न्याय की तराजू और प्रेम की केतली: समीरा और आरव की महागाथा
अध्याय 1: उम्मीदों का छोटा घर और अभावों का आकाश
शहर के कोलाहल से दूर, जहाँ रेलवे की पटरियां एक-दूसरे को काटती हुई अनंत तक जाती थीं, वहीं बसी थी ‘पुरानी बस्ती’। इस बस्ती की हवा में कोयले का धुआं और थकी हुई जिंदगियों की गंध हमेशा तैरती रहती थी। इसी बस्ती की एक तंग गली में दो कमरों का एक मकान था, जिसकी छत हर बरसात में आँसू की तरह टपकती थी।
वहाँ समीरा और आरव रहते थे। समीरा, जिसके लिए कानून की किताबें केवल कागज़ के पन्ने नहीं, बल्कि एक उड़ान का जरिया थीं। और आरव, जिसका पूरा संसार समीरा की आँखों की चमक में सिमटा हुआ था। आरव रोज सुबह 4 बजे उठता था, जब शहर की रोशनी अभी ठीक से जागी भी नहीं होती थी। वह चुपचाप रसोई में जाता, अदरक कूटता, चाय उबालता और फिर अपनी केतली लेकर प्लेटफार्म नंबर तीन की ओर निकल पड़ता।
आरव की चाय में केवल दूध और शक्कर नहीं होती थी, बल्कि उसमें समीरा के भविष्य का निवेश होता था। हर कप चाय से मिले दो रुपये सीधे समीरा की कोचिंग और किताबों के लिए जमा होते थे। समीरा जब रात-रात भर जागकर धाराएँ (Sections) याद करती, तो आरव खिड़की के पास बैठकर उसे देखता रहता।
“आरव, तुम सो क्यों नहीं जाते? सुबह तुम्हें जल्दी निकलना है,” समीरा अक्सर कहती।
आरव मुस्कुराकर जवाब देता, “जब मेरी जज साहिबा जाग रही हों, तो चपरासी को सोने का हक नहीं है।”
अध्याय 2: टूटन की शुरुआत और नियति का वार
वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता। आरव की कमाई कम होने लगी। रेलवे प्रशासन ने स्टेशन के बाहर से ठेले हटाने का अभियान शुरू किया। आरव का छोटा सा व्यापार संकट में आ गया। घर का किराया बकाया होने लगा। इसी बीच समीरा की जुडिशियल सर्विस की परीक्षा नजदीक आ गई।
पैसों की तंगी ने उनके बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी कर दी। पड़ोसियों के ताने और रिश्तेदारों की बेरुखी ने आग में घी का काम किया। किसी ने समीरा को बहकाया कि आरव उसकी पढ़ाई का बोझ नहीं उठा पा रहा, तो किसी ने आरव से कहा कि समीरा सफल होने के बाद उसे छोड़ देगी।
गलतफहमियों का एक छोटा सा बीज अब एक विशाल वृक्ष बन चुका था। एक रात, एक मामूली बहस ने विकराल रूप ले लिया।
“आरव, तुम मुझे कभी नहीं समझोगे!” समीरा चिल्लाई।
“समीरा, मैंने तुम्हारे लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया और तुम मुझ पर ही शक कर रही हो?” आरव की आवाज में पहली बार दर्द के साथ गुस्सा था।
उस रात के सन्नाटे ने उनके रिश्ते को निगल लिया। कुछ हफ्तों बाद, वे फैमिली कोर्ट की ठंडी सीढ़ियों पर खड़े थे। तलाक के कागजात पर साइन करते समय समीरा की उंगलियां कांप रही थीं, पर उसका अहंकार और जिद प्रेम से बड़ी हो गई थी। आरव ने बिना कुछ कहे अपना बैग उठाया और स्टेशन की भीड़ में खो गया।
अध्याय 3: संघर्ष की अग्नि और सफलता का शिखर
तलाक के बाद के चार साल समीरा के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थे। वह एक छोटे से हॉस्टल के कमरे में रहने लगी। वहाँ न आरव की बनाई चाय थी, न उसका सहारा। वह अक्सर भूखी सोती, पर अपनी किताबों से उसने नाता नहीं तोड़ा। हर असफलता पर उसे आरव का वह चेहरा याद आता जो कहता था, “हारना सबसे बड़ा गुनाह है।”

उसने अपनी आंखों के आंसुओं को स्याही बनाया। दिन-रात एक कर दिए। और फिर वह दिन आया जब अखबार में उसका नाम ‘सिविल जज’ की सूची में सबसे ऊपर चमक रहा था।
समीरा अब जज बन चुकी थी। वह काले कोट में अदालत की ऊँची कुर्सी पर बैठती। लोग उसके सम्मान में खड़े होते। पर उसके अंदर का सन्नाटा अभी भी उसे कचोटता था। उसे अपनी पहली पोस्टिंग उसी शहर में मिली जहाँ उसका अतीत दफन था।
