करोड़पति बाप की बेटी ने जिसे नौकर समझा | जब उसकी असली पहचान सामने आई तो सबके होश उड़ गए | फिर जो हुआ

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अपमान का बदला

विनय ने कभी ख्वाब भी नहीं देखा था कि जिस लड़की के घर में वह झाड़ू पोछा लगाता है, एक दिन उसी से उसकी शादी होगी। लेकिन आगे जो हुआ, वह ना उसकी किस्मत में लिखा था और ना ही किसी ने होते देखा था। शादी के बाद जो जिल्लत, ताने और बेइज्जती उसने सहे, वह किसी पत्थर को भी तोड़ सकती थी। उसकी पत्नी ने उसे इंसान नहीं, बल्कि नौकर समझा। सास ने उसके आत्मसम्मान को चटाई पर बिछा दिया।

जिस अमीर लड़के से उसकी बीवी दिल लगाकर बैठी थी, वही लड़का सबके सामने एक बर्थडे पार्टी में पूरा केक उठाकर उसके चेहरे पर दे मारता है और सैकड़ों लोगों के सामने उसकी हंसी उड़ाई जाती है। लेकिन किसी को क्या पता था कि जिसे सबने तुच्छ समझा, वही एक दिन साबित करेगा कि खामोश लोग जब बोलते हैं, तो इतिहास बदल देते हैं।

वह रात जब उसकी शादी हुई थी, वह उसकी जिंदगी की सबसे अजनबी और सबसे लंबी रात थी। कहने को दूल्हा बना था वह, लेकिन महसूस कुछ नहीं कर रहा था। बस एक ही ख्याल दिल में उठ रहा था, “क्या सच में यही मेरी जिंदगी होने वाली है? क्या अब हर दिन अपमान के नाम रहेगा?” कल तक जो उस बंगले में झाड़ू पोछा करता था, आज उसी बंगले की बेटी का पति था। लेकिन पति कहलाने से कोई पति बन जाता है क्या?

रीमा शहर की नामी बिजनेस वूमन थी, जिसे अपने पापा की हर बात मंजूर थी। पर यह शादी जैसे किसी ने उसकी जिंदगी का अपमान लिख दिया हो। और उस अपमान का बदला वह हर रोज अपने पति विनय से लेती थी। शब्दों से, तानों से और अपनी घमंड भरी नजरों से। “तुम मेरी जिंदगी के सबसे घटिया फैसले हो। मेरी औकात से नीचे भी कोई होगा तो वह सिर्फ तुम हो,” यह कहकर वह अपने बिस्तर पर जाकर लेट गई।

विनय चुपचाप जमीन पर बिछावन डालने लगा। उसे नींद नहीं आई उस रात। बस यह सोचते-सोचते आंखें भीगती रही। “मैंने ऐसा कौन सा पाप किया था कि मुझे इज्जत से जीने का हक भी नहीं मिला?” कहानी की शुरुआत ऐसे हुई थी। विनय एक पढ़ा-लिखा लेकिन बेरोजगार लड़का था, जिसकी हालातों ने उसे शहर लाकर एक बंगले में सफाई का काम करने पर मजबूर कर दिया था।

उसी बंगले में रहते थे मिस्टर आर वर्मा, एक प्रतिष्ठित उद्योगपति और उनकी इकलौती बेटी रीमा। एक रात मिस्टर वर्मा ने विनय के सामने हाथ जोड़कर कहा, “मैं तुमसे कुछ मांगना नहीं चाहता, विनय। लेकिन मेरी इज्जत, मेरी बेटी के भविष्य के लिए मैं तुमसे एक विनती कर रहा हूं। मेरी रीमा से शादी कर लो।”

