सच्ची पहचान
सुबह के 11:00 बज रहे थे। एक पतले-दुबले बुजुर्ग, सिंपल पट शर्ट पहने, शहर के सबसे बड़े कार शोरूम की तरफ तेज़ी से बढ़ रहे थे। उनका नाम था विनय कुमार। उनके कंधे पर एक पुराना झोला लटका था। कपड़े साधारण थे, लेकिन चाल में आत्मविश्वास ऐसा था जैसे कोई करोड़पति चल रहा हो।
जैसे ही वे गेट पर पहुँचे, गार्ड कुर्सी से उठ गया और गुस्से से बोला, “अरे अंदर कहाँ जा रहे हो बाबा? यह कार का शोरूम है, राशन की दुकान नहीं!” विनय कुमार जी ने मुस्कुराकर कहा, “मुझे वही काम है बेटा, जो एक कार खरीदने वाले को होता है। मुझे एक कार का रेट और कुछ डिटेल्स पता करनी हैं।”
गार्ड हँस पड़ा, “देखो भाई, बाबा को गाड़ी खरीदनी है!” रिसेप्शन पर बैठी सोनाली सिंह यह सब देख-सुन रही थी। उसने विनय कुमार जी को ऊपर से नीचे तक देखा और तिरस्कार भरी मुस्कान के साथ बोली, “बाबा, यह इंपोर्टेड कार का शोरूम है। आप शायद गलत जगह आ गए हैं।”
विनय कुमार जी ने सहजता से जवाब दिया, “बेटा, मुझे पता है यहाँ गाड़ियों की कीमत बहुत ज्यादा है। लेकिन मुझे यहीं आना है।” उनका कॉन्फिडेंस देखकर गार्ड और सोनाली एक-दूसरे को देखने लगे। सोनाली बोली, “ठीक है, आप अंदर वेट करिए। लेकिन किसी गाड़ी को टच मत करना बाबा, वरना प्रॉब्लम हो जाएगी।”
अंदर मौजूद कस्टमर्स विनय कुमार जी को ऐसे देख रहे थे जैसे कोई एलियन आ गया हो। कोई कह रहा था, “बेचारा एसी की हवा खाने आया होगा।” सब हँस रहे थे, लेकिन विनय कुमार जी शांति से एक कोने में जाकर बैठ गए। उन्होंने अपना चश्मा उतारकर साइड में रखा, झोले से पानी निकाला और पीने लगे। वे धैर्यपूर्वक सेल्समैन के फ्री होने का इंतजार कर रहे थे।
रिसेप्शनिस्ट सोनाली को उनकी उपस्थिति प्रीमियम कस्टमर्स के बीच खटक रही थी। उसे डर था कि कहीं मैनेजर उसकी क्लास न ले ले। लेकिन वह बुजुर्ग बाबा का आत्मविश्वास देखकर थोड़ा हैरान भी थी। विनय कुमार जी हर सेल्समैन और मैनेजर को ध्यान से देख रहे थे, दो घंटे से ज्यादा इंतजार कर चुके थे।

अचानक वे कुर्सी से उठे और मैनेजर के रूम की तरफ बढ़ने लगे। सोनाली तेजी से पहुँची और बोली, “बाबा, मैनेजर सर अभी व्यस्त हैं, आप उनसे नहीं मिल सकते।” विनय कुमार जी बोले, “बेटा, मैं दो घंटे से इंतजार कर रहा हूँ, अब खुद ही बात कर लेता हूँ।” सोनाली ने एक्टिंग करते हुए कहा, “ठीक है बाबा, थोड़ी देर और बैठिए, जैसे ही कोई सेल्समैन फ्री होता है, मैं भेजती हूँ।”
आधा घंटा और बीत गया। विनय कुमार जी देख रहे थे कि सब उन्हें जानबूझकर इग्नोर कर रहे हैं। आखिरकार सोनाली ने मैनेजर को कॉल किया। मैनेजर मोबाइल पर रील्स देखने में व्यस्त था। सोनाली ने कहा, “सर, वो बाबा अभी भी बैठे हैं, प्रीमियम कस्टमर्स को डिस्टर्ब कर रहे हैं। उनसे पाँच मिनट में बात करके निपटा दीजिए।”
मैनेजर ने विनय कुमार जी को बुलाया और घमंड से बोला, “मेरे पास सिर्फ पाँच मिनट हैं बाबा, जल्दी बताइए क्या काम है?” विनय कुमार जी बोले, “बेटा, मुझे बाहर खड़ी ब्लैक एसयूवी की कीमत और डिटेल्स पता करनी हैं। मेरी बेटी यूएसए से पढ़ाई खत्म करके वापस आ रही है, उसका बर्थडे है, मैं उसे यह एसयूवी गिफ्ट करना चाहता हूँ। क्या दस दिन में डिलीवरी हो सकती है?”
