“अब तुम मेरे किसी काम के नहीं रहे”

ज़िंदगी बड़ी अजीब चीज़ है। कभी तुम्हें ऊँची कुर्सी पर बैठाकर हीरो बना देती है, और कभी उसी कुर्सी के सामने व्हीलचेयर रखकर पूछती है, अब बताओ असली हिम्मत कितनी है?

दिलीप कभी हार मानने वालों में से नहीं था। शहर के बाहरी इलाके की तंग गलियों से निकलकर उसने ट्रांसपोर्ट का कारोबार खड़ा किया था। ट्रक, गोदाम, स्टाफ, क्लाइंट, सब उसकी मेहनत का नतीजा था। दिन में धूप खाता, रात में हिसाब करता। उसके लिए आराम सिर्फ डिक्शनरी का शब्द था।

रश्मि से उसकी शादी तब हुई थी जब जेब में ज्यादा पैसा नहीं था, लेकिन आँखों में बड़ा सपना था। रश्मि खूबसूरत थी, समझदार थी, और शुरू में तो दिलीप को लगता था जैसे किस्मत ने बोनस दे दिया हो। शादी के शुरुआती साल अच्छे रहे। लेकिन जैसे-जैसे बिज़नेस बढ़ा, घर बड़ा हुआ, गाड़ियाँ बदलीं, वैसे-वैसे रश्मि भी बदलने लगी।

अब उसकी दुनिया किटी पार्टी, ब्रांडेड कपड़े, इंस्टाग्राम और हाई-प्रोफाइल डिनर तक सिमट गई थी। दिलीप धीरे-धीरे पति कम, एटीएम ज्यादा बन गया। और दिलीप? वह भी कभी-कभी घमंड में सोचता, सब मेरी वजह से है।

घर में एक और शख्स थी। सरिता। चुपचाप काम करने वाली नौकरानी। पति को बीमारी में खो चुकी, कोई बच्चा नहीं, कोई सहारा नहीं। लेकिन चेहरे पर अजीब सी शांति। जैसे जिंदगी से लड़ना उसे आता हो।

फिर वह रात आई जिसने सब बदल दिया।

बारिश हो रही थी। सड़क चिकनी थी। रश्मि का फोन आया, “आज पार्टी है, सबके हसबैंड आए हैं। और सुनो, मुझे नया फोन चाहिए। प्रो मैक्स वाला।”

दिलीप ने थकी आवाज़ में कहा, “ठीक है, ले लेंगे।”

फोन रखते ही उसने गाड़ी तेज़ कर दी। शायद पार्टी से ज्यादा उसे रश्मि के तानों से डर था। सामने से अचानक एक बाइक मुड़ी। ब्रेक लगा। गाड़ी फिसली। एक तेज़ आवाज़। फिर अंधेरा।

जब आँख खुली, अस्पताल की सफेद रोशनी थी। हाथ में ड्रिप। और नीचे… कुछ महसूस नहीं हो रहा था।

डॉक्टर ने कहा, “स्पाइनल इंजरी है। रिकवरी लंबी होगी। उम्मीद है, पर गारंटी नहीं।”

उम्मीद। यही एक शब्द दिलीप ने पकड़ा।

शुरुआती दिनों में रश्मि ने खूब देखभाल की। फोटो, स्टेटस, दुआएँ। लोग बोले, “कितनी स्ट्रॉन्ग वाइफ है।” लेकिन जैसे-जैसे सच साफ हुआ कि यह जल्दी ठीक होने वाला नहीं, रश्मि की आँखों की चमक बुझने लगी।

घर लौटने के बाद असली परीक्षा शुरू हुई।

सीढ़ियाँ दुश्मन लगतीं। बाथरूम डरावना। व्हीलचेयर घर में अजनबी।

एक दिन रश्मि बोली, “व्हीलचेयर ड्रॉइंग रूम में मत लाना। अजीब लगता है।”

अजीब। जो आदमी इस घर की नींव था, अब अजीब हो गया था।

दिलीप कोशिश करता। गिरता। शर्मिंदा होता। मदद मांगता तो रश्मि चिढ़ जाती, “मैं नर्स बनने के लिए शादी नहीं की थी।”

एक दिन बाथरूम में गिर गया। सरिता दौड़कर आई। किसी तरह उठाया। रश्मि दरवाज़े से देखकर बोली, “ये रोज का ड्रामा है क्या?”

