Boorhi Amma Ko Jungle Mein Mila Aik Yateem Bacha 😭 Aakhir Wo Kaun Tha

जंगल का बच्चा (The Child of the Forest)
भाग 1: जंगल की खामोशी में एक नई कहानी
दिन का वक्त था, जंगल पर एक गहरी खामोशी तारी थी। जैसे दरख्त भी सांस रोके खड़े हो। बूढ़ी अम्मा हलीमा जंगल के एक कोने में लकड़ियां काट रही थी। हर वार के साथ उनकी सांस फूल जाती, मगर गरीबी ने उन्हें हिम्मत सिखा दी थी और जरूरत ने सब्र। कुछ देर बाद उन्होंने कटी हुई लकड़ियों को अपने दुपट्टे में समेटा, अच्छी तरह बांधा और गट्ठा उठाकर जंगल के अंदर की तरफ बढ़ने लगी।
अभी वह चंद कदम ही आगे बढ़ी थीं कि अचानक उनके कानों में एक बच्चे के रोने की आवाज पड़ी। अम्मा हलीमा चौंक गईं। चारों तरफ देखा, मगर कोई नजर नहीं आया। खामोशी फिर लौट आई। दिल की धड़कन तेज हो गई। वह थोड़ा और आगे बढ़ीं तो देखा कि किसी जानवर के घोंसले में एक नन्हा सा बच्चा पड़ा था। गुलाबी कंबल में लिपटा हुआ, जोर-जोर से रो रहा था। ऐसा लगता था जैसे भूख ने उसकी सांसें भी चुरा ली हों।
अम्मा हलीमा का दिल तड़प उठा। उन्होंने बच्चे को उठा लिया, चेहरे पर परेशानी साफ झलक रही थी। बार-बार इधर-उधर देखने लगीं, जैसे किसी को पुकार रही हों। यह किसका बच्चा है? कौन अपनी औलाद को इस सुनसान जंगल में छोड़ गया? मगर जंगल खामोश था। कोई आवाज नहीं, कोई साया नहीं, कोई इंसान नहीं।
आखिरकार अम्मा हलीमा ने लकड़ियों का गट्ठा एक हाथ में और बच्चे को दूसरे हाथ में थामे घर की तरफ चल पड़ीं। वह बिल्कुल बेखबर थीं कि जंगल के एक घने दरख्त के पास एक औरत बैठी यह सब मंजर देख रही थी। उसके होठों पर मुस्कुराहट थी, मगर आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। वह दरख्त के तने से टेक लगाए फूट-फूट कर रो रही थी, “ऐ अल्लाह तेरा शुक्र है, तूने मेरे बच्चे को महफूज हाथों तक पहुंचा दिया।”
भाग 2: गांव की हकीकत और सवाल
अम्मा हलीमा उस बच्चे को सीने से लगाए गांव में दाखिल हुईं। गांव वालों की नजरें फौरन उन पर जम गईं। हैरत और सवाल सबके चेहरों पर थे। “अरे अम्मा हलीमा, यह बच्चा कहां से उठा लाई हो?” अम्मा हलीमा ने सादगी से जवाब दिया, “यह बच्चा मुझे जंगल में मिला था। तन्हा था, इसलिए मैं इसे घर ले आई हूं।”
यह सुनकर लोग और भी हैरान हो गए। तभी एक औरत आगे बढ़ी और तल्खी से बोली, “अम्मा, किसी के गुनाह का टोकरा तुमने अपने सर क्यों ले लिया? ना जाने किसकी हराम की औलाद है जो इस तरह जंगल में फेंक गया। वरना कोई अपने बच्चे को यूं ही छोड़कर जाता है?”
