10 साल बाद विदेश से लौटा बेटा… माँ को सड़क किनारे चाय बेचते देखा तो फूट-फूटकर रो पड़ा…

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10 साल बाद विदेश से लौटा बेटा… माँ को सड़क किनारे चाय बेचते देखा तो फूट-फूटकर रो पड़ा

मित्रों, सोचिए एक छोटे से कस्बे में एक साधारण परिवार रहता था। परिवार बड़ा अमीर तो नहीं था, लेकिन उसमें प्यार और अपनापन भरपूर था। उस परिवार की सबसे बड़ी ताकत थी एक मां और उसका इकलौता बेटा। पति का साया जल्दी उठ गया था, लेकिन मां ने कभी हार नहीं मानी। वह अपने बेटे के लिए जीती थी, उसकी परवरिश करती थी, उसे पढ़ाती थी और हर दिन उसके उज्जवल भविष्य के लिए खुद को समर्पित कर दिया था।

बेटा बड़ा हो रहा था, पढ़ाई में तेज और मां की आंखों में उसके लिए एक ही सपना था — कि मेरा लाल इतना काबिल बने कि हमें कभी भी गरीबी या तंगी का सामना न करना पड़े। मां हर दिन बेटे को यही सिखाती, “बेटा, बड़े सपने देखो, मेहनत करो, ताकि हमारा नाम रोशन हो।” बेटे ने मां की उम्मीदों को समझा और देश से बाहर जाकर बेहतर जिंदगी बनाने का फैसला किया। उसने सोचा कि विदेश जाकर मां की सारी परेशानियां दूर कर दूंगा, उसे आराम की जिंदगी दूंगा।

शुरुआत के दिन अच्छे थे। बेटे की पढ़ाई और नौकरी की तैयारी में मां ने अपनी सारी ताकत लगा दी। बेटे ने पासपोर्ट बनवाया, इंटरव्यू दिया और आखिरकार उसे विदेश में नौकरी मिल गई। मां की आंखों में खुशी के आंसू थे। उसने बेटे को आशीर्वाद दिया, “बेटा, जहां भी जाना, भगवान तेरा भला करे। मैं तुम्हारे लिए हमेशा दुआ करती रहूंगी।”

बेटा विदेश चला गया, अपने सपनों की उड़ान भरने। शुरू-शुरू में वह मां को फोन करता, पत्र भेजता और पैसे भी भेजता। मां को लगा कि अब सब ठीक हो जाएगा, घर में खुशहाली आएगी। लेकिन वक्त की करवटें कुछ और ही थीं। धीरे-धीरे बेटे की व्यस्तता बढ़ी। फोन कम आने लगे, पत्र भी कम। मां रोज डाकिए का इंतजार करती, पर खाली हाथ लौटती। बेटे की याद में उसका दिल टूटता, पर वह खुद को संभालती।

मां की उम्र बढ़ती गई, पर हालात बदतर होते गए। खेत बंजर होने लगे, घर का खर्च बढ़ता गया। पड़ोसी भी मदद करने लगे, पर उनकी मदद सीमित थी। मां ने कई बार सोचा कि बेटा विदेश में पैसा कमाता है, तो वह क्यों नहीं भेजता? लेकिन वह कभी बेटे को परेशान नहीं करना चाहती थी। उसने अपने दुख छुपा लिए, खुद भूखी-प्यासी रहकर घर संभालती रही।

कई बार मां बीमार पड़ती, पर दवा नहीं ले पाती। कभी टूटी चप्पल पहनकर बाजार जाती, कभी बिना दवा के दर्द सहती। बेटे को यह सब देखकर बहुत दुख होता। वह कई बार मां से कहता, “मां, आराम करो, मैं हूं ना।” पर मां मुस्कुराकर कहती, “जब तक तू ठीक रहेगा, मैं ठीक रहूंगी।”

धीरे-धीरे घर की हालत खराब हो गई। अनाज खत्म हो गया, बर्तन टूट गए, चौखटें जर्जर हो गईं। मां ने ठाना कि अब किसी पर बोझ नहीं बनेगी। उसने अपने बूढ़े हाथों से चाय का ठेला लगाना शुरू किया। सुबह उठकर लकड़ी इकट्ठा करती, पानी भरती, चाय बनाती। कांपते हाथों से प्याले में चाय देती। बारिश में भीगती, धूप में झुलसती, सर्दी में ठिठुरती, लेकिन हार नहीं मानी।

गांव के कुछ लोग उसकी हिम्मत की तारीफ करते, कुछ ताने देते। मां खामोश रहती, क्योंकि उसके दिल में बेटे के लिए प्यार अभी भी उतना ही था। वह सोचती, “बेटा जरूर लौटेगा, और तब मैं उसे अपनी हालत दिखाकर रुलाऊंगी।”