उस रात दिलीप रो पड़ा। “बस साथ दे दो।”

रश्मि की आवाज़ ठंडी थी। “मैं अपनी जिंदगी बर्बाद नहीं कर सकती। तुम बोझ बन गए हो।”

कुछ दिनों बाद उसने सूटकेस पैक किया। जाते-जाते वही वाक्य कहा जो किसी गोली से कम नहीं था।

“अब तुम मेरे किसी काम के नहीं रहे।”

दरवाज़ा बंद हुआ। और दिलीप अंदर से ढह गया।

रिश्तेदार आए, दो दिन सहानुभूति दी, फिर गायब। बिज़नेस भी लड़खड़ाने लगा। रातें लंबी हो गईं। कई बार दिलीप को लगा सब खत्म कर दे।

एक रात उसने सरिता से पूछा, “तुम अकेली होकर भी कैसे संभली रहती हो?”

सरिता ने धीरे से कहा, “गरीबी रोने नहीं देती, मालिक। और अकेलापन वही काट सकता है जो खुद को संभाल ले।”

वह पहली बार चुप हो गया।

धीरे-धीरे सरिता उसकी देखभाल करने लगी। समय पर दवा, फिजियोथेरेपी, खाना, घर में बदलाव। वह कहती, “मालिक, आदमी पैर से नहीं, इरादे से होता है।”

यह लाइन दिलीप के अंदर उतर गई।

फिजियोथेरेपी शुरू हुई। दर्द, पसीना, गुस्सा। लेकिन हर दिन दो कदम आगे। पहले उंगलियाँ हिलीं। फिर घुटने। फिर वॉकर के सहारे पहला कदम।

वह कदम सिर्फ जमीन पर नहीं, खुद की ओर था।

करीब एक साल बाद दिलीप काफी संभल गया। पूरी तरह नहीं, पर इतना कि खड़ा हो सके, मीटिंग कर सके, कंपनी फिर पटरी पर आ सके।

और जैसे ही पैसा लौटा, रश्मि भी लौट आई।

महंगा बैग, वही परफ्यूम, वही मुस्कान।

“गलती हो गई। मुझे माफ कर दो।”

दिलीप ने उसे देखा। अब वह टूटा हुआ आदमी नहीं था।

तभी सरिता चाय लेकर आई।

रश्मि ने तिरछी नज़र से पूछा, “ये अब भी यहीं है?”

दिलीप की आवाज़ पहली बार ठोस थी। “ये ‘ये’ नहीं है। सरिता है। और जब तुम गई थीं, तब यही साथ थी।”

रश्मि ने हाथ पकड़ना चाहा। उसने हाथ पीछे कर लिया।

“तुम्हें माफ कर सकता हूँ। पर उस रिश्ते में नहीं लौटूंगा जो सुविधा पर टिका था। तुम तब गई थीं जब मैं टूटा था। आज मैं जुड़ा हूँ, तुम्हारे बिना।”

रश्मि चली गई। इस बार सच में।

घर में पहली बार सन्नाटा नहीं, सुकून था।

कुछ दिनों बाद दिलीप ने सरिता से कहा, “मैं तुम्हें बराबरी देना चाहता हूँ। क्या तुम मेरी जिंदगी का हिस्सा बनोगी?”

सरिता डर गई। “लोग क्या कहेंगे?”

दिलीप मुस्कुराया। “जब मैं गिरा था तब किसी ने सहारा नहीं दिया। अब लोगों की चिंता क्यों?”

मंदिर में सादा शादी हुई। बिना शोर। बिना दिखावे।

उस दिन घर में पहली बार अपनापन बसा।

दिलीप ने सीखा, पैर टूट जाए तो इंसान फिर चलना सीख सकता है। पर भरोसा टूट जाए तो अंदर से अपाहिज हो जाता है।

और सरिता ने उसे चलना नहीं, जीना सिखाया।

क्योंकि आखिर में इंसान काम का नहीं, दिल का होता है।