका नाम था रोहित।

रोहित लगभग पच्चीस साल का था। दुबला-पतला शरीर, चेहरे पर हल्की दाढ़ी और आंखों में थकान। उसने साधारण सी शर्ट पहन रखी थी और कंधे पर एक छोटा सा बैग था। वह धीरे-धीरे प्लेटफार्म पर चलता हुआ आया और एक बेंच पर बैठ गया।

कुछ देर बाद उसकी नजर सामने की किताबों की दुकान पर पड़ी। वह उठकर वहां चला गया। उसने एक प्रतियोगी परीक्षा की किताब उठाई और कुछ पन्ने पलटे।

आरती ने उसे देखा और मुस्कुराकर पूछा,
“आपको कोई खास किताब चाहिए?”

रोहित कुछ पल चुप रहा। फिर बोला,
“नहीं… बस ऐसे ही देख रहा था।”

उसकी आवाज में थकान थी। आरती ने महसूस किया कि शायद वह किसी चिंता में है।

“आप यहां पहली बार आए हैं?” उसने पूछा।

रोहित ने हल्के से सिर हिलाया।

कुछ देर दोनों के बीच खामोशी रही। तभी पास से एक ट्रेन गुजर गई और प्लेटफार्म पर तेज आवाज गूंजने लगी।

ट्रेन के जाने के बाद रोहित ने कहा,
“आप यह दुकान अकेले संभालती हैं?”

आरती ने मुस्कुराकर कहा,
“अब तो आदत हो गई है।”

तभी कुछ बच्चे फिर से दुकान के पास आ गए और बोले,
“दीदी, आज कहानी सुनाओगी?”

आरती ने किताब उठाई और पढ़ना शुरू कर दिया। बच्चे ध्यान से सुनने लगे। रोहित वहीं खड़ा यह सब देख रहा था। कुछ देर बाद बच्चों ने ताली बजाई और हंसते हुए भाग गए।

रोहित के चेहरे पर भी हल्की मुस्कान आ गई। शायद उस दिन पहली बार उसे थोड़ा सुकून मिला था।

असल में रोहित पढ़ा-लिखा था। उसने मेहनत से पढ़ाई की थी, कई जगह नौकरी के लिए कोशिश की थी, लेकिन हर जगह उसे निराशा ही मिली। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास टूटने लगा था। अब वह शहर छोड़कर कहीं और जाने की सोच रहा था।

अगले दिन सुबह वह फिर उसी प्लेटफार्म पर आ गया। शायद उसे खुद भी नहीं पता था कि क्यों।

उसने देखा कि आरती बच्चों को कहानी सुना रही है। कहानी खत्म होने के बाद वह दुकान के पास आया। एक बच्चा उसके पास आकर बोला,

“भैया, इसमें क्या लिखा है?”

रोहित ने किताब ली और पढ़ना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे बाकी बच्चे भी उसके आसपास जमा हो गए।

अब रोहित उन्हें अक्षर समझा रहा था।

आरती यह सब देखकर चुपचाप मुस्कुरा रही थी।

कुछ देर बाद उसने रोहित से पूछा,
“आपको बच्चों को पढ़ाना अच्छा लगता है?”

रोहित ने धीरे से कहा,
“शायद… हां।”

फिर आरती ने कहा,
“अगर आप चाहें तो कभी-कभी यहां आकर मदद कर सकते हैं।”

रोहित चौंक गया। एक अनजान लड़की उसे अपने काम में शामिल करने की बात कर रही थी।

“लेकिन लोग क्या कहेंगे?” उसने पूछा।

आरती मुस्कुराई,
“लोग तो कुछ भी कहते हैं। लेकिन अगर किसी अच्छे काम में मदद मिल जाए तो मुझे फर्क नहीं पड़ता।”

रोहित कुछ देर सोचता रहा। फिर बोला,
“ठीक है… मैं कोशिश कर सकता हूं।”