अम्मा हलीमा का दिल कट कर रह गया। लोग कितने संगदिल हो सकते हैं जो एक मासूम जान के बारे में ऐसी बातें कर रहे हैं। उन्होंने मजबूत लहजे में कहा, “यह बच्चा मैं लेकर आई हूं और इसकी परवरिश की जिम्मेदारी मेरी है। किसी को कोई हक नहीं कि इस पर उंगली उठाए या सवाल करे।”
उनके लहजे में ऐसा यकीन था कि लोग खामोश हो गए। आखिर उन्हें क्या ऐतराज होना था। परवरिश तो उन्हें करनी नहीं थी। एक-एक करके सब अपने घरों को लौट गए।
अम्मा हलीमा बच्चे को लेकर घर आईं। दूध गर्म किया और मोहब्बत से बच्चे को पिलाया। बच्चा शायद बहुत भूखा था। दूध पीते ही उसकी रोने की आवाज धीमी पड़ गई और थोड़ी ही देर में उसे सुकून मिल गया। अम्मा हलीमा मुस्कुराती आंखों से बच्चे को देख रही थीं। होठों पर मुस्कुराहट थी और आंखों में नमी।
अम्मा हलीमा एक बीवा औरत थीं। अल्लाह ने उन्हें औलाद की नेमत से नहीं नवाजा था। शौहर के इंतकाल के बाद वह खुद ही मेहनत-मशक्कत करती थीं। जंगल जातीं, लकड़ियां काटतीं, उन्हें बेचकर अपना गुजर-बसर चलातीं। और आज शायद अल्लाह ने इसी बच्चे को उनकी जिंदगी में तोहफा बनाकर भेज दिया था।
भाग 3: फैजान की परवरिश
अम्मा हलीमा ने बच्चे का नाम फैजान रखा। फैजान बेहद खूबसूरत और जहीन बच्चा था। अम्मा हलीमा उसके लिए अपनी हर तवानाई वफ कर देती थीं। यूं ही दिन गुजरते गए मोहब्बत और फिक्र के लम्हों में।
फैजान पूरे 5 साल का हो गया था। एक दिन अम्मा हलीमा घर के सहन में बैठी सब्जी काट रही थीं कि अचानक फैजान रोता हुआ अंदर आया। अम्मा हलीमा ने उसे रोते हुए देखा तो उनका दिल तड़प उठा। “क्या हुआ बेटा? तुम क्यों रो रहे हो?”
फैजान रोते हुए बोला, “अम्मा, आपको पता है गली में जो बच्चा है फारूक, आज उसने मुझे मारा। वो हर रोज मुझे मारता है और स्कूल में भी। आज जब मैंने उससे अपना बदला लिया तो उसकी मां ने मुझे बहुत डांटा। वह कहती हैं कि मैं नाजायज हूं और मेरा कोई भी नहीं। ना मां-बाप, ना आप मेरी अपनी मां हैं। अम्मा, यह नाजायज क्या होता है?”
अम्मा हलीमा का दिल कट कर रह गया। उन्होंने फैजान को गले लगाया, “बेटा, दोबारा ऐसी बातें बिल्कुल मत कहना। मैं ही तुम्हारी मां हूं। वो तो गुस्से में कह गई होंगी। तुम उनकी बातों को दिल पर मत लो।”
उसी रोज अम्मा हलीमा उस औरत के घर गईं और कहा, “दोबारा अगर मेरे बच्चे से तुमने इस तरह की बात की तो मैं तुम्हें नहीं छोड़ूंगी। मैं उसकी मां हूं। मैं ही उसका खानदान हूं। दोबारा मेरे बेटे से इस तरह की बात कोई भी नहीं करेगा।”
अम्मा हलीमा फैजान की ढाल बन गई थीं। एक सगी मां से बढ़कर उन्होंने फैजान से मोहब्बत की और उसकी परवरिश की। यूं ही दिन गुजरते रहे और फैजान अब स्कूल जाने लगा था। लेकिन अम्मा हलीमा की मोहब्बत और हिफाजत हमेशा उसके साथ थी।
भाग 4: अतीत का राज
फैजान की उम्र अब 10 साल हो चुकी थी और वह खासा समझदार हो गया था। वो अक्सर अम्मा हलीमा से कहता, “अम्मा, एक दफा मैं पढ़ लिख जाऊं, फिर देखिएगा आपको यह काम नहीं करने पड़ेंगे। मैं आपको शहर में एक बड़ा सा घर लेकर दूंगा। आप बस आराम से रहा करेंगी।”
फैजान की यह मासूम बातें सुनकर अम्मा हलीमा बस मुस्कुरा दिया करती थीं। मगर उनकी आंखों में दुआएं झलकने लगतीं।
यह भी एक मामूल का ही दिन था। फैजान स्कूल गया हुआ था और अम्मा हलीमा जंगल में लकड़ियां काट रही थीं। अचानक उनकी नजर एक औरत पर पड़ी जो वहां खड़ी थी। अम्मा हलीमा चौंक उठीं। उस घने और सुनसान जंगल में यह औरत कहां से आ गई?
