माँ ने भूखे बच्चे के लिए दूध माँगा.. दुकानदार ने ज़लील कर भगा दिया! लेकिन अगले दिन जो
माँ की ममता: रीमा की कहानी
सुबह के 9 बजे थे। दिल्ली के एक भीड़भाड़ वाले बाजार में हलचल शुरू हो चुकी थी। सब्जी वालों की आवाजें, चाय की दुकानों से उठती भाप, दूध की दुकानों पर रोज़ की भीड़। इन्हीं आवाज़ों के बीच एक दुबली-पतली औरत, रीमा, तेज़ी से चली आ रही थी। उसकी गोद में एक साल का बच्चा जोर-जोर से रो रहा था। रीमा का पहनावा बेहद साधारण था—फटी हुई साड़ी, टूटी चप्पल, माथे पर पसीने की लकीरें और आंखों में चिंता की गहराई।
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वह सीधे शिव डेयरी की दुकान पर पहुँची। भीड़ में घुसते हुए उसने कांपती आवाज़ में कहा, “भैया, थोड़ा दूध दे दीजिए। बच्चा भूखा है, पैसे शाम को ला दूंगी, प्लीज।” दुकानदार शिवनाथ ने ताना मारते हुए जवाब दिया, “फिर वही कहानी? कल भी ऐसे ही आई थी। हम कोई मुफ्त सेवा केंद्र नहीं चला रहे।” भीड़ में खड़े लोग मुस्कुरा उठे, जैसे कोई तमाशा शुरू हो गया हो।
रीमा ने बच्चे का मुंह पोंछा, उसकी रोती आँखों को देखा और फिर दोबारा विनती की, “मैं सच में कल पैसे दे दूंगी, भैया। बच्चे ने दो दिन से कुछ नहीं पिया।” शिवनाथ ने डांटते हुए कहा, “तेरे जैसे सौ आते हैं रोज़। पैसे नहीं है तो बच्चा क्यों पैदा किया? निकल यहाँ से।” रीमा की आँखें भर आईं, लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया। बस अपने बच्चे को सीने से चिपकाकर धीरे-धीरे चली गई। भीड़ में किसी ने धीमी आवाज़ में कहा, “बेचारे को थोड़ा दे देते तो क्या चला जाता।” मगर उस आवाज़ को भी बाकी भीड़ ने निगल लिया।
उस रात रीमा अपने बच्चे को गोद में लेकर एक पुराने झोपड़े में बैठी थी। मिट्टी का चूल्हा बुझ चुका था। बच्चा भूख से थककर सो गया था, लेकिन रीमा की आँखें अब भी खुली थीं। उसमें आंसू नहीं, एक शांति, धैर्य और कहीं न कहीं एक सख्त निर्णय था।
अगले दिन वही बाजार, वही भीड़। लेकिन आज कुछ अलग था। रीमा फिर आई, लेकिन आज उसकी चाल में लड़खड़ाहट नहीं थी। चेहरे पर शांति थी। वह दुकान के काउंटर तक आई, पर्स से ₹100 का नोट निकाला और कहा, “आधा लीटर दूध देना।” उसकी आवाज़ में स्थिरता थी। शिवनाथ पहचान गया, हैरान हो गया। “कल तो बहुत मजबूरी में आई थी, आज पैसे कहां से आ गए?” उसने तिरस्कार और संदेह से पूछा।
रीमा ने हल्के स्वर में कहा, “जरूरत में जिस इंसान ने मुझे जलील किया, उसे जवाब देने का मन नहीं करता।” भीड़ अब पूरी तरह चुप थी। तभी एक सफेद कार आकर रुकी। उसमें से दो लोग, एक महिला और एक पुरुष, उतरे। महिला ने रीमा से कहा, “मैम, आपको लेने आए हैं। एनजीओ मीटिंग में देर हो रही है।” सबकी आंखें फटी रह गईं।
शिवनाथ ने चौंककर पूछा, “यह क्या चल रहा है?” रीमा ने उसकी ओर देखा, “कल तुमने मुझे सिर्फ एक गरीब मां समझा, लेकिन तुम नहीं जानते थे कि मैं एक रजिस्टर्ड एनजीओ की संस्थापक हूं। कल तुम्हें परखना चाहती थी और तुम नाकाम रहे।” शिवनाथ का चेहरा पीला पड़ गया। “माफ कर दीजिए,” उसने धीमी आवाज़ में कहा। रीमा बोली, “माफ कर दूंगी, अगर आगे किसी जरूरतमंद को तुम्हारे यहाँ से खाली हाथ ना लौटना पड़े। इंसान की पहचान उसकी हालत से नहीं, व्यवहार से होती है।”

दुकान की दीवार पर एक नया पोस्टर चिपका गया—
“No woman or her child shall be denied food or milk hereafter.”