विनय हैरान रह गया। “साहब, मैं तो आपका नौकर हूं। मैं आपकी बेटी के काबिल कहां?” लेकिन मिस्टर वर्मा ने जो जवाब दिया, उसने विनय को सोचने पर मजबूर कर दिया। “अगर मेरी बेटी को इस समाज की घटिया सोच से बचाना है, तो उसे एक ईमानदार दिल और सच्चे इंसान के साथ जोड़ना होगा और वो सिर्फ तुम हो।”

रीमा लाख मना करती रही, चिल्लाई, रोई। लेकिन मिस्टर वर्मा ने किसी की नहीं सुनी और एक दिन बिना रीमा की मर्जी के उसकी शादी विनय से हो गई। शादी की पहली रात ओ मिस्टर पतिदेव, “अब सुहागरात भी मनाएंगे क्या?” रीमा ने तंज कसते हुए कहा।

विनय सिर्फ इतना बोल पाया, “नहीं, रीमा, मैं बस तुम्हारे कमरे में रहने की इजाजत चाहता हूं। मैं तुम्हारा पति जरूर हूं, लेकिन जबरदस्ती कुछ नहीं करूंगा।” “शट अप! अपनी बकवास बंद रखो और उधर कोने में जमीन पर सो जाओ,” और हां, सुबह जल्दी उठकर मेरे ऑफिस के कपड़े प्रेस कर देना।

रीमा ने कहकर लाइट बंद कर दी। उस रात विनय ने समझ लिया था कि यह रिश्ता एक नाम भर है। मोहब्बत और इज्जत से इसका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं। एक साल बीत गया। मिस्टर वर्मा का निधन हो गया और रीमा के लिए विनय एक बोझ से ज्यादा कुछ नहीं रह गया।

सास मधु वर्मा दिन भर ताने देती थीं। “कैसा दामाद है जो हमारी बेटी की चमक के सामने भीख जैसा लगता है। घर के काम, कपड़े परहेज करना, पैर दबाना यही विनय की औकात बना दी गई थी। लेकिन वो हर दिन चुप था, पर टूटा नहीं था।

उस सुबह जब विनय ने चुपचाप अपने कमरे का दरवाजा खोला, तो सामने बैठक में कुछ औरतें बैठी थीं और उनकी बातों का केंद्र था वही विनय। “इधर आ, विनय, जरा मेरे पैर दबा दे। बहुत दर्द हो रहा है,” उसकी सास मधु वर्मा ने आदेश देने वाले लहजे में कहा।

विनय ने नजर उठाकर देखा। वहां बैठी एक औरत ने चौंकते हुए कहा, “यह तो तेरा दामाद है, मधु। इससे नौकरों वाला काम करवा रही है।” “हां, दामाद। दामाद तो किस्मत वालों को मिलते हैं। यह तो किस्मत का झटका है, जिसे मेरी बेटी की गर्दन में लटका दिया गया है। ना ढंग की नौकरी, ना पैसे। और ऊपर से दामाद बनकर बैठा है।”

मधु की जुबान से निकले जहर जैसे शब्दों पर सब औरतें हंसने लगीं। विनय ने कुछ नहीं कहा। जैसे यह सब उसके लिए अब रोज की बात बन गई हो। उसकी हथेलियां मधु के पैर दबा रही थीं। लेकिन दिल धीरे-धीरे एक आग में बदलता जा रहा था।

उसी वक्त रीमा अपने कमरे से निकली। ब्लैक शॉट टॉप में खुले बालों में महकती हुई जैसे कोई परी हो। उसे देखकर विनय की आंखों में एक पल के लिए चमक आ गई। “काश यह मुस्कान मेरे लिए होती।” लेकिन अगली ही सेकंड वो मुस्कान तीर बनकर उसके सीने में उतर गई।

“विनय, ड्राइवर की तबीयत खराब है। तुम मुझे ऑफिस ड्रॉप कर दो। और हां, यह मेरी फाइल्स और पर्स पकड़ो,” विनय ने सर हिलाया और उसकी गाड़ी स्टार्ट की। ऑफिस पहुंचते ही जब वह कार से उतरने लगा तो “रुको वहीं,” रीमा की आवाज तेज थी। “यह मेरा ऑफिस है। कोई देख लेगा तो मजाक बनेगा। मैं नहीं चाहती कोई तुम्हें मेरा पति समझे। बाहर रहो और घर जाकर बर्थडे पार्टी की सफाई करवाओ।”