वो औरत तेजी से आगे बढ़ी और सख्त लहजे में बोली, “मैं अपनी अमानत वापस लेने आई हूं।”
अम्मा हलीमा हैरत से उस औरत को देखने लगीं। “तुम कौन हो और किस अमानत की बात कर रही हो?”
वो औरत बोली, “मैं अपना बच्चा वापस लेने आई हूं जो 8 साल पहले मैं यहां छोड़कर गई थी।”
यह सुनकर अम्मा हलीमा की आंखें हैरत से खुली की खुली रह गईं। “खबरदार जो तुमने मेरे बेटे को अपना बेटा कहा वो मेरा बेटा है। फैजान मेरा बेटा है।”
अम्मा हलीमा की आंखों में खून उतर आया था। वो कैसे अपने लगते जिगर को किसी और औरत के हवाले कर सकती थीं। उन्होंने फैजान को अपनी कोख से जन्म नहीं दिया था, मगर उससे बेइंतहा मोहब्बत की थी। एक सगी मां से बढ़कर।
भाग 5: मरियम की कहानी
घर पहुंचते ही अम्मा हलीमा चारपाई पर बैठ गईं। गम और सदमे की वजह से उनका बुरा हाल था। उन्हें डर था कहीं यह बच्चा उनसे छिन ना जाए। कुछ ही लम्हों बाद दरवाजे पर दस्तक हुई। वही औरत सामने खड़ी थी। वो फौरन रोते हुए अंदर आ गई और बोली, “खुदा के लिए मेरी बात का यकीन करें। मैं सच कह रही हूं।”
उसने अपना नाम मरियम बताया और अपनी पूरी कहानी सुनाई। कैसे वह अपने मां-बाप की मन्नतों के बाद पैदा हुई थी, कैसे उसके बाप ने उसे कॉलेज भेजा, कैसे अहमद से उसकी मुलाकात हुई, कैसे वह अपने परिवार की मर्जी के खिलाफ अहमद से शादी करके भाग गई, कैसे उसके भाइयों ने अहमद की जान ली, कैसे वह डर के मारे अपने बच्चे के साथ जंगल में भागी और आखिरकार मजबूरी में अपने बच्चे को जंगल में छोड़ दिया।
मरियम की कहानी सुनकर अम्मा हलीमा भी हैरान रह गईं। मरियम ने एक सोने की चैन दिखाई, जो फैजान के गले में थी। यही चैन उसने अपने बच्चे को छोड़ते वक्त पहनाई थी।
भाग 6: फैजान का फैसला
जब फैजान स्कूल से आया तो एक अनजान औरत को घर में देखकर ठिटक गया। “अम्मा, यह औरत कौन है?”