अध्याय 4: स्टेशन का वह सामना
ज्वाइन करने के कुछ दिन बाद, समीरा को एक आधिकारिक दौरे के लिए रेलवे स्टेशन जाना पड़ा। भारी सुरक्षा और अधिकारियों के साथ जब वह प्लेटफार्म नंबर तीन पर पहुँची, तो हवा में वही पुरानी अदरक वाली चाय की खुशबू तैर रही थी।
उसकी नजरें अनायास ही भीड़ को चीरती हुई उस पुराने कोने की ओर गईं। वहाँ एक आदमी फटी हुई कमीज पहने, दाढ़ी बढ़ाए, चाय छान रहा था। वह आरव था।
समीरा के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह जज की गरिमा भूलकर वहीं रुक गई। आरव ने ऊपर देखा। उसकी आँखों में न नफरत थी, न खुशी। बस एक अजीब सा ठहराव था।
“एक चाय देना,” समीरा ने भारी आवाज में कहा।
आरव ने बिना कुछ बोले कप आगे बढ़ाया। जब उनकी उंगलियां टकराईं, तो लगा जैसे 4 साल का सन्नाटा एक पल में चीख पड़ा हो। समीरा ने देखा कि आरव के हाथ कांप रहे थे, पर उसने नजरें नहीं मिलाईं।
अध्याय 5: अदालत का कठघरा और न्याय का अंतिम प्रहार
अगले ही दिन, पुलिस ने अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाया और आरव समेत कई छोटे दुकानदारों को गिरफ्तार कर लिया। किस्मत का खेल देखिए, इन सबको उसी अदालत में पेश किया गया जहाँ समीरा जज थी।
कटघरे में खड़ा आरव और जज की कुर्सी पर बैठी समीरा। पूरी अदालत खामोश थी। सरकारी वकील ने आरोप लगाए कि ये लोग व्यवस्था में बाधा डालते हैं।
समीरा ने फाइलें देखीं। कानून की नजर में वे अतिक्रमणकारी थे, पर न्याय की नजर में वे केवल दो वक्त की रोटी कमाने वाले गरीब थे। उसने आरव की आँखों में देखा। उन आँखों ने कभी उसे जज बनाने के लिए खुद को जलाया था।
समीरा ने अपना हथौड़ा (Gavel) मेज पर रखा और फैसला सुनाया। “पर्याप्त सबूतों के अभाव और मानवीय आधार पर इन सभी को रिहा किया जाता है। प्रशासन को आदेश दिया जाता है कि इनके लिए एक स्थायी वेंडिंग जोन बनाया जाए।”
अध्याय 6: बारिश और अधूरी बातचीत
शाम को जब समीरा अपने चेंबर में थी, तो आरव उससे मिलने आया। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी।
“धन्यवाद, जज साहिबा,” आरव ने सिर झुकाकर कहा।
“आरव, मुझे जज साहिबा मत कहो,” समीरा की आँखों से आँसू छलक पड़े। “तुमने चाय बेचकर मुझे इस कुर्सी तक पहुँचाया और मैंने तुम्हें ही कटघरे में खड़ा देखा।”
आरव मुस्कुराया, “समीरा, कुछ कहानियाँ साथ रहने के लिए नहीं, बल्कि एक-दूसरे को मुकाम तक पहुँचाने के लिए होती हैं। तुम इस कुर्सी के लायक थी और मैं इसी केतली के।”
समीरा ने उसका हाथ थामना चाहा, पर आरव पीछे हट गया। उसने कहा, “आज तुमने न्याय किया है, एहसान नहीं। मेरा प्यार सफल हो गया।”
उपसंहार: एक नया सवेरा
आरव स्टेशन की भीड़ में वापस चला गया और समीरा अपनी फाइलों की दुनिया में। वे दोबारा कभी एक नहीं हुए, पर उस शहर के लोग आज भी एक जज और एक चाय वाले की कहानी सुनाते हैं। एक ऐसी कहानी जहाँ प्यार ने खुद को मिटा दिया ताकि दूसरा चमक सके।
समीरा आज भी जब किसी बड़े फैसले को सुनाती है, तो उसे आरव की वह अदरक वाली चाय याद आती है। वह जानती है कि न्याय केवल किताबों से नहीं, बल्कि उस पसीने से भी निकलता है जो किसी ने आपके लिए बहाया हो।
अगला कदम: क्या आप चाहते हैं कि मैं इस कहानी का एक ‘अल्टरनेटिव एंडिंग’ (Alternative Ending) लिखूँ जहाँ समीरा और आरव अपने मतभेद भुलाकर फिर से एक हो जाते हैं? या फिर आप समीरा के किसी बड़े न्यायिक केस पर आधारित एक नई कहानी चाहेंगे?
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