यह सुनकर विनय की आंखें नम हो गईं। पर होठों पर मुस्कान आ गई। “तुम्हारा बर्थडे है। चाहे मेरी हैसियत कुछ भी हो, तुम्हारा दिन तो खास मनाऊंगा।” वहां से जाते ही विनय ने किसी को कॉल किया और सिर्फ इतना बोला, “कल का दिन रीमा की जिंदगी का सबसे यादगार दिन होगा। चाहे किसी को पसंद आए या नहीं।”

दूसरे दिन रात थी। मलिक मिशन पूरी तरह दुल्हन की तरह सजा था। सारा डेकोरेशन रीमा की पसंद का और विनय ने दिन रात मेहनत करके हर छोटी चीज पर ध्यान दिया था। रीमा जैसे ही पार्टी में आई, ब्लैक ग्लिटर गाउन, गोल्डन कर्ली बाल, हाई हील्स, एकदम परी लग रही थी।

विनय ने उसे देखकर बस एक ही बात अपने मन में दोहराई, “काश मैं तुमसे नफरत कर पाता। पर अफसोस मैं तो सिर्फ तुमसे प्यार करता हूं।” तभी वहां नकुल बजाज आ गया। महंगी गाड़ी से बड़े गिफ्ट के साथ। शहर का नामी बिजनेसमैन जो अब रीमा को रिलेशनशिप और बिजनेस डील दोनों में खींच रहा था।

और फिर शुरू हुआ खेल। नकुल ने पार्टी के बीच जोर से कहा, “अरे रीमा, आज तो तुम्हारा पति भी है।” तभी रीमा ने कहा, “आओ ना विनय, साथ में केक काटो।” विनय भागता हुआ आया। पहली बार रीमा ने उसका हाथ पकड़ा लेकिन जैसे ही उसने हाथ आगे बढ़ाया, नकुल ने पीछे से उसे धक्का दे दिया।

विनय का चेहरा सीधा केक पर जा गिरा। पूरा हॉल हंसी से गूंज उठा। किसी ने कहा, “लूजर है यह।” किसी ने कहा, “इसे तो घर के काम ही करने चाहिए।” रीमा भी हंसते हुए बोली, “मैंने इस नौकर को पति कहकर ज्यादा ही इज्जत दे दी।”

विनय चुपचाप उठा। अपने कपड़े साफ किए और बस एक बात मन में दोहराई, “अब बहुत हुआ। अब तमाशा नहीं। जवाब होगा और ऐसा जवाब होगा कि यह पूरी दुनिया देखेगी।” और विनय वहां से चला गया।

कुछ ही देर बाद विनय फिर से हॉल में वापस आया। इस बार चेहरे पर साफ सुथरी मुस्कान थी लेकिन आंखों में तूफान। अब तक सभी मेहमान आ चुके थे और हर कोई रीमा को एक से बढ़कर एक महंगे तोहफे दे रहा था।

नकुल बजाज ने भी जेब से एक डायमंड नेकलेस निकाला और बोल पड़ा, “यह मेरी तरफ से रीमा को ब्यूटीफुल गर्ल के लिए ब्यूटीफुल गिफ्ट। यह मेरे कलेक्शन का सबसे बेस्ट पीस है।” रीमा ने खुश होकर कहा, “वाओ, यह तो बहुत ही सुंदर है। थैंक यू सो मच नकुल।”

तभी विनय अपनी जेब से एक छोटा सा गिफ्ट बॉक्स निकालकर रीमा के सामने रख देता है। “यह तुम्हारे लिए है रीमा। पता है, तुम्हें पसंद नहीं आएगा। फिर भी दे रहा हूं।” रीमा चिल्ला उठी, “कहा ना? तुम यह तमाशा मत करो। तुम्हारा ₹50 वाला गिफ्ट मुझे इंसल्ट लगता है।”