अम्मा हलीमा बोलीं, “बेटा, यह तुम्हारी मां है।”
फैजान ने जवाब दिया, “नहीं अम्मा, आप मेरी मां हैं। मैं इस औरत को नहीं जानता।”
मरियम ने चैन दिखाया और सबूत दिया कि वह उसकी असली मां है। अम्मा हलीमा ने रोते हुए फैजान को सारी बात बताई कि किस तरह वह उसे जंगल में मिली थीं और यह उसकी हकीकी मां है।
फैजान की आंखों में सोच की परछाइयां लहराने लगीं। मरियम आगे बढ़ी, “तुम मेरे बेटे हो। मैं तुम्हें लेने आई हूं।”
फैजान ने उसके हाथ दूर झटक दिए, “नहीं, मैं आपका बेटा नहीं हूं। मैं अम्मा हलीमा का बेटा हूं। उन्होंने मुझे आज इस मुकाम तक पहुंचाया है। मुझे पढ़ाया है, लिखाया है, मेरी परवरिश की है। आप अगर मेरी मां होतीं तो मुझे जंगल में कभी ना छोड़तीं।”
मरियम हैरान और परेशान अपने बेटे को देख रही थी जो उसके साथ जाने से इंकार कर रहा था।
अम्मा हलीमा बोलीं, “मेरा बेटा तुम्हारे साथ नहीं जाना चाहता। यह तुम्हारे अपने किए की सजा है। जो तुमने अपने बाप के साथ किया, आज तुम्हारी औलाद तुम्हारे साथ वैसा ही कर रही है।”
मरियम की आंखों से आंसू बहने लगे। वो रोते हुए उस घर से निकल गई।
भाग 7: पुलिस और आखिरी फैसला
मरियम लरजते कदमों के साथ पुलिस स्टेशन पहुंची। चेहरा आंसुओं से तर था और लबों पर बस एक ही फरियाद थी कि उसे उसका बच्चा चाहिए। पुलिस अफसर ने नरमी से पूछा, “आप किस लिए आई हैं?”
मरियम ने लरजती आवाज में कहा, “साहब, मुझे अपना बच्चा चाहिए। मैंने मजबूरी में छोड़ा था। लेकिन अब नहीं। अब मैं उसे वापस चाहती हूं।”
पुलिस अफसर ने गांव पहुंचकर दरवाजा खटखटाया। “बीबी, यह बच्चा किसका है?”
अम्मा हलीमा ने रोते हुए कहा, “यह मरियम का बच्चा है। मगर मैंने इसे दूध से नहीं, आंसुओं से पाला है। अब यह मेरा है, मेरा अपना।”
अफसर ने फैजान से पूछा, “तुम्हारी मां कौन है?”
फैजान ने लरजती आवाज में कहा, “यही मेरी मां है, अम्मा हलीमा।”
अफसर ने कहा, “तुम किसके साथ रहना चाहोगे?”
फैजान ने बिना झिझक कहा, “मैं अम्मा हलीमा के साथ रहूंगा। यही मेरी मां है।”
पुलिस अफसर ने मरियम की तरफ देखकर कहा, “जाइए बीवी, यह बच्चा अब अम्मा हलीमा का है।”
मरियम के आंसू बहने लगे। वह पलटी और बिना कुछ कहे दरवाजे से बाहर निकल गई।
भाग 8: अंत और सच्ची मोहब्बत
मरियम रोते हुए गांव के बाहर निकल आई। चलते-चलते एक दरख्त के नीचे जा बैठी और फूट-फूट कर रोने लगी। अचानक उसके सीने में जबरदस्त दर्द उठा। वो तड़पने लगी, हाथ सीने पर रखकर हांपने लगी और कुछ ही देर में उसकी सांसें रुक गईं। वह वहीं खामोशी से दुनिया फानी से रुखसत हो गई।
अम्मा हलीमा ने फैजान को गले लगाया। फैजान उनका सगा बेटा तो नहीं था, मगर उन्हें सगों से भी ज्यादा अजीज था। कुछ रिश्ते खून के नहीं होते, मोहब्बत के होते हैं। फैजान ने उसी गांव में पढ़ाई पूरी की और बड़ा होकर अम्मा हलीमा का सहारा बना।
कहानी का सबक:
इंसान के किए हुए आमाल कभी ना कभी पलट कर उसकी तरफ वापस जरूर आते हैं। मोहब्बत खून की नहीं, दिल की होती है। जो सच्चे दिल से किसी को अपनाता है, वही असली रिश्ता निभाता है।
अगर आपको कहानी अच्छी लगी हो तो कमेंट करें और बताएं कि आपको किस किरदार ने सबसे ज्यादा छू लिया।
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