औकात कपड़ों से नहीं, संस्कारों से बनती है
मुंबई की शाम सिंदूरी रोशनी में नहाई हुई थी। कांच और स्टील की ऊँची इमारतों के बीच रायजादा ग्रुप का मुख्यालय हीरे की तरह चमक रहा था। उसी इमारत की 35वीं मंज़िल पर खड़ा था गौतम रायजादा — देश के सबसे सफल युवा उद्योगपतियों में से एक।
आज उसकी कंपनी की दसवीं सालगिरह थी।
पूरा शहर उसकी पार्टी की चर्चा कर रहा था। बड़े उद्योगपति, फिल्मी सितारे, राजनेता — सब आने वाले थे।
लेकिन उस शोर और सफलता के बीच गौतम के दिल में एक खालीपन था।
उसकी नज़र टेबल पर रखी एक पुरानी फोटो पर पड़ी —
एक मिट्टी का घर, सामने खड़े उसके माता-पिता, सादे कपड़े, सच्ची मुस्कान।
उसने तुरंत फोन उठाया।

गांव से बुलावा
“बापू… आज आप और मां मुंबई आ रहे हैं,”
उसने प्यार से कहा।
रामफल पहले तो हिचकिचाए —
“बेटा, हम गांव के लोग… वहाँ क्या करेंगे?”
गौतम ने साफ कहा —
“अगर आप नहीं आए तो मैं पार्टी रद्द कर दूंगा।”
आखिर माता-पिता मान गए।
मीना ने बेटे के लिए बेसन के लड्डू बनाए, अचार रखा, अपनी सबसे अच्छी पुरानी साड़ी पहनी।
रामफल ने अपना साफ कुर्ता-पायजामा निकाला।
वे गर्व और घबराहट दोनों लेकर मुंबई रवाना हुए।
मुंबई की चकाचौंध
ट्रेन से उतरते ही वे भीड़ में खो गए।
ड्राइवर उन्हें लेने आया और एक बड़ी लग्जरी कार में बैठाया।
उनकी आंखें हर चीज़ देखकर चमक रही थीं —
ऊँची इमारतें, चमकती सड़कें, बड़ी दुकानें।
लेकिन ड्राइवर की नजरों में सम्मान नहीं, तमाशा था।
कंपनी के गेट पर अपमान
रायजादा ग्रुप की बिल्डिंग किसी महल से कम नहीं थी।
जैसे ही वे अंदर जाने लगे, सिक्योरिटी गार्ड ने रोका।
“कहाँ घुस रहे हो? यह कोई धर्मशाला नहीं है!”
रामफल ने कांपते हाथों से कार्ड दिखाया।
गार्ड ने देखा, फिर ताना मारा —
“ओह, गांव वाले रिश्तेदार हो… अंदर जाओ, लेकिन औकात में रहना।”
मीना की आंखें भर आईं।
पार्टी का माहौल
हॉल जगमगा रहा था।
हीरे, महंगे कपड़े, वाइन, हंसी।
और एक कोने में खड़े थे गौतम के माता-पिता —
सहमे हुए, बेटे को ढूंढते हुए।
तूफान का नाम — सना
गौतम की मंगेतर सना पार्टी होस्ट कर रही थी।
महंगे गाउन में, ऊँची सोसाइटी वाली सोच के साथ।
उसकी नजर जब रामफल और मीना पर पड़ी,
उसे लगा ये भिखारी हैं।
वह गुस्से में उनके पास आई।
“किसने अंदर आने दिया तुम्हें?”
रामफल ने धीरे से कहा —
“हम गौतम के मां-बाप हैं…”
यह सुनकर सना का चेहरा बदल गया।
उसे शर्म नहीं, गुस्सा आया।
और फिर…
चटाक!
उसने रामफल को थप्पड़ मार दिया।
पूरा हॉल सन्न।
मोबाइल कैमरे ऑन।
सना चीखी —
“भिखारी बनकर पार्टी में घुसते हो!”
गार्ड्स ने दोनों को घसीटकर बाहर फेंक दिया।
बेटे की एंट्री
उसी वक्त गौतम की कार गेट पर रुकी।
उसने भीड़ देखी…
और फिर अपने माता-पिता को जमीन पर बैठा देखा।
मां रो रही थी।
बापू के गाल पर थप्पड़ के निशान थे।
गौतम का दिल टूट गया।
“मां… बापू…”
वह घुटनों पर गिर पड़ा।
आंसू गुस्से में बदल गए।
हिसाब
गौतम उन्हें ऊपर ऑफिस में बैठाकर सीधा हॉल में गया।
माइक उठाया।
“सना कहाँ है?”
सना मुस्कुराती हुई आई।
और तभी…
चटाक!
गौतम का थप्पड़ पूरे हॉल में गूंजा।
“जिन्हें तुमने भिखारी कहा,
वो मेरे मां-बाप हैं।”
सन्नाटा।
सना रोने लगी, माफी मांगने लगी।
गौतम बोला —
“अगर वे मेरे मां-बाप न होते,
तो क्या किसी गरीब के साथ ऐसा करना ठीक था?”
उसने गार्ड्स को आदेश दिया —
“इसे बाहर निकालो।”
सना भी उसी तरह घसीटी गई।
आईना
गौतम ने मेहमानों से कहा —
“तुम सब वीडियो बनाते रहे,
किसी ने रोका क्यों नहीं?”
सबकी नजरें झुक गईं।
असली दौलत
रात को ऑफिस में,
गौतम अपने पिता के पैरों में गिरा।
रामफल बोले —
“गलती तेरी नहीं लाला…
हम इस दुनिया के नहीं।”
गौतम रो पड़ा —
“यह सब आपका ही है बापू।”
मीना ने लड्डू निकालकर दिया —
“खा ले बेटा, तेरे पसंद के हैं।”
गौतम ने लड्डू हाथ में लिया।
उसे समझ आ गया —
दुनिया की सबसे बड़ी दौलत यही है।
सबक
उस रात गौतम ने कंपनी में नया नियम लागू किया:
“किसी इंसान की पहचान
उसके कपड़ों से नहीं,
उसके संस्कारों से होगी।”
और उसी दिन से
रायजादा ग्रुप में हर गार्ड को सिखाया जाने लगा —
सम्मान देना पद से नहीं, इंसानियत से होता है।
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