लेकिन नकुल मुस्कुराते हुए बोला, “रुको रीमा, मैं देखना चाहता हूं। तुम्हारा यह भिखारी पति क्या गिफ्ट लाया है। सबको असली औकात पता तो चले।” रीमा बोली, “ठीक है विनय, लाओ। खोलते हैं यह आखिरी गिफ्ट। क्योंकि इसके बाद मैं तुमसे तलाक लेने जा रही हूं। तलाक के पेपर्स भी तैयार हैं और फिर मैं नकुल से शादी करूंगी।”

पूरा हॉल शांत हो गया। रीमा ने बॉक्स खोला और वो जैसे वही जम गई। आंखें फैल गईं। हाथ कांप गए, होठ सूख गए। उस बॉक्स में रखी थी Rolls Royce कार की चाबी और एक रियल रेयर डायमंड ब्रेसलेट जिसकी कीमत करोड़ों में थी।

रीमा की मां मधु वर्मा चिल्ला पड़ी, “यह क्या है? चोरी किया है क्या तूने? या फिर नकली है यह सब?” तभी विनय ने मुस्कुरा कर कहा, “सासू मां, यह नकली नहीं है। यह गिफ्ट मेरी पत्नी के लिए है। और हां, यह गहना किसी आम आदमी की पहुंच में नहीं होता। या तो किसी महारानी के पास होता है या किसी अरबपति की बीवी के पास।”

पर तुम तो नकुल कुछ बोल भी नहीं पाया। तभी उसका फोन बज गया। फोन पर आवाज आई, “हैलो मिस्टर नकुल बजाज। आप बैंक रपर्ट हो चुके हैं। आपकी कंपनी को सीज कर दिया गया है। सारे अकाउंट्स ब्लॉक कर दिए गए हैं। यह आदेश ईआर ग्रुप के सीईओ द्वारा जारी किया गया है।”

“क्या कौन सीओ?” नकुल कांपने लगा। फोन पर जवाब आया, “आर कपूर यानी आरुष कपूर।” हॉल में जैसे बम फट गया। सबका चेहरा विनय की ओर घूम गया। और विनय ने अपनी टाई सीधी करते हुए कहा, “हां, नकुल वही आरुष कपूर जिसे कुछ देर पहले तुमने केक में डुबोया था, वही हूं मैं एआर ग्रुप का सीईओ और आज शहर का सबसे अमीर आदमी।”

रीमा की सांसें अटक गईं। उसकी मां मधु चुप हो गईं। नकुल विनय के पैरों में गिर पड़ा, “सर, मुझे माफ कर दीजिए। मैं आपको नहीं पहचान पाया।” “पहचाना तो तुमने सही था लेकिन देर कर दी। तुमने मेरी बीवी को फंसाने की कोशिश की, उसके साथ धोखा करना चाहा और इसलिए मैंने तुम्हारी कंपनी खत्म कर दी।”

फिर विनय ने सबके सामने अपनी सच्चाई बताई। कैसे उसने एक पार्टी में पहली बार रीमा को देखा था। कैसे पहली ही नजर में उसे उससे प्यार हो गया था। और कैसे उसने अपनी असली पहचान छुपाकर एक नौकर बनकर उसके घर में काम करना शुरू किया।

“मैं नहीं चाहता था कि कोई लड़की मेरी दौलत से प्यार करे। मैं चाहता था कि वह मेरे दिल से प्यार करे। लेकिन अफसोस मैंने अपनी हैसियत छुपाई और तुम सब ने मेरा दिल कुचल दिया।” रीमा की आंखों से आंसुओं की धार बह रही थी। लेकिन विनय अब बहुत शांत था जैसे वो अब सब कुछ कह चुका हो।

हॉल में सन्नाटा पसरा हुआ था। हर चेहरा जैसे शर्म से झुका हुआ था। और रीमा वो तो जैसे जमीन में गढ़ चुकी थी। आंखों से बहते आंसू, कांपते होंठ और दिल में एक तूफान। उसने धीरे-धीरे चलकर विनय के पास आकर कहा, “विनय, नहीं अब तो आरुष कहूं। पता नहीं क्या कहूं। जो किया जैसा किया सब मेरी गलती थी। मैंने हमेशा तुम्हें नीचा दिखाया, जलील किया। लेकिन तुमने हमेशा मेरा सम्मान किया। आज जब सच सामने आया तो खुद से नजर मिलाने की हिम्मत नहीं बची।”

विनय कुछ नहीं बोला। बस एक फीकी मुस्कान के साथ उसकी आंखों में देखा। “तुम अभी मुझसे कुछ कह क्यों नहीं रहे?” रीमा बोली। विनय ने एक लंबी सांस ली। “रीमा, तुमने सही कहा था। मैं तुम्हारे लायक नहीं था। लेकिन शायद तुम भी उस प्यार के लायक नहीं थी जो मैंने तुम्हें दिया। आज जब मेरा सच सबको पता चल गया है, तो मैं चाहता हूं। मैं वहीं पर रुक जाऊं जहां तुम्हें मेरा प्यार झूठा लगता था।”

“तुम जाना चाहते हो?” रीमा की आवाज कांप रही थी। “हां, क्योंकि मैं नहीं चाहता कि कोई मुझसे इसलिए प्यार करे क्योंकि मैं अमीर हूं। मैं चाहता था कि तुम मुझसे उस दिन प्यार करती जब मैं तुम्हारे कपड़े प्रेस कर रहा था। जब मैं तुम्हारे ऑफिस के बाहर खड़ा था। जब तुम लोगों ने मुझे केक में डूबाया था।”

रीमा फूट-फूट कर रोने लगी। “विनय, मुझे माफ कर दो। मैं अब बदलना चाहती हूं। मैं अब तुम्हें समझ पाई हूं। मैं तुम्हें अब नहीं खोना चाहती।” विनय ने एक कदम पीछे हटते हुए कहा, “अब बहुत देर हो चुकी है, रीमा। प्यार तब खूबसूरत होता है जब वह समय पर मिले। वरना वह सिर्फ एक पछतावा बनकर रह जाता है।”

“क्या तुम मुझे गले नहीं लगाओगे?” रीमा ने कांपते हाथों से पूछा। विनय की आंखें भी अब भर आई थीं। “मैं हमेशा तुम्हें प्यार करूंगा, रीमा। लेकिन अब मैं तुम्हारा साथ नहीं दे पाऊंगा।” और यह कहते हुए विनय ने धीरे से रीमा को गले लगाया।

वो आलिंगन एक अलविदा था जिसमें मोहब्बत भी थी, दर्द भी और एक अधूरी कहानी की आखिरी सांस भी। रीमा की रुलाई थम नहीं रही थी। वो सिर्फ इतना कह पाई, “विनय, मैं तुम्हें हर दिन याद करूंगी। हर सांस में महसूस करूंगी।”

और विनय वो दरवाजे से निकल कर बिना पीछे देखे हमेशा के लिए चला गया। पार्टी के फूल मुरझा गए, महंगे गिफ्ट्स बेईमानी हो गए और एक दिल एकदम खामोश हो गया।

अब जरा आप खुद से पूछिए। जब किसी इंसान को उसकी औकात के नाम पर जलील किया जाए। उसके जज्बातों को कुचल दिया जाए और जब वो टूट कर बिखर जाए, तब क्या आंसुओं से भरी एक माफी उस इंसाफ की कीमत चुका सकती है? क्या देर से आया पछतावा उसी वक्त ठुकरा दिए गए सच्चे प्यार का जवाब बन सकता है?