उस दिन से रोहित कभी-कभी दुकान पर आने लगा। वह किताबें सजाने में मदद करता, ग्राहकों को किताबें दिखाता और बच्चों को पढ़ाता।

धीरे-धीरे बच्चे ज्यादा आने लगे। कोई अक्षर सीखता, कोई शब्द पढ़ता, कोई कहानी सुनता।

कुछ लोग पहले मजाक उड़ाते थे। लेकिन धीरे-धीरे वही लोग रुककर बच्चों को पढ़ते हुए देखने लगे।

एक दिन एक बुजुर्ग यात्री वहां आए। उन्होंने कुछ देर तक बच्चों को पढ़ते देखा। फिर अपने बैग से दो पुरानी किताबें निकालकर आरती को दे दीं।

“यह बच्चों के काम आ जाएंगी,” उन्होंने कहा।

उस दिन के बाद से कई लोग किताबें, कॉपियां और पेंसिल देने लगे।

आरती ने दुकान के एक कोने को बच्चों के लिए अलग कर दिया। दो पुराने लकड़ी के बक्से रख दिए जिन पर बच्चे बैठ सकते थे। दीवार के पास किताबों की एक छोटी लाइब्रेरी बना दी गई।

अब वह छोटी सी दुकान सचमुच एक छोटी लाइब्रेरी बन गई थी।

लेकिन सबसे बड़ा बदलाव रोहित के अंदर आया था।

कुछ महीने पहले तक वह खुद को बेकार समझता था। उसे लगता था कि उसकी पढ़ाई किसी काम की नहीं रही। लेकिन अब जब वह बच्चों को पढ़ते हुए देखता, उनकी छोटी-छोटी सफलताएं देखता, तो उसे लगता कि उसका ज्ञान सच में किसी के काम आ रहा है।

एक शाम जब बच्चे पढ़कर जा चुके थे, प्लेटफार्म पर हल्की शांति थी।

आरती दुकान के सामने खड़ी थी और रोहित किताबें समेट रहा था।

आरती ने मुस्कुराकर कहा,
“तुम्हें याद है जिस दिन तुम पहली बार यहां आए थे?”

रोहित बोला,
“हां… उस दिन मैं बहुत निराश था।”

आरती ने कहा,
“अगर उस दिन तुम नहीं आते तो शायद यह सब भी नहीं होता।”

रोहित ने सिर हिलाया और बोला,
“नहीं… अगर तुमने मुझे मौका नहीं दिया होता तो मैं भी यहां नहीं होता।”

दोनों कुछ पल चुप रहे।

उसी समय कुछ बच्चे दौड़ते हुए आए और बोले,
“दीदी, कल भी पढ़ाई होगी ना?”

रोहित हंसकर बोला,
“बिल्कुल होगी।”

बच्चे खुश होकर भाग गए।

रोहित ने दुकान की ओर देखते हुए कहा,
“सच कहूं तो अब यह सिर्फ दुकान नहीं रही।”

आरती ने पूछा,
“तो क्या है?”

रोहित ने मुस्कुराकर कहा,

“यह एक छोटी लाइब्रेरी है… जहां से कई बच्चों के सपनों की शुरुआत हो सकती है।”

उसी समय प्लेटफार्म पर एक ट्रेन आकर रुकी। यात्री उतरने लगे, कुछ चढ़ने लगे। स्टेशन का शोर फिर से बढ़ गया।

लेकिन उस शोर के बीच भी प्लेटफार्म के उस छोटे से कोने में एक शांत उम्मीद मौजूद थी।

एक छोटी सी दुकान…
जहां एक लड़की की हिम्मत और एक बेरोजगार लड़के की कोशिश ने मिलकर कई बच्चों के लिए सीखने का रास्ता बना दिया था।

क्योंकि कभी-कभी एक छोटा सा मौका और दो सच्चे इरादे कई जिंदगियों की दिशा बदल देते हैं।