मैनेजर हँस पड़ा, “अरे बाबा, आपको पता भी है यह गाड़ी कितने की है? कहीं झोले में पैसे भर कर तो नहीं लाए हो?” पूरा स्टाफ हँस रहा था। विनय कुमार जी बोले, “बेटा, मुझे वही एसयूवी खरीदनी है, एडवांस पेमेंट भी कर सकता हूँ, बस शर्त है कि गाड़ी दस दिन में मिल जाए।”
मैनेजर को गुस्सा आ गया, “बाबा, टाइम पास हो गया हो तो बाहर निकलो, वरना गार्ड को बुलाऊँगा।” विनय कुमार जी शांत रहे। तभी एक यंग सेल्स गर्ल काव्या आई और बोली, “सर, मैं आपकी मदद करूँगी।” विनय कुमार जी ने कहा, “मुझे उस एसयूवी की डिलीवरी दस दिन में चाहिए।” काव्या ने सिस्टम में चेक किया, “सर, कीमत 1 करोड़ 25 लाख है और एक हफ्ते में डिलीवर हो सकती है।”
विनय कुमार जी ने झोले से चेकबुक निकाली, चेक लिखा और काव्या को दे दिया। काव्या चेक लेकर मैनेजर के पास गई, लेकिन मैनेजर ने गुस्से में चेक फाड़कर डस्टबिन में फेंक दिया। उसने काव्या को डांटा, “अगर तुम्हें समाज सेवा करनी है तो एनजीओ ज्वाइन करो, यहाँ प्रीमियम कस्टमर्स की हेल्प करो।”
काव्या की आंखों में आंसू आ गए। मैनेजर ने उसे जॉब से निकालने की धमकी दी। काव्या दुखी होकर बैठ गई। विनय कुमार जी अपने मोबाइल पर कुछ टाइप कर रहे थे। उन्होंने मैनेजर से कहा, “बेटा, एक बार अपना मेल चेक कर लो, शायद एचआर हेड स्वाति का मेल आया हो।” मैनेजर हँस पड़ा, “बाबा, यह सब ड्रामा छोड़िए।”
तभी तीन चमचमाती काली गाड़ियाँ शोरूम के बाहर आकर रुकीं। शोरूम के मालिक अभिज्ञान सिंह भागते हुए अंदर आए और विनय कुमार जी के सामने सर झुका कर बोले, “सर, आपने मुझे बुला लिया होता। आपके साथ यहाँ ऐसा व्यवहार होना मेरे लिए शर्म की बात है।”
अभिज्ञान सिंह ने सबके सामने कहा, “मैनेजर, तुम्हें पता है तुमने किसकी इंसल्ट की है? यह बुजुर्ग उस कंपनी के मालिक हैं जिनकी गाड़ियाँ हम बेचते हैं। ये चाहे तो पूरा शोरूम खरीद सकते हैं!” मैनेजर सदमे में था, विनय कुमार जी के पैरों पर गिरकर माफी माँगने लगा।
विनय कुमार जी बोले, “माफी तुम मुझसे नहीं, इस शोरूम से माँगो। तुमने इसकी इमेज खराब की है। माफी शोरूम के मालिक से माँगो, और अपनी मैनेजर की कुर्सी से माँगो, जो सबकी हेल्प करने के लिए दी गई थी।”
अंत में विनय कुमार जी बोले, “अब तुम्हारा भविष्य इस शोरूम की नई मैनेजर काव्या सिंह के हाथ में है।” काव्या को खुशी के आँसू आ गए। उसने मैनेजर को एक मौका दिया, छह महीने की ट्रेनिंग और फील्ड में काम करने की सजा दी, ताकि उसे अपनी जिम्मेदारी का एहसास हो सके।
सभी स्टाफ और कस्टमर्स काव्या के लिए तालियाँ बजा रहे थे। आज सबको समझ आ गया था कि असली पहचान कपड़ों या ओहदे से नहीं, बल्कि इंसानियत और ईमानदारी से होती है।
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