10 साल बीत गए। बेटा विदेश में अपनी दुनिया में व्यस्त था। बड़ी नौकरी, पैसा, पहचान सब कुछ उसके पास था। लेकिन मां की यादें उसके दिल से दूर नहीं हुईं। त्यौहारों पर मां की दी हुई दुआएं याद आतीं, बचपन की यादें ताजा होतीं। पर उसने कभी यह नहीं सोचा कि मां अकेली कैसे जी रही होगी।

एक दिन उसने फैसला किया कि अब समय आ गया है मां को अपने साथ लेकर लौटने का। उसने मां के लिए तोहफे लिए, खुशियों के सपने लिए, देश वापस आ गया। स्टेशन पर मां का इंतजार किया, लेकिन मां वहां नहीं थी। टैक्सी लेकर पुराने कस्बे गया। रास्ते में सब कुछ बदल चुका था, लेकिन घर की गली वही थी।

घर पहुंचा तो दीवारें टूटी हुई थीं, आंगन वीरान था। मां का कोई पता नहीं था। पड़ोसियों से पूछा तो पता चला कि मां अब सड़क किनारे चाय बेचती हैं। बेटे का दिल कांप उठा। वह तेज कदमों से उस सड़क की ओर बढ़ा।

जैसे ही उसने मां को चाय का ठेला लगाते देखा, उसकी आंखों से आंसू रुक नहीं पाए। बूढ़ी मां कांपते हाथों से चाय बना रही थी, झुर्रियों से भरा चेहरा था, पर होठों पर वही पुरानी मुस्कान। बेटे ने धीरे से आवाज लगाई, “मां…”

मां ने पलटकर देखा, विश्वास नहीं हुआ कि यह उसका बेटा है। दोनों गले मिले, आंसू बहने लगे। बेटे ने पूछा, “मां, यह क्या हुआ? तुम्हें इस उम्र में चाय बेचनी क्यों पड़ी? मैंने तो वादा किया था कि तुम्हें सुख दूंगा, तंग नहीं होने दूंगा।”

मां ने कांपती आवाज में कहा, “बेटा, सब बाद में बताऊंगी। अभी बस यह देखना चाहती हूं कि तू लौट आया है। तू ठीक है, तेरी आंखों में वही प्यार है जो बचपन में था।”

फिर मां ने बेटे को सच बताया। जब तू गया था, घर की हालत खराब थी। मैंने तेरा इंतजार किया, पर वक्त बीतता गया। तेरा खत आता था, पर उसमें सिर्फ यही लिखा होता था कि तू ठीक है, अपना ख्याल रखना। पर पेट पालने के लिए रोजी-रोटी चाहिए होती है। पड़ोसी थोड़ी मदद करते, पर ज्यादा दिन कोई नहीं कर सकता।

मैंने खेत में मजदूरी की, सामान बेचा, कई रातें भूखी सोई। तुझे चिंता में नहीं डालना चाहती थी, इसलिए सब छुपा लिया। जब हालात और बिगड़े तो ठेला लगाना शुरू किया। लोग ताने देते, पर मैंने कभी हार नहीं मानी।

बेटा मां की बात सुनकर फूट-फूट कर रो पड़ा। उसने कहा, “मां, मैंने कितना स्वार्थ किया। सोचा था पैसा भेजूंगा, सब ठीक हो जाएगा। पर मां, तेरी ममता का कोई मोल नहीं। तेरी भूख का दर्द मेरे सारे खजानों से बड़ा है। मैं अपनी गलती मानता हूं कि तुझे अकेला छोड़ दिया।”

मां ने बेटे के आंसू पोंछते हुए कहा, “अब सब भूल जा। तू लौट आया है, यही मेरे लिए सबसे बड़ी दौलत है। यह ठेला भी बोझ नहीं, बल्कि मेरी इज्जत है। मेहनत की है और यही मेरा गर्व है।”

गांव के लोग भी यह देखकर भावुक हो गए। किसी ने कहा, “मां जैसी कोई नहीं होती, जिसने सब कुछ बेटे के लिए न्योछावर कर दिया।”

बेटा मां को गले लगाकर बोला, “मां, अब मैं तुम्हें अपने साथ ले जाऊंगा। तुम्हें सारी खुशियां दूंगा। अब तुम्हें किसी काम की जरूरत नहीं।”

मां ने बेटे को गले लगाकर कहा, “तेरी ये बातें मेरे लिए सबसे बड़ा सुकून हैं। अगर तू अब मेरे पास रहेगा, यही मेरी सबसे बड़ी कमाई होगी।”

मित्रों, यह कहानी हमें सिखाती है कि चाहे हम कितने भी बड़े हो जाएं, मां की सेवा सबसे बड़ी दौलत होती है। मां को अकेला छोड़कर कोई भी इंसान खुशहाल नहीं रह सकता। मां की ममता की कोई कीमत नहीं होती। मां की गोद और उनके आशीर्वाद से बड़ा कोई खजाना नहीं।

अगर आपकी आंखें भी इस कहानी को सुनकर नम हो गई हैं, तो इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाएं ताकि हर बेटा और बेटी मां की कद्र करें और कभी देर न करें।

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