कार में बैठते हुए रीमा ने अपने बच्चे के माथे पर हाथ फेरा। वह अब भी सुकून से सो रहा था। एनजीओ की लीगल हेड ने कहा, “मैम, आप चाहें तो सुबह वाला वाकया मीडिया को दे सकते हैं, बहुत पॉजिटिव इंपैक्ट बनेगा।” रीमा ने सिर हिलाया, “नहीं, दुकान नहीं बदलेगी अगर सोच नहीं बदले। मुझे तमाशा नहीं चाहिए, बदलाव चाहिए।”
चार साल पहले रीमा का जीवन खुशहाल था। पति अनिरुद्ध सरकारी क्लर्क था, छोटा सा घर, प्यारा बेटा, ढेरों सपने। एक सड़क दुर्घटना ने सब छीन लिया। मुआवजा भी बीमारी और रिश्तेदारों में चला गया। घर चला गया, बची सिर्फ एक मां और उसका भूखा बच्चा।
पहले घरों में काम किया, फिर पढ़ाई के कारण एक एनजीओ में पार्ट टाइम काम मिला। वहीं से बदलाव शुरू हुआ। खुद भूखी रही, इसलिए कसम खाई कि अपने जैसा दर्द किसी और को न झेलना पड़े। धीरे-धीरे वालंटियर बनी, फिर कोर टीम में आई, फिर खुद की छोटी टीम बनाई—माँ की ममता फाउंडेशन।
अब रोज़ शहर के स्लम एरिया में जाकर जरूरतमंद महिलाओं-बच्चों को खाना, शिक्षा और आत्मनिर्भर बनने की ट्रेनिंग देती थी। कल जब देखा कि एक मां को सिर्फ पैसे न होने के कारण दूध नहीं मिला, पुराने दिन याद आ गए। उसने तय किया कि अगली सुबह वही मां बनकर जाएगी, जो एक दिन थी—गरीब, लाचार, पर मजबूत।
कार एक सामुदायिक हॉल के सामने रुकी। दर्जनों महिलाएं रीमा का इंतजार कर रही थीं। रीमा ने बच्चे को स्टाफ के पास सौंपा और मंच की ओर बढ़ गई। “आप सब मुझे एनजीओ हेड समझती हैं, पर मैं भी कभी आप जैसी थी। मेरे पास न पैसा था, न पहचान। लेकिन मैंने अपने दर्द को कमजोरी नहीं बनने दिया। कल मेरी बेबसी को अपमान में बदला गया, आज मैंने वही अपमान किसी और की उम्मीद बना दिया।”

सोच का बदलाव, एक नई शुरुआत
अब शिवनाथ हर सुबह दुकान पर समय से पहले आता। उसकी आंखों में बदलाव था। हर ग्राहक में अब उसे सिर्फ ग्राहक नहीं, कभी कोई मां, कोई पिता, कोई भूखा बच्चा दिख जाता। उसकी आवाज़ नरम हो जाती। पोस्टर अब भी दुकान की दीवार पर है—कोई भूखा वापस नहीं जाएगा।
एक शाम रीमा का बेटा, जो अब थोड़ा बड़ा हो चुका था, दुकान पर आया। छोटे हाथों में ₹5 थे। “दूध मिलेगा क्या अंकल?” शिवनाथ ने मुस्कुरा कर कहा, “ना पैसे चाहिए, ना बहाना। तू रीमा मैडम का बेटा है ना?” बच्चे ने सिर हिलाया। शिवनाथ ने झुककर उसे दूध की थैली दी, “जा बेटा, और मां को कहना अब कोई मां रोएगी नहीं यहां।”
उस रात रीमा ऑफिस में बैठी थी, एनजीओ की अगली योजना पर काम कर रही थी। बेटा आया, “आज दूध अंकल ने खुद दिया, पैसे भी नहीं लिए।” रीमा थोड़ी देर चुप रही। फिर बोली, “बदलाव तब आता है जब कोई अपनी गलती समझकर उसे सुधारने की हिम्मत करता है। आज उन्होंने वह हिम्मत दिखाई।”
क्योंकि असली बदलाव, दिल से